Subscribe by Email

चौकीदार का चोर होना

((हिंदी के सबसे बड़े और सम्मानित पत्रकार प्रभाष जोशी हाल में संपन्न आम चुनावों के दौरान खबरों की खरीद-फऱोख्त के शर्मनाक धंधे के खिलाफ खम ठोककर मैदान में उतर पड़े हैं। उन्होंने मांग की है कि खबरें बेचकर पत्रकारिता की पवित्रता को दागदार करने वाले अखबारों का रजिस्ट्रेशन रद्द होना चाहिए। अगर ज़रूरी हो तो इसके लिए नया कानून भी बनाया जाना चाहिए। इस विषय पर उनका पिछला लेख “खबरों के पैकेज का काला धंधा” आप यहां पहले पढ़ चुके हैं। जनसत्ता के अपने मशहूर कॉलम “कागद कारे” में इस बार भी प्रभाष जी ने इसी मुद्दे पर कलम उठायी है। पढ़िए और जनतंत्र के चौथे स्तंभ को बचाने की इस मुहिम में उनका साथ दीजिए।))

————————————————————————–

चुनाव की खबरों को बेचने का काला धंधा ऐसा नहीं कि अखबारों ने कोई छुपाते और लजाते हुए किया हो। छोटे-मोटे स्ट्रिंगर से लेकर संपादक और मालिक तक और उधर छुटभैये कार्यकर्ता से लेकर उम्मीदवार, उसकी पार्टी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तक सब जानते थे कि अखबारों में चुनाव की खबरें पैसे और वह भी काले पैसे से छप रही हैं। राजनीतिक लोगों की बेशर्मी तो फिर भी समझी जा सकती है, क्योंकि उनमें से अधिकतर अखबारों में छपे को अपना प्रचार मानकर ही चलते हैं। लेकिन अखबारों – खासकर हिंदी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय दैनिक, जो अपनी गिनती दुनिया के सबसे बड़े अखबारों में और सबसे ज्यादा पाठकों वाले अखबारों में करवाते हैं और अपनी पत्रकारिता की तारीफ करते खुद ही नहीं थकते – वे भी खबरों की अपनी पवित्र जगह बेचते हुए आंखों की शर्म भी नहीं रखते थे।

कई अखबारों ने तो बाकायदा विज्ञापन के रेट कार्ड की तरह चुनाव कवरेज के भी रेट कार्ड छपवाए थे और वे न सिर्फ अपने स्टाफ को दिए थे, बल्कि उम्मीदवारों को भी दिए गए थे। दो राष्ट्रीय दैनिकों के छोटे स्थानीय संस्करणों के रेट कार्ड मेरे पास हैं। एक से पांच लाख तक के पैकेज में रंगीन और सादे कवरेज के रेट अलग-अलग मदों में दिए गए हैं। जैसे प्रचार अभियान के 8 गुणा 12 के रंगीन कवरेज के 6,000 और सादे के 4,800 रुपये। जनसंपर्क के उतने ही कवरेज के तीस और चौबीस हजार। समर्थकों की अपील 9 गुणा 12 के सात और पांच हजार। जनसभा/रैली के 10 गुणा 16 के तीस और चौबीस हजार। प्रायोजित साक्षात्कार 7 गुणा 12 के साढ़े दस और साढ़े आठ हज़ार। मांग पर विशेष कवरेज 25 गुणा 16 के पच्चीस और बीस हज़ार। विशेष फीचर/इनोवेशन 51/33 के दाम मोलभाव से तय होंगे। चुनाव चिह्न के साथ वोट देने की अपील 8 गुणा 12 के अठारह से साढ़े चौदह हजार। प्रमुख मुद्दों पर बयान और प्रतिक्रिया के अलग। फोटो फीचर आदि के अलग।

यानी चुनाव प्रचार को अलग-अलग मदों में बांटकर हर एक के रेट तय किए गए थे। मालिकों और संपादकों को ऐसा करते हुए कहीं भी यह अपराध-बोध नहीं था कि अपने अखबार की खबरों की पवित्र जगह इस तरह बेचते हुए वे कोई अनैतिक और पत्रकारिता की आचार संहिता के उल्लंघन का पाप कर रहे हैं। पूछने पर वे उसे तरह-तरह से उचित ठहराते थे। जैसे तेरह साल पहले मध्य प्रदेश के एक बड़े प्रकाशन केंद्र में एक पुराने और प्रतिष्ठित अखबार के एक संवाददाता ने एक उम्मीदवार से एक लाख रुपया ले लिया और पूरे चुनाव भर उसकी अच्छी खबरें छापीं। सन अठानवे के चुनाव में उसी केंद्र में गया तो पता चला कि उस संवाददाता की तो छुट्टी हो गयी, लेकिन अब अखबार ने ही उम्मीदवारों से डील कर लिए हैं। उसके मालिक/संपादक अपने पुराने मित्र हैं। उनसे पूछा कि यह क्या हो रहा है? क्या करें प्रभाष जी – सब रिपोर्टर बाला-बाला पैसा लेकर चुनाव प्रचार छापते थे। हमने तय किया कि हमारा अखबार है तो हमीं छापेंगे और पैसा लेंगे। रिपोर्टरों को कमीशन दे देंगे।

खबरों पर भ्रष्टाचार करने के पत्रकारों के धतकरम से ऐसी सीख मध्य प्रदेश के हिंदी दैनिक के मालिक/संपादक ने ही नहीं ली। ऐसे मामलों में पत्रकारिता के मूल्यों और आचार संहिता को उद्दंडता से तोड़ने में अगुआई करने वाले टाइम्स ग्रुप ने भी अपने खाऊ-कमाऊ पत्रकारों से सीख लेकर मीडियानेट नाम का जंजाल बनाया और उसके जरिये पैसे लेकर खबरें छापने लगे। दावा किया कि भ्रष्टाचार को रोकने का यह कारगर तरीका है क्योंकि इसमें खबरें बेचने का काम पारदर्शिता और ईमानदारी से किया जाता है। भ्रष्टाचार को सदाचार बनाने की इस दलील को अपन बाद में देखेंगे। अभी तो यह देखें कि रिपोर्टरों के पैसे लेने के उदाहरण से मालिकों ने यह चलन क्यों चलाया।

जैसे कोई-कोई पत्रकार रिश्वत खा लेते हैं वैसे ही ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता का अपना काम समर्पण और सच्चाई और ईमानदारी से भी करते हैं। बल्कि भारत में पत्रकारिता को सम्मान इसीलिए मिला कि संपादकों/पत्रकारों ने बलिदान, तपस्या और लोकहित में समर्पण से काम किया। यहां बात महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी और माखललाल चतुर्वेदी जैसे महान नेता और संपादकों की नहीं है। ‘स्वदेश’ के एक के बाद एक पंद्रह पत्रकारों ने अंडमान में काला पानी काटना मंजूर किया, पर न तो अंग्रेजों का लगाया जुर्माना भरा, न उनका कहा छापा। वे कोई प्रसिद्ध और महान नेता नहीं थे। हम उनके नाम तक नहीं जानते ऐसे मामूली लोग थे वे। और ऐसा नहीं कि आजादी के आंदोलन के कारण ऐसे पत्रकार पैदा हुए। सन पचहत्तर में इंदिरा गांधी ने इमरजंसी सेंसरशिप लगाई तो उसका भी विरोध मालिकों, संपादकों, पत्रकारों ने किया। कुलदीप नैयर जेल गए, मुलगावकर और इस कलम घसीट ने इस्तीफे दिए और कितने पत्रकारों ने अखबार बंद किए या भूमिगत पत्रकारिता की। आज भी अपने काम पर अड़ जाने वाले पत्रकार आपको मिल जाएंगे।

