सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित विशेष जांच दल (एसआइटी) ने गुजरात दंगों के सिलसिले में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों और अन्य आला अफसरों की भूमिका की जांच शुरू कर दी है। एसआईटी ने इस दौरान मोदी से पूछताछ किए जाने से इनकार नहीं किया है।
एसआईटी के प्रमुख आर के राघवन ने गांधीनगर में पत्रकारों को बताया कि गुजरात के कुछ बड़े राजनेताओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर ज़ाकिया जाफरी की अर्जी पर जांच शुरू हो चुकी है।
दंगों के दौरान अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में मारे गए पूर्व सांसद एहसान जाफरी की पत्नी ज़ाकिया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि गुजरात दंगों के दौरान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 63 लोगों की भूमिका की जांच की जाए।
राघवन ने बताया कि एसआईटी ने दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसायटी में हुए कत्लेआम पर शिकायतकर्ता ज़ाकिया जाफरी का पक्ष सुन लिया है। अब आगे की जांच पूरे निष्पक्ष ढंग से की जाएगी। गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसायटी में एहसान जाफरी समेत तीन दर्जन से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी गयी थी।
इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने दंगे के मुकदमों से जुड़े 96 चश्मदीद गवाहों को केंद्रीय बलों की सुरक्षा दिए जाने की मांग की है। तीस्ता के मुताबिक एसआईटी चीफ राघवन ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि गवाहों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
virendra jain
May 27, 2009 at 9:33 pm
I am attaching one of my article recently published on yhe very subject as my comment
गुजरात में जाँच के समानान्तर किये जाने वाले काम
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में हुये मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के दौरान गुलवर्ग सोसाइटी में काँग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी समेत 62 लोगों की जघन्य हत्या के मामले में स्व ज़ाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ की याचिका पर फैसला दिया कि मामले की जाँच की जाये जिसमें मुख्यमंत्री समेत राज्य मंत्रिमंडल के सदस्यों की भूमिका की भी जाँच सम्मिलित रहेगी। आदेश के अनुसार सीबीआई के पूर्व र्निदेशक श्री आर के राघवन करेंगे और इस आयोग की बैठकें प्रति दिन के आधार पर होंगीं। जाँच के बारे में उक्त फैसला आने में ही सात साल गुजर गये हैं तथा जाँच की ऑंच अपराधियों तक पहुँचने में कितने दिन लगेंगे कहा नहीं जा सकता क्योंकि आरोपी के राज्य शासन में बैठे होने तक वह इसे प्रभावित करता रहेगा।
इस जाँच के लिए न केवल समस्त राजनीतिक दल प्रतीक्षा रत थे अपितु मानव अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, हजारों गैर सरकारी संस्थाएं न्याय की आशा में न्याय की ओर देख रहे थे। यह फैसला ऐसे समय आया है जब लालकृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की सारी संभावनाएं चुकती नजर आने के बाद भाजपा के लोग राजग के दूसरे घटक दलों से पूछे बगैर नरेन्द्र मोदी को वैकल्पिक प्रधानमंत्री की तरह पेश करने लगे थे। स्मरणीय है कि पिछले दिनों ही उद्योगपतियों के संगठन ने दूसरे प्रदेशों की तुलना में गुजरात में उद्योपतियों के अनुकूल वातावरण देने हेतु धन्यवाद देते हुये