बीते एक दशक में मीडिया का स्वरूप जितनी तेज़ी से बदला है, उतनी ही तेज़ी से उसे नियंत्रित कर हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की चाहत भी बढ़ी है। ये चाहत सबसे अधिक नेताओं में होती है। शुरू से देखा गया है कि नेता मीडिया से डरते हैं। भ्रष्ट नेता तो बहुत ज़्यादा डरते हैं। इसलिए साम-दाम-दंड़-भेद सभी तरीके से उसे नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।
पत्रकारों को प्रलोभन देकर खुश रखना आम बात है। मगर ज़्यादा चिंताजनक नहीं। हर व्यवस्था की तरह मीडिया में भी हमेशा भ्रष्ट और ईमानदार दोनों तरह के लोग रहे हैं। ये प्रकृति के नियम भी है कि जहां ज़हर होता है वहीं पर उसकी काट भी मिलती है। ठीक उसी तरह भ्रष्ट पत्रकार बिक जाते हैं, जबकि ईमानदार पत्रकार सरकार को निरंकुश होने से रोकते हैं। लेकिन एक दशक में सत्ता में बैठे नेताओं ने सरकारी बाबुओं की मदद से ईमानदार पत्रकार पर नकेल कसने का नया तरीका ढूंढ लिया है। अब वो सीधे तौर पर मीडिया संस्थान को ही अपने जाल में फांस लेते हैं। वो खुलेआम कहते हैं कि तुम जो चाहे वो लिखो मगर असर तभी होगा जब छपेगा। मतलब पत्रकार आज़ाद रह कर भी क्या कर सकते हैं जब उनका माध्यम यानी अख़बार या फिर न्यूज़ चैनल गुलाम हो।
बिहार में भी इसका चलन बढ़ रहा है। नीतीश सरकार ने वहां के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों की आर्थिक नस दबा रखी है। इसके लिए सरकारी विज्ञापनों को जरिया बनाया गया है। महंगाई के दौर में आज एक अख़बार को छापने की कीमत कम से कम 12 रुपये आती है। मगर वो बिकता है ढाई या फिर तीन रुपये में। लागत और बिक्री के बीच के इस अंतर को विज्ञापनों की मदद से पाटा जाता है। इसमें सरकारी विज्ञापनों की भूमिका बड़ी होती है। बस अख़बारों की ये कमजोरी, निरंकुश नेताओं को मनमानी करने की छूट दे देती है।
इसे विस्तार से समझने के लिए आप कभी बिहार सरकार के जन संपर्क विभाग की वेबसाइट पर जाएं। वहां आपको राज्य विज्ञापन नीति ( स्टेट एडवर्टिजमेंट पॉलिसी)- 2008 मिलेगी। इस नीति के तीसरे पेज पर चौथे कॉलम में साफ शब्दों में लिखा है कि “कोई भी समाचार पत्र-पत्रिका, जो कि स्वीकृत सूची में शामिल होने की अनिवार्य पात्रता रखते हैं, को स्वीकृत सूची में शामिल किया जाना समिति के लिए बाध्यकारी नहीं होगा”।
ये भी लिखा है कि अगर किसी मीडिया संस्थान का काम राज्य हित में नहीं हैं तो उसे दिये जा रहे विज्ञापन रोके जा सकते हैं। उसे स्वीकृत सूची से किसी भी वक़्त बाहर किया जा सकता है। अब सवाल उठता है कि मीडिया संस्थान का काम राज्य हित में है या नहीं ये कौन तय करेगा? जन संपर्क विभाग में तैनात सरकारी बाबू या भ्रष्टाचार में लिप्त नेता?
