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मनमोहन सरकार का मीडिया मैनेजमेंट

कुछ दिन पहले ही एक्सचेंज फॉर मीडिया पर इस साल जनवरी से मार्च के बीच टॉप टेन एडवरटाइजर्स यानी विज्ञापन देने वाली कंपनियों और संस्थाओं की सूची छापी गई। उस सूची में एक बात चौंकाने वाली थी। मंदी के इस दौर में मनमोहन सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अख़बारों के लिए खजाना खोल दिया था। टॉप टेन एडवरटाइजर्स में दो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं। इनके अलावा भारत सरकार, नागरिक उड्डन मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय भी शामिल हैं।

इस लिस्ट के मुताबिक पिछले साल जनवरी से मार्च के बीच तीसरे स्थान पर मौजूद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इस साल पहले स्थान पर है। बैंकिंग सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनियां इस लिस्ट में कहीं नहीं हैं। मतलब साफ है एसबीआई ने प्रचार पर अपने प्रतिद्वंदियों से काफी अधिक पैसा खर्च किया… आखिर क्यों? ठीक इसी तरह दूसरे नंबर पर मौजूद है एक और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनल। जबकि टेलीकॉम सेक्टर की कोई और कंपनी टॉप टेन में शामिल नहीं है। वोडाफोन और रिलायंस भी नहीं।

सरकारी कंपनियों के बाद अब मंत्रालयों पर नज़र। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल कितना बुरा है इसका अंदाजा सभी को है। यहां हर साल हजारों की संख्या में लोग इलाज नहीं मिलने के कारण मर जाते हैं। लेकिन जब विज्ञापन पर पैसे खर्च करने की बारी हो और वो भी चुनाव से पहले तो स्वास्थ्य मंत्रालय किसी से कम नहीं। विज्ञापन देने वालों की सूची में स्वास्थ्य मंत्रालय ने तो बहुत ऊंची छलांग लगाई है। वो 62वें स्थान से 10वें स्थान तक पहुंच गया है। 2008 में 18वें स्थान पर रहने वाली भारत सरकार इस बार 8वें स्थान पर है यानी दस पायदान ऊपर। नागरिक उड्डन मंत्रालय की तो बात ही मत पूछिये। पिछले साल ये मंत्रालय विज्ञापन देने वालों की रेस में कहीं नहीं था, लेकिन इस बार सातवें स्थान पर है।

चुनाव से ठीक पहले सरकार की तरफ से प्रचार पर इतने भारी खर्च की वजह क्या थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार मीडिया का मुंह बंद रखना चाहती थी? सरकार से ये पूछा जाना चाहिए कि किस मीडिया संस्थान को कितना विज्ञापन दिया गया? क्या विज्ञापन सर्कुलेशन और टीआरपी के आधार पर बांटे गए या फिर कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई?

इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकारी विज्ञापनों के जरिये किस तरह से ब्लैकमेलिंग होती है। ये भी कि ये सच सिर्फ बिहार का नहीं बल्कि पूरे देश का सच है। कहीं कम कहीं ज़्यादा। जिस राज्य के मुखिया में तानाशाही प्रवृति ज़्यादा है वहां पर खुलेआम अख़बारों और पत्रकारों को डराया-धमकाया जाता है। जिन राज्यों का मुखिया थोड़ा लोकतांत्रिक है, वहां पर अख़बारों को थोड़ी आज़ादी मिली हुई है। सवाल उठता है कि केंद्र और राज्य सरकारों की विज्ञापन नीति में ये क्यों जोड़ा जाता है कि आप सारी अनिवार्यताएं पूरी करके भी विज्ञापन पर हक़ नहीं जता सकते?

मैंने कई वरिष्ठ पत्रकारों से यही सवाल किया। संपादक स्तर के पत्रकारों से भी। मैंने उनसे ये भी पूछा कि क्या सरकारों की इस विज्ञापन नीति को कभी किसी अख़बार या मीडिया संस्थान ने अदालत में चुनौती दी है या नहीं? सबने यही कहा कि उनकी जानकारी में ऐसा कोई वाकया नहीं है। आखिर क्यों? अगर सारी अनिवार्यताएं पूरी करने के बाद राज्य हित के ख़िलाफ़ ख़बर लिखने के आरोप में उनका विज्ञापन रोका गया तो उसे अदालत में चुनौती क्यों नहीं दी गई? क्यों नहीं कहा गया है कि राज्य के हित में क्या है ये तय करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ नेताओं और सरकारी बाबुओं को नहीं हो सकता। अगर नेताओं और सरकारी बाबुओं को ही ये तय करने का अधिकार है तो फिर देश की बाकी स्वायत्त संस्थाओं को भंग क्यों नहीं कर दिया जाता? तब संविधान में दिये गए बोलने के अधिकार को ख़त्म क्यों नहीं कर दिया जाता?