क्या बात है कि इनको मालिक और प्रबंधन उदाहरण नहीं बनाते लेकिन एक रिपोर्टर या एक आर्थिक पत्रकार पैसे खा लेता है तो वे उससे सीख लेकर वही करने लगते हैं जो रिश्वतखोर पत्रकार ने किया था। भला और ईमानदार पत्रकार मालिकों के सम्मान और गर्व का पालन किया जाने वाला उदाहरण क्यों नहीं बनता और रिश्वतखोर पत्रकार से सबक वे क्यों ले लेते हैं? जिस रिपोर्टर ने उम्मीदवार से पैसे लेकर उसकी खबरें छापीं उसे हमारे मालिक/संपादक ने अखबार और पत्रकारिता से बाहर करके अपने पूरे स्टाफ के सामने सख्त उदाहरण क्यों नहीं रखा? इकनॉमिक टाइम्स ने अपने रिश्वतखोर पत्रकारों को निकालकर मिसाल क्यों नहीं बनाई कि ऐसा जो करेगा वह पत्रकारिता में टिक नहीं सकेगा? क्योंकि हम उसी के रास्ते पर चलते हैं जिसका रास्ता हमें अच्छा लगता है। अपने मालिक और प्रबंधन भ्रष्ट और रिश्वतखोर पत्रकारों का उदाहरण लेते हैं क्योंकि वे भी वही करना चाहते हैं जो उनके मुलाजिम ने पैसे बनाने के लिए किया।

भ्रष्टाचार को सदाचार बनाने की टाइम्स की दलील का मतलब है कि बलात्कार करना और उसकी इच्छा रखना स्वाभाविक है और हर आदमी चाहता है। इसलिए आपके घर की किसी मां, बेटी, बहन, भाभी आदि से कोई बलात्कार कर जाए तो नाहक हो हल्ला और पाखंड मत करो। बलात्कार को कानूनी रूप से मंजूर कर लो। उसके खिलाफ दंड और वर्जना मत बढ़ाओ। बलात्कार से पैदा हुए बच्चे/बच्ची का तिलक करो और वैध उत्तराधिकारी मान लो। इससे बलात्कार भ्रष्टाचार नहीं रहेगा और सदाचार हो जाएगा। आखिर बलात्कार आदमी की सजह प्रवृत्ति है और स्वस्थ और सभ्य समाज सहज प्रवृत्तियों को मानकर ही विकास करता है। जैसे नवउदार पूंजीवाद लालच, सट्टाखोरी और धोखाधड़ी को आर्थिक विकास की प्रेरणाएं मानता है। और पंद्रह सितंबर दो हजार आठ के दिन वॉल स्ट्रीट के दिवाले के बाद भी वित्तीय पूंजीवाद को अमर और बाजार को स्वयंभू मानता है।

अब दिक्कत यह है कि खुले से खुले आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में स्वतंत्रता और उदारता होती है। लेकिन एक बार विवाह हो जाए और बना रहे तो व्यभिचार बर्दाश्त नहीं होता। हत्याएं हो जाती हैं और स्त्री-पुरुष अलग हो जाते हैं क्योंकि गृहस्थ जीवन वफादारी और एक-दूसरे में विश्वास के बिना नहीं चल सकता। दरअसल मनुष्य का कोई भी कार्य व्यापार संबंध और विश्वास के बिना नहीं टिक सकता। व्यापार-व्यवसाय और उद्योग भी बिना विश्वास के नहीं चल सकता। पूंजीवाद में भी सबसे महत्वपूर्ण तो ‘कांट्रेक्ट’ करार ही है। पत्रकारिता अखबार और पाठक में विश्वास और मालिक, संपादक और पत्रकार में आपसी विश्वास से ही होती है। विज्ञापन को खबर बनाकर छापना, बिना बताए कि यह पैसा लेकर छापी गयी है, पाठक के विश्वास को तोड़ना और उसके साथ खेल करना है। खबर को अखबार की पवित्र जगह इसीलिए कहा जाता है कि वह पाठक के विश्वास की जगह है। दुनिया में कहीं भी पाठक खबर के लिए अखबार लेता है, विज्ञापन के लिए नहीं। विज्ञापन देने वाले जानते हैं कि पाठक विज्ञापन पर उतना भरोसा नहीं करता जितना खबर पर करता है, इसीलिए तो वे विज्ञापन की खबर बनवाकर छपवाना चाहते हैं।

जिन मालिकों और अखबारों ने आम चुनाव में चुनाव की खबरों के साथ यह धोखाधड़ी की है उनने तो उस लोकतंत्र से ही खिलवाड़ किया है जो प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी करता है। लोकतंत्र में पत्रकारिता का धर्म है कि वह चुनाव के समय वोटरों को सच्ची और प्रामाणिक खबरें दे और उन्हें अपना ठीक फैसला करने में मदद करे। हमने देखा कि अखबारों ने काला पैसा बनाने के लिए पत्रकारीय धर्म छोड़ा और पाठकों से धोखाधड़ी की। यह प्रेस की स्वतंत्रता, विश्वसनीयता और लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका को नष्ट करने का निर्लज्ज धतकरम है। आप यह भी देखेंगे कि जिन अखबारों ने पत्रकारीय कर्तव्य और धर्म छोड़कर ऐसे काले धंधे से कमाई की वही मतदाता जागरण के अभियान चला रहे थे। बिल्कुल अपने जमाखोर, मुनाफाखोर व्यापारियों की तरह, जो काली कमाई से दान-पुण्य करके गंगा में डुबकी लगाते हैं। इन लोगों ने समाचार पत्र का काम छोड़कर छापेखाने का काम किया है। इसलिए इनका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जाना चाहिए और इनको प्रिंटिंग प्रेस का लाइसेंस लेना चाहिए। इसी तरह जिस उम्मीदवार की जितनी खबरें छपी हैं वे सब विज्ञापन की दर से उसके चुनाव खर्च में शामिल की जानी चाहिए। कानून न हो तो अगली संसद को बनाना चाहिए।