उनको प्रधानमंत्री बनने की शुभकामनाएं दी थीं जिससे पूरा देश भोंचक्का रह गया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के आने के बाद जब पूर्व केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता से फैसले पर टिप्पणी करने को कहा गया था तो उन्होंने गुजरात के औद्योगिक विकास का बखान करना शुरू कर दिया था। ऐसा लगता है कि जैसे कभी यह मान्यता थी कि बड़े ठेकेदार बड़ा प्रोजेक्ट प्रारंभ करने से पहले प्रोजेक्ट स्थल पर मानव बलि देते हैं यह वैसा ही मामला हो गया हो तथा अपने मुनाफे के आगे मानवीय गरिमा की कोई कीमत ही नहीं हो।
विसंगति यह है कि हमारे देश में लोकतंत्र है और मोदी गुजरात की जनता द्वारा चुने हुये नेता हैं। उनके चुनाव में किसी बड़ी चुनावी अनियमितता के प्रमाण भी नहीं मिले तथा उन्हें गुजरात में व्यापक पैमाने पर जन समर्थन प्राप्त है जबकि शेष देश उन्हें तानाशाह हत्यारा साम्प्रदायिक निर्दयी आदि के रूप में देखता है। अखबारों के कार्टूनों में वे हाथ में खडग लिए लाशों के ढेर पर खड़े िदखाये जाते हैं, अमेरिका उन्हें अपने देश में आने के लिए वीसा नहीं देता तथा ज्योति बसु जैसे वरिष्ठ नेता उन्हें बर्बर की तरह याद करते हेैं। गुजरात में भाजपा के ही अनेक भाजपा नेता उनके कारण ही भाजपा छोड़ चुके हैं तथा गुजरात काण्ड के बाद राजग के अनेक घटक दलों ने अटल बिहारी सरकार से समर्थन वापिस ले लिया था व स्वयं अटल बिहारी ने उन्हें राजधर्म न निभाने वाले के रूप में पहचाना था। भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक तथा तत्कालीन राज्यपाल सुंदरसिंह भंडारी ने अपने अंतिम लेखों में उन्हें बहुत ही खराब ढंग से उद्धृत किया है। दुनिया भर की प्रैस और मीडिया ने उनकी निंदा की है पर फिर भी आडवाणी संघ एन्ड कम्पनी उन्हें न केवल सिर आंखों पर ही बिठाये हुये है अपितु अपने शिखर नेता की तरह प्रस्तुत करने लगी है।
असल में गुजरात की जनता ही नहीं अपितु देश के एक बड़े हिस्से को संघ परिवार अपने शब्दजाल में उलझा कर सच्चाई से विमुख कर देता है जिससे गुजरात का जन मानस भ्रमित हो जाता है व गुजरात में 2002 में घटित घटनाओं को मोदी कम्पनी द्वारा दिखाये गये दृशय की तरह देखने लगता है। मैंने गुजरात के सम्बंध में कुछ ऐसे ही कुछ दिग्भ्रिमित लोगों से बात की और उन्हें सच्चाई बतलायी तो उनका कहना था कि इसने तो हमारी दृष्टि ही बदल दी है। एक आम गुजराती के मोदी एन्ड कम्पनी के प्रचार से कुप्रभावित होकर यह मानता है कि गुजरात से कुछ हजार लोग अयोध्या में रामजन्म भूमि स्थल पर बन रहे श्री राम मंदिर हेतु कारसेवा के लिए गये थे व इसी से नाराज गोधरा के मुसलमानों ने वहाँ से लौटते हुये कार सेवकों को सबक सिखाने के लिए पूरी ट्रेन में आग लगा दी जिससे 59 कार सेवक जल कर मर गये। उनके इस दुस्साहस पर कुपित होकर गुजरात में दंगे भड़के और हिंदुओं ने हजारों मुसलमानों को मार कर व उनकी घर सम्पत्ति को लूट कर अपने आहत स्वाभिमान का बदला लिया व उन्हें ऐसा सबक सिखाया कि वे हिंदुओं की ओर ऑंख उठा कर देखने की हिम्मत न जुटा सकें। यह वीरता का काम मोदी ने किया जिसके लिए वह हिंदुओं का नायक है।
संघपरिवारियों द्वारा प्रसारित इस प्रचार में से ही अनेक मौलिक सवाल उठते हैं।
• संघ परिवार के इतने लोग क्या एक साथ कार सेवा के लिए निकले तो उन्हें संगठित कर भेजने वालों ने सभी के हाथों में त्रिशूल क्यों थमाये थे। इन्हें ट्रेन पर छोड़ने के लिए व पूड़ी के पैकिट लेकर गुजरात के मंत्री क्यों गये थे?
