कुछ अख़बारों में छपी ख़बरों को पढ़ने के साथ ही आप समझ जाएंगे कि उसके पीछे क्या खेल है। अब मैं आज कुछ अख़बारों में छपी ख़बरों का नमूना पेश कर रहा हूं। आप इन्हें पढ़िये और सोचिए कि क्या इसी को रिपोर्टिंग कहते हैं?
हिंदुस्तान, 17 जून 2009 पेज नंबर – 8 (देश)
झंडा ढोने वाले गेस्ट, भाषण देने वाले होस्ट
पटना (हिं. ब्यू.) – मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सरकारी आवास, एक अणे मार्ग। चुनाव के दौरान झंडा ढोने वाले पंगत में बैठकर भोजन कर रहे हैं और मंच से भाषण देने वाले परोसकर खिला रहे हैं। चुनाव में जीत की खुशियां बांटने का नीतीश कुमार का यह है नायाब अंदाज। वे खुद होस्ट की भूमिका में हैं। कोई छूट न जाए इसके लिए वे सबसे खुद मिल रहे हैं।
लजीज भोजन, ऊपर से नेता से मिला सम्मान। सबके चेहरे के भाव के साथ उनकी भंगिमा बता रही है कि खुशी छुपाना उनके वश का नहीं रहा। दूसरी पंगत में बैठा एक कार्यकर्ता बगल वाले से कहता है “ओह! चुनाव के थकान आजे नु मिटल”, जवाब में दूसरा कहता है – “अब कहहीं के बा, सही में भाई जनता के मलिक बुझे वाला इहे (नीतीश कुमार) नेता बा।”
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इस ख़बर की मंशा दूसरे पैराग्राफ की आखिरी लाइन में छिपी है। अरे भई किसी पार्टी का कार्यकर्ता अपने नेता के घर पर दावत उड़ाने के बाद और क्या कहेगा? ये तो वही बात हुई कि मां की ममता साबित करने के लिए उसके चहेते बेटे से गवाही ले ली जाए। इस एक कॉलम और दो पैराग्राफ की ख़बर के बगल में नीतीश कुमार और शरद यादव की तीन कॉलम तस्वीर छपी है। उसका कैप्शन लिखा है – जीत का स्वाद।
दैनिक भास्कर, 11 जून 2009
जीत की खुशी में सोनिया ने दिया पत्रकारों को भोज
वेजीटेबिल मोमोज, वोनटोन्स, कटहल बिरयानी, पुलाव, जाते जूस, गरमागरम जलेबी। दक्षिण भारत और उत्तर भारत के सभी मशहूर पकवान और साथ में लजीज इटैलियन पाश्ता। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जीत के बाद दिल्ली के अशोक होटल में पहली बार पत्रकारों को पार्टी की ओर से भोजन पर बुलाया तो खाने के टेबल पर खानपान संस्कृति की झलक देखने को मिली।
नेताओं की दावत और उसकी रिपोर्टिंग से जुड़ा एक और वाकया। ये वाकया भी इसी महीने का है। 10 जून को सोनिया गांधी ने जीत की खुशी में दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकारों को दावत दी। पहले से ही मना कर दिया गया था कि यहां की बातचीत पर वो रिपोर्ट तैयार नहीं करेंगे। लेकिन पत्रकारों को देश के सबसे ताकतवर शख़्स ने खाने पर बुलाया था। ये उनके लिए बड़ा सम्मान था। इस सम्मान का बोझ उतारने के लिए कुछ पत्रकार दिल खोल कर लिखना चाहते थे। सोनिया गांधी से हुई बातचीत का ब्योरा देना चाहते थे। बताना चाहते थे कि कांग्रेस आलाकमान उन्हें पहचानती हैं। लेकिन पहले ही मना कर दिया गया था तब क्या लिखें? इस धर्मसंकट को दूर करने के लिए उन्होंने दावत में परोसे गए व्यंजनों पर ही रिपोर्ट छाप दी। उस रिपोर्ट में व्यंजनों की तारीफ़ के अलावा कुछ नहीं था। उदाहरण के लिए 11 जून का दैनिक भास्कर के फ्रंट पेज पर छपी रिपोर्ट का मुखड़ा पढ़िये। ये मुखड़ा बॉक्स में दिया हुआ है।
