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“बहुत महंगी है अभिव्यक्ति की आज़ादी”

अभिव्यक्ति की आज़ादी क्या है? क्या भारत में आप और हम बोलने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं? क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ – मीडिया पूरी तरह आज़ाद है? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर, वर्तमान दौर में चर्चा बेहद अहम हो गई है। लोकसभा चुनाव में सबने देखा कि किस तरह मीडिया ने लेन-देन का खेल किया। किस तरह ख़बरें दबाई गईं, मैनुपुलेट की गईं। जिन उम्मीदवारों के पास पैसा नहीं था वो चीखते रहे, चिल्लाते रहे, अपनी बात कहते रहे लेकिन उन्हें किसी अख़बार ने नहीं छापा। देश और दुनिया में ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं जिसे कोई अख़बार नहीं छापता है। कोई टीवी न्यूज़ चैनल नहीं दिखाता है। आखिर क्यों? इन सब मुद्दों पर जनतंत्र डॉट कॉम के लिए जितेंद्र और समरेंद्र ने अरुंधति रॉय से बात की। बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति उन चंद साहसी लोगों में एक हैं जो सच कहने से नहीं डरते। सच चाहे अमेरिका के ख़िलाफ़ हो, चाहे कंपनियों के ख़िलाफ़ या फिर चाहे भारत सरकार के ख़िलाफ़।
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समरेंद्र - भारत में मीडिया की आज़ादी को आप किस तरह देखती हैं? क्या मीडिया सच में आज़ाद है?

अरुंधति रॉय – भारत में बहुत अलग-अलग किस्म का मीडिया हैं।

“हम लोग अब नए जमाने में रह रहे हैं। जहां फ्री स्पीच की बात नहीं है … बात है मैन्यूफैक्चर्ड न्यूज़ की।….जैसे आप देखिये हमारा खुफिया तंत्र है। वो मीडिया को कंट्रोल करते हैं और स्टोरी प्लांट करते हैं। चाहे कश्मीर का मसला हो, चाहे इस्लामिक आतंकवाद का मसला हो या फिर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जो कुछ भी हो रहा है।”

ये जिसे हम कॉरपोरेट मीडिया कहते हैं वो किसी भी तरह आज़ाद नहीं है। हमको मालूम है कि ये सारे जो टीवी चैनल हैं और न्यूज़पेपर हैं उनका 90 फीसदी रेवेन्यू कॉरपोरेट से आता है। तो वो आज़ाद कैसे रह सकते हैं। हम इस चक्कर में पड़ जाते हैं कि आदमी अच्छे नहीं हैं, लेकिन सच्ची बात तो ये है कि उसका ढांचा ही ऐसा है कि वो आज़ाद नहीं रह सकते। अगर उन्होंने किसी भी कॉरपोरेट के ख़िलाफ़ लिखा जैसे टाटा या रिलायंस के ख़िलाफ़ तो अचानक उनकी एडवर्टाइजिंग रेवेन्यू कम हो जाएगी। न्यूज़ पेपर या चैनल चलाना ही मुश्किल हो जाएगा। एक तरह से पूरा जो निजीकरण और कॉरपोरेटाइजेशन हो रहा है। पानी का, हेल्थ का एग्रीकल्चर का .. एक तरह से हमारी ज़िंदगी का पूरा कंट्रोल कॉरपोरेट्स के हाथ में जा रहा है। एक तरह से मीडिया का कंट्रोल भी उनके हाथ में है। जो मीडिया का मौलिक काम है वो इस ढांचे में नहीं हो सकता।

समरेंद्र – ये तो बात हुई कॉरपोरेट मीडिया की। फिर स्पेस कहां बचता है।

अरुंधति रॉय - बहुत कम स्पेस है। छोटे-मोटे जो पर्चा निकालते हैं। सीडी बनाकर जागरुक करते हैं। इंटरनेट है। वो मीडिया जिसे हम न्यू (नया) मीडिया कहते हैं। लेकिन मास मीडिया में स्पेस तो ख़त्म ही हो गया है।

समरेंद्र – एक लेख में आपने कहा है कि भारत में फ्रीडम ऑफ स्पीच (बोलने का अधिकार) का कोई मतलब नहीं है। यहां इतने किंतु परंतु हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के कोई मायने नहीं रहते। इसका क्या मतलब निकाला जाए?