• यह बात क्यों छुपायी जाती है कि इस ट्रेन में कितने लोग बर्थें आरक्षित कराके गये थे और कितने लोग बिना आरक्षण के गये थे। आरक्षण सूची में दिये गये पतों के आधार पर पूछताछ क्यों नहीं की गयी।
• इन तथा कथित संगठित समूह के लोगों ने फैजाबाद के आसपास के स्टेशनों पर दाढी वाले बुजुर्ग मुसलमानों और बुर्काधारी महिलाओं के साथ जो जैसा व्यवहार किया जिसकी कुछ मामलों में रिपोर्ट भी दर्ज की गयी है व कई मामलों में महिलाएं ट्रेन से कूदने के लिए मजबूर हुयीं जिसके समाचार 25 फरबरी 2002 के जनमोर्चा में प्रकाशित हैं जिसे उत्तरप्रदेश के प्रसिद्ध पत्रकार शीतला सिंह निकालते हैं।
• गोधरा में पूरी साबरमती ट्रेन में आग नहीं लगी थी अपितु केवल खास एक बोगी एस-6 में आग लगी थी।
• इस बोगी में लगी आग में जो 59 लोग जल कर मर गये थे उनमें तथाकथित कार सेवकों की संख्या केवल दो थी। शेष अधिकांश आम सवारियां थीं जिनमें अधिकांश औरतें और बच्चे थे। यदि आग लगाने वालों की दृष्टि और योजना कारसेवकों को आहत करना होती तो क्या वे यह कोशिश नहीं करते कि ट्रेन में सवार दो हजार कार सेवकों में से अधिक आहत हों। जो सभी बोगियों में थे।
• यदि, जैसा कि प्रचारित किया गया है कि, श्री राममंदिर की कार सेवा के लिए जाने वालों पर आक्रमण करने की योजना होती तो अयोध्या जाते समय हमला किया जाता न कि लौटते समय!
• जिस ट्रेन में दो हजार कार सेवक सवार हों उस में आग लगाने व मुकाबला करने के लिए सौ पचास लोग एकत्रित नहीं होंगे जैसा कि बताया जाता रहा है।
• यह बहुत संभव है व जैसा कि विभिन्न समाचार माध्यमों के द्वारा बताया भी गया है कि बोगी संख्या 6 में सवार किसी व्यक्ति से भले ही वह कार सेवक रहा हो, किसी का झगड़ा हो गया हो और उसने बदला लेने के लिए अपने साथियों को एकत्रित कर हमला किया हो व उसके द्वारा बोगी बन्द कर लेने की स्थिति में गुस्से में उसके साथियों ने पूरी बोगी में आग लगा देने का अपराध किया हो। इस घटना के अगले साल ही विधान सभा चुनाव होना तय थे इसलिए इसको साम्प्रदायिक रूप देने से बहुसंख्यकों की पार्टी को लाभ मिल सकता था।
• स्मरणीय है कि उन दिनों भाजपा की गुजरात सरकार बेहद अलोकप्रिय थी व उसी अलोकप्रियता से उबरने के लिए केशूभाई को हटा कर मोदी को लाया गया था। इस घटना से पूर्व विधानसभा के चार उपचुनाव हुये थे जो भाजपा की ही सीटें रही थीं पर उनमें से तीन में भाजपा हार गयी थी और जिस एक सीट पर उसे विजय मिली थी वह मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीट थी पर उस सीट पर भी जीत का अंतर पिछली जीत से आधा रह गया था।
• गोधरा घटना के बाद जो मुसलमानों का नरसंहार किया गया वह इतने बड़े पैमाने पर, इतने विस्तृत क्षेत्र में तथा इतनी तेजी के साथ तभी हो सकता था जब इसमें पूर्व से तैयार योजना हो और राज्य शासन की मदद हो। बाद की जाँचों व स्टिंग आपरेशन में इस बात की पुष्टि भी हुयी है।
• प्रैस भी प्रचार प्रभावित होकर गोधरा के बाद हुये इकतरफा नरसंहार को साम्प्रदायिक दंगा कहता है जबकि इसमें एक ही समुदाय के लोग मारे गये व उनके ही घर व सम्पत्ति लुटे।
इसलिए केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश और जाँच भर बिठा देने से अपराधियों को कमजोर नहीं किया जा सकता अपितु जरूरत इस बात की है कि गुजरात की जनता तक असलियत पहुँचे और अफवाहें तथा झूठी बातें फैलाने वालों पर कठोर नियंत्रण लग सके। इसके साथ यह भी जरूरी है कि अल्पसंख्यक वर्ग के अपराधियों के साथ भी कोई रियायत न की जाये जिससे साम्प्रदायिक लोगों को गलत प्रचार का अवसर नहीं मिल सके।
वीरेन्द्र जैन
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