आज सुबह नींद खुली तो मैच का नतीजा जानने के लिए अख़बार उठाया। बीती रात भारत और इंग्लैंड के बीच बड़ा मैच था। धोनी ने टॉस जीत कर इंग्लैंड को बल्लेबाजी का न्यौता दिया और टीम इंडिया के गेंदबाजों ने उसके खिलाड़ियों को 153 रन पर रोक दिया। मैं ये मान कर सो गया कि अब भारत की जीत तय है और उसे सेमीफाइनल में पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता। सुबह उठने पर नतीजा जानने की बेचैनी थी। सबसे पहले “हिंदुस्तान” हाथ लगा। उसके फ्रंट पेज पर पीटरसन और बोपारा की बड़ी सी तस्वीर थी। इस फोटो के नीचे लिखा था – “रविवार को भारत के साथ टी-20 वर्ल्ड कप के महत्वपूर्ण मुक़ाबले के दौरान एक्शन में पीटरसन“। साथ ही कुछ और कैप्शन भी दिये गए थे। जैसे “टॉस जीता – इंग्लैंड से मैच जीतने की जद्दोजहद में जुटी इंडिया“… “टीम इंडिया में इरफान पठान और प्रज्ञान ओझा की जगह आर. पी. सिंह और रविंदर जडेजा शामिल”। उसके बाद मैं हिंदुस्तान के खेल पेज पर गया। वहां आधे पन्ने में छपी ख़बर का शीर्षक है … अंतिम ओवर में चला भज्जी का जादू… अगर किसी को ये नहीं मालूम हो कि भारत ने पहले गेंदबाजी की है तो इस शीर्षक से यही अंदाजा लगाएगा कि भज्जी ने आखिरी ओवर में टीम इंडिया को जीत दिला दी है।
हिंदुस्तान के उलटने-पलटने के बाद मैं समझ गया कि हर रोज की तरह कल भी उसके संपादक अपने तय समय पर सो गए होंगे। अख़बार का प्रिंट 12 बजे से पहले (अगली तारीख के शुरू होने से पहले) छोड़ दिया गया होगा। उन्हें ये ख़्याल नहीं आया होगा कि दिल्ली एडिशन को मैच समाप्ति तक रोक लेते। कम से कम कुछ पाठकों को ही सही मैच की पूरी जानकारी तो दे देते। अगर ऐसा नहीं करना था तो फिर इतना अधिक बासी मसाला देने की ज़रूरत क्या थी? ये तो पाठकों से साथ धोखा है।
उसके बाद मैंने दैनिक भास्कर उठाया। दैनिक भास्कर के फ्रंट पेज पर मौजूद ख़बर ने मुझे बता दिया कि भारत का बोरिया बिस्तर गोल हो गया है। अख़बार ने उस ख़बर को उचित जगह दी है। दो कॉलम की उस ख़बर की हेडिंग है – पूर्व चैंपियन वर्ल्ड कप से बाहर… उप हेडिंग – अंग्रेजों ने धोया भारतीय टीम को, इंग्लैंड सेमीफाइनल की दौड़ में…. इसके अलावा पृष्ठ संख्या 14 पर भारत की हार की ख़बर विस्तार से दी गई है।
दैनिक भास्कर की तुलना में दैनिक जागरण में इस ख़बर का ट्रीटमेंट उतना अच्छा नहीं है, लेकिन पहले पन्ने पर ही उसने अपने पाठकों को बता दिया है कि धोनी के धुरंधर चारो खाने चित्त हो गए हैं। बायीं ओर मौजूद साइड बार में उसने एक फोटो के साथ चार लाइन की ख़बर छापी है। उसके बाद पूरा ब्योरा आपको पेज नंबर 14 पर मिलेगा। राष्ट्रीय सहारा ने भी फ्रंट पेज पर ही अपने पाठकों को बता दिया है कि इस बार भारत से खिताब की उम्मीद नहीं करें।
