अमिताभ बच्चन मीडिया से फिर नाराज़ हैं। ख़ासकर न्यूज़ चैनलों के पत्रकारों से। अपने ब्लॉग पर अमिताभ ने लिखा है कि प्रकाश मेहरा के अंतिम संस्कार के वक़्त न्यूज़ चैनलों के पत्रकारों ने जो कुछ किया उस पर उन्हें शर्म आनी चाहिए।
अमिताभ लिखते हैं, “प्रकाश जी के बड़े बेटे सुमीत सुबह अमेरिका से लौटे और दोपहर में प्रकाश जी का अंतिम संस्कार हुआ। अभिषेक और मैं उसमें शामिल हुए। लेकिन श्मशानघाट पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बर्ताव बहुत बुरा था। ऐसे संवेदनशील मौके पर भी उनके मन में कोई सम्मान नहीं था। मौके की नज़ाकत का कोई लिहाज नहीं। और एक बेहद निजी और उदास रस्म के दौरान मर्यादित रहने का सलीका भी नहीं।”
अमिताभ आगे लिखते हैं, “सिर्फ बाइट लेना ही उनका मकसद था। वो हमारी नाक से कुछ इंच दूरी तक कैमरे ठेलते रहे, वो भी ऐसे वक़्त में जब शांति और खामोशी हर किसी की जरूरत हो। शर्मनाक। और शोक में शामिल होने आए कुछ लोगों को भी क्या कहें, उन्हें देखकर लगता नहीं था कि वो शोक मनाने आए हैं। वो लगातार हर सेलिब्रेटी के करीब या उनके ठीक पीछे खड़े होने के लिए दूसरों को धकेलते रहे ताकि कैमरे में उनका भी चेहरा नज़र आ जाए।”
ये पहला मौका नहीं है जब अमिताभ मीडिया के रवैये पर भड़के हों। इससे पहले भी वो मीडिया (खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) पर तल्ख़ टिप्पणी कर चुके हैं। वो मानते हैं कि पत्रकारों का काम बहुत ही मुश्किल है। मगर इसका मतलब ये नहीं कि पत्रकार अपनी सीमा लांघते रहे।
ajay brahmatmaj
May 21, 2009 at 9:38 am
ऐसे प्रलाप न प्रकाशित करें इस साइट पर ब्लॉग की बातें देख कर अच्छा नहीं लगा यह तो चेंज चेंज,लेकिन सेम सेम हो गया
virendra jain
May 21, 2009 at 10:55 am
I am posting one of my latest article on the very same issue
प्रैसफोटोग्राफर और समाज के नायक
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों भारत भवन भोपाल में एक नाटक के दौरान मध्यप्रदेशा के संस्कृति और जनसम्पर्क विभाग के सचिव की उपस्थिति में प्रैस फोटोग्राफरों और नाटक के निदर्ेशक के बीच झगड़ा हो गया जिसके परिणाम स्वरूप प्रैस फोटोग्राफर कार्यक्रम की रिपोर्टिंग न करने की धमकी देते हुये बीच में से उठ कर चले गये। संस्कृति सचिव भी बिना कोई हस्तक्षेप किये हुये कार्यक्रम छोड कर चले गये।
इस घटना में विवाद का मुद्दा यह था कि नाटक के दृशय में अंधेरा आवशयक था किंतु पहले से किये गये निवेदन के बाबजूद प्रैस फोटोग्राफर अपना फ्लैशा चमका कर फोटो खींचने लगे जिससे नाटक का सारा वातावरण ही बिगड़ गया। जब नाटक के निर्देशक ने इस बात पर अपना असंतोष व्यक्त किया तो स्वयं को विशिष्ट मानने के घमंड में प्रैस फोटोग्राफरों ने उनकी बात नहीं मानी और अपनी मनमानी करते रहे। निर्देशाक को लगा कि वे जिसकी रिपोर्टिंग के लिए आये हुये हैं उसी की आत्मा को खत्म किये दे रहे हैं और समझाइश का उन पर कोई असर नहीं हो रहा तो उनका गुस्सा फूट पड़ा जो स्वाभाविक था।