वे कहते हैं कि पत्रकारिता तो व्यापार भी है और व्यापार में तो कमाई का कोई तरीका कोई आजमाता है तो सभी उसे अपनाते हैं। इस देश में व्यापार में खुली होड़ और कमाई करने की छूट और आजादी है। इसलिए सभी अखबार पैसे लेकर खबरें छापने लगे हैं और इस चलन से कोई बच नहीं सकता। यह सरासर झूठ है। हमारे मित्र हरिवंश ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक ही नहीं हैं, वे उसका पूरा प्रबंधन देखते हैं और वित्तीय व्यवस्था भी करते हैं। उनने पैसे लेकर खबरें छापने के काले धंधे के खिलाफ अपने अखबार में अभियान तो चलाया ही, पहले पेज पर ‘खबरों का धंधा’ शीर्षक से लेख भी लिखा। उनने अपनी आचार संहिता छापी। साफ कहा कि प्रेस विज्ञप्ति, इंटरव्यू, विश्लेषण, फोटो, उम्मीदवारों के साथ दौरे जैसे पत्रकारीय कर्तव्य को हम हमेशा अपने धर्म की तरह निबाहेंगे। हमारा कोई भी पत्रकार इसका उल्लंघन करे तो इस नंबर और पते पर शिकायत कीजिए, हम तत्काल कार्रवाई करेंगे। उनने इस काले धंधे के खिलाफ दूसरे पत्रकारों के लेख और पाठकों के पत्र भी छापे। हरिवंश को विज्ञापन चाहिए, लेकिन उनने कहा, हम खबरों की अपनी पवित्र जगह नहीं बेचेंगे। ‘प्रभात खबर’ फल-फूल रहा है।

तो साफ है कि जिन अखबारों ने काला पैसा लेकर पाठकों को बिना बताए विज्ञापन को खबर बनाकर छापा है उनने पत्रकारिता और व्यवसाय दोनों के साथ धोखाधड़ी की है। सावधान हो जाइए, जिसे आपने अपने लोकतंत्र और सभ्य समाज की निगरानी के लिए चौकीदार बनाया था वही चोर हो गया है। और इसकी सजा तो पाठक समाज को ही देनी होगी। ढिलाई पत्रकारिता को खत्म कर देगी।

Share This Post

24 Responses to चौकीदार का चोर होना

  1. चुनाव में मीडिया की संदिग्ध भूमिका पर ऑनलाईन प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करें
    (सिटिज़न्स न्यूज सर्विस से साभार। आशा परिवार के बॉबी रमाकान्त द्वारा प्रस्तुत ऑनलाईन प्रतिवेदन पर हिन्दी में टिप्पणी सहित सहमति दें। प्रतिवेदन पढ़ने और सहमति देने के लिए यहां क्लिक करें:
    http://www.petitiononline.com/media000/petition.html

    • रंगनाथ सिंह Reply

      May 28, 2009 at 11:22 am

      हिन्दी के “सबसे बड़े और सम्मानित पत्रकार” कुछ अजीब सा विश्लेषण है। माना प्रभाष जी हिन्दी के सबसे बड़े पत्रकार हैं लेकिन इसे इस तरह से लिखना थोड़ा अटपटा लगता है। ऐसा विश्लेषण विष्णु राव पराड़कर या अम्बिका प्रसाद वाजपेयी के नाम के आगे भी नहीं लगाया होगा। प्रभाष जोशी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। फिर इस कृत्य का कोई अर्थ नहीं समझ में आता। यदि इस विश्लेषण को प्रभाष जी का आशीर्वाद प्राप्त है तो ज्यादा चिंता की बात है। हिन्दी भाषा की एक बड़ी कमी है कि ये समतावादी नहीं है। अंग्रेजी में ऐसे फर्जी विश्लेषण को जगह दिए बिना काम चल जाता है लेकिन हिन्दी में ऐसा करना कठिन है। आप और जी छाप भाषा लिखने वाले के साहस को जरूर ही प्रभावित करती है। लिखित भाषा का अपना मूल्य और महत्व होता है। हम लोग व्यक्तिगत सम्मान और प्रशंसाभाव को हर्फ दर हर्फ पन्नों में उतारने लगें तो जो दृश्य तैयार होगा वो काफी दारूण होगा। हालाँकि ऐसे साहित्य की कमी नहीं है। किसी सरकारी कृपा प्राप्त किताबों का पढ़ लें तो इसके ढेरों नमूने मिल जाएंगे।

      • - साहस का पता ‘जी’ और ‘आप’ की जगह तू-तड़ाक करने से नहीं चलता। साहस का पता उस बात से चलता है, जो कही जा रही है। प्रभाष जोशी को प्रभाष जी आपने भी लिखा है। किसी को सम्मानपूर्वक संबोधित करने में कुछ भी ग़लत नहीं है। ग़लत तब होता है जब व्यक्तियों के प्रति हमारा सम्मान का भाव ऐसे श्रद्धाभाव में बदल जाता है, जो श्रद्धेय के खिलाफ तर्क की भाषा नहीं सुनना चाहता। आप भरोसा रखें, “जनतंत्र” में सम्मान सबका है, श्रद्धाभाव किसी के लिए नहीं।

        - “हिन्दी भाषा की एक बड़ी कमी है कि ये समतावादी नहीं है।” – ये आपकी निजी राय हो सकती है। हम इससे कतई सहमत नहीं।

        टिप्पणियों के लिए धन्यवाद। आगे भी आप इसी तरह अपनी टिप्पणियां देते रहेंगे ऐसी उम्मीद है।

        • रंगनाथ सिंह Reply

          June 3, 2009 at 4:35 am

          महोदय आप ने कुछ दिन पहले अपनी एक जवाबी प्रतिक्रिया में कहा था कि आपको अपने पाठकों की शालीनता में पूरा विश्वास है इसलिए आपने कमेंट माॅडरेशन नहीं रखा है।
          मुझे यह समझने में कठिनाई हो रही है कि आप ने मेरी किस टिप्पणी की अशालीनता से क्षुब्ध होकर मेरे ईमेल आई डी को माॅडरेशन पर डाल दिया। मुझे आप तक अपनी बात पहुँचाने के लिए दूसरी आई डी का सहारा लेना पड़ा। मैं चाहता तो इस आई डी से अपनी टिप्पणी को तुरंत पोस्ट कर देता। लेकिन अब इसकी कोई जरूरत नहीं बची है, न ही आपके ”जनतंत्र” में मेरी कोई रूचि नहीं बची है। आप आपके माॅडरेशन के लिए उपलब्ध उस टिप्पणी को पढ़े़़ और जरूरी समझे ंतो अपने पूर्वाग्रह पर पुनिर्विचार करें। हो सके तो मेरी टिप्पणी को पाठकों के सामने प्रस्तुत करें जिससें वो भी जान सकेे कि किस तरह हक अशालीनता के अंदेशे से मझे माॅडरेशन पर डाला गया था। क्योंकि शायद भविष्य में किसी और मामले में आपको और पाठकों को इस नजीर की जरूरत पड़े।

          • समरेंद्र Reply

            June 3, 2009 at 7:11 am

            रंगनाथ जी,

            आपका कमेंट मॉडरेट करने की हमारी कोई मंशा नहीं। सच तो ये है कि जनतंत्र ने शुरू में किसी का कमेंट भी मॉडरेट नहीं करने का फ़ैसला लिया था। मगर कुछ पाठक ऐसे कमेंट भेजते हैं जिन्हें किसी भी लिहाज से छापा नहीं जा सकता। इसलिए मज़बूरी में हमें ये कदम उठाना पड़ा।

