वर्तमान में मीडिया के दो चेहरे हैं। मुखौटा हटाने पर नज़र आने वाला असली चेहरा इतना विकृत है कि सिर शर्म से झुक जाता है। इस चुनाव में मीडिया ने ख़ासकर दैनिक जागरण जैसे कुछ संस्थानों ने दलाली का एक नया इतिहास रचा है। लोकतंत्र का सौदा कर उन्होंने अपने कर्म और धर्म दोनों से किनारा कर लिया और पाठकों को धोखा दिया है। इस पर भी उनकी बेशर्मी का आलम ये है कि वो खुलेआम जनता के साथ होने का दम भर रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने इस हफ़्ते जनसत्ता में उनकी इसी बेशर्मी को सामने रखा है। साथ ही सूचना के अधिकार की वकालत करने वाले अरविंद केजरीवाल और अरुणा राय से पूछा है कि आखिर किस सिद्धांत के तहत वो ऐसे अख़बारों के साथ खड़े हैं जिन्होंने सूचना के अधिकार को ताक पर रख दिया। ये विरोधाभास क्यों? ये साठगांठ क्यों?
वे जब सूचना के जन अधिकार अभियान के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो अरविंद केजरीवाल से मिलना जुलना होता था। फिर जब सूचना के अधिकार का कानून बन गया तो केजरीवाल ने दिल्ली जैसे महानगर में काम करने के लिए “परिवर्तन” नाम की संस्था बनाई। गांवों में काम करने वाले लोगों से सीधे मिलने और बात की बात से प्रचार करके काम चला सकते हैं। महानगर में मीडिया की सहायता के बिना लोगों तक पहुंचा नहीं जा सकता। केजरीवाल ने इसलिए दिल्ली के मीडिया से संबंध बनाए और उससे मिले सहयोग के कारण उनके काम का असर भी हुआ। भले लोगों की सिफारिश पर उन्हें मेग्सेसे भी मिल गया। अब वे सूचना के अधिकार आंदोलन के नेता हो गये। अब वे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन के जरिये सूचना के अधिकार को बढ़ाने वाले लोगों को राष्ट्रीय पुरस्कार देने वाले हैं।
अच्छा है। लेकिन इससे अपने को उत्तेजित होने की जरूरत नहीं थी। यह कागद कारे इसलिए लिख रहा हूं कि अरविंद केजरीवाल ने यह पुरस्कार तय करने के लिए जो समिति बनाई है, उसमें ऐसे अखबार और उसके मालिक संपादक को भी रखा है, जिसने इस लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया। भ्रष्टाचार तो हिंदी इलाके के और भी बल्कि देश भर के अखबारों ने किया। पैसे लेकर उम्मीदवारों के प्रचार को खबर बनाकर छापा और पाठकों को बताया तक नहीं कि ये खबरें उनकी नहीं, उम्मीदवार के प्रचार के विज्ञापन हैं। उम्मीदवारों को अपना खर्च सीमा में रखने और काले पैसे से मनचाहा प्रचार पाने की सुविधा हुई। चुनाव कवरेज के लिए हिंदी इलाके में घूमने वाले समझदार और जानकार पत्रकारों का अंदाज है कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपये का काला धन बनाया है।
काला धन तो देश के और भी धंधेबाज बनाते हैं और इससे ज्यादा ही बना लेते हैं। मनमोहन सिंह की उदारवादी नीतियों के बावजूद पिछले 18 साल में देश के उद्योग व्यापार को ईमानदार होने की प्रेरणा और प्रोत्साहन नहीं मिला है। काला धन कथित समाजवाद के जमाने से ज्यादा बन रहा है। लेकिन आजतक भ्रष्टाचार केवल नेताओं का उजागर और चर्चित होता है। उदारवादी पूंजीवाद की पवित्र गैयाएं हैं- उद्योग और व्यापार- और उनके भ्रष्टाचार पर ना अखबार बात करते हैं ना चैनल। मुझे कुछ वर्षों से शंका हो रही थी कि हमारी मीडिया को हमारी पूंजी ने अपना सहयोगी बना लिया है और अपने सहोदरों के भ्रष्टाचार पर बात करना हमारा शिष्टाचार नहीं है। लेकिन इस चुनाव के दौरान मुझे अच्छी तरह समझ आ गया कि काले धन के धंधे में हमारा उद्योग-व्यापार और हमारे नेता ही शामिल नहीं हैं बल्कि हमारा मीडिया भी बराबर का सहयोगी और भागीदार हो गया है। उम्मीदवारों ने अखबारों और चैनलों को खुलकर पैसा दिया, काला पैसा। और अखबारों और चैनलों ने बिना किसी पत्रकारीय आचार विचार के उन्हें खूब प्रचार दिया।
अब काले धन का धंधा इतना सर्वव्यापी है तो मैं हिंदी के एक अख़बार के पीछे क्यों पड़ा हूं? इसलिए कि एक तो वह अख़बार है और दूसरे, अख़बार होते हुए भी चुनाव के समय लोकतंत्र और वोटर के प्रति अपनी जिम्मेदारी को सरासर ठेंगा दिखा कर काले धन के धंधे में पड़ा है और तीसरे, जनता के सूचना के अधिकार के गंगाजल में अपने हाथ धोने की कोशिश में लगा है। अरविंद केजरीवाल से मैंने यही पूछा कि भाई, जो कानून भ्रष्टाचार का भंडा फोड़ने के लिए बानया गया है और जो लोगों के सही सूचना पाने के अधिकार को उनका मौलिक अधिकार बनाता है उसके आंदोलन और पुरस्कारों से आप एक ऐसे अख़बार और उसके मालिक संपादक को कैसे जोड़ते हो जिसने पूरे चुनाव भर जनता के सूचना के अधिकार का खुद होकर उल्लंघन किया, भ्रष्टाचार में लिप्त रहा और अपनी इन करतूतों पर परदा डालने के लिए मतदाता जागरण अभियान चलाता रहा जिसमें आप और हमारी अरुणा राय भी शामिल हो गईं?
उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने वाले लगभग सभी उम्मीदवारों को इस अख़बार के व्यवहार और ब्लैकमेली हरकतों से शिकायत रही। कम से कम दो उम्मीदवारों ने तो अपने चुनाव प्रचार में इस अख़बार को अपने विरोध का सीधा और खुला निशाना बनाया। लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी की सीट से लड़ने वाले भारतीय जनता पार्टी के लालजी टंडन और समाजवादी पार्टी की तरफ से देवरिया से लड़ने वाले मोहन सिंह। भाजपा और सपा दोनों ने इस अख़बार के एक-एक मालिक को राज्यसभा में भेजा है। मोहन सिंह ने खुली सा में पूछा कि वे बताएं कि उनको राज्यसभा में भेजने के पार्टी ने कितने पैसे लिये थे जो आज पे हमारी ख़बरें छापने के पैसे मांग रहे हैं। लालजी टंडन अटलजी के पुराने सहयोगी रहे हैं और उन्हें लखनऊ से चुनाव लड़वाते रहे हैं। वे जानते हैं कि समझदार राजनीति और अच्छा जनसंपर्क क्या होता है। लेकिन उन्हें भी भरी सभा और खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहना पड़ रहा है। लालजी टंडन ने आखिर तक इस अखबार का पैकेज नहीं खरीदा और जनता के समर्थन से जीत कर आए।
अब सूचना के अधिकार का कानून और उसकी भावना का तकाजा है कि इस अख़बार से पूछा जाए कि दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में चुनाव के समय अख़बार की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है कि वह वोटरों को निष्पक्ष और उचित रूप से सही और सच्ची जानकारी दे ताकि वे वोट देने का सही फैसला कर सकें। हर लोकतंत्र में जिम्मेदार और स्वतंत्र प्रेस का यह पहला पत्रकारीय कर्तव्य है है। अपनी ख़बरों की जगह उम्मीदवारों के प्रचार को बेचकर अख़बार ने पाठकों के सूचना के अधिकार को खारिज किया है। वह बताए कि क्यों? फिर हर लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस की ख़बरों की जगह को पवित्र माना जाता है क्योंकि पाठक भरोसा करता है कि अख़बार सच्ची और सही ख़बर देगा। दुनिया में हर पाठक अख़बार ख़बर के लिए खरीदता है, विज्ञापन के लिए नहीं। सब समझदार मानते हैं कि पाठक और अख़बार के इस भरोसे के बिना अख़बार और पत्रकारिता टिके नहीं रह सकते। इस अखबार से पूछना पड़ेगा कि यह विश्वास उसने क्यों तोड़ा?