यही नहीं अगर आप बिहार की विज्ञापन नीति को गौर से पढ़ें तो उसमें एक चौंकाने वाली बात और नज़र आएगी। उसमें ये भी लिखा है कि अगर कोई “संस्थान स्वीकृत सूची में नहीं है तो भी उसे विज्ञापन दिया जा सकता है”। “विशेष परिस्थिति” में विज्ञापन प्राधिकृत समिति किसी भी “राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र”, पत्रिका को विज्ञापन दे सकती है। आखिर क्यों? एक तरफ कोई सारे मापदंडों पर खरा उतरने के बाद भी वंचित रह जाए और दूसरी तरफ बिना किसी मेहनत के किसी को सबकुछ मिल जाए? ये कहां का इंसाफ़ है? कहीं इसका मकसद अपनों को खुश करना तो नहीं है?
यही वो तीसरा पहलू है जिसकी वजह से आज बिहार से धांधली और गड़बड़ियों की ख़बरें बेहद कम आ रही हैं। लालू की सत्ता के दौरान मुखर होने वाले पत्रकार आज खामोश हैं। पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे बताया कि “बहुत से पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया है। वो पत्रकार कम, बिज़नेस मैन ज़्यादा हो गए हैं। जो नहीं बिके उन्हें सत्ता के इस्तेमाल से हाशिये पर ढकेल दिया गया है”।
पटना के एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि “मीडिया नीतीश राज से ज्यादा लालू राज के दौरान आज़ाद था। लालू के ख़िलाफ़ हम लोग फिर भी लिख लिया करते थे, मगर नीतीश के ख़िलाफ़ कुछ भी लिखना आफ़त को दावत देना है”। वो पत्रकार आगे ये भी कहते हैं कि “अगर रोजी-रोटी पर ख़तरा नहीं हो तो किसी भी तानाशाह से निपट लिया जाए। लेकिन अब तो सबूत जुटा लेने पर भी सरकार के ख़िलाफ़ कुछ लिखने से कोई फायदा नहीं, हमें मालूम है कि वो छपेगा नहीं। अगर ग़लती से छप गया तो नौकरी भी जा सकती है”।
इसी बात को बिहार के जुझारू पत्रकार पुष्पराज नया विस्तार देते हैं – “2008 में जब बिहार पर कोशी ने क़हर बरपाया तो मैं एक प्रतिष्ठित अख़बार के लिए रिपोर्टिंग करने बाढ़ क्षेत्र में गया। वहां से मैंने कई ख़बरें भेजी। ऐसे इलाके में था जहां सबकुछ पानी में डूबा हुआ था, अख़बार कहां से मिलता? इसलिए पता नहीं चल सका कि ख़बरों का अंजाम क्या हुआ? क़रीब एक हफ़्ते बाद थोड़ा सुरक्षित इलाके में पहुंचा तो अख़बार पढ़ने को मिला। शुरुआती कुछ ख़बरें तो बिना काट-छांट के छपीं। उसके बाद की ख़बरों में जो पंक्ति या शब्द सरकार के ख़िलाफ़ था उसे हटा दिया गया था। मैंने दफ़्तर फोन किया और समाचार संपादक से इस बारे में बात की। बातचीत में अहसास हो गया कि नीतीश सरकार ने सब मैनेज कर लिया है”। पुष्पराज बताते हैं कि राज्य में कई ईमानदार और खांटी पत्रकार हैं जिनकी ख़बरों के साथ न्याय नहीं हो रहा।
पुष्पराज इससे भी अधिक ख़तरनाक बात बताते हैं। उनका कहना है कि उनकी बेबाक पत्रकारिता की वजह से उनके परिवार को कई बार मुश्किल उठानी पड़ी है। इलाके के कुछ अधिकारी उनके घरवालों को बेवजह डरा धमका रहे थे। इसकी शिकायत उन्होंने मुख्यमंत्री से की। मुख्यमंत्री कार्यालय से चिट्ठी भी आई। उसमें भरोसा दिलाया गया कि दोषी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी। लेकिन लंबा वक़्त गुजरने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे उन अधिकारियों के हौसले बढ़ गए हैं। वो अब खुलेआम कहते हैं कि तुमने शिकायत करके हमारा क्या बिगाड़ लिया? ये संकेत है कि आने वाले दिनों में बिहार में पत्रकारों की स्थिति बिगड़ने वाली है। वो दिन दूर नहीं जब सरकार के इशारे पर उन पत्रकारों पर जुल्म ढाए जाएंगे, जो सत्ता के सामने घुटने टेकने से इनकार कर देंगे।