            जहां तक आपको हुई परेशानी का सवाल है। हो सकता है कि जब से हमने कमेंट मॉडरेटर को ऑन किया है, उसके बाद आपने कोई टिप्पणी नहीं भेजी हो। मुझे लगता है कि अब आप टिप्पणी भेजेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।

            धन्यवाद

  2. हर्षवर्धन Reply

    May 18, 2009 at 5:24 pm

    प्रभाषजी की पहल अच्छी है। और, ऐसे लेख हमें हमारे कर्तव्य की याद दिलाते हैं। लेकिन, मुझे दिक्कत इस बात से है कि प्रभाषजी को जब ये सौदेबाजी-दलाली 98 के चुनाव से ही पता थी तो, उस के खिलाफ मुहिम उसी समय से क्यों नहीं शुरू की। इनका सम्मान है लोग बात सुनते हैं। कुछ तो होता। 2007 के विधानसभा चुनावों में मैंने भी अखबारों-सहारा-ईटीवी चैनलों में खबर के लिए पत्रकारों को उम्मीदवारों से पैसे मांगते देखा है। बहुत गुस्सा आया। जहां तक हो सकता था चीखा भी लेकिन, अपने साथी पत्रकार ही उसे इस कान से सुन उस कान से निकाल देते। अब जब एक विदेशी पत्रिका ने चंडीगढ़ के निर्दलीय उम्मीदवार के जरिए पत्रकारिता की सौदेबाजी की खबर छापी है तो, इस पर हल्ला हो रहा है।

    • समरेंद्र Reply

      May 18, 2009 at 6:01 pm

      हर्षवर्धन जी,
      आपकी पीड़ा अपनी जगह सही है। ये सौदेबाजी काफी पहले से चल रही है। लेकिन आप ये भी मानेंगे कि पहले कभी इतने व्यापक स्तर पर ख़बरों का सौदा नहीं हुआ। इसलिए आज प्रभाष जी अख़बारों की दलाली के विरोध में खुल कर सामने आए हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिये। जहां तक आपके चीखने का सवाल है, मीडिया के बाज़ार में आपकी और हमारी हैसियत एक प्यादे जैसी है और प्रभाष जी महारथी हैं। इसलिए आपके और मेरे शोर मचाने से आमतौर पर कोई हलचल नहीं होती। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम शोर मचाना बंद कर दें। हमारा काम ही शोर मचाना है। लोगों को वक़्त रहते आगाह करना है। सही बदलाव के लिए दबाव बनाना है।

  3. anupam agrawal Reply

    May 19, 2009 at 2:02 pm

    मीडिया से सीधे सम्पर्क ना होने वाले लोगों के लिये यह आश्चर्यचकित करने वाली बात है .

    और यह सुनकर और भी ताज्जुब होता है कि जिम्मेदार लोग कैसा व्यवहार कर रहे हैं.

  4. Jay Kishan Singh Reply

    May 20, 2009 at 8:29 pm

    प्रभात खबर और हरिवंश ने भी खबरें बेची हैं प्रभाष जी

    हिंदी के बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी हाल में संपन्न आम चुनावों के दौरान
    खबरों की खरीद-फऱोख्त के शर्मनाक धंधे के खिलाफ खम ठोककर मैदान में उतर
    पड़े हैं। जनसत्ता के अपने मशहूर कॉलम “कागद कारे” में इस बार भी प्रभाष
    जी ने इसी मुद्दे पर कलम उठायी है।
    लेकिन अफसोस है कि प्रभाष जी ने इस टिप्पणी में एक अखबार प्रभात खबर और
    उसके संपादक हरिवंश को इस धंधे से अलग बताने का हास्यास्पद प्रयास किया
    है जबकि बिहार, झारखंड और बंगाल के साथ देश के अन्य हिस्सों में भी
    राजनीतिक लोगों और नागरिकों को मालूम है कि प्रभात खबर और हरिवंश ने
    खबरों के धंधे में बढ़-चढ़कर हिस्सा बटोरा। हां, दूसरों ने अपनी पीठ नहीं
    थपथपायी, नैतिकता नहीं बघारी जबकि हरिवंश ने सारे कुकर्म करते हुए अपनी
    पीठ खुद थपथपायी, प्रभाष जी को भी गलत सूचना दी।
    प्रभाष जी ने एक जरूरी सवाल उठाया, धन्यवाद। लेकिन पत्रकारिता के इस काले
    चेहरे में एक चमचमाता सफेद चेहरा तलाश कर पेश करने की कवायद हास्यास्पद
    है। प्रभाष जी ने लिखा है-
    हमारे मित्र हरिवंश ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक ने पैसे लेकर खबरें
    छापने के काले धंधे के खिलाफ अपने अखबार में अभियान तो चलाया ही, पहले
    पेज पर ‘खबरों का धंधा’ शीर्षक से लेख भी लिखा। उनने अपनी आचार संहिता
    छापी। साफ कहा कि प्रेस विज्ञप्ति, इंटरव्यू, विश्लेषण, फोटो,
    उम्मीदवारों के साथ दौरे जैसे पत्रकारीय कर्तव्य को हम हमेशा अपने धर्म
    की तरह निबाहेंगे।
    क्या प्रभाष जी को यह नहीं मालूम कि प्रभात खबर ने दिसंबर 2008 में तमाड़
    में विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री शिबू सोरेन और आजसू नेता सुदेश
    महतो के प्रत्याशी के पक्ष में भारी भरकम कीमत वसूल कर कई दिनों तक दो-दो
    तीन-तीन दिनों तक पूरे-पूरे पेज छापे। इस दौरान एक बेचारे निर्दलीय
    उम्मीदवार राजा पीटर को दम भर कोसा भी गया। लेकिन प्रभात खबर और अन्य
    अखबारों द्वारा इतना गुमराह किये जाने के बावजूद तमाड़ की जनता ने दोनों
    धनवान प्रत्याशियों को ठिकाने लगाकर राजा पीटर को बहुमत से जिताया। इसके
    कारण शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, राष्ट्रपति शासन लगा। जनता
    और जनाकांक्षा राजा पीटर के साथ थी, प्रभात खबर और अन्य अखबार शिबू सोरेन
    और आजसू की दलाली कर रहे थे। सिर्फ पैसों के लिए प्रभाष जी, सिर्फ पैसों
    के लिए। आपके सूत्र रांची में होंगे, पता लगा लें ताकि आपका भ्रम थोड़ा
    दूर हो।

