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आरटीआई के दायरे में हों मीडिया संस्थान

मीडिया को सूचना अधिकार के दायरे में लाया जाए या नहीं – ये बहस तेज हो रही है। कुछ समय पहले अरुंधति रॉय से बात हुई तो उन्होंने मीडिया को सूचना के अधिकार कानून के दायरे में लाने की बात कही। मीडिया संस्थानों को मिलने वाले पैसे का पूरा हिसाब देने की मांग की। वो पैसा कहां से आता है और कौन देता है? मांग सही है। हर पैसे का अपना चरित्र होता है और यही पैसा मीडिया संस्थानों का चरित्र भी तय करता है। इसलिए इसे आरटीआई के दायरे में लाना चाहिये। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया भी इसी बहस को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है जिस तरह मीडिया सूचना के अधिकार कानून का इस्तेमाल कर दूसरी संस्थाओं के बारे में जानकारी हासिल करता है ठीक वैसे ही “मीडिया को भी अपने लिए इस कानून के इस्तेमाल की सुविधा मुहैया करानी चाहिये।” दैनिक हिंदुस्तान से साभार … हम उनका ये लेख आपके सामने पेश कर रहे हैं। आप भी इस बहस में शामिल हों। खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दें।


कोलकाता के जे एन मुखर्जी ने एक समाचार पत्र में एक लेख पढ़कर लेखकी की पृष्ठभूमि के बारे में जानने के लिए पत्र लिखा। उन्हें महीनों तक जवाब नहीं मिला। लेखक के बारे में जानना जरूरी था, क्योंकि स्वास्थ्य संबंधी एक विषय पर उन्होंने जो दावे किये थे वे भ्रामक थे और एक हद तक बेबुनियाद भी थे। जे.एन. मुखर्जी समाचार पत्र के दफ़्तर पहुंच गए। लेकिन उन्हें कई बार की भागदौड़ के बाद भी उस लेखक का न तो पता ठिकाना मिला और न ही उसके बारे में कोई जानकारी। लेकिन उस दफ़्तर के आखिरी चक्कर में एक संपादकीय सहयोगी ने उन्हें एक जानकारी दी कि कई चीजें प्रायोजित होती हैं और उसमें लेखक का पता ठिकाना और पृष्ठभूमि तलाशना व्यर्थ है।


मीडिया खुद को संसदीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में परिभाषित करता है। जिस तरह से संसदीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर यह कानून लागू होता है तो मीडिया संस्थानों पर क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिये? तीनों स्तंभों पर भी इस कानून के लागू होने की एक सीमा निश्चित की गई है। पर मीडिया का मामला कई मायने में बेहद संवेदनशील है। जैसे मीडिया के पास अपने सूत्रों को नहीं बताने का विशेषाधिकार है। भले ही उसके दुरुपयोग की भी शिकायतें मिलती रहती हैं। लेकिन जिस तरह से संसद और न्यायालयों ने कुछ विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित बनाए रखें हैं, मीडिया को भी ऐसे कुछ विशेषाधिकार हासिल हो सकते हैं। लेकिन जहां विशेषाधिकार पर आंच नहीं आती हो कम से कम वैसे मामलों में सूचना के अधिकार के तहत उन्हें लाया जा सकता है।

जन संचार माध्यमों में रोजाना जितनी तरह की सामग्री परोसी जाती है उनमें से बहुत बड़ा हिस्सा ख़बरों का नहीं होता है। उन्हें मोटेतौर पर प्रचार सामग्री कहा जा सकता है। लेकिन वो ख़बरों की तरह प्रस्तुत की जाती हैं और उन पर ख़बरों की तरह भरोसा भी किया जाता है। अपनी बातें लोगों तक पहुंचाने के लिए तमाम तरह के संगठन रिपोर्टरों को तरह-तरह से प्रेरित करते हैं। ये एक खुली किताब की तरह है कि पत्रकारों को बड़े-बड़े गिफ्ट मिलते हैं। सैर-सपाटे की सुविधाएं मिलती हैं। इन सबके प्रभाव में रिपोर्टर ख़बरें प्रस्तुत करते हैं। कहा जा सकता है कि दूसरे पेशों की तरह पत्रकारिता में भी ऐसे बहुत से लोग हो सकते हैं, लेकिन उनके व्यक्तिगत आचरण की हर जानकारी संस्थान के पास हो ये जरूरी नहीं। बात सही है… पर संस्थान को एक जानकारी जरूर होती है। यदि कोई संस्था या व्यक्ति अपनी उपलब्धियों या अपने शोध की सफलता के लिए किसी रिपोर्टर को कहीं ले जाता है और उसकी रिपोर्ट को रिपोर्टर की ख़बर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है – तो ये जानकारी संस्थान के पास होती है।