दरअसल, सहनशीलता और उदारता किसी भी लोकतंत्र के बुनियादी तत्व होते हैं। जब हुक्मरान सहनशील और उदार नहीं रहेंगे तो फिर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता। यहां पर मैं आपका ध्यान इवेलाइन बीट्राइस हॉल के एक मशहूर कोटेशन की तरफ खींचना चाहता हूं। आमतौर पर कहा जाता है कि वो कोटेशन वोल्टेयर का है। लेकिन ये सच नहीं है। वो कोटेशन बीट्राइस का है जिन्होंने वोल्टेयर पर किताब भी लिखी थी। उनका कहना था कि “ आई डिस्एप्रूव ऑफ व्हाट यू से, बट आई विल डिफेंड टू द डेथ योर राइट टू से इट” मतलब “मैं आपकी बात खारिज कर दूंगा लेकिन अपनी अंतिम सांस तक आपके बोलने के अधिकार की रक्षा करूंगा”। कुछ ऐसी ही भावना हमारे संविधान बनाने वालों की भी रही होगी, तभी तो उन्होंने मौलिक अधिकारों में फ्रीडम ऑफ स्पीच को शामिल किया। फिर जब सरकार संविधान की उस मूल भावना के साथ खिलवाड़ करती है तब उसका विरोध क्यों नहीं होता? क्या मीडिया संस्थान कानूनी लड़ाई से डरते हैं?

जहां तक मुझे लगता है मीडिया संस्थान कानूनी लड़ाई से डरते नहीं हैं बल्कि बचना चाहते हैं। मैं ऐसे कई वाकयों को जानता हूं जिनमें मीडिया संस्थानों में स्टैंड लिया है। सही रिपोर्ट होने पर मुकदमे भी लड़े हैं। अदालत से लेकर संसदीय समिति तक चक्कर काटे हैं। जाहिर है अदालती लड़ाई तो लड़ी जा सकती है, लेकिन विज्ञापन बंद होने पर हर रोज लाखों रुपये का जो नुकसान होगा वो सहना मुश्किल है। अख़बार या फिर टीवी चैनल चलाना सफेद हाथी पालने जैसा है … कानूनी लड़ाई लंबी खिंची तो कारोबार बंद करने की नौबत भी आ सकती है।

फिर हमारे पास कौन सा विकल्प बचता है? मेरे हिसाब से इसका एक ही उपाय है कि जिस तरह दूसरे तमाम सेक्टरों में रेगुलेटरी बॉडी हैं ठीक उसी तरह कोई रेगुलटरी बॉडी बनाई जानी चाहिये। जिसमें मीडिया से जुड़े तमाम मुद्दों पर का जल्द से जल्द निपटारा हो सके। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक निष्पक्ष समिति की गठन होना चाहिए। मीडिया से जुड़े सरकारी आदेश को चुनौती देने का अधिकार भी दिया जाना चाहिये। साथ ही विज्ञापन नीति में एक क्लाज भी जोड़ा जाए कि दोष साबित होने तक किसी भी मीडिया संस्थान का विज्ञापन नहीं रोका जाएगा। ना ही उस पर कोई आर्थिक दंड लगाया जाएगा।

((जारी))…………………….

((अगर आप भी विज्ञापन के ज़रिये ब्लैकमेलिंग के मुद्दे पर कोई राय रखते हों तो उसे खुल कर बताएं।))

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4 Responses to मनमोहन सरकार का मीडिया मैनेजमेंट

  1. रंगनाथ सिंह Reply

    June 5, 2009 at 1:18 am

    समरेन्द्र जी
    विज्ञपान को लेकर एक खास मिथक है कि विज्ञापन न हो तो अखबार/चैनल बंद हो जाएंगे। तमाम प्रोडक्टस के लिए ऐसी मैगजीन आतीं हैं जो सिर्फ एरिया स्पेसिफिक होती हैं। इसके बावजूद पाप्यूलर मीडिया में विज्ञापन क्यों आते हैं ? इन बहुराष्ट्रीय कंपनीयों को मीडिया पर इतनी दया क्यों है ? मीडिया को इन विज्ञापनों से ज्यादा लाभ मिलता है या मीडिया द्वारा इन विज्ञापनों के प्रसार से बहुराष्ट्रीय कंपनीयों को ? अगर मीडिया विज्ञापनों पर निर्भर है तो तमाम प्रोडक्ट्स अपने फर्जी दावों से जनता को भरमाने के लिए मीडिया पर निर्भर है। परस्पर निर्भरता का यह मामला एक तरफा नहीं है।
    रही बात सरकारी विज्ञापनों की, सरकारी विज्ञापनों का प्रयोग अनुग्रह राशि/सुविधा शुल्क या फिर इकोनाॅमिकल ब्लैक मेलिंग के लिए किया जा रहा है। मीडिया मे विज्ञापन की बंदरबांट के अलावा इन विज्ञापनों को लिखवाने के लिए जिन विज्ञापनों एजेंिसयों को चयनित किया जाता है उसमें बड़े खेल खेले जातें है। ब्यूरोक्रेट सरकारी खजाने से इन विज्ञापनों की लिखाई का जो (और जैसे) शुल्क अदा करते हैं उसकी भी जाँच जरूरी है।
    सरकार इन गुप्त तकनीकियों से मीडिया को जिस तरह नियंत्रित करती है उसकी मुखालफत के लिए हर संभव प्रयास करना होगा।

