मीडिया पहले ही यूपीए की जीत को कांग्रेस की जीत और कांग्रेस की जीत को राहुल गांधी का चमत्कार साबित कर चुका है। अब मीडिया में नई बहस चल रही है। बहस ये कि आखिर राहुल गांधी मंत्री बनेंगे या नहीं? अगर हां, तो कौन सा मंत्रालय लेंगे। राहुल के गुणगान में जुटे पत्रकारों के लिए ये बड़ा सवाल है। इसका जवाब हर कोई अपने-अपने तरीके से दे रहा है। कुछ पत्रकार तो राहुल के लिए मंत्रालय चुनने में भी जुट गए हैं।
आईबीएन-7 पर राजदीप सरदेसाई ने अपनी समझ से राहुल का मूल्यांकन किया। राजदीप ने कहा कि राहुल गरीबों की बात करते हैं। विकास की बात करते हैं। इसलिए उन्हें ग्रामीण विकास मंत्रालय या फिर मानव संसाधन मंत्रालय लेना चाहिए।
एनडीटीवी इंडिया के मेंटर विनोद दुआ ने कहा कि गरीबों के विकास की फिक्र करने वाले राहुल गांधी के लिए कृषि मंत्रालय सही रहेगा। हालांकि ये बात उन्होंने अपने खास अंदाज में कही, लेकिन कही तो सही।
एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक मनोरंजन भारती ने कहा कि राहुल गांधी पीएमओ संभाल सकते हैं। इससे वो प्रधानमंत्री के काफी करीब रहेंगे और वहां उनकी “ग्रूमिंग” सही तरीके से होगी।
ये चंद उदाहरण हैं। अख़बारों में भी सलाहकारों की कमी नहीं है। किसी ने राहुल को सूचना प्रसारण मंत्री बनने की सलाह दी है तो किसी ने बिना पोर्टफोलियो के मंत्री बनने को कहा है। सलाह देने और अनुमान लगाने वालों की ये फेहरिस्त काफी लंबी है। दरअसल ये सारा मसला ही “ग्रूमिंग” का है। अब चाहे “ग्रूमिंग” राहुल की हो, मीडिया की या फिर दिग्गज पत्रकारों की।
nirmla.kapila
May 20, 2009 at 6:39 pm
janab unhen dal roti khane dijiye ab sara din vo aur kya karen
chandan rai
May 23, 2009 at 1:12 pm
जब बात कांग्रेस के राजकुमार की हो तो हर मंत्राालय कुबाZन। भई राजकुमार हैं तो पिफर राजा की गददी ही चाहिए। लेकिन अभी राजमाता सोनिया जी ने इस पद पर अपने विश्वासपात्रा को बिठा रखा है। जब तक राहुल राजनीति में मैच्योर नहीं हो जाते चरण पादुका लेकर मनमोहन जी ही विराजेंगे। डर है कि कहीं प्रियंका की महात्वाकांक्षा भी जोर मारने लगे तब क्या होगा? आखिर प्रधनमंत्राी के पद पर दो तो बैठ नहीं सकते। भारत में नवजात लोकतंत्रा का गला घोंटने में गांध्ी परिवार ने कोई कसर बाकि नहीं रख छोडी। कुछ हमारी आदत भी राजनीति में एक परिवार के पिछलग्गू बने रहने की रही। कांग्रेस ने तो राजनीति में परिवारवाद की जो विष बेल बोई है उसी के दावेदार सचिन पायलट,संदीप दीक्षित से लेकर प्रिया दत्त और न जाने कई लोग रहें है। आखिर समाजसेवा भी तो एक ध्ंध है जो पैतक संपित्त की तरह अपनी विरासत साथ में लेकर चलती है। राजनीतिज्ञों की विदेशों में पली बढी नई पौध्, जिसे भारतीय संस्कति का ककहरा भी नहीं पता हो,बिना ग्राउन्ड लेवल पर काम किए सीध्े हमारे सिर पर बिठा दी जाती है और हम विक्रम की तरह वैताल को अपने कंधें पर ढोने को मजबूर हैं। कौन कहता है कि भारत में लोकतंत्रा है? लोकतंत्रा के सभी दुर्गुZण तो हैं जैसे परिवारवाद,साम्प्रदायिकता,जातिवाद,आर्थिक असमानता,अशिक्षा ….लेकिन सच्चा लोकतंत्रा नहीं। राहुल को कौन सा मलाईदार पद मिलता है,इसपर चर्चा ही व्यर्थ है। हम तो शर्मिंदगी से यह देखने को मजबूर हैं कि कब कोई कांग्रेस का कार्यकर्ता जिसकी डोर सोनिया जी के हाथों में हो मंच से राहुल को पीएम पद के लिए आमंत्रिात करता है। और कांग्रेस में कब अपने को गांध्ी परिवार का विश्वासपात्रा दिखाने के लिए सियारों की तरह हुआ..हुआ शुरू होती है।