अरुंधति रॉय - अभी फ्रीडम ऑफ स्पीच बहुत महंगा हो गया है। ये गरीबों की पहुंच से बाहर है। ऐसी कोई चीज नहीं है अब। जो ऊंची बोली लगा सकता है … फ्री स्पीच के मंच सिर्फ उसी के लिए हैं। जैसे आप अमेरिका में देखिये।

“आपकी वेबसाइट का नाम आपने कहा कि जनतंत्र है। पर अभी जनतंत्र .. फ्री मार्केट के साथ फ्यूज हो गया… पूंजीवाद के साथ फ्यूज हो गया है। अब जनतंत्र की सारी संस्थाएं … चाहे वो न्यायपालिका हो … विधायिका हो … कार्यपालिका हो या फिर मीडिया हो … सारे एक हो गए हैं। आप सोचिये कि आखिर न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया … ये संस्थाएं अलग-अलग क्यों बनाईं गईं थीं – ताकि वो एक दूसरे पर नज़र रख सकें। मगर आज वो सभी एक दूसरे को संरक्षण देती हैं।”

दुनिया में अभिव्यक्ति की आज़ादी को सुरक्षित करने के लिए कानून सबसे ज़्यादा अमेरिका में हैं। लेकिन सबसे कम अमल भी वहीं पर होता है। ये तो एक बात हुई। दूसरी बात ये है कि हम लोग अब नए जमाने में रह रहे हैं। जहां फ्री स्पीच की बात नहीं है … बात है मैन्यूफैक्चर्ड न्यूज़ की। इराक और अफगानिस्तान युद्ध के दौरान सत्ता के संरक्षण में चल रहे रेडियो और टेलीविजन स्पॉन्सर्ड ‘प्रो वार’ प्रदर्शन किया करते थे और फिर उसी को चैनल पर न्यूज़ के तौर पर सुनाते और दिखाते थे। यहां भी यही हो रहा है। जैसे आप देखिये हमारा खुफिया तंत्र है। वो मीडिया को कंट्रोल करते हैं और स्टोरी प्लांट करते हैं। चाहे कश्मीर का मसला हो, चाहे इस्लामिक आतंकवाद का मसला हो या फिर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जो कुछ भी हो रहा है। आज भी देखो तो हर टीवी चैनल में हर अख़बार में ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमले सुर्खियों में हैं। छाए हुए हैं। लेकिन कहीं भी श्रीलंका में जातीय नरसंहार पर ख़बर नहीं छपती है। आख़िर ऐसा क्यों होता है? ऑस्ट्रेलिया में एक व्यक्ति पर हमला सुर्खियों में और नरसंहार का जिक्र तक नहीं। जबकि संयुक्त राष्ट्र कह चुका है कि श्रीलंका में बीस हज़ार से एक लाख तक लोग मारे जा चुके हैं। श्रीलंका में वार क्राइम की जांच की मांग को दबाने के लिए भारत, पाकिस्तान, चीन और रूस सभी एकजुट हो गए हैं। मीडिया के लिए ये मुद्दा ही नहीं है।

समरेंद्र – मतलब मीडिया पूरी तरह से स्टेट का प्रतिनिधित्व कर रहा है?

अरुंधति रॉय - या तो स्टेट का या फिर कॉरपोरेशन्स का ..तो फिर स्टेट और कॉरपोरेशन तो एक ही बन गया ना। आपकी वेबसाइट का नाम आपने कहा कि जनतंत्र है। पर अभी जनतंत्र .. फ्री मार्केट के साथ फ्यूज हो गया… पूंजीवाद के साथ फ्यूज हो गया है। अब जनतंत्र की सारी संस्थाएं … चाहे वो न्यायपालिका हो … विधायिका हो … कार्यपालिका हो या फिर मीडिया हो … सारे एक हो गए हैं। आप सोचिये कि आखिर न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया … ये संस्थाएं अलग-अलग क्यों बनाईं गईं थीं – ताकि वो एक दूसरे पर नज़र रख सकें। मगर आज वो सभी एक दूसरे को संरक्षण देती हैं।

समरेंद्र - ये तो बड़ी साज़िश है?