  2. Arun Kumar, General Secretary, Bihar Working Journalists Union Reply

    June 7, 2009 at 4:48 pm

    Samrendra Ji,

    Media ko Vigyapan Rasi Ke jariye Niyantrit Karne Ki Koshish Ki Jitni Khilafat Ki Jai Samaj Ke Liye, Jantantra Ke Vikash Ke Liye Woh Kuch Kam Hi Hoga. Lekin Uske Saath Hi Saath Media ke Andar Vaidhanik Wage Boardon Ke Mutabik Patrakar Aur Gair Patrakar Mediakarmaiyon Ko Wetan Nahin Dekar Aur Tamam Niyamon Ko Tak Par Rakhkar Unke Soshan Ka Mamla Ujagar Karna Bhi Utna Hi Aavasyak Hoga. Udarikaran Ke Daur Mein Bonafide Trade Union Gatividhiyan Bhi Nahin Chalne Di Ja Rahi Hain Aur Unki Kahin Koi Sunwai Bhi Nahin Hai. Nyayapalika Mein Bhi Jane Par Unhe Uchit Nyaya Nahin Mil Pa Raha Hai. Justice Delayed Nahi Justice Denied Ki Sthiti Hai. Main Nahin Sochta Ki Punjivadiyon Ke Sargana Mulk America Mein Bhi Koi Sansthan Yeh Nahi Soch Sakta Hoga Ki Wo Statutory Wage Board Dwara Nirdharit Wetanman Apne Karmchariyon Ko Nahin De. Magar Yeha Yeh Sathiti Media Industry Ke Karmchariyon Ko Jhelni Par Rahi Hai. Nyaypalika Ke Darwaze Bhi Unke Liye Naya Milne Ka Aujar Sabit Nahi Ho Raha Hai. Bihar Mein Vigat Aaath Varshon Se Bihar Ki Media Industry Ki Ek Shashakt plant Union “The Times Of India Newspaper Employees Union” (Patna) Yeh Ladai Lad Rahi Hai Magar Woh Ajtak Apne Yahan Ke Gair Patrakaron Ko Manisana Wage Board ke Mutabik Grade II Ka Wetan jo Wahan Ke Patrakaron Ko Mil Reha Hai Nahin Dilwa Payee Hai. Nyayapalika Se Bhi Use Koi Madad Nahin Mil Pa Rahi Hai.
    Wigat Dinon Trade Union Andolanon Ko Kamzor Karne Ke Liye Patrakaron / Gair Patrakaron ke andar Vidyaman pad aur paise ki lipsa ka istemal karte hue outrageous salary dekar wage board ki jagah par contractual appointment ki padhati lagoo ki gayee. Chaplusi ke adhar par junior most ko senior padon par bahal kar unka istemal nyaya ki mang karne wale wage board journaliston ko tang karne me kiya gaya. Malikon ka maksad ab pura ho gaya kyunki ab media industry ke andar trade union nam ki koi cheej nahin rah gayee hai.

    Media industry ke andar pichle do dashakon se chal rahe ish soshan ke khilaf bhi jantantra ke blog ka istemal kiya jana chahiye. Apko Malum Hi Hoga Ki Press Council Of India Ne Bhi Ek Prastav Pass Kar Contractual appointment Ko Jantantra Ke Hit mein Ghatak Bataya Ja Chuka Hai. Magar Iski Kisi ne Sudh Bhi Nahin Li. Gaurtalab Hai Ki Woh Resolution Ab Press Council Of India Ke Web-site Par Bhi Nahin Mil Pa Raha Hai. Kya Iske Piche Bhi Koi Sajish Hai ?

    Kya Aap Is Mudde Par Bhi Likhwayenge ?