मैं जानता हूं कि अख़बार कहेगा – जैसा कि ऐसा धंधा करने वाले दूसरे अख़बार भी कहते हैं – कि हम आखिर एक व्यावसायिक गतिविधि हैं। जैसा सूचना का अधिकार है वैसा ही रोजी और मुनाफा कमाने का अधिकार है। बिना पूंजा, बिना कमाई और मुनाफे के कोई अख़बार चल नहीं सकता। सही है। लेकिन अख़बार अनिवार्य रूप से लोकहित का कार्य है और लोकहित की व्यापारिक गतिविधि भी मुनाफे की ऐसी अंधी दौड़ नहीं हो सकती जिसमें ख़बर की पवित्र जगह काले धन में बेटी जाए। आखिर व्यापार-व्यवसाय भी नियम कायदे से ही चल सकते हैं। अख़बार माल है और ख़बरें सब्जी-मच्छी की तरह बिकती हों तो उन पर माल के स्टैंडर्ड लगाए ही जाएंगे। तंबाकू बेचना भी व्यवसाय है. फिर क्यों चेतावनी छापना ही पर्याप्त नहीं माना गया और अब बीड़ी-सिगरेट की डिबिया पर फोटू छापना पड़ रहा है। आपने क्यों नहीं लिखा कि यह हमारी ख़बर नहीं उम्मीदवार का विज्ञापन है। माल में भी बताना तो पड़ता ही है कि उसमें क्या-क्या है।
पत्रकारिता और व्यवसाय दोनों के कानून-कायदे आप तोड़ें और अपने पाठक के प्रति नहीं काला धन देने वाले उम्मीदवार के प्रति जिम्मेदार हों तो आप प्रेस को मिली स्वतंत्रता पर दावा कैसे कर सकते हैं? चलिये एक बार मान लें कि ये सवाल पत्रकारिता और व्यवसाय के हैं और उनके उत्तर अरविंद केजरीवाल और अरुणा राय से नहीं मांगे जाने चाहिये। लेकिन अरुणा राय ने सूचना के अधिकार का आंदोलन राजस्थान के गरीब और अनपढ़ किसानों और मजदूरों के लिए चलाया था। उसमें इतनी आग थी को वह देश भर में फैल गया। आखिर पहले अटलजी और फिर मनमोहन सिंह की सरकार को कानून बनाना पड़ा। कोई अख़बार व्यापारिक गतिविधि हो सकता है, लेकिन सूचना के अधिकार का आंदोलन तो पूरी तरह लोकहित में लोकसेवा की भावना से चलाया गया और चलता है। पैसे आंदोलन को भी चाहिये लेकिन आजतक किसी जन आंदोलन ने नहीं कहा कि हम मुनाफे के हो और चल रहे हैं। लोक संघर्ष का यह स्थान लोकहित का पवित्र स्थान है। इसे आप उन लोगों और संस्थानों को कैसे सौंप सकते हैं जिनका दावा है कि वे मुनाफा बनाने के िलए हैं और ऐसा करने में वो शुभ-अशुभ और नैतिक-अनैतिक का कोई विचार नहीं रखना चाहते?
लेकिन अख़बार आजकल पाठकों को सही और सच्ची सूचना देने और सार्वजनिक मामलों में उन्हें ठीक राय बनाने में मदद करने अपने कर्त्तव्य की दो कौड़ी चिंता नहीं करते। वे ख़बरों की जगह विज्ञापन छाप कर पैसे कमाने में लगे हैं। वे जानते हैं कि ऐसा करने में लोक सेवा और लोकहित की पवित्र लोकतांत्रिक जगह उनके हाथ से जाती रहती है। पाठक और देश का कुल सभ्य समाज उनका वह सम्मान और उनमें वह विश्वास नहीं रखता जो पहले के लोकहित सेवक और रक्षक अख़बारों और पत्रकारों का करता था। इसलिए अख़बार आजकल सार्वजनिक हितों के आंदोलनों में भागीदारी करना चाहते हैं ताकि उनकी पुण्याई इन्हें गंगा स्नान का पुण्य दे सके। और इसे वे नई पत्रकारिता कहते हैं। पुरानी पत्रकारिता, पत्रकारिता के जरिये ही लोकहित और लोकसेवा करती थी और इसी को अपना काम मानती थी। नई पत्रकारिता व्यवसाय अपना पहला काम और मुनाफे को अपना पहला प्रयोजन मानती है। जिस तरह उद्योग-व्यापार अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए कुछ कमाई आंदोलनों और समाज सुधार में दे देते हैं वैसे ही नई पत्रकारिता – लीड इंडिया, मतदाता जन जागरण और घूंस को घूंसा जैसे अभियान चलाती है। यह काली कमाई करते हुए गंगा में डुबकी लगाना है।
आपने देखा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस लोकसभा चुनाव में लीड इंडिया अभियान चलाया 26/11 की घटना पर मुंबई के मध्यवर्ग की प्रतिक्रिया देखकर। क्या असर हुआ? जिस दक्षिण मुंबई में ताज और ओबराय जैसे होटल और नरीमन गेस्ट हाउस था और जहां ऐसे भयानक आतंकवादी हमले हुए थे, वहां उतने लोग भी वोट देने नहीं आए, जितने पिछले चुनाव में आए थे। अंग्रेजी पढ़ने-लिखने वाले महानगरीय समाज ने भारत का नेतृत्व करना तो दूर, लोकतंत्र की जिम्मेदारी भी नहीं ली। वही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और राहुल के यंग ब्रिगेड में भी वही वंशवादी चेहरे आगे दिखे। मतदाता जनजागरण और घूंस को घूंसा का भी यही हश्र हुआ। लोग जानते हैं कि कौन भ्रष्टाचारी गंगा में हाथ धो रहे हैं। गंगा किसी को हाथ धोने से मना थोड़े करती है!