अरुंधति रॉय – साज़िश कहना सही नहीं होगा। साज़िश कहने से ये मामला छोटा बन जाता है। इट इज़ सबवर्जन ऑफ ए ह्यूज थिंग। ये जो लोकतंत्र कहलाता है। जिसके लिए पूरी दुनिया में लड़ाई लड़ी जा रही है। उदाहरण के लिए अफ्रीका के देशों को देखिये और तिब्बत को देखिये। लोकतंत्र एक बड़ा सपना है। लेकिन हमने उसे मैला कर दिया। इसे ख़त्म कर दिया है। ये खेल इतना बड़ा है कि इसे समझने में आपका दिमाग ख़राब हो सकता है। जैसे अभी देखो कश्मीर जल रहा है। लेकिन किसी भी पेपर में आपने पढ़ा है? नहीं।

समरेंद्र – छोटी सी ख़बर होती है।

अरुंधति रॉय - छोटी सी ख़बर, लेकिन वहां शहर-शहर में आंदोलन हो रहा है। वो कहीं नहीं है।

“हम सब लोगों ने नाम ले-लेकर कहा कि किसने कहां से झूठ बोला। उन पर कार्रवाई करने की जगह उन्हें प्रमोशन दिये गए… अच्छी तनख्वाह दी गई… वो आज भी वही बीट देख रहे हैं… अब इसके बारे में क्या सोचा जाए? अगर वो एक्सपोज नहीं किये गए होते तो कोई बात नहीं थी। लेकिन वो एक्सपोज किये जा चुके हैं।”

अब आप इलेक्शन को ले लीजिये। इंडियन इलेक्शन में आधिकारिक तौर पर दो अरब डॉलर (दो सौ करोड़ डॉलर – यानी 10 हज़ार करोड़ रुपये) खर्च हुए। ये अमेरिकन इलेक्शन से ज़्यादा है। अनाधिकारिक तौर पर 1000 करोड़ डॉलर यानी 50 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। अब ये पैसा कहां से आता है? इसमें 90 फ़ीसदी आज़ादी ख़त्म हो जाती है। क्योंकि जिनके पास कॉरपोरेट की स्पॉन्सरशिप नहीं है वो मीडिया में स्पेस नहीं खरीद सकते।

समरेंद्र — क्या ये सिर्फ़ स्पेस खरीदने का मसला है। कुछ जगहों पर तो ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जहां अगर आप सत्ता के ख़िलाफ़ खड़े हैं और आपके पास पैसा है, तो भी आप स्पेस नहीं खरीद सकते। वहां पर मीडिया जैसे सत्ता में बैठे लोगों का मोहरा बन जाता है।

अरुंधति रॉय - ये जो बड़ी पार्टियां हैं हमारी बीजेपी और कांग्रेस।

“मुझे लगता है कि राइट टू इन्फॉर्मेशन में ये आना चाहिये कि कौन से अख़बार को कहां से कितना पैसा मिल रहा है? सिर्फ सरकारी विज्ञापन ही नहीं प्राइवेट कंपनियों के विज्ञापनों का लेखा-जोखा भी सामने आना चाहिये।”

कॉरपोरेट्स को इससे फर्क नहीं पड़ता कि बीजेपी आए या कांग्रेस। रतन टाटा ने कह दिया। अंबानी ने कह दिया कि मोदी विल बी ए ग्रेट प्राइम मिनिस्टर। आपको दुनिया के किसी देश में ऐसा उदाहरण नहीं मिलेगा कि टाटा जैसे कॉरपोरेट्स और बॉलीवुड स्टार सभी टीवी पर कह रहे थे वोट दो-वोट दो। आखिर क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि ये जो लूट चल रही है, उसे ढंकने के लिए आपको चुनाव की ज़रूरत है। आपको वोटर टर्नआउट की ज़रूरत है। आपके लिए ये मतलब रखता होगा कि कौन जीतता है। लेकिन कॉरपोरेट वर्ल्ड के किए ये कोई मतलब नहीं रखता।

समरेंद्र- अभी आपने कश्मीर का उदाहरण दिया। वहां के विरोध प्रदर्शनों को मीडिया में स्पेस नहीं मिलता। अभी कुछ दिन पहले उमर अब्दुल्ला ने बयान दिया है। सोपिया में जो दो महिलाओं को बलात्कार के बाद मार दिया गया है, उससे वहां पर लोग काफी भड़के हुए हैं और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उस विरोध प्रदर्शन को लोकल चैनलों ने खूब दिखाया। जिसके बाद उमर अब्दुल्ला ने कहा कि जब स्टेट को नहीं मालूम कि बलात्कार और क़त्ल किसने किया तो फिर मीडिया क्यों लिख रहा है। अपरोक्ष तरीके से उमर अब्दुल्ला ने लोकल मीडिया को धमकाया है कि अगर उन्होंने इसे प्रचारित करना बंद नहीं किया, तो उनका लाइसेंस रद्द हो सकता है। इससे जाहिर होता है कि अगर आपके पास पैसा है और बैख़ौफ़ होकर ख़बर दिखाना चाहते हैं तो भी आप ख़बर नहीं दिखा सकते। स्टेट आपका दमन कर देगा।