    आप खुश हैं कि ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक हरिवंश ने पैसे लेकर खबरें
    छापने के काले धंधे के खिलाफ अपने अखबार में अभियान तो चलाया ही, पहले
    पेज पर ‘खबरों का धंधा’ शीर्षक से लेख भी लिखा।
    लेकिन क्यों?
    क्योंकि इस बार खुद प्रभात खबर ने खबरों का धंधा करके खुद भारी-भरकम राशि
    जुटाने का टारगेट अपने संपादकों और प्रबंधों को दे रखा था। जिस दिन पहले
    पेज पर हरिवंश ने खबरों का धंधा शीर्षक टिप्पणी लिखी, उसके दूसरे ही दिन
    रांची के कांग्रेस प्रत्याशी कंेद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय की प्रशंसा
    में पूरे 24 पेज का विशेष संस्करण छापा गया। इसके बाद बंधु तिर्की का। यह
    सिलसिला हर संस्करण में चला। हर पार्टी और हर प्रत्याशी के पास प्रभात
    खबर के भी वरिष्ठ संपादकीय व प्रबंधकीय लोग अपने पैकेज और लुभावने
    प्रस्ताव लेकर चक्कर काटते, खबरांे के खरीददारों की लगातार तलाश करते
    रहे। खबरें बेचने में हरिवंश और उनका प्रभात खबर कहीं से भी पीछे नहीं
    रहा प्रभाष जी, आप कृप्या इसका पता लगा लें और अपनी साख, विश्वसनीयता
    कायम रखने के लिए दुबारा इस संबंध में टिप्पणी लिखकर भूल सुधार कर लें।
    एक दिलचस्प बात और। प्रभात खबर ने पहले पेज पर जो खबरों का धंधा शीर्षक
    से हरिवंश की टिप्पणी छापी थी, उसका असल संदेश जानते हैं क्या था?
    मैं बताउं आपको।
    उसमें मोटे-मोटे अक्षरों में यह बताया गया था कि हम भी विज्ञापन के बतौर
    कीमत वसूल कर आपकी मनचाही खबरें व विश्लेषण छापने को सहर्ष तैयार हैं।
    बस, कीमत लगाइये और खबरें छपाइये।
    उस दिन का अखबार मंगाकर देखें तो आपको इस का पता चल जायेगा प्रभाष जोशी
    जी। इसकी स्पष्ट ध्वनि यह थी कि भइया, आप उधर कहां जा रहे हो, हमें
    ईमानदार समझने का भ्रम निकाल दो, हम भी आपकी प्रायोजित खबरें छापने को
    तैयार बैठे हैं।

    हरिवंश बार-बार अपनी टिप्पणियों में धीमे स्वर में यह बताते हैं कि हां,
    विज्ञापन छापना हमारी मजबूरी है और हम अगर ऐसी सामग्री छापते हैं तो उसके
    साथ प्रभात खबर मार्केटिंग इनीशिएटिव या विज्ञापन या प्रायोजित वगैरह भी
    अवश्य लिखते हैं। अब अगर आपने खबर की शक्ल में प्रायोजित सामग्री छाप ही
    दी, 24 पेज रंग ही दिये हैं किसी के गुणगान में तो उसमें छोटे अक्षर में
    लिखे प्रभात खबर मार्केटिंग इनीशिएटिव का अर्थ भला हर पाठक क्या समझ
    पायेगा?
    क्या हरिवंश यह बतायेंगे कि उन्होंने किस किस संस्करण में किस किस
    प्रत्याशी की ऐसी कितनी प्रायोजित सामग्री छापी?

    प्रभाष जी, सबसे जरूरी बात सबसे अंत में ध्यान से पढ़ियेगा। प्रभात खबर
    मार्केटिंग इनीशिएटिव के जरिये प्रकाशित ऐसे प्रायोजित पृष्ठों के लिए
    प्रभात खबर ने भारी-भरकम रकम वसूली लेकिन जितनी रकम वसूली, उसकी मात्र
    पांच से दस प्रतिशत राशि का बिल दिया गया। कारण यह कि चुनाव आयोग के खर्च
    की सीमा के कारण प्रत्याशियों के लिए यह संभव नहीं कि पूरा खर्च दिखा
    सकें। इसके लिए अन्य अखबारों की तरह प्रभात खबर भी कम राशि का बिल देने
    खुला आॅफर लिये घूम रहा था। यह अंडर बिलिंग क्या चुनाव में काले धन को
    खपाने का अंग नहीं? क्या हरिवंश अपने प्रथम पृष्ठ पर छापेंगे कि उन्होंने
    सुबोधकांत से 24 पेज के विशेष संस्करण के लिए कितने पैसे वसूले और बदले
    में कितने का बिल दिया।

    सब इस देश के नागरिकों को मूर्ख बना रहे हैं प्रभाष जी। आपने भी अपनी इस
    टिप्पणी के जरिये ठीक यही काम किया है। एक-दूसरे की पीठ खुजाने का ध्ंाधा
    कब तक चलेगा प्रभाष जी? साहस और नैतिकता हो तो एक बार आप हरिवंश और
    प्रभात खबर की चकाचैंध से बाहर निकल कर निष्पक्ष आकलन करें। रांची में
    आपके अनगिनत सूत्र हैं जिनसे आप उक्त तथ्यों की पुष्टि कर सकते हैं।
    आपसे जवाब की उम्मीद करूं श्रीमान?

    आपके विराट व्यक्तित्व के समक्ष क्षमायाचना सहित

    जयकिशन सिंह
    बिरसा चैक, रांची

    • जनतंत्र डेस्क Reply

      May 20, 2009 at 10:30 pm

      जयकिशन जी,
      खबरों के धंधे के विरोध का आपका जज़्बा तारीफ के काबिल है। साथ ही आपने प्रभाष जी के लेख पर उनसे जवाब भी मांगा है। लिहाजा, इस संदर्भ में “जनतंत्र” की ओर से कुछ बातें स्पष्ट करना ज़रूरी है।

      - मूल रूप से “जनसत्ता” में छपे प्रभाष जी के दोनों लेख हमने उनकी अनुमति लेकर यहां छापे हैं, लेकिन इन पर आने वाली सारी ऑन लाइन टिप्पणियां वो देख रहे होंगे, ऐसा ज़रूरी नहीं है।

      - हमने प्रभाष जी के लेख यहां दिए, क्योंकि खबरों की खरीद-फरोख़्त का विरोध करना हमें ज़रूरी लगता है। प्रभाष जी ने भी अपने दोनों लेखों में बड़ी स्पष्टता से इस खतरनाक प्रवृत्ति का विरोध किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने खबरों की ख़रीद-फ़रोख्त करने वाले अखबारों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग तक उठाई है। हमारे हिसाब से उनका लेख आंखें खोलने वाला है।

      - जहां तक प्रभाष जी के लेख में प्रभात खबर और उसके संपादक के ज़िक्र का सवाल है, तो इसका उत्तर तो वही दे सकते हैं, लेकिन हम यहां इतना ज़रूर साफ करना चाहेंगे कि हमारे लिए महत्वपूर्ण है पूरा मुद्दा और उससे जुड़े पत्रकारीय सरोकार। किसी खास अखबार या व्यक्ति विशेष का समर्थन या विरोध हमारा मकसद नहीं है।