    • समरेंद्र Reply

      June 7, 2009 at 6:13 pm

      अरुण जी,

      जनतंत्र डॉट कॉम को बनाने के पीछे एक ही मंशा है कि पत्रकारिता का माहौल बेहतर हो और अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी मिले। जनतंत्र से जुड़े सभी लोग ये मानते हैं कि पत्रकारिता का माहौल तब तक बेहतर नहीं हो सकता जबतक कि पत्रकारों की स्थिति में बदलाव नहीं आए। हम उनके साथ हो रही ज्यादती से परिचित हैं और हममें से कुछ उसे भोग भी रहे हैं। इसलिए यकीनन वो सबकुछ सामने लाना चाहेंगे जिसका जिक्र आपने किया है। लेकिन अभी टीम बहुत छोटी है, इसलिए काम धीरे धीरे ही आगे बढ़ेगा। आप पत्रकारों के संगठन के सेक्रेटरी हैं। आपकी नज़र में ऐसे कई पत्रकार होंगे जिनके साथ ज्यादती हुई होगी, आप हमें उनके बारे में सभी तथ्यों के साथ जानकारी भेंजे तो हम उसे यकीनन छापेंगे।

      धन्यवाद.

  3. Arun Kumar, General Secretary, Bihar Working Journalists Union Reply

    June 7, 2009 at 4:48 pm

    Samrendra Ji,

    Media ko Vigyapan Rasi Ke jariye Niyantrit Karne Ki Koshish Ki Jitni Khilafat Ki Jai Samaj Ke Liye, Jantantra Ke Vikash Ke Liye Woh Kuch Kam Hi Hoga. Lekin Uske Saath Hi Saath Media ke Andar Vaidhanik Wage Boardon Ke Mutabik Patrakar Aur Gair Patrakar Mediakarmaiyon Ko Wetan Nahin Dekar Aur Tamam Niyamon Ko Tak Par Rakhkar Unke Soshan Ka Mamla Ujagar Karna Bhi Utna Hi Aavasyak Hoga. Udarikaran Ke Daur Mein Bonafide Trade Union Gatividhiyan Bhi Nahin Chalne Di Ja Rahi Hain Aur Unki Kahin Koi Sunwai Bhi Nahin Hai. Nyayapalika Mein Bhi Jane Par Unhe Uchit Nyaya Nahin Mil Pa Raha Hai. Justice Delayed Nahi Justice Denied Ki Sthiti Hai. Main Nahin Sochta Ki Punjivadiyon Ke Sargana Mulk America Mein Bhi Koi Sansthan Yeh Nahi Soch Sakta Hoga Ki Wo Statutory Wage Board Dwara Nirdharit Wetanman Apne Karmchariyon Ko Nahin De. Magar Yeha Yeh Sathiti Media Industry Ke Karmchariyon Ko Jhelni Par Rahi Hai. Nyaypalika Ke Darwaze Bhi Unke Liye Naya Milne Ka Aujar Sabit Nahi Ho Raha Hai. Bihar Mein Vigat Aaath Varshon Se Bihar Ki Media Industry Ki Ek Shashakt plant Union “The Times Of India Newspaper Employees Union” (Patna) Yeh Ladai Lad Rahi Hai Magar Woh Ajtak Apne Yahan Ke Gair Patrakaron Ko Manisana Wage Board ke Mutabik Grade II Ka Wetan jo Wahan Ke Patrakaron Ko Mil Reha Hai Nahin Dilwa Payee Hai. Nyayapalika Se Bhi Use Koi Madad Nahin Mil Pa Rahi Hai.
    Wigat Dinon Trade Union Andolanon Ko Kamzor Karne Ke Liye Patrakaron / Gair Patrakaron ke andar Vidyaman pad aur paise ki lipsa ka istemal karte hue outrageous salary dekar wage board ki jagah par contractual appointment ki padhati lagoo ki gayee. Chaplusi ke adhar par junior most ko senior padon par bahal kar unka istemal nyaya ki mang karne wale wage board journaliston ko tang karne me kiya gaya. Malikon ka maksad ab pura ho gaya kyunki ab media industry ke andar trade union nam ki koi cheej nahin rah gayee hai.

    Media industry ke andar pichle do dashakon se chal rahe ish soshan ke khilaf bhi jantantra ke blog ka istemal kiya jana chahiye. Apko Malum Hi Hoga Ki Press Council Of India Ne Bhi Ek Prastav Pass Kar Contractual appointment Ko Jantantra Ke Hit mein Ghatak Bataya Ja Chuka Hai. Magar Iski Kisi ne Sudh Bhi Nahin Li. Gaurtalab Hai Ki Woh Resolution Ab Press Council Of India Ke Web-site Par Bhi Nahin Mil Pa Raha Hai. Kya Iske Piche Bhi Koi Sajish Hai ?

    Kya Aap Is Mudde Par Bhi Likhwayenge ?

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