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जिसकी जैसी मार्केटिंग, उसको वैसा वोट

जनसत्ता में आज वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष का लेख छपा है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले अरविंद पटना में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके हैं और वो बिहार की पत्रकारिता के बारे में काफी गहराई से जानते हैं। जनसत्ता में आज के लेख में उन्होंने बिहार की ज़मीनी हक़ीक़त और मीडिया के जरिये मार्केटिंग के बीच के अंतर को बयां किया है। साथ ही देश में मीडिया की मौजूदा भूमिका का विश्लेषण किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे मीडिया मैनेजमेंट ने आम चुनाव के नतीजों पर असर डाला। हम अरविंद शेष का ये लेख जनसत्ता से साभार जनतंत्र पर छाप रहे हैं। आप भी पढ़ें और अपना नज़रिया पेश करें।
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उत्तर प्रदेश के रामपुर से संसदीय चुनाव में हार के बाद भाजपा के कुल जमा दो में से एक मुसलिम चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी ने जो राय जाहिर की, वह भारतीय जनता का राजनीतिक मानस समझने में कई तरह से मदद करती है। मनमोहन सिंह के खिलाफ नकारात्मक और अशालीन प्रचार अभियान के अलावा उन्होंने खास तौर पर अरुण जेटली, अरुण शौरी और यशवंत सिंह की ओर से नरेंद्र मोदी का नाम उछाले जाने और सासे ज्यादा वरुण गांधी के नफरत से भरे भाषणों को भाजपा की हार की अहम वजह बताई।

संभव है कि यह भाजपा के लिए जमीनी हकीकतों को नजरअंदाज करते हुए सपाट दिखने वाले पेचदार रास्तों पर सरपट भागने का नतीजा हो। लेकिन इन्हीं रास्तों की बुनावट का अंदाजा लगा कर इस पर दौड़ने वालों ने बाजी मार ली। इसमें एक तरफ वरुण गांधी और उनके जहरीले बयान समूची हिंदुत्ववादी राजनीति का चेहरा बन गए, तो दूसरी तरफ दलितों के घर सोने या अपने पिता की तरह लोक-लुभावनी शैली में दिए गए कुछ बयानों की मार्फत राहुल गांधी ने कांग्रेस को एक बार फिर ‘स्वीकार्य’ की स्थिति में खड़ा कर दिया। इस तरह उन्माद और उत्तेजना की राजनीति के बरक्स लोगों ने उस पक्ष को ज्यादा कबूल किया जो उनकी सामान्य दिनचर्या में घुले-मिले और रचे-बसे सपनों की बात करता था। यों, अबूझ परतों के भीतर पैठे सपने कई बार कड़वी सच्चाइयों पर भारी पड़ जाते हैं और कभी यथास्थितिवाद तो कभी भारी उलटफेर का वाहक बनते हैं।

इस लिहाज से देखें तो नतीजों के बाद गढ़े जा रहे ये तर्क बेमानी हो जाते हैं कि जनता ने ‘सुशासन’ का चुनाव किया है। चुनावों की घोषणा के बाद से लेकर प्रचार के आखिरी दिन तक जनता के सामने जो अभियान चले वे उनके मन को मोहने के लिए ज्यादा थे। अमेरिका के साथ परमाणु करार से भारत का अंधेरा कितना दूर होगा और इसका नफा-नुकसान क्या है, इसकी बहुत सारी परतें खुल चुकी हैं। इसके अलावा, यह समूची विदेश नीति के ‘शिफ्टिंग’ का मामला था, जिस पर देश की राय लेना जरूरी नहीं समझा गया। मंदी के बहाने छिन रही नौकरियां और वीभत्स होती बेरोजगारी, अमीरी-गरीबी के बीच चौड़ी होती खाई, भ्रष्टाचार, महंगाई, शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे सवाल ऐसे मुद्दे में तदील नहीं हो सके, जिस पर अपना वोट तय किया जा सके। विकास के ‘सेज’ के नाम पर जमीन अधिग्रहण पश्चिम बंगाल को छोड़ कर देश के किसी हिस्से में प्रचार तक नहीं पा सका।

इस बात का विश्लेषण किए जाने की जरूरत है कि महाराष्ट्र के विदर्भ और छत्तीसगढ़ के जो इलाके किसानों की आत्महत्या के लिए जाने जाते हैं, वहां से उन्हीं पार्टियों को जनता ने क्यों जिताया, जिनकी नीतियां इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार हैं। अगर ऐसा नहीं है तो क्या यह ‘पैकेज’ का पुरस्कार है? और क्या हम इस बात का सिरा वहां ले जाना चाहते हैं कि मतदान के ठीक पहले लोगों का वोट हासिल करने के लिए उनके बीच शराब और नोट बांटे जाने की घटनाएं बढ़ जाती हैं?