      - आपने प्रभात खबर और उसके संपादक पर जो आरोप लगाए हैं, अगर उन्हें साबित करने वाले ठोस प्रमाण आपके पास हैं, तो वो आप हमें भेज सकते हैं, हम उन्हें भी अपनी वेबसाइट पर जगह देंगे।

  5. Sanjeev Kumar Reply

    May 21, 2009 at 9:59 am

    खबरों के धंधे का खुलासा करके इसके खिलाफ मुहिम चलाने के लिए श्री प्रभाष जोशी और जनतंत्र को धन्यवाद। पत्रकारिता के लिए यह बड़ा कलंक है। संपादकीय सामग्री या समाचार सामग्री के रूप में प्रायोजित विश्लेषण या समाचारों का किसी भी रूप में प्रकाशन तकाल रोका जाना चाहिए। विज्ञापन चाहे जितने छपें, इस पर किसी पाठक को एतराज नहीं लेकिन विज्ञापन को समाचार होने का भ्रम नहीं पैदा करना चाहिए। यह भी चिंताजनक बात है कि प्रभात खबर ने खबरों के ध्ंाधे का विरोध करने का पाखंड करते हुए खुद यही धंधा किया। जनतंत्र पर इसका खुलासा करने के लिए धन्यवाद। आपकी यह शंका ही है कि संभव है कि प्रभाष जी इस प्रतिक्रिया को न पढ़ सकें। मेरा सुझाव है कि जनतंत्र की ओर से प्रभाष जी को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वह इस संबंध में अपने स्तर से पता लगा सकें। मेरा प्रभाष जी से भी निवेदन होगा कि जब एक बार उन्होंने प्रभात खबर की तारीफ में एक सार्वजनिक मंच पर लिखा है तो उनका भी नैतिक दायित्व बनता है कि इस संबंध में तथ्यों का पता लगा लें और अगर उन्होंने जाने-अनजाने में कोई अतिश्योक्ति कह दी हो तो वास्तविक तथ्य स्वीकार कर बड़प्पन दिखायें।

  6. pushpraj Reply

    May 22, 2009 at 9:50 pm

    जब हमारे देश में जनतंत्र का मतलब थैलीशाहों की थैली हो गयी है,हम अपने तंत्र को इसी तरह आपकी वेब पत्रिका में तलाश सकते हें .मीडिया के आका कब तक आपस में पुरस्कार बांटकर ऐंठते रहेंगे ?
    भारतीय पत्रकारिता को बचाने के लिए माननीय प्रभाष जोशी जी ने जिस तरह की भूमिका ली है,देश के हर सचेतन को अपनी भूमिका तय करनी होगी .
    तब कुलदीप नैयर जी एक तानाशाह सत्ता के विरूद्व लिखते हुए जेल गए थे ,आज की सत्ता ने किस तरह मीडिया को अपना प्रभाग बना लिया है .
    अगर पत्रकारिता को बचाने के लिए प्रभाष जोशी,कुलदीप नैयर जैसे प्रतिमान सेनापति की भूमिका निभाने की तयारी कर रहे हों ,तो युद्घ जरुरी है.
    जो लड़ने की तैयारी कर रहें हों,उन सबका सलाम
    पुष्पराज

  7. Santosh Sarang Reply

    May 23, 2009 at 6:31 pm

    Prabhash Joshijee ka lekh Prabhat Khabar mein parha tha. Ab Jantantra.com mein unke tewar se awagat hue, patrakarita ke girate star ke khilaf. Bahoot dhanyawad Prabhash Joshijee, Harivanshjee, Pushprajjee evam jantantra.com ke sampadak ko, jinhone Patrakarita ke mulyon ko bachane ki liye muhim chher rakhi hai.

  8. रंगनाथ सिंह Reply

    May 28, 2009 at 11:35 am

    समरेन्द्र जी आप ने जय किशन को जो जवाब दिया है वो अपाच्य है। इस तरह पद्धति से आपके पोर्टल को अखबार या टीवी बनते देर न लगेगी। प्रभाष जोशी को टिप्पणियों की प्रतिक्रिया नहीं देनी है तो फिर उनके लेख फीलर से ज्यादा कुछ नहीं हैं। आप संपादक के हैसियत से लेखकों से प्रतिक्रिया दिलवाना सुनिश्चित करें। पाठकों की प्रतिक्रिया का जो हाल अखबार या टीवी में होता है वही हाल यहाँ भी होने लगा तो फिर किसी को न्युज पोर्टल पढ़ने की क्या जरूरत है। वेब पर आने वाले पाठक सामान्य से ज्यादा साक्षर होता है। इसलिए उसके पास प्रश्न भी ज्यादा होते हैं। उन प्रश्नों को सम्मान दिए बगैर किसी समाचार माध्यम का जनवादी होना मुश्किल है।

    • रंगनाथ जी,
      - हमने जय किशन जी की टिप्पणी को पूरे सम्मान के साथ जगह दी। इसलिए प्रश्नों का सम्मान न होने का सवाल ही नहीं है। प्रभात खबर और उसके संपादक के खिलाफ उनके आरोपों के सिलसिले में भी हमारा रवैया बिलकुल खुला हुआ है। हमने कहा है कि अगर वे अपने आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण हमें देंगे, तो हम उन्हें भी अपनी वेबसाइट पर जगह देंगे।
      - प्रभाष जी के लेख के संदर्भ में हमने सिर्फ हकीकत बताई है। आपका ये सुझाव अच्छा है कि लेखकों से जवाब मिलना चाहिए, लेकिन कई बार ऐसा कर पाना व्यावहारिक तौर पर मुश्किल हो जाता है। प्रभाष जी का लेख हमें अपनी मुहिम को मज़बूत करने वाला लगा इसलिए हमने उनसे पूछकर यहां दे दिया। उनसे ऐसी कोई सहमति नहीं ली थी कि वे सभी प्रतिक्रियाओं के जवाब देंगे।
      - किसी भी लेख या खबर पर प्रतिक्रियाओं के लिए जगह हमेशा खुली है। हम पढ़ने वालों की प्रतिक्रिया का पूरा सम्मान करते हैं और उनकी शालीनता पर भरोसा भी। इसीलिए मॉडरेटर जैसी बाधा भी नहीं रखी है। प्रतिक्रियाएं सीधे प्रकाशित हो जाती हैं। ये प्रतिक्रियाओं और प्रश्नों का सम्मान ही तो है।
      - प्रतिक्रिया व्यक्त करना ज़्यादा ज़रूरी है। उसका जवाब मिलने से भी ज़्यादा। कई बार सवाल, जवाब से ज्यादा अहम होते हैं और कई बार उन्हीं में छिपे भी होते हैं।
      हमारी वेबसाइट के लेखों पर प्रतिक्रियाएं देने के लिए आपका धन्यवाद।