यहां सवाल उठता है कि अगर कोई ये पूछे कि किस ख़बर को प्राप्त करने के लिए किसके संसाधन का इस्तेमाल किया गया तो क्या ये बताया जाना चाहिए? सीधे तौर पर सवाल यह कि क्या मीडिया संस्थान को सूचना के अधिकार कानून के तहत लाया जा सकता है? यह कानून निजी संस्थानों पर सीधे तौर पर लागू नहीं है। मीडिया खुद को संसदीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में परिभाषित करता है। जिस तरह से संसदीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर यह कानून लागू होता है तो मीडिया संस्थानों पर क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिये? तीनों स्तंभों पर भी इस कानून के लागू होने की एक सीमा निश्चित की गई है। पर मीडिया का मामला कई मायने में बेहद संवेदनशील है। जैसे मीडिया के पास अपने सूत्रों को नहीं बताने का विशेषाधिकार है। भले ही उसके दुरुपयोग की भी शिकायतें मिलती रहती हैं। लेकिन जिस तरह से संसद और न्यायालयों ने कुछ विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित बनाए रखें हैं, मीडिया को भी ऐसे कुछ विशेषाधिकार हासिल हो सकते हैं। लेकिन जहां विशेषाधिकार पर आंच नहीं आती हो कम से कम वैसे मामलों में सूचना के अधिकार के तहत उन्हें लाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि सूचना का अधिकार कानून मीडिया पर लागू नहीं है। सार्वजनिक उपक्रमों के तहत संचालित मीडिया पर ये कानून लागू है। पिछले विधानसभा के चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में कई जिलों में मतदाताओं ने चुनाव आयोग के जरिये मीडिया संस्थाओं से कई जानकारियां हासिल की थीं। खासतौर से उम्मीदवारों द्वारा वित्रापन के मद में किये गए खर्च का ब्योरा हासिल किया था। एक मौके पर सूचना के अधिकार कानून के तहत पीआईबी से उनके यहां मान्यता प्राप्त तमाम स्वतंत्र पत्रकारों की आमदनी का हिसाब-किताब पूछा गया। पीआईबी में मान्यता प्राप्त स्वतंत्र संवाददाताओं को अपनी मान्यता के नवीनीकरण के लिए अंकेक्षण द्वारा सत्यापित आमदनी का ब्योरा पेश करना होता है। जब हर वर्ष अपनी आदमनी का ब्योरा पेश कनरे की बाध्यता है तो फिर सूचना के अधिकार कानून के तहत किसी को यह जानकारी लेने से कैसे रोका जासकता है?

मीडिया का पूरा व्यापार भरोसे पर टिका है। जिस तरह से मीडिया के आचरण को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, वैसी स्थिति में एक रास्ता यह है कि पारदर्शिता के दरवाजे थोड़े खोले जाएं। यह किया जा सकता है कि सूचना के अधिकार कानून की भावनाओं के अनुरूप खुद मीडिया कोई ऐसा तंत्र विकसित करे, जहां से पाठक अपनी सूचनाओं के जवाब हासिल कर सकें। अभी मीडिया द्वारा खुद ख़बरों के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन मीडिया को भी अपने लिए इस कानून के इस्तेमाल की सुविधा मुहैया करानी चाहिये।

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