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वोट से पहले मीडिया में खेला गया नोट का खेल

दिल्ली सरकार ने चुनाव पूर्व मीडिया के लिए खजाना खोल दिया था। दस साल में विज्ञापन राशि तीस गुना से ज्यादा बढ़ गई है। चार साल में गैर-समाचार पत्र प्रचार माध्यमों में विज्ञापन के मद में खर्च सौ गुना से ज्यादा बढ़ गया है। केन्द्र सरकार ने भी चुनाव के पहले के महीनों में मीडिया के लिए खजाना लूटाया था। शीला दीक्षित और मनमोहन सिंह की इस दरियादिली पर से अब पर्दा उठ रहा है। और ये पर्दा उठा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया। आप उनके इस शानदार विश्लेषण को पढ़िये और अंदाजा लगाइये कि क्यों यूपीए सरकार की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ मीडिया की आवाज़ धीमी पड़ गई है?… क्यों मंत्रियों की अय्याशी पर मीडिया ख़ामोश है? और क्यों बीते कई साल से किसी बड़े घोटाले का पर्दाफाश नहीं हुआ है? सोचिए कि क्या हमारे देश के सारे अधिकारी और सारे नेता ईमानदार हो गए हैं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि दलाल दलाली छोड़ कर भजन-कीर्तन में जुट गए हैं? सोचिए और खुल कर अपनी प्रतिक्रिया दीजिये।

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दिल्ली की राज्य सरकार ने पिछले दस वर्षों के दौरान समाचार पत्रों, रेडियों, टेलीविजन चैनलों और दूसरे प्रचार माध्यमों में विज्ञापन के मद में पचास करोड़ रूपये खर्च किया है। इन पचास करोड़ रुपये में सबसे ज्यादा खर्च चुनावी वर्ष 2008-2009 के दौरान किए गए हैं। ये रकम 22 करोड़ 56 लाख 28 हजार 569 रुपये है। इसी वित्तीय वर्ष के दौरान दिल्ली में विधानसभा और लोकसभा दोनों के लिए चुनाव कराए गए थे। गौरतलब है कि वर्ष 2001 में दिल्ली सरकार द्वारा समाचार पत्रों में विज्ञापन के मद में महज 71 लाख 56 हजार रुपये खर्च किए गए थे। इस लिहाज से देखा जाए तो दिल्ली सरकार द्वारा खर्च की रकम अब करीब 30 गुना बढ़ गई हैं।

दिल्ली सरकार ने 2008-2009 में विज्ञापन में जितनी राशि खर्च की है उसमें तकरीबन 8 करोड़ 37 लाख रुपये समाचार पत्रों के विज्ञापन में और 14 करोड़ 18 लाख 35 हजार रुपये रेडियो, टेलीविजन, होर्डिंग आदि में खर्च किए गए हैं। मजेदार बात ये है कि वर्ष 2004-2005 में दिल्ली सरकार ने रेडियो, टेलीविजन और होर्डिंग आदि में महज 12 लाख 15 हजार 659 रुपये ही खर्च किए थे। नए माध्यमों में विज्ञापन की राशि में तो 100 गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी की गई है।

दिल्ली सरकार द्वारा विज्ञापन के मद में खर्च में बढ़ोतरी चुनावी वर्ष को ध्यान में रखकर की गई। ये बात दिल्ली विधान सभा के चुनाव के वर्षों में खर्च की रकम को देखकर साफतौर पर कहीं जा सकती है। वर्ष 2003 में पिछला विधान सभा चुनाव हुआ था। दिल्ली सरकार द्वारा वर्ष 2002-2003 और वर्ष 2003 -04 में विज्ञापन के मद में खर्च की जो जानकारी विधानसभा में दी गई है वह क्रमश: 2 करोड़ 89 लाख 76 हजार 239 रुपये और 2 करोड़ 70 लाख 73 हजार 822 रुपये है।