  9. Kopal Verma Reply

    May 29, 2009 at 9:12 am

    यह प्रसंग दिलचस्प लगा, इसलिए टिप्पणी करना जरूरी समझती हूं। प्रभाष जी ने एक मुहिम छेड़ी है जो स्वागत योग्य है। लेकिन अगर जयकिशन का यह कहना सही है कि प्रभात खबर ने उसी दिन के अखबार में अपनी प्रायोजित खबरों का भी विज्ञापन किया और उसके दूसरे दिन सुबोधकांत सहाय का 24 पेज का प्रायोजित परिशिष्ट छापा, तब तो प्रभाष जी की इस मुहिम की हवा निकल गयी समझो। कारण यह कि अपनी टिप्पणी में प्रभाष जी ने काफी गर्व से लिखा है कि हमारे मित्र हरिवंश ने ऐसा किया, वैसा किया ….। यानी प्रभाष जी ने प्रभात खबर और हरिवंश को एक रोल माॅडल के बतौर पेश किया है। लिहाजा, प्रभाष जी को इन तथ्यों से अवश्य अवगत होना चाहिए कि तमाड़ के उपचुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक के दौर में प्रभात खबर और हरिवंश ने कितने पृष्ठ की प्रायोजित खबरें छापीं, किस दर पर छापीं और उसके बदले अंडर बिलिंग की गयी अथवा वास्तव में जितनी राशि वसूली गयी उतने का ही बिल बनाया गया। रंगनाथ जी का यह कहना बिलकुल सही है कि एक बार जब जनतंत्र डेस्क ने प्रभाष जी की इस क्रांतिकारी मुहिम को अपने पोर्टल पर स्थान दिया है तो उस संदर्भ में आ रहे तथ्यों व तर्कों को अंजाम तक पहुंचाया जाया। इस बाबत जय किशन से और तथ्य अथवा प्रमाण मांगना हास्यास्पद/अनावश्यक है क्योंकि उनने अपने पत्र में पर्याप्त प्रमाण/तथ्य दिये हैं। प्रभाष जी और जनतंत्र डेस्क, दोनों के लिए यह सलाह है कि कृपया आप दोनों अपना नाम रणछोड़ शूरवीरों में न लिखायें। भारतीय बुद्धिजीवियों का यही कायरपन आज सबसे बड़ा खतरा है कि आप किसी मुद्दे को जोर से उठाते हो और जरा सी जटिलता आने पर भाग खड़े होते हो। जनतंत्र डेस्क चाहे तो बेहद आसानी से यह पता लगा सकता है कि चुनाव में प्रभात खबर ने प्रायोजित खबरें छापी और अंडर बिलिंग की थी अथवा नहीं। जनतंत्र डेस्क अपने पाठकों की ओर से प्रभाष जोशी ओर प्रभात खबर से आग्रह कर सकता है कि वह इस बाबत उठे सवालों का ठोस जवाब दें, भावनात्मक नहीं। आपने अगर कोई मुहिम छेड़ी है तो आपको यह जानना और बताना चाहिए कि आपके मित्र वास्तव में किस हद तक आपके उस मुहिम में आपके मित्र हैं? भ्रष्ट आचरण के खिलाफ लड़ाई के लिए जरूरी है पाखंड से निपटना।

    • जनतंत्र डेस्क Reply

      May 29, 2009 at 11:36 am

      कोपल वर्मा जी,

      आपकी ये बात समझ नहीं आयी -
      “इस बाबत जय किशन से और तथ्य अथवा प्रमाण मांगना हास्यास्पद/अनावश्यक है क्योंकि उनने अपने पत्र में पर्याप्त प्रमाण/तथ्य दिये हैं।”

      अपने पत्र में उन्होंने जो कुछ भी कहा है, उसे तो हमने जगह दी ही है। उसके लिए कोई प्रमाण भी नहीं मांगे। हम तो सिर्फ इतना चाहते हैं अगर उनके पास इस सिलसिले में और भी जानकारियां हैं, प्रमाण हैं, तो उन्हें भी हमें भेज सकते हैं। उन्हें भी प्रमुखता से जगह देंगे। उनका मौजूदा पत्र तो हमारे पोर्टल पर प्रकाशित है ही। ‘जनतंत्र’ में प्रकाशित लेखों, टिप्पणियों के तथ्यों / तर्कों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए भी ऐसा करना ज़रूरी है। पाठकों की टिप्पणियों, उनकी ओर से मिली पुष्ट जानकारियों के आधार पर ही हम इस कोशिश को आगे बढ़ा सकते हैं। हमारा रुख बिलकुल साफ है – खबरों का धंधा करना कतई गलत है, चाहे वो हिंदुस्तान करे या प्रभात खबर। हम किसी खास अखबार के खिलाफ नहीं हैं, न किसी के पक्ष में हैं। प्रभाष जी ने एक पहलू उजागर किया। अच्छी बात है। कोई और अगर किसी दूसरे पहलू से परदा उठाना चाहता है, तो उसका भी स्वागत है। इसमें हम कहां पीछे हट गए? हां, हमारी दिलचस्पी व्यक्ति केंद्रित छींटाकशी से ज्यादा व्यापक मुद्दों पर बहस छेड़ने में है।

  10. Samta Bharti Reply

    May 29, 2009 at 10:53 pm

    जनतंत्र द्वारा इस बहस को आगे बढ़ाया जाना इसके नाम को सार्थक करता है। में समझती हूं कि यह व्यक्तिगत छींटाकशी का मामला नहीं है बल्कि आदरणीय प्रभाष जोशी ने अपने लेख में जिस व्यक्ति या अखबार को आदर्श बताया है, उसके बारे में वास्तविक तथ्यों की तहकीकात का मामला है। चूंकि प्रभाष जी इसे लिख चुके हैं और जनतंत्र इसे प्रकाशित कर चुका है, साभार ही सही, तो अब यह छानबीन कोई व्यक्तिगत बात नहीं रह जाती। तारीफ आपने किसी व्यक्ति की ही की है, उसकी सच्चाई जानने की बात आयी तो इसे छींटाकशी कहकर कोई बच नहीं सकता। में समझती हूं कि इस मामले में प्रभाष जी की चुप्पी उनके व्यक्तित्व को हल्का करेगी। यह बात मेरी समझ से परे है कि आप पाठकों को जवाब देकर उलझने के बजाय सीधे प्रभाष जी से ही इसका जवाब क्यों नहीं मांग लेते। में नहीं समझती कि उनके जैसा व्यक्तित्व सच्चाइ से मुंह चुरायेगा अथवा पीछे हटेगा। एक मूर्धन्य पत्रकार होने के नाते श्री प्रभाष जोशी बखूबी समझते ही होंगे कि उनके लिखे की सच्चाई जानने का हक हर पाठक को है। इस पर सवाल करने का भी। इसे व्यक्तिगत या छींटाकशी बताकर टालने के बजाय सच सामने लाने का प्रयास होना चाहिए।

  11. kaushlendra Reply

    June 1, 2009 at 9:07 pm

    prabhash ji ke lekh se journalism ke us bhitari sadan ka khulasa hota hai jise pad, dekh kar afshosh hi hota hai. kya yahi lamajik sarokar rah gaya hai. 30 may yani journalism ki history me mile stone udand martand ka prakashan huva. yahin se bharat me patrika ka vikas mana jata hai. prabhash ji ne janshasta me lekh likh kar kam se kam is ki laaj rakh lee ki ik paper me hi sahi 31 may ke din lekh past, present ki charch se purn hai.

