जहां सौ-दो सौ लोग काम करते हैं, वहां थोड़ा टकराव तो ज़रूर होता है। ख़बरों पर तीखी बहस होती है। किसी की लापरवाही से ख़बर समय पर नहीं चले तो झगड़ा भी होता है। हम सबने ने ऐसे झगड़े कई बार किये हैं और बहसें भी खूब की हैं। लेकिन किसी को भी (किसी को भी मतलब भगवान को भी) दूसरों को अपमानित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। किसी को भी ये हक़ नहीं है कि वो दूसरों के साथ गाली-गलौज करे। बात-बात पर धमकी देता फिरे कि उठा कर बाहर फेंक दूंगा। इंसान को अपनी जागीर समझे। क्षेत्र, जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भद्दी टिप्पणी करे। एक ऐसे तनाव से भर दे कि पीड़ित कर्मचारी हर वक़्त उससे उबरने की कोशिश करता रहे। नौकरी बचाने के लिए… परिवार का पेट पालने के लिए सबकुछ चुपचाप सहता रहा। घुट-घुट कर जीता रहे।
अगर आप मीडिया में हैं और आपके साथ ऐसा कोई वाकया हुआ है तो आप हमसे खुल कर कहें। हम तक अपनी बात पहुंचाने का तरीका वेबसाइट के ऊपरी हिस्से में मौजूद संपर्क में दिया हुआ है। हम उसे जरूर छापेंगे। यकीन मानिए आपका नाम और पता किसी भी सूरत में जाहिर नहीं किया जाएगा। बंद और खाली कमरे में भी आपका जिक्र नहीं होगा। आपका नाम जुबां पर नहीं आएगा। अगर भरोसा हो तो आप खुल कर लिखें। दुनिया के बारे में तो हम रोज सोचते हैं। साथी शैलेंद्र के जाने से एक मौका मिला है कि हम कुछ पलों के लिए ही सही… थोड़ा ठहर कर अपने बारे में सोचें। एक बहस अपने बारे में हो।
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