विडंबना यह है कि इन सवालों को वोट का मुद्दा बनाने की ताकत एक संगठित विपक्ष के तौर पर जिस भाजपा के पास थी, वह ‘लौह पुरुष’ की मजबूती के प्रचार, वरुण गांधी के उन्मादी तेवर और उससे भी आगे अपना भविष्य नरेंद्र मोदी को सौंपने की मुनादी के भरोसे बैठी रही। हिंदुत्व के मुद्दे की हकीकत भारत की सांस्कृतिक बुनावट और सामाजिक मनोविज्ञान से तय होती है, न कि उन्माद या नफरत की राजनीति से। लोग ‘रथयात्रा’ के तात्कालिक असर में बह कर भले ही बाबरी मसजिद को ढहा देने तक के अभियान में शामिल हो जाएं, लेकिन उसके बाद अपनी मूल प्रकृति के हिसाब से ही घटनाक्रमों से प्रभावित होते हैं। इसलिए वे आडवाणी, नरेंद्र मोदी या वरुण गांधी छाप हिंदुत्व के मुकाबले अपने हिंदुत्व को कांग्रेस की शरण में ज्यादा मुफीद पाते हैं।

वामपंथी पार्टियों के लिए अगर जन से जुड़े कुछ सवाल मुद्दा थे भी तो वे तीसरे मोर्चे में शामिल गैर-भरोसेमंद दलों की छवि और अपने प्रभाव वाले राज्यों में आत्मविश्वास की अति के बोझ तले दब कर दम तोड़ गए। वाम मोर्चे का दूसरा वहम यह था कि लोग पिछली यूपीए सरकार में उसके परमाणु करार के विरोध को सकारात्मक समर्थन देंगे और कांग्रेस की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत लिए जाने वाले जनविरोधी फैसलों पर लगाम लगाने के साथ-साथ राष्ट्रीय रोजगार गारंटी या वनवासी अधिकार जैसे कानून लागू किए जाने में उसकी भूमिका को याद रखेंगे। लेकिन हुआ यह कि परमाणु करार पर समर्थन वापसी के बाद उसकी सारी ‘भूमिका’ का फायदा कांग्रेस उठा ले गई।

दरअसल, कई साल के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर आम जनता के मानस की बुनावट के अनुकूल बातों के प्रचार पर ज्यादा जोर दिया, जो असरदार रहा। यह अलग बात है कि लोक को लुभाने वाली तमाम शैलियां आज तक लोक को छलने का ही जरिया बनी हुई हैं। एक समय बिहार में जो लालू प्रसाद दलित बस्तियों में जाकर वहां के बच्चों को नहलाते-धुलाते थे और उसकी तस्वीरें अखबारों में छपती थीं तो मीडिया ने लालू को किसी मसखरे या जोकर से ज्यादा की अहमियत नहीं दी। लेकिन कलावती की कहानी बांचने से लेकर किसी दलित के घर सोने जैसी बातों से उभरी (उभारी गई) मसीहाई छवि की मार्फत कांग्रेस के साथ-साथ खुद राहुल गांधी कहां का सफर शुरू कर चुके हैं, यह सभी जानते हैं। ध्यान रहे कि एक जुमला पिछले लगभग ढाई दशक से व्यवहार और प्रभाव के स्तर पर व्यक्तित्व में ‘निखार’ लाने में उतना ही कामयाब है कि एक रुपए का केवल पंद्रह पैसा जनता को मिल पाता है। यों, ताजा खार यह है कि राहुल गांधी के वादे के भरोसे उनसे मिलने की आस लगाए दिल्ली आईं कलावती निराश होकर वापस चली गईं। यह कहते हुए कि ‘उन्होंने मुझे घर दिलाने का वादा किया था, लेकिन वे मुझसे मिले तक नहीं। आ मैं उनसे नहीं मिलना चाहती।’

