उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अब तानाशाही रवैया अख़्तियार कर रही हैं। उनकी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये सूचना के अधिकार में कटौती कर दी है। ये सोचे समझे बगैर कि उनके इस कदम से सबसे ज़्यादा नुकसान हाशिये पर मौजूद लोगों को ही होगा। ये अधिकार ताक़तवर लोगों के संक्षरण के लिए नहीं बल्कि उन लोगों को ताक़तवर बनाने के लिए है जिन्हें हमेशा छला जाता रहा है।
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने गुपचुप तरीके से एक अध्यादेश जारी किया है। इस अध्यादेश के मुताबिक सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने पर भी सूबे के मंत्रियों, विधायकों और सांसदों के आचार व्यवहार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाएगी। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि मंत्रियों और सांसदों के ख़िलाफ़ शिकायतों से जुड़ी जानकारी और जांच का ब्योरा भी नहीं सौंपा जाएगा। सवाल उठता है कि आखिर इस कदम के पीछे मायावती की मंशा क्या है? क्या वो अपने भ्रष्ट नेताओं को बचाना चाहती हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भ्रष्टाचार के दलदल में वो खुद इस कदर फंस गईं हैं कि उन्हें पोल खुलने का डर सता रहा है?
अध्यादेश में ये बंदोबस्त भी है कि अगर कोई सूचना के अधिकार के जरिये उत्तर प्रदेश सचिवालय से जुड़ी कोई जानकारी मांगता है तो वो भी नहीं दी जाएगी। आखिर क्यों? सचिवालय में ऐसी कौन सी अवैध गतिविधि चल रही है जिसे छिपाने की ज़रूरत पड़ गई है? आप कभी बीएसपी की वेबसाइट पर जाइयेगा। वहां पर मायावती को एक दूरदर्शी और सुलझे हुए नेता के तौर पर पेश किया गया है। लेकिन इस ताज़ा अध्यादेश ने उनके दावे पर सवालिया निशान लगा दिया है।
आज के दौर में पूरी दुनिया में पारदर्शिता की वकालत की जा रही है। लोकतंत्र को मजबूत करने और जन प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाने की ज़रूरत पर बल दिया जा रहा है। ऐसे में एक ऐसी मुख्यमंत्री जो समाज के सबसे निचले तबके का प्रतिनिधित्व करती हैं किस हक़ से जनता को उसके अधिकार से वंचित कर सकती हैं? मायावती के इस तानाशाही कदम का विरोध होना ही चाहिये।
Naresh Kadyan
June 8, 2009 at 5:46 am
We strongly opposed the ordinance which is brought with melafide intention…..
जनतंत्र डेस्क
June 8, 2009 at 11:05 am
नरेश जी,
हर किसी को मायावती के इस अध्यादेश का विरोध करना चाहिए। ये चोरी छिपाने की नीयत से जारी किया गया है। ये सबूत है कि सत्ता में बैठे लोगों की जातियां और धर्म भले ही अलग-अलग हों, लेकिन चरित्र एक होता है। वो मौका मिलते ही अपने ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ को दबाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। मायावती भी उसी राह पर चल रही हैं। वो कहने के लिए दलित हैं। दलित की बेटी हैं। लेकिन कई मामलों में उनका रवैया ऊंची जाति के शासकों जैसा है। बहुत से दलित ये सोच कर खुश हैं कि मायावती ऊंची जातियों के दंभ को कुचल रही हैं। लेकिन इस सोच ने मायावती में एक अहंकार को जन्म दे दिया। और धीरे धीरे मायावती का चरित्र बदल गया। अब वो बिल्कुल ऊंची जाति के अहंकारी नेताओं की तरह बर्ताव करती हैं। अब उनमें, मुलायम में और राजनाथ में कोई फर्क नहीं। इनमें से कोई भी गरीबों और हाशिये पर मौजूद लोगों के बारे में नहीं सोचता।