नई पत्रकारिता ने पत्रकारिता छोड़ कर पुण्याई को कमाई बनाने का निश्चय किया है। पत्रकारिता और जन आंदोलनों को उनकी सही भूमिका में रखना आप नागरिक का कर्त्तव्य है।
रंगनाथ सिंह
June 8, 2009 at 1:52 am
prabhash ji ne amurtan se bahar nikal ke ek akhbar ka to naam liya. sabhi jante h ki kaun kaun chor hai magar koi khul ke samne nhi kahta.
bhajapa ko satta me lane me jagaran ki badi bhumika rhi h. jis patti me yah akhbar sarvadhik prabhavshali rha h usi patti se ram-janm bhumi aandolan ko sarvadhik karyakarta mile. is akhbar me aise vidvan lagatar sampadkiy pristh par likhte rhe h jinhone alif-laila ki kahaniyo aur chandrakanta santati ke aalawa kisi kitab ko hath bhi nhi lagaya h.
jagran to purana paapi h. kuchh naye paapiyo ka naam bhi sarvajanik hota to behtar hota.h.
Arun Kumar, General Secretary, Bihar Working Journalists Union
June 8, 2009 at 8:51 pm
Prabhash Ji Ko Itni Himmat Se Patrakarita ki kali bheron ke khilaf likhen ke liye shat shat naman. Save Journalism – Save India.
Aakashdeep
June 29, 2009 at 9:14 pm
Prabhashji ka yah lekh logo ki aakhen kholta hai aur unhe sochne ko majboor karta hai. Aaj ke halat me patrakaro ko isse sikh leni chahiye.
Dainik Jagran ne pichle aam chunao ke dauran khub paisa wasoola hai yah sadhe satrah aane sahi bat hai. Is bare me jitna kaha aur likha gaya hai sab bilkul sahi bat hai. Ek ghatana to mere samne ki hai. Dainik Jagran ke ek malikan, company director Sunil Gupta ji ne Dainik Jagran ke Patna office me staff patrakaro ki ek meeting me sabke samne saf-saf kaha the ki is aam chunao me company ne tay kiya hai ki hum ummidwaro se unki khabaren likhne yani unki baten chapne ke evaj me paisa wasooli karenge. Sunil Gupta ne baithak me apne staff patrakaro se is wasooli abhiyan me madad karne ko kaha. Unhone kaha tha ki sabhi patrakar is kam me madad karenge to achhi wasooli ho jayegi. Is par bureau chief Subhash Pandey ne akhbar ke samooh sampadak Shailendra Dikshit ke samne kah diya tha ki company chahto hai wasooli karna to apni tarah se kare, apna koi patrakar is galat kam me kyo sath dega so humlog koi wasooli karne nahi jayenge. Sunil Gupta ne is wasooli abhiyan ko sahi thahrate hue kaha tha ki jo akhbar apne ko bada aur sidhhantwadi kahte hain is bar we bhi wasooli kar rahe hain (Sunil Gupta ka ishara HT group ke hindi akhbar dainik Hindustan ki taraf tha), isliye dainik Jagran ne bhi wasooli karne ka faisla kiya hai. Sunil Gupta ne yah meeting chunao abhiyan ke shuruwati dino me ki thi. Meeting Patna ke daftar Rashmi Complex ki pachwi majil (5th floor) par confrence hall me hui thi. Sunil Gupta undino Patna me chal rahe Idea mobile company ke ek vigyapan abhiyan ke samapan samaroh ke karyakram me shamil hone aaye the. Idea ka yah karyakram Gandhi Maidan me hua the jise Dainik Jagran ne aayojit karaya tha. Meeting is karyakram ke samapan ke agle din hui thi. Ab kisi ko dam ho to kahen ki main jhuth bol raha hun aur Sunil Gupta ne staff patrakaro ki kisi meeting me wasooli ki yah bat nahi ki thi. Dum ho to koi iska khandan karen. Kahen to is meeting ki mobile par banayee gayee MMC is website par post kar dun.
Aise me agar Prabhash Joshi ji ya phir koi aur is paisa wasooli ko lekar Dainik Jagran ki ninda karta hai to isme kya galat hai. Patrakarita ki pavitrata ko aise neech logo se bachane ke liye kisi na kisi ko kuch na kuch to karna hi padega.