हालांकि कांग्रेस के बरक्स राजग और वामदलों सहित तीसरे मोर्चे की विफलता की व्याख्या एक सीधी रेखा खींच कर नहीं की जा सकती। लेकिन एक बिंदु है, जहां अलग-अलग पक्षों ने जनता की नज पहचानने में जितनी कामयाबी हासिल की, नतीजे भी उतने ही उनके अनुकूल रहे। यह क्षेत्र था प्रचार का। कुछ खास मुद्दों को अभियान की शक्ल देने और तमाम जायज-नाजायज रास्तों के जरिए अपने पक्ष में हवा बना पाने की ‘कला’ में जो भारी पड़ा, जीत उसकी हुई। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सफलता के अलावा बिहार में जद (एकी) को जिस तरह की कामयाबी मिली, उससे साफ जाहिर होता है कि कम से कम भारतीय संदर्भों में प्रचार की क्या अहमियत है।

भारत के बहुत सारे ‘राजनीतिबाज’ यह अच्छी तरह समझते हैं कि लोकतंत्र का चौथा खंभा आज राजनीति को किस हद तक प्रभावित कर सकता है और विज्ञापनों के मुकाबले जनता के मानस को किसी खास ओर झुकाने में ‘खबर’ की क्या भूमिका है। इसलिए जिसने जितना पैसा खर्च किया, उसकी ‘खबरें’ उतनी ज्यादा छपीं। हालांकि इस तरह की ‘खबरें’ की खार लेने वाले भी बैठे नहीं थे और इस पर बहुत सारी जानकारी आ सामने आ चुकी है।

अपने तीन शासनकाल में लालू प्रसाद सामाजिक न्याय (समीकरण) को सत्ता का एकमात्र सूत्र मान कर उसी के भरोसे इस बार भी नैया पार लग जाने की उम्मीद करते रहे। और नीतीश कुमार ने इसी सूत्र में सिर्फ एक चीज ‘प्रचार’ को जोड़ दिया और बाजी मार ली। नीतीश सरकार के बारे में राजद के एक जुमले- ‘विज्ञापनी सरकार’ को हम खारिज कर सकते हैं। लेकिन बिहार के प्रशासनिक तंत्र के थोड़ा करीब जाने पर ढेर सारी सच्चाइयां साफ-साफ दिखाई देने लगती हैं। राजधानी या एक-दो शहरों की कुछ मुख्य सड़कों के किनारे मोबाइल या दूसरी कंपनियों के सजीले विज्ञापनों से किया गया ‘शृंगार विकास’ दिखता है और इनका प्रचार पूरे देश में ‘बदलते बिहार’ की रोशनी बिखेरता है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘वीसल लोअर’ या बिगुल फूंकने वाले की भूमिका में आए नीतीश कुमार के दावों के सच का अंदाजा पंचायत से लेकर प्रखंड और जिलास्तरीय सरकारी कार्यालयों और पुलिस थानों की गतिविधियों को देख कर ही लगाया जा सकता है। रिश्वतखोरी के खिलाफ बयानबाजियां अखबारों की सुर्खियां बनती हैं, लेकिन व्यवहार में इस नासूर के कितने स्तर पैदा हो गए हैं, इस पर निगाह डालना किसी को जरूरी नहीं लगता। चार साल पूरे करने की ओर बढ़ते ‘सुशासन’ के बावजूद इलाज से लेकर दवाइयों तक के मामले में सरकारी अस्पतालों की सच्चाई खार नहीं बन पाती है। चार या पांच हजार रुपए महीने के वेतन और ठेके पर सरकारी स्कूलों में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की भर्तियां जरूर हुई हैं। लेकिन किसी निजी कंपनी या एनजीओ की तरह चलाई जाने वाली यह योजना कहां से आई और कैसे चल रही है, इसकी विस्तृत जानकारी लोगों तक पहुंचनी अभी बाकी है।

