अरुंधति रॉय से जनतंत्र की ख़ास बातचीत के पहले हिस्से में आपने मीडिया पर उनकी बेबाक राय पढ़ी। अब दूसरी और आखिरी किश्त … जिसमें मीडिया के साथ कुछ और बड़े मुद्दों पर चर्चा। इस बातचीत में अरुंधति ने कश्मीर के हालात पर… छत्तीसगढ़ में चल रहे नरसंहार पर… नंदीग्राम और सिंगूर की हिंसा पर… और भारत में चल रहे ब्रितानिया हुकूमत के औपनिवेशिक मॉडल पर खुल कर बात की। आप भी अरुंधति से हुए इस सवाल-जवाब को पढ़िये और अपनी राय रखिए।
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जितेंद्र – अक्सर कहा जाता है कि मीडिया फोर्थ स्टेट (चौथा स्तंभ) है … क्या सच में ये फोर्थ स्टेट है?
अरुंधति – मुझे लगता है कि शायद ये फर्स्ट स्टेट है।
वैसे तो मीडिया के लार्जर स्किम में लेफ्ट फिट नहीं बैठता है। लेकिन यहां विरोधाभाष तो लेफ्ट के भीतर भी था। वो सेंटर में कुछ कहता था और पश्चिम बंगाल में कुछ और। तो वही विरोधाभाष मीडिया में रिफलेक्ट हुआ।इनका जो रोल है वो बहुत बढ़ गया है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर नहीं बल्कि स्टेटस्को (यथास्थितिवाद) बनाए रखने में बहुत बढ़ गया है। अभी आप देखो कि ये टीवी पर जो यंग पीपुल हैं, वही माहौल बना रहे हैं। कॉरपोरेट के खिलाड़ी हों, या डिफेंस के अफ़सर हों, नेता हों या फिर कोई और …. वो सबको बीच में रोक कर पूछते हैं कि सर क्या भारत को पाकिस्तान से रिश्ते तोड़ लेने चाहिये? क्या भारत को पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिये? … ये आखिर क्या है? ये बहुत डरावना है।
समरेंद्र – मतलब वो जनमत तैयार कर रहे हैं और नीतियों पर असर डाल रहे हैं?
अरुंधति – पता नहीं कितना ओपिनियन बिल्ड कर रहे हैं। मुझे ये भी लगता है कि अब धीरे धीरे लोग समझने लगे हैं कि ये लोग (मीडिया के लोग) एक अलग ही दुनिया में रहते हैं। क्योंकि कुछ साल से वो एक ही इलेक्शन का रिजल्ट प्रेडिक्ट नहीं कर पाया। ये भी एक सच है ना। इससे पता चलता है कि जमीनी हक़ीक़त से मीडिया का रिश्ता तेजी से टूट रहा है। एक पूरा क्लास को हिप्नोटाइज करके रखा है। बिना बात के इस शोर में।
समरेंद्र – आपने कहा कि ये फर्स्ट स्टेट है। हम लोग समझ रहे हैं कि ये एक टूल है और स्टेट के लिए काम कर रहा है। अगर फर्स्ट स्टेट है तो ये इस्तेमाल हो नहीं रहा बल्कि इस्तेमाल कर रहा है। इन दोनों में अंतर है।
अरुंधति – नहीं… इतना अंतर भी नहीं है।
अरे ज्यूडिसरी का तो आप पढ़ सकते हैं। उनका जजमेंट। इवेंचुअली द जजमेंट ऑन अफ़जल सेज दैट … इवेन दोउ वी हैव नो एविडेंस दैट ही (अफ़जल) विलॉन्ग्स टू ए टेरोरिस्ट ग्रुप, वी नो व्हाट ही (अफ़जल) हैज डन हैज सेकेन द कंट्री, इन ऑर्डर टू सटिस्फाइ द कलेक्टिव कॉन्सियसनेस ऑफ द सोसाइटी वी सेंटेंस हिम टू डेथ …स्टेट का मतलब क्या है? दिज आर द एलिमेंट्स ऑफ स्टेट। जैसा की पहले मैंने कहा था कि लोकतंत्र में अलग-अलग इंस्टीट्यूशन्स हैं जो एक दूसरे पर नज़र रखते हैं। अब वो एक दूसरे को कवर देते हैं। एक बार फिर मैं पार्लियामेंट अटैक के मुद्दे पर लौटना चाहूंगी। आपने देखा कि मीडिया किस तरह से न्यायपालिका को कवर दे रही है। न्यायपालिका पुलिस को कवर दे रही है। नेता हर किसी को कवर दे रहे थे। इस पूरे खेल से जिन लोगों ने पर्दा उठाया वो पत्रकार नहीं थे। वो वकील थे, वो प्राध्यापक थे… वो सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने बताया कि किस तरह तमाम संस्थाएं एक दूसरे को संरक्षण दे रही हैं।
समरेंद्र – न्यायपालिका भी?
अरुंधति – अरे ज्यूडिसरी का तो आप पढ़ सकते हैं। उनका जजमेंट।
ये बहुत ख़तनाक़ हालात हैं। सरकार से, मीडिया से और बाकी संस्थाओं से लोगों में जो उम्मीद की लौ थी वो बुझ रही है। इसलिए छत्तीसगढ़ में गृहयुद्ध चल रहा है। नंदीग्राम और सिंगूर में हिंसा हुई।इवेंचुअली द जजमेंट ऑन अफ़जल सेज दैट … इवेन दोउ वी हैव नो एविडेंस दैट ही (अफ़जल) व]]
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