कुछ पत्रकार तर्क देते हैं कि नीतीश के राज में विकास हो रहा है, फिर खिंचाई की क्या ज़रूरत? यहां सवाल नीतीश या फिर किसी दूसरे नेता की खिंचाई का नहीं है। अगर कोई ख़बर किसी की खिंचाई के इरादे से करता है तो ये एक तरह का मैनुपुलेशन होगा। मसला इससे बहुत बड़ा है। लोकतंत्र की मूल भावना से जुड़ा है। क्या किसी भी सरकार को ये हक़ है कि वो अपने ख़िलाफ़ उठने वाली सभी आवाज़ों को ताक़त के बल पर दबा दे? क्या सरकार को निरंकुश होने से रोकने के लिए सवाल उठाना ग़लत है? क्या सरकार में शामिल लोगों के काले कारनामों को उजागर करना ग़लत है? क्या समाज के सबसे निचले तबके को लेकर प्रशासनिक बेरुखी को सामने रखना एक अपराध है? सवाल ये भी है कि संविधान ने जो इस देश के नागरिकों को हक़ दिया है उसका क्या होगा?
यहां एक और बात है जो अभी सत्ता के नशे में चूर नीतीश कुमार समझ नहीं पा रहे। इसे सही तरीके से समझना हो तो छत्तीसगढ़ जाइये। अजीत जोगी उस सूबे के पहले मुख्यमंत्री थे। उन दिनों मैं छत्तीसगढ़ में ही था। मुझे अच्छी तरह याद है कि राज्य में विज्ञापनों के आधार पर अख़बारों को ब्लैकमेल करने का धंधा उनकी ही सरकार के दौरान शुरू हुआ। कोई चैनल उनके ख़िलाफ़ ख़बर करता तो उसे इलाके में ब्लैकआउट करा देते। कोई अख़बार ख़बर छापता तो विज्ञापन रोक देते। लेकिन वो दिन भी आया जब जनता ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। आज वहां रमण सिंह की सरकार है। अब भी वहां विपक्ष के ख़िलाफ़ ख़बरें तो छप जाती हैं लेकिन सरकार के ख़िलाफ़ नहीं छपती। मतलब जो हथियार अजीत जोगी ने अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया आज वही हथियार उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो रहा है। इस खेल में कभी अजीत जोगी, कभी रमण सिंह या कभी नीतीश कुमार जैसे लोग अपना हित साध लें, लेकिन ये लोकतंत्र के लिए घातक है।……
((जारी))
रंगनाथ सिंह
June 3, 2009 at 12:17 pm
लेकतंत्र में कानून बना कर प्रतिरोध का दमन करने का चलन बढ़ता जा रहा है। नीतीश सरकार की प्रेस के लिए गला-घोंटु विज्ञापन पाॅलिसी जान कर आश्चर्य हुआ। आपने सत्ता की बारीक नसो में घुस कर जिस तरह से शोषण के (तथाकथित कानूनी) औजारों को बेनकाब किया है उससे नोम चोम्सकी के अमरीका मीडिया के किए गए चीर-फाड़ की याद आ गई।
धन्यवाद
समरेंद्र
June 3, 2009 at 12:52 pm
रंगनाथ जी,
उत्साह बढ़ाने के लिए शुक्रिया, लेकिन मैं अपनी सीमा जानता हूं।
arvind shesh
June 3, 2009 at 12:35 pm