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भई पत्रकारिता हो तो ऐसी और पत्रकार हों तो ऐसे। अब रिपोर्टिंग का दूसरा नायाब नमूना। ये नमूना दैनिक भास्कर में आज ही देखने को मिला। इस अख़बार के दिल्ली संस्करण में नियमित तौर पर एक पन्ना राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ पर समर्पित होता है। उस पन्ने पर मैं छत्तीसगढ़ में आम जनता से जुड़ी… सरोकार वाली ख़बरें पढ़ने के लिए तरस जाता हूं। वहां से मुख्यमंत्री रमण सिंह की तारीफ और उनकी योजनाओं के अलावा सिर्फ़ नक्सलियों की क्रूरता की ख़बरें ही छपती हैं। सलवा जुडुम की क्रूरता और राज्य और केंद्र सरकार की तरफ से प्रायोजित हिंसा के बारे में कुछ नहीं छपेगा। आज भी एक ऐसी ही ख़बर छपी है। ख़बर देने वाले रिपोर्टर का नाम नहीं लिखा गया है। आप ख़बर पढ़ कर अंदाजा लगा सकते हैं कि ख़बरें प्लांट कैसे की जाती हैं? इस ख़बर में आपको किसी घटना का जिक्र नहीं मिलेगा। कोई सबूत नहीं मिलेगा। स्रोत के नाम पर “नक्सली मामलों के विशेषज्ञ अफसरों” जैसे वाक्य मिलेंगे।
दैनिक भास्कर, 17 जून 2009
ख़बर – छत्तीसगढ़ में क्रूरता पर उतरे नक्सली
भास्कर न्यूज़। रायपुर
राज्य सरकार से शांति वार्ता का प्रस्ताव रख रहे नक्सलियों के आचरण से तो कम से कम ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि उनकी रुचि इसमें है। पुलिस पार्टियों पर लगातार हमले हो रहे हैं। पुलिस का साथ देने के नाम पर लोगों का गला काटा जा रहा है। अब नक्सलियों ने पुलिस जवानों को गंभीर रूप से घायल करने के लिए प्रेशर बमों के अलावा लोहे के सरियों और बांस के नुकीले टुकड़ों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
कई जवानों के चोटिल होने के बाद पुलिस की सर्च टीम के लिए अलग दिशा-निर्देश जारी किये गए हैं। पुलिस पार्टियों पर हमला करने के लिए नक्सली हर छह-आठ महीनों में नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। नक्सली मामलों के विशेषज्ञ अफसरों का कहना है कि एंटी नक्सल ग्रे हाउंड्स फोर्स के दबाव के बाद हार्डकोर नक्सलियों ने पलायन कर अबूझमाड़ और उड़ीसा के सीमाई इलाकों में अपने अड्डे बना लिये हैं। वहां लड़ाकों को सेना या अर्धसैनिक बलों की तरह कमांडो ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग की कुछ सीडी भी पुलिस ने जब्त की है। कुछ दिन पहले दिल्ली में गिरफ़्तार दो महिला नक्सलियों के पास भी पुलिस को ट्रेनिंग की सीडी मिली थी। पुलिस की असल मुसीबत नक्सलियों की रिसर्च टीम है, जो हर हमले के बाद उसकी बारीकी से पड़ताल कर उसकी सारी खामियों को ध्यान में रखकर रणनीति बदलती है।
rajiv kishor
June 18, 2009 at 2:52 pm
इसके लिए रिपोर्टर से ज्यादा वे लोग जिम्मेवार हैं जो ऐसा लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। या फिर लिखने के बाद उसे छापने के बाद फोन कर ये बता भी देते हैं कि कल का अखबार देख लीजिएगा। दरअसल, रिपोर्टर के कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली ये वो गोली है जो हर अखबार, हर संस्थान में चलाई जाती है और जिसका कमान पूरी तरह किसी दूसरे के हाथों में होता है। क्योंकि ये बात समझ में नहीं आती की अगर किसी रिपोर्टर के चटुकारिता भरी रिपोर्ट को संपादित आखिर किस वजह से नहीं किया जाता?