केंद्र सरकार और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मिलने वाली मदद के बारे में खुद राज्य के सरकारी दस्तावेज नीतीश कुमार के इस वितंडे की कलई खोलते हैं कि बिहार जैसे गरीब राज्य को केंद्र पैसा नहीं दे रहा है। लेकिन मुद्दों के बरक्स सफर की सुविधा के हिसाब से खेतों में ताने गए वातानुकूलित तंबुओं में ठहर कर गांव की हालत देखते या ‘न्याय यात्रा’ और ‘विकास यात्रा’ के रथों पर मुख्यमंत्री की सवारी को ही ‘खबर’ के लायक समझा जाता है। पिछले साल की बाढ़ में बह गए लोगों की अब भी जारी त्रासदी की तस्वीरें मीडिया को नहीं मिलतीं। जाहिर है, बहुत सारी हकीकत प्रचार की आंधी में मुद्दे की शक्ल अख्तियार नहीं कर पाती है।

यह अपने आप में इस बात को समझने के लिए काफी है कि किसी समाज में जनता का मानस कैसे तैयार होता है और यथास्थितिवाद को बनाए रखने के लिए ‘अनुकूलन’ का सिद्धांत कितना कारगर साबित होता है। इस लिहाज से अगर कांग्रेस का ही उदाहरण लें तो यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पार्टी और संघर्षों में अपना जीवन खपा देने वाले धुरंधर कांग्रेसी भी मनमोहन सिंह के ‘आभामंडल’ में गुम हो जाते हैं या राजीव गांधी, सोनिया गांधी या राहुल गांधी जैसे नामों के आगे नतमस्तक दिखाई देते हैं। यहां प्रजा का राजा में अपना अक्स देख कर ‘संतोषं परम सुखम’ का मानस तैयार करने वाला तंत्र दरअसल अपने ही जाल में उलझा नजर आता है। ऐसा लोकतंत्र अगर जनतांत्रिक केंद्रीयता की जगह ‘केंद्रित’ जनतांत्रिकता के फार्मूले को अपना ‘राजधर्म’ बनाता है, तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

असली मामला जनता के मानस के अनुकूल खुद को ‘स्वीकार्य’ के रूप मे पेश करने का है। यह अनायास नहीं है कि राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक नीतियों के स्तर पर लगभग समान होने और सत्ता के पांच साल का सत्र सफलता से पूरा करने के बावजूद भाजपा और कमजोर होती दिखती है और कांग्रेस करीब-करीब स्थायी तौर पर कामयाब है। बहरहाल, पचास फीसद से भी कम मतदान में महज लगभग अट्ठाईस फीसद वोट हासिल कर कांग्रेस की नई सरकार ने कुछ ‘बाधाओं’ से मुक्त होकर अपना कामकाज शुरू कर दिया है। जनता अनंत काल तक इस उम्मीद पर जीने को तैयार है कि विकास कभी ‘रिस’ कर उस तक भी आएगा!

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One Response to जिसकी जैसी मार्केटिंग, उसको वैसा वोट

  1. ABHAY MISHRA Reply

    June 21, 2009 at 7:14 pm

    शानदार विश्लेषण, मीडिया के सहारे कुछ चमकीले पोस्टरों की रोशनी से पूरे देश को अंधेरे रहित बनाने का दावा, अरविंद जी की शैली लाजबाव कर देने वाली है। हालांकि मैं इस बात से सहमत नहीं कि जिस का जैसा प्रचार उसे वैसा ही वोट, मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश और दिल्ली का विधानसभा चुनाव और ताजे लोकसभा चुनाव का अनुभव यहीं कहता है कि पैसे वालों ने पूरे के पूरा अखबार ही खरीद लिया, हर रोज उन्ही का चेहरा दिखता था लेकिन बावजूद इसके नेता और मीडिया का यह गठजोड़ जीत में तब्दील नहीं हो पाया, अगर ऐसा होता तो मध्यप्रदेश में आज भी दिग्गी सरकार होती और यूपी में मायावती का कोई नाम लेवा नही बचता।
    अरविंद जी ने नेता,मीडिया और कारपोरेट के गठजोड़ द्वारा जारी लोकतंत्र के अपहरण उद्दोग का बेहतरीन खाका खींचा है,नीतीश जैसे अच्छे नेता यदि आईना देख सके तो बेहतर होगा.

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