  12. Surendra Sharma Reply

    June 2, 2009 at 7:44 pm

    This is a black side of media and the citizen of India shall come forward to save Journalism. It is also sad to see the silence of Sri Prabhash Joshi as he is the most respectable journalist of India and if did not responding to the comments which are contradictory to his article, it does not match to a person like him. I hope prabhash ji will not be silent on the issues raised regarding the role of Harivansh ji and Prabhat Khabar and either he will contradict it or accept it.

  13. रंगनाथ सिंह Reply

    June 3, 2009 at 4:06 am

    प्रभाष जोशी के नाम के आगे ”सबसे बड़ा….” विश्लेषण के प्रयोग का आपने कोई जवाब नहीं दिया। आपने सही इशारा किया है कि मैं भी प्रभाष जोषी के सम्मान करता हूँ। और इसीलिए मैंने उनके नाम के आगे जी लगाया है। लेकिन प्रभाष जोशी के प्रति मेरा निजी सम्मान मेरी निजी टिप्पणियों में जाहिर होना एक बात है और प्रशस्ति-पत्र में सार्वजनिक रूप से लिखना दूसरी बात है। सबसे बड़े-सबसे छोटे जैसे तमगे देने की जरूरत भला क्यो है ? आप को नहीं लगता कि इस तरह की हाइअॅराक्इकॅल मेरिट लिस्ट तैयार करना सिर्फ सम्मान की बात नहीं है। हिन्दी का सबसे बड़ा पत्रकार है तो सबसे छोटा भी होगा ! नंबर दो, तीन, चार….. भी होगें !!!
    बात सिर्फ सम्मान की नहीं है। बात भाषा मे बचे सांमती अवशेषों और संस्कारों की है। सबाल्र्टन स्टडी के दौर में भी इस तरह के विशेषण चकित करते है। जहाँ तक हिन्दी को जनवादी भाषा न मानने का प्रश्न है , आप पूरी तरह सही है। जब तक की मैं अपनी बात को प्रमाण पूर्वक स्थापित न कर दूँ यह एक निजी राय है। और वैसे भी यह मामला अॅकैडॅमिक है। यहाँ इतना जरूर कहुँगा ”आप, जी, सबसे बड़े, सबसे सम्मानित” की छोड़िए खुद प्रभाष जोशी के लिखे ”मेरे मित्र”, पुराने परीचित या पुराने साथी जैसे विशेषणों का विखण्डन किया जाएगा तब जा के हिन्दी का असल चाल-चरित्र और चेहरा सामने आएगा। और हिन्दी का विकास देखते हुए मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन ऐसा होगा जरूर।
    लेखकों की प्रतिक्रिया दिलवा पाने में आपके समक्ष जो कठिनाई है उससे मैं भी परीचित हूँ। जनतंत्र का संपादक ज्यादातर टिप्पणियों का जवाब खुद दे रहा है तो यह इसके नाम की गरिमा को बचाए रखने के लिए पर्याप्त है। प्रभाष जी या दूसरे महत्वपूर्ण लेकिन व्यस्त लेखकों के लिए हर टिप्पणी का जवाब देना संभव भी नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि संभव हो तो ये लेखक सभी टिप्पणियों को समेटते हुए एक मुक्कमल जवाब दे दें। ज्यादा कहने कि जरूरत नहीं क्योंकि निश्चय ही आप अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे होंगे।
    जनतंत्र को के प्रयास की मुखर प्रशंसा करने में मुझे कोई संकोच नहीं है।

    • समरेंद्र Reply

      June 3, 2009 at 7:04 am

      रंगनाथ जी,

      किसी को लेकर आपका क्या नज़रिया है… ये आपके शब्द जाहिर कर देते हैं। मेरे साथ भी यही हुआ। लेकिन किसी को बड़ा और किसी को छोटा साबित करने की मेरी कोई मंशा नहीं। आपके दोनों सुझाव स्वागत योग्य हैं।

      धन्यवाद.

  14. Renuka Pandey Reply

    June 3, 2009 at 8:21 am

    Rangnath ji ki yah baat sahi hai ki web portal par aaye articles par aaye sawalo ka jawab uske lekhak se awashya mangana chahiye. Khaskar yadi kisi mamale par facts ya truth ka bada gap ho tau usko jarur clear karna chahiye. Agar Prabhash Joshi ji ne apane MITRA Harivansh ji aur unke paper Prabhat Khabar ka anawashyak mahimamandan kiya ho aur agar Prabhat Khabar ne bhi News ke form me Advertisements publish kiye ho tab Prabhash ji ko aise mamle ka spastikaran jaruur dena chahiye. Unki chuppi sandeh ko badawa de rahi hai. Mai nahi samajhti ki agar aap iss babat prabhash ji se jawab mangenge tau wo na kahenge. Aap kam se kam apne pathko ko ye tau bata sakate hai ki ab tak aapne Prabhash ji se iss babat bat ki hai ya nahi aur unka kya reaction hai.

  15. रंगनाथ सिंह Reply

    June 3, 2009 at 11:59 am

    समरेेन्द्र जी
    मैं तकनीकी मामले में अल्प-ज्ञानी हूँ अतः पूरे मामले को समझ न सका। साथ ही अपने रुष्ट टिप्पणी के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ। कमेंटस के द्वारा निजी खंुदकों और कुंठा के विरेचन की तरफ आपने सही इशारा किया है। क्या ऐसा संभव नहीं है कि कमेंटस को माडरेशन पर डालने के बजाय आप उन टिप्पणीयों को जनतं़त्र पर आने दें और फिर उनकी अशालीनता के देखते हुए उन्हें डिलीट कर दें ? मोहल्ला जैसे कई ब्लाॅग पर यह प्रयोग सफल रहा है।
    आप अन्यथा न लें तो एक और सुझाव देना चाहुँगा। ”हमारे बारे में” काॅलम की जगह ”संपादकीय” होता तो बेहतर होता। पाठकों की प्रवृत्ती होती है कि वो जिस समाचार माध्यम से जुड़तें हैं सामसायिक मुद्दों पर उसकी आधिकारिक प्रतिक्रिया जानने के उत्सुक होते हैं। आप अपने नाम से संपादकीय(या जो लिखे अपना नाम दे) से संपादकीय लिखेंगे तो पाठक आप से सीधा जुड़ाव महसूस करेंगे। निश्चय ही यह काम आप की व्यस्तता को बढ़ा देगा। लेकिन इसकी उपयोगिता को देखते हुए आप चाहें तो ऐसा कर सकते हैं।
    बिहार पर आपने जो स्टोरी की है उससे आपके जनतंत्र में पाठकों का विश्वास बढ़ेगा।
    आपके प्रयास और पाठकों के सहयोग से ”जनतंत्र” की सफलता सुनिश्चित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>