असली बात वही है जिसकी ओर आपने साफ तौर पर ध्यान दिलाया है। आज भी दिल्ली से निकलने वाले “नई दुनिया” में देख लीजिए। पटना से नीतिश कुमार का चालीसा कम से कम चार जगहों पर बड़े स्पेस में छपा है। यह स्वाभाविक तो नहीं ही हो सकता है। जिन बातों का हल्ला नीतिश मचा रहे हैं, उसकी कई परतें आपने पहले आलेख में उघाड़ी हैं। बीबीसी ने भी अपनी एक खबर में बिहार में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के आधार पर यह बताया था कि नीतिश के प्रचार का क्या सच है। वैसे भी बिहार या देश का यही मीडिया है जिसे पिछले साल की बाढ़ में मारे हजारों लोगों में से एक की भी तस्वीर या छापने के लिए वैसी खबर नहीं मिल, जो नीतिश के चार चांद लगाते व्यक्तित्व में बट्टा लगाते हों, लेकिन छोटे-से-छोटे “इवेंट” में नीतिश की तस्वीर और विस्तृत खबरें आसानी से जगह पा लेती हैं।
साहसपूर्ण श्रृंखला के लिए बहुत-बहुत बधाई। यह ईमानदार विश्लेषण जारी रखें। इस पर मैं भी कुछ लिख रहा हूं। उम्मीद करता हूं कि आपसे बहुत मदद मिलेगी…
समरेंद्र
June 3, 2009 at 12:55 pm
अरविंद जी,
आप लिखिये, मैं आपके साथ हूं। एक बात और आपने जिक्र किया है कि बीबीसी ने सूचना के अधिकार के तहत कोई जानकारी मांगी थी। क्या आप उस ख़बर के बारे में थोड़ा विस्तार से बता सकते हैं? इससे मेरी भी थोड़ी मदद हो जाएगी।
धन्यवाद.
अरविंद शेष
June 3, 2009 at 1:27 pm
शुक्रवार, 01 मई, 2009 को 10:32 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बिहारः चुनाव प्रचार और सच
चुनाव प्रचार के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ख़ुद को राज्य का विकास का पहरुआ बताया है और साथ ही केंद्र को कटघरे में खड़ा किया है, यह कहते हुए कि विकास के लिए बिहार जैसे ग़रीब राज्य को केंद्र पैसा ही नहीं दे रहा.
लेकिन राज्य सरकार के ही काग़ज़ चुनावी मौसम की इस राजनीतिक भाषा की कुछ और चुगली करते नज़र आते हैं.
बिहार सरकार से सूचना का अधिकार क़ानून के तहत मिली जानकारी से यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वर्तमान राज्य सरकार को पिछली राज्य सरकार की तुलना में लगभग दोगुना पैसा केंद्र सरकार से मिला है.
इतना ही नहीं, जानकारी यह भी दिखाती है कि पहली बार अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से राज्य को बड़ी मदद मिलनी शुरू हुई है लेकिन विकास के लिए लिया जा रहा पैसा इस्तेमाल ही नहीं हो रहा है.
सूचना का अधिकार क़ानून के तहत युवा कार्यकर्ता अफ़रोज़ आलम साहिल ने राज्य सरकार से जानकारी मांगी कि पिछले आठ वर्षों में केंद्र सरकार से राज्य सरकार को कितना कितना पैसा मिला है. यह भी पूछा गया कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से कितना अनुदान राज्य सरकार को प्राप्त हुआ है.
राज्य सरकार से लंबे इंतज़ार के बाद जो जानकारी मिली, वो राज्य सरकार के नेताओं की चुनावी प्रचार की भाषा को ग़लत साबित करती नज़र आती है.
केंद्र से मिली राशि
आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2003-04 में राज्य सरकार को केंद्र से 1617.62 करोड़ रूपए मिले थे. पर केंद्र में सरकार बदलने के बाद यूपीए ने राज्य सरकार को लगभग दोगुना पैसा देना शुरू किया.
पहले ही वित्तीय वर्ष यानी वर्ष 2004-05 में केंद्र ने राज्य सरकार को 2831.82 करोड़ रूपए की राशि उपलब्ध कराई.