जहां तक अंग्रेजी अख़बारों का सवाल है उनमें टाइम्स ऑफ इंडिया ने फ्रंट पेज पर युवराज को फोटो छापी है और अपने पाठकों को बता दिया है कि भारत खिताबी दौड़ से बाहर हो गया है। खेल पेज पर पूरे सम्मान के साथ ख़बर छापी गई है। चैंपियन्स नो मोर। इसमें स्कोर बोर्ड के साथ मैच का पूरा विश्लेषण भी है। वैसे अब तक पूरे टूर्नामेंट के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया की कवरेज अच्छी रही है।
हिंदुस्तान टाइम्स ने फ्रंट पेज पर मैच का नतीजा बताने के साथ खेल पेज पर बड़ी ख़बर छापी है। हेडिंग है – इंडिया क्रैश आउट ऑफ डब्ल्यू टी-20 … इस मामले में हिंदुस्तान टाइम्स अपने समूह के हिंदी अख़बार से मीलों आगे है। उसने अपने पाठकों के साथ छल नहीं किया है। अंग्रेजी अख़बार मेल टुडे ने भी भारत की हार की ख़बर छापी है। मगर उससे एक चूक हो गई है। कम से कम एक इंट्रो फ्रंट पेज पर भी छापना चाहिये था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया है।
अभिनव
June 15, 2009 at 3:46 pm
लेखक महोदय ने अच्छे से analyze किया है हर मुद्दे को. पर आपको नहीं लगता आपने अपने ज्यादातर लेखों को हिंदुस्तान की हिलहुज्जत करने का ही जरिया बना लिया है. Constructive criticism तो ठीक है लेकिन अपने लेखों का इस्तेमाल पूरी तरह दूसरों पर कीचड़ उछालने के लिए किया जाता बिल्कुल न्यायसंगत नहीं लगता.
समरेंद्र
June 15, 2009 at 11:13 pm
अभिनव जी,
माफ कीजियेगा। अगर आपको ऐसा लगा कि हमने जनतंत्र को हिंदुस्तान को हिलहुज्जत करने का जरिया बना लिया है तो ऐसा बिलकुल नहीं है। ये जनतंत्र का मकसद भी नहीं है। हिंदुस्तान की गलतियां यहां पर ज़्यादा दर्ज हो रही हैं तो इसकी एक वजह ये है कि मैं पिछले कई वर्ष से हिंदुस्तान का पाठक हूं। सुबह उठने के साथ ही सबसे पहले मैं यही अख़बार उठाता हूं। इसलिए इसकी ग़लतियां ज़्यादा खटकती हैं। दूसरी बात यह कि ये अख़बार दूसरों की तुलना में बहुत सुस्त है, लेकिन इसके संपादक ज़्यादा नैतिकता भी बघारते हैं। यही वजह है कि मैं निजी तौर पर इस अख़बार की ख़बरों को लेकर ज़्यादा क्रिटिकल हो जाता हूं। और कोई वजह नहीं है। ना कभी हिंदुस्तान में काम किया है और ना ही कभी काम करने की इच्छा है। इसलिए इससे कोई निजी खुन्नस हो, ऐसा भी नहीं है। वैसे भी जनतंत्र का यह यकीन नहीं कि किसी के साथ निजी खुन्नस निकाली जाए। अगर कभी ऐसा किया तो उससे जनतंत्र की अवधारणा पर सवाल उठेगा जो कि हम लोग कभी नहीं चाहेंगे। यहां एक बात और बताना चाहूंगा कि जनतंत्र मेरा निजी फोरम नहीं है। इसके साथ कई संवेदनशील लोग जुड़े हैं, जो पत्रकारिता के सम्मानित नाम है। जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का लंबा वक़्त सार्थक पत्रकारिता के लिए दिया है। अगर मैं कभी भटकने लगूंगा तो वो लोग मुझे इससे बाहर कर देंगे। इसलिए आप यहां हो रहे विश्लेषण को निजी तौर पर मत लीजिये। हो सके तो ये सोचिए कि क्या यहां दर्ज बातें सही हैं या नहीं। अगर ग़लत हैं तो उसका तार्किक विश्लेषण कीजिये। इससे हमें काफी सहयोग मिलेगा और सुधार करने का मौका भी।
धन्यवाद।