विवाद की स्थिति तक पहुँचने के भले ही कम मौके आते हैं पर प्रैस फोटोग्राफरों और पत्रकारों के दर्ुव्यहार की यह इकलौती घटना नहीं है। जड़विहीन भ्रष्ट राजनेताओं व ऐसे ही कला साहित्य से जुड़े अयोग्य लोगों द्वारा अतिरिक्त चापलूसी करने व उनकी मनमानी पर झुक जाने के कारण प्रैस के लोग अपने आप को सबसे ऊपर मानने लगे हैं और वे सभी राजनेताओं और कलाकारों को एक समान धरातल पर तौलने लगे हैं। वे समझते हैं कि उनके कारण ही नेता और कलाकार का अस्तित्व व महत्व है। यशपाल ने कुछ कुछ ऐसी ही स्थितियों से तंग आकर आलोचकों के बारे में कहा था कि वह तो गाड़ी के नीचे चलने वाला वह कुत्ता है जो समझता है कि गाड़ी वही चला रहा है। जब दुनिया में प्रैस नहीं थी तब की कला भी जीवित है और शान से जीवित है। इसलिए सबको एक ही धरातल पर आंकना ठीक नहीं है।
प्रैस फोटोग्राफर्स का काम होता है, जो हो रहा है उसमें बिना कोई हस्तक्षेप किये हुये उसको रिकार्ड करना और अपने काम के लिए उचित समय से उचित स्थान ग्रहण कर लेना। किंतु अपनी स्वयंभू विशिष्टता और अक्षम अयोग्य लोगों द्वारा की गयी चापलूसी के दंभ में ये लोग समझते हेैं कि सब कुछ ये ही लोग बनाने और बिगाड़ने वाले हैं। आम तौर पर किसी भी समारोह में ये फोटोग्राफर वीडियोग्राफर मंच को चारों तरफ से इस तरह से घेर लेते हैं कि दूर दूर से आये हुये वििशष्ट अतिथि जिन्हें खास तौर पर उक्त कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया होता है कुछ भी नहीं देख पाते। नेताओं की प्रैस कांफ्रैंसों का जब सीधा प्रसारण होता है तो पूरी दुनिया प्रैस फोटोग्राफरों की अनुशाासनहीनता धक्कामुक्की के प्रत्यक्ष र्दशन करती है। टीवी कैमरामैन और पत्रकार तो कई बार अपना माइक नेताओं के मुँह में ही घुसेड़ते से नजर आते हैं। कई बार ये लोग देर से आते हेैं और हो चुके विमोचन या सम्मान समारोह को दुहराने के लिए कहते हैं ताकि उसका फोटो वीडियो लिया जा सके। खेद है कि रीढहीन नेता और साहित्यकार प्रैस में छपने के लालच में उनकी इच्छा के अनुरूप हो चुके कार्यक्रम के अपने क्रम को दुहरा भी देते हैं। धरने हड़ताल पर बैठे लोगों से कहा जाता है कि वे प्रैस फोटाग्राफर के आने पर उठ कर बैठ जावें व नारे लगाना प्रांरभ कर दें। अपने संगठन की कम संख्या की हीनता ग्रन्थि से पीड़ित प्रचार के भूखे लोग उनकी बात को सहर्ष मान भी लेते हेैं। ऐसी निरंतर हो रही घटनाओं के कारण प्रैस फोटोग्राफरों ने स्वयं को डायरेक्टर समझ लिया है व वे समाज के नायकों को अच्छे प्रचार का सपना देकर उन्हें निर्देशित करने लगे हैं। यह स्थिति भूमिकाओं में विचलन की सूचक है। भारत भवन भोपाल में हुयी इस घटना ने यह बता दिया है कि अब भी किन्हीं कलाकारों में कला के प्रति सम्मान का भाव और आत्मसम्मान बचा हुआ है व वे कैरियर में प्रचार के महत्व को जानते हुये भी कला के सम्मान की रक्षा में कैरियर का खतरा भी मोल ले सकते हैं।