अरुंधति रॉय – कश्मीर का मीडिया बहुत कॉम्प्लेक्स है। सेवंती नैनन ने एक बहुत अच्छा पीस लिखा है इस पर। वहां कौन सा मीडिया संस्थान कौन चलाता है। उसकी फंडिंग कौन करता है। ये बहुत पेचीदा मसला है। आप राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को ही देखिये। कुछ कुछ न्यूज़पेपर्स हैं जिनका सर्कुलेशन बहुत ही कम है। पर उनके पास सरकार का बहुत विज्ञापन आता है।

समरेंद्र – जैसे इंडियन एक्सप्रेस है।

अरुंधति रॉय – हां, तो उन्हें पैसा क्यों मिलता है? अमेरिका में भी आप इराक युद्ध का कवरेज देखिये। न्यूयॉर्क टाइम्स में जूडिथ मिलर वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन के बारे में लिख रही थी। उन ख़बरों का सोर्स था चलाबी। चलाबी को सीआईए पैसा मुहैया कराती थी। उसके बाद डिक चेनी न्यूयॉर्क टाइम्स की ख़बर को कोट करके बयान देते थे। मतलब साफ है वो पहले तो एक ख़बर प्लांट करते हैं। उसके बाद वो ये कहेंगे कि देखिये ये मैं नहीं कह रहा हूं … ये तो न्यूयॉर्क टाइम्स कह रहा है। हाउ टू सबवर्ट डेमोक्रेसी, नाउ इट्स ए वेरी सॉफिस्टिकेटेड गेम… आप अपने यहां पार्लियामेंट अटैक को लीजिये। हम सब लोगों ने नाम ले-लेकर कहा कि किसने कहां से झूठ बोला। उन पर कार्रवाई करने की जगह उन्हें प्रमोशन दिये गए… अच्छी तनख्वाह दी गई। वो अपना काम चला रहे हैं। वो आज भी वही बीट देख रहे हैं और वही चीज लिख रहे हैं। अब इसके बारे में क्या सोचा जाए? अगर वो एक्सपोज नहीं किये गए होते तो कोई बात नहीं थी। लेकिन वो एक्सपोज किये जा चुके हैं। लेकिन कुछ नहीं हुआ उनका। ज़ी टीवी ने पार्लियामेंट अटैक पर फिल्म बनाई थी। दिस इज द ट्रूथ बेस्ड ऑन पुलिस वर्जन। कोई ऐसा कैसे कर सकता है? जब सुनवाई चल रही हो। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी इसका समर्थन करते हैं। उसके बाद वो फिर से चैनल पर दिखाया जाता है।

समरेंद्र – स्टेट के ख़िलाफ़ नहीं जाने की बड़ी वजह हैं विज्ञापन। मैं पिछले कुछ दिन से सरकारों की विज्ञापन नीति को पढ़ रहा हूं। सब जगह दो क्लॉज़ खासतौर पर जोड़े गए हैं। पहला कि अगर आप सारी अनिवार्यताएं पूरी करते हैं, तो भी आपको विज्ञापन दिया जाए या नहीं ये सरकार तय करेगी। दूसरा, अगर आप सारी अनिवार्यताएं पूरी नहीं करते हैं, तो भी खास परिस्थितियों में सरकार आपको विज्ञापन दे सकती है। क्या आपको लगता है कि अगर इन दोनों क्लॉज़ को हटाया जाए और विज्ञापन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए तो स्थिति कुछ बदलेगी।

अरुंधति रॉय – मुझे लगता है कि राइट टू इन्फॉर्मेशन में ये आना चाहिये कि कौन से अख़बार को कहां से कितना पैसा मिल रहा है? सिर्फ सरकारी विज्ञापन ही नहीं प्राइवेट कंपनियों के विज्ञापनों का लेखा-जोखा भी सामने आना चाहिये। अगर कोई रजिस्टर्ड अख़बार या मीडिया संस्थान चलाता है, तो उसे एक तय समय में आमदनी के सभी स्रोत अपने अख़बार पर छापने चाहिये। उसे बताना चाहिये कि उसे पैसे कौन-कौन दे रहा है।

((जारी)) ….

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