केन्द्र सरकार के विज्ञापनों को जारी करने वाली डीएवीपी कोई एकलौती संस्था नहीं है। विज्ञापन नीति में कई तरह के परिवर्तन किए गए हैं। दूसरी एजेसिंयों द्वारा भी विज्ञापन जारी किए जाते है। उपभोक्ता मामले की तरह दूसरे जिन विभागों या मंत्रालयों के विज्ञापन बड़े पैमाने पर इस दौरान जारी किए गए है वे भी गौरतलब है। परिवार कल्याण (आईईसी) द्वारा 2 करोड़ 76 लाख के विज्ञापन जारी किए गए। स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा 1 करोड 72 लाख से ज्यादा, नई और रिचार्जेबल ऊर्जा द्वारा 2 करोड़ 95 लाख से ज्यादा, पंचायती राज द्वारा 1 करोड़ 74 लाख से ज्यादा, ग्रामीण विकास विभाग द्वारा 2 करोड़ 19 लाख से ज्यादा, भू संसाधन द्वारा 2 करोड़ 37 लाख से ज्यादा खर्च किए गए। इस दौरान सबसे ज्यादा विज्ञापन में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा किया गया जो रकम 14 करोड़ से भी ज्यादा रुपये है। योजना फंड से 5 करोड़ 45 लाख से ज्यादा और गैर योजना फंड से 8 करोड़ 94 लाख रुपये चुनाव पूर्व के दो महीनों के दौरान खर्च किए गए।

देश के विभिन्न राज्यों में राज्य सरकारों ने विज्ञापन के जरिये अपनी छवि निखारने पर जोर बढाया है। दिल्ली में ये बात खासतौर से देखी जाती है। सरकारों के कामकाज और राजनीतिज्ञों के आचरण एवं व्यवहार पर शिकायतें लगातार बढ़ी है। उन्हें सुधारने की जगह सरकारों ने अपनी छवि बनाने के लिए विज्ञापनों का रास्ता अपनाया। इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ा है। सरकारों के विज्ञापनों की भाषा में भी एक गुणात्मक परिवर्तन देखा जा सकता है। सरकारों ने विज्ञापन में अप मार्केट को ध्यान में ठीक उसी तरह से रखा है जिस तरह से टेलीविजन चैनलों द्वारा उन्हीं दर्शकों का ध्यान ऱखा जाता है जो कि बाजार में ऐशोआराम की चीजें खरीदने की क्षमता रखते है। टेलीविजन चैनलों की भाषा में अप मार्केट शब्द का इसी तरह के उपभोक्ताओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सरकारें भी आम नागरिकों के बजाय समाज को प्रभावित करने वाले वर्ग की भाषा, रंग और छवि को ध्यान में रखकर विज्ञापन तैयार करवाती है। वह भी कारपोरेट क्षेत्र की तरह अपने उपभोक्ताओं को फील गुड कराना अपना उपलब्धि समझती है। कोरपोरेट क्षेत्र की पूंजी अपने अपभोक्तओं को जिस तरह से लुभाने और आकर्षित करने पर जोर लगाती है उसी तरह से सरकार वोटरों को आकर्षित करती है।

इसी से जुड़ा एक दूसरा पहलू ये है कि राजनीतिक पार्टियां और राजनेता चुनाव के दौरान अपने प्रचार के लिए जिस तरह से प्रचार माध्यमों की जगहों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। अब सरकारें भी उसी शैली में काम करने लगी है। चुनावी वर्षों में विज्ञापन के मद में प्रचार माध्यमों में विज्ञापन की रकम बढ़ाने का सीधा अर्थ क्या हो सकता है? सरकारें इस तरह से प्रचार माध्यमों को अपने प्रभाव में रखने की कोशिश करती है। दिल्ली सरकार ने समाचार पत्रों की बजाय दूसरे माध्यमों में विज्ञापन राशि को सौ गुना से ज्यादा बढ़ोतरी की तो इसकी एक वजह ये है कि इन माध्यमों से छवि को प्रभावित करने और छवि बनाने की ताकत का अंदाजा सरकार को भी बाद के वर्षों में हुआ हैं।

दिल्ली सरकार ने ही इस तरह से विज्ञापन की राशि में बढ़ोतरी की है ऐसी बात नहीं है। पत्रकार श्रृषि कुमार सिंह ने पिछले दिनों केन्द्र सरकार द्वारा विज्ञापन के मद में खर्च का ब्यौरा मांगा तो उसमें भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। केन्द्र सरकार ने चुनाव से पूर्व ने केवल विज्ञापन की दरों में बढ़ोतरी की बल्कि विज्ञापन के मद में खर्च के बजट में भी बढ़ोतरी कर दी। ये बढ़ोतरी केवल विज्ञापन दर में बढ़ोतरी की वजह से नहीं है।

यह मजेदार तथ्य हो सकता है कि इस वर्ष चुनाव के पूर्व 10 दिसंबर से 20 फरवरी के बीच में केन्