इसका एक दूसरा पक्ष भी है। आम तौर पर प्रैस फोटोग्राफर स्वतंत्र होते हेैं व उन्हें एक ही समय में विभिन्न स्थानों पर जाना होता है। दूसरे नेताओं व विशिष्ट अतिथियों के समय पर न आने के कारण कार्यक्रम देर से प्रारंभ होते हैं जिससे भी प्रैस के लोगों की समय सूची अस्तव्यस्त हो जाती है तथा उनकी व्यावसायिक जरूरतें उन्हें अधिक से अधिक फोटो पाने के लिए विवश करती हैं। यही कारण है कि समाज के नायकों के विचलन का लाभ वे भी उठा लेना चाहते हैं और उन्हें अपनी तरह से निर्देशित कर लेते हैं। इसलिए अनुशासन की जरूरत पूरे समाज को है और एक जगह ठीक कर लेने से चीजें ठीक नहीं होंगीं अपितु सबको ही सुधरना होगा। शायद यही कारण है कि राजनेता और कलाकार दोनों ही आजकल र्दशकों और श्रोताओं के लिये तरसते हैं।
वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629 4
chandan rai
May 21, 2009 at 5:56 pm
अमिताभ जी पहले अपने गिरेबान में झांक लो। करचोरी से लेकर जमीन कब्जाने को लेकर न जाने कितने कुकर्म बुढापे में (अगर मानें तो,हालांकि दिल से तो अभी जवानों के भी कान काटते हैं।द्धकर डाले। कुछ तो कविगुरू का ख्याल किया होता। मंदिर में करोडों का दान करने से किए पाप थोडे ही कम हो जाते हैं। पत्राकारों को नसीहत देना तो आसान हैैे। पेशे के प्रति ईमानदारी ही किसी पत्राकार को ऐसा करने पर मजबूर करती है। ख्ौर आप तो सैलिब्रेटी ठहरे। हाई सोसाइटियों एवं राजनेताओं के साथ गलबहियां करते उम्र गुजरी हैं। कांग्रेस ने दुत्कारा तो अमर सिंह के गले लग गए। अब वहां से भी गुजारा न होगा तो न जाने किसका दामन थामेंगे। पत्राकारों के लिए तो आम मजबूरी बन जाते हो। क्योंकि आप खांसते भी हो तो सभी टीवी चैनलों के न्यूज रूम में हडकंप मच जाता है। पता नहीं कब सिधर जाओ। कला जगत में आपने चाहे जो भी गरीब मजदूरों के गुस्से को पर्दे पर दिखाकर नाम कमाया हो पर हकीकत में कभी उनके साथ खडे नहीं दिखे। खुद राजनीति में न आए तो क्या पत्नी को सत्ता सुख भोगने संसद में तो भेज ही दिया।
Rangnath Singh
May 24, 2009 at 6:56 pm
amitabh ki niji burayio se unki bt galat nhi ho jati. unhone sau fisadin shi mudda uthaya h. jin logo ko mirchi lag rhi h wo sach svikar nhi karna chahate
akhilesh dixit
May 26, 2009 at 10:57 pm
मेरी दादी एक कहावत कहती थीं जो आज बहुत दिनों के बाद याद आयी है
मुलाहिज़ा कीजिए
जइसे उदय तइसे भान
न उनके झोटा न उनके कान
एक और कहावत याद आयी
जस मुकुन्द तस पादन घोड़ी
राज
May 27, 2009 at 3:03 am
ये सब पढ़कर ऐसा लग रहा है कि पत्रकार बिरादरी निरंकुश
होने की दिशा में आगे बढ़ रही है ….खतरनाक संकेत
समय पर चेतना जरूरी है । अमिताभ ने कुछ भी गलत नहीं कहा है।
Rajneesh K Jha
May 28, 2009 at 1:37 am
Amitaabh jii se sahmat, TV patrkaarita nitaant hii nimn star par chali gayii hai, parantu ismen patrakaaron ka dosh bhi to nahi de sakte, bites or exclusive ke liye kuch bhii karne ka dawaab.