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तो इसे कहते हैं साहसिक पत्रकारिता!

आप इंडियन एक्सप्रेस को यदि गौर से देखें तो वहां पर आपको लाल रंग से लिखा मिलेगा – जर्नलिज्म ऑफ करेज यानी साहसिक पत्रकारिता। अगर आप उसके संपादकों से बात करें तो वो इस पर एक लंबा लेक्चर भी दे सकते हैं। वो बता सकते हैं कि साहसिक पत्रकारिता कैसे की जाती है? वो आपको एक्सप्रेस की परंपरा के बारे में भी ज्ञान देंगे। मगर आज उनके इस अख़बार ने एक बड़ी चूक कर दी है। ऐसी चूक जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आज इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर आपको कसाब की पहचान करने वाली 10 साल की मासूम और पिता की बड़ी तस्वीर दिखाई देगी। अजमल कसाब 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले का आरोपी है।

इसी साल मार्च में ये ख़बर उड़ी कि कसाब केस की सुनवाई की वीडियो क्लिप लीक कर दी गई है। जिसके बाद सरकार ने न्यूज़ चैनलों के लिए एक एडवाइजरी जारी की। जिसमें उस वीडियो को चलाने से मना कर दिया गया। उसके बाद न्यूज़ ब्रोडकास्टर्स एसोसिएशन ने भी एक एडवाजरी जारी कर कहा कि किसी भी न्यूज़ चैनल ने ऐसा कोई वीडियो दिखाया तो उस पर कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चल सकता है। उसके बाद से न्यूज़ चैनल कसाब की सुनवाई में एहतियात बरत रहे हैं। बुधवार को भी टेलीविजन न्यूज़ चैनलों ने तो मासूम गवाह और उसके पिता दोनों के चेहरे को ब्लर करके दिखाया। उनका नाम बदल कर और पहचान छुपा कर ख़बर दी। लेकिन साहस की पत्रकारिता करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने सारी कोशिशों को धता बता दिया। अब ये काम जानबूझ कर किया गया या फिर अनजाने में … ये तो अख़बार के संपादक ही बता सकते हैं, लेकिन ये काम हुआ है और इंडियन एक्सप्रेस को इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिये।

वैसे आपको बता दें कि इंडियन एक्सप्रेस अकेला ऐसा अख़बार नहीं है जिसने आतंकी हमले की मासूम गवाह की तस्वीर छापी हो। ऐसे अख़बारों की संख्या कम नहीं। द टेलीग्राफ और दैनिक भास्कर ने भी बच्ची और उसके पिता की तस्वीर छाप दी है। दैनिक भास्कर ने पेज 11 पर सबसे ऊपर ये ख़बर छापी है। जिसमें बच्ची की तस्वीर के साथ कई सब हेडिंग्स दी गई हैं। ये ख़बर लिखने तक द टेलीग्राफ की वेबसाइट पर भी बच्ची और उसके पिता की तस्वीर देखी जा सकती है। हेडिंग है डिसेबल्ड बाइ बुलेट्स, चाइल्ड पाइंट्स फिंगर एट कसाब ”… ये सोचे बगैर कि उनकी इस हरकत से गवाहों की पहचान सार्वजनिक हो जाएगी। ये भी सोचे बगैर कि इससे आतंकवादी संगठन उन्हें भी निशाना बना सकते हैं। ये सोचे बगैर कि इससे न्याय की अवधारणा ख़तरे में पड़ सकती है।

अब बात उन अख़बारों की जिन्होंने नन्ही गवाह की तस्वीर तो नहीं छापी मगर उसका सारा ब्योरा दे दिया है। दैनिक हिंदुस्तान, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन और दैनिक जागरण समेत ऐसे अख़बारों की संख्या तो ढेरों है, जिन्होंने गवाह का सारा ब्योरा दे दिया है। दैनिक जागरण में पेज 11 पर छपी इस ख़बर की हेडिंग है “:दस वर्षीय ….. ने भुला दी अजमल की मुस्कुराहट। इस हेडिंग की खाली जगह पर अख़बार ने गवाह का नाम लिखा है। हिंदुस्तान का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इस अख़बार ने ख़बर को बहुत छोटा स्पेस दिया है, मगर गवाह का नाम तो लिख ही दिया है। हालांकि ऐसे अख़बारों की संख्या भी काफी है जिन्होंने संवेदनशील तरीके से रिपोर्टिंग की है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीन कॉलम की ख़बर में ना तो गवाह का नाम दिया है और ना ही उनकी कोई फोटो छापी है। लेकिन इससे ख़बर का महत्व कम नहीं हुआ है।

कानून के जानकारों के मुताबिक आम तौर पर गवाहों की पहचान जाहिर करने में कोई हर्ज नहीं होता। लेकिन संवेदनशील मामलों में जहां गवाह की जान को ख़तरा हो वहां उनकी पहचान गोपनीय रखी जाती है। नीतीश कटारा हत्याकांड से लेकर ऐसे तमाम मामले हैं जहां पर गवाहों की पहचान लंबे समय तक गोपनीय रखी गई थी। लेकिन देश पर सबसे बड़े आतंकवादी हमले से जुड़े मामले में एक मासूम गवाह की पहचान सार्वजनिक करके इन अख़बारों ने कौन सा साहसिक काम किया है ये समझ पाना मुश्किल है।

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One Response to तो इसे कहते हैं साहसिक पत्रकारिता!

  1. अजय सकलानी Reply

    June 12, 2009 at 4:01 pm

    क्या कहें भाई साहब आजकल साहसिक पत्रकारिता का एक नया दौर चल पड़ा है| वैसे गौर से देखा जाए तो आजकल के संपादकों के पास अनुभव की कमी नहीं है| बस फर्क इतना है की अनुभव केवल कई वर्ष पत्रकारिता में गुज़रने का है न कि काम करने का| अब ये जो इतनी बड़ी भूल कि गयी है या केवल हमारी और आपकी नज़र में ही बड़ी हो सकती है, उनकी नज़र में तो हाँ बस एक छोटी सी हो गयी| पहले जो सरकार नें advisory जारी की थी वो भी अब कहीं नज़र नहीं आने वाली| न ही कहीं अब उसका भी कोई निशान मिलेगा|

    अजय सकलानी
    आवाजें

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