इसके बाद राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समर्थन से बनी इस राज्य सरकार को वर्ष 2005-06 में 3332.72 करोड़ रूपए केंद्र सरकार से मिले.
इसके अगले वित्तीय वर्ष में यानी वर्ष 2006-07 में यह राशि बढ़ाकर 5247.10 करोड़ कर दी गई. इसके बाद के आंकड़े राज्य सरकार उपलब्ध नहीं करा पाई है पर अधिकारी मानते हैं कि केंद्र से मदद बढ़ी ही है.
राज्य सरकार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने बीबीसी को इस बारे में बताया कि केंद्र का रवैया सौतेला ही रहा है. पिछली सरकार से वर्तमान सरकार की तुलना के आधार पर राज्य के लिए ज़रूरी राशि की बात नहीं करनी चाहिए.
पर चुनाव के दौरान लोगों से यह कहना कि केंद्र ने राज्य सरकार को पैसा नहीं दिया, कहाँ तक सही है.
इसपर सुशील मोदी कहते हैं, “पिछली सरकार विकास के नाम पर कुछ नहीं करती थी. जो पैसा नाममात्र के लिए आता था, उसे भी राज्य सरकार ख़र्च नहीं कर पाती थी. अब विकास का काम शुरू हुआ है तो उसके लिए पैसा चाहिए पर जितना चाहिए, उतना केंद्र से नहीं मिल रहा है.”
विश्व बैंक की मदद
लेकिन एक तथ्य और है जो राज्य सरकार के विकास कार्यों पर होने वाले ख़र्च पर सवाल उठा देता है. राज्य सरकार से मिले दस्तावेज़ों में यह जानकारी भी मिली है कि विश्व बैंक से कितना पैसा राज्य सरकार को मिल रहा है और उसमें से कितना ख़र्च हो रहा है.
सुशील मोदी गर्व के साथ बताते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान ही विश्वस्तरीय एजेंसियों में राज्य सरकार के प्रति विश्वास पैदा हुआ है और सहायता मिलनी शुरू हुई है. पर आंकड़े कहते हैं कि पैसा लेने में चुस्त सरकार, उसे ख़र्च करने में सुस्त है.
राज्य सरकार को वर्ष 2006-07 में विश्व बैंक से ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए 92.92 लाख रूपए मिले पर ख़र्च हुए कुल 60 लाख रूपए. अगले वित्तीय वर्ष यानी 2007-08 में ग़रीबी उन्मूलन, लोक व्यय एवं वित्तीय प्रबंधन और बिहार विकास ऋण के लिए राज्य सरकार को 464 करोड़ रूपए मिले पर दस्तावेज़ बताते हैं कि राज्य सरकार ने इसमें से कुछ 6.13 करोड़ रूपए ही ख़र्च किए हैं.
इस बारे में उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी अपने ही विभाग से मिली जानकारी को ग़लत बताते हैं और कहते हैं कि जितना पैसा मिल रहा है, उसका पूरा इस्तेमाल हो रहा है और ऐसा किसी साज़िश के तहत राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है.
हक़ीक़त की चुगली
सुशील मोदी कहते हैं, “आपके पास जो भी आंकड़ा है वो ग़लत आँकड़ा है, पहली बात तो विश्व बैंक जो पैसा देता हैं, उनकी अपनी शर्तें हैं, पहले ये संस्थाएँ पैसा नहीं देती थी लेकिन मौजूदा सरकार की कोशश के बाद ऐसा हो सका. इसके लिए इस सरकार ने उन संस्थाओं के सामने अपनी साख बनाई उसके बाद ही ऐसा हो सका है.”
मोदी इस मुद्दे पर केंद्र की ओर एक और हमला करते नज़र आते हैं. वो सवाल उठाते हैं बिहार सरकार के बाढ़ राहत के लिए पैदा हुए आर्थिक संकट का.
मोदी कहते हैं, “राज्य सरकार को केंद्र से केवल एक हज़ार करोड़ की मदद मिली थी. वो तत्काल ख़र्च हो गई. उसके बाद कोसी तटबंध और बाढ़ प्रभावित ज़िलों के लिए हमने केंद्र से 14 हज़ार करोड़ की मदद मांगी पर केंद्र राष्ट्रीय आपदा घोषित करने के बाद भी कोई मदद दे नहीं रही है. यह सौतेला व्यवहार नहीं है तो क्या है.”
बाढ़ के मुद्दे पर केंद्र को घेर रही राज्य सरकार काग़ज़ों में सामने आते सच पर साफ़ कुछ नहीं बता पाती. जो बताती है, उसमें और कागज़ों में दर्ज सच में फ़र्क साफ़ है. पर राजनीति में लोगों के सामने सच कितना और किस रूप में आता है, इस बार का चुनाव प्रचार इसका एक सटीक उदाहरण तो है ही.
खेतों को कटवाकर ताने गए वातानुकूलित तंबुओं में ठहरकर गांव की हालत देखते और न्याय यात्रा और विकास यात्रा के रथों पर सवार राज्य के मुख्यमंत्री से शायद लोग भाषा में ईमानदारी की भी उम्मीद करते हैं. ईमानदारी, जिस शब्द से राज्य में सत्ता बदली है. जिस नारे पर वर्तमान सरकार सत्ता में आई है.
समरेंद्र
June 3, 2009 at 1:58 pm
बहुत बहुत धन्यवाद अरविंद जी। इससे काफी मदद मिलेगी। एक बार फिर धन्यवाद।
रंगनाथ सिंह
June 4, 2009 at 3:31 pm
मेरी तारीफ को अन्यथा न लें। मैं यूँ ही कुछ नहीं कह रहा। बिहार सरकार की मीडिया नीति को जो पेंच आप ने खोला है वो बहुत महत्वपुर्ण है। आम तौर पर लोग अति सरलीकरण से काम लेतें हैं। सरकार ये कर रही है, सरकार वो कर रही है। मीडिया ये कर रहा है, मीडिया वो कर रहा है। जबकि ये बातें तो लोग तुरंत जान लेते हैं। लेकिन लोग ये नहीं जानते होते कि यह सब कैसे किया जा रहा है। वो कौन से उपकरण हैं जिनके सहारे सरकारें भ्रष्टाचार की अति करने के बाद भी सुरक्षित बच निकलती हैं। वो कौन से तकनीकी सुरक्षा कवच हैं जिनकी ढाल के आगे सारे महाभ्रष्ट सुरक्षित छिपे हुए हैं।
साहसपूर्ण पत्रकारिता के लिए बधाई
Sagar
June 7, 2009 at 4:11 pm
Samrendra ji ,
Namaskar !
Aapka aalekh abhi jari hai , Jitna bhi likha aapne , usme Netaon ki hi charcha hai, Jabki netaon se bhi bare doshi BEAUROCRATES – Babu log hain , Neta unse mil gaye hain , Dono mil-jul kar , Bihar kya poore desh ko chala rahen hain ,Is baat par jara gaur kijiyega.
Sadar ——— Sagar
आवाज़
June 19, 2009 at 2:29 pm
विज्ञापन नीति के बूटों तले सरकारों का मीडिया संस्थानों को दबाना नई बात नहीं। लेकिन मुद्दा ये है कि जो पारर्शिता का दंभ भर रहे हैं, उनके राज में भी सबकुछ ऐसा ही चल रहा है तो वो दिन दूर नहीं जब इतिहास खुद को दोहराएगा। किसे याद नहीं कि कभी लालू का गुणगान करने वाले मीडिया ने एक ही बार में उन्हें कहां से कहां उतार दिया। वक्त है…और नीतीश फिलहाल इसके सिकंदर हैं। आगे-आगे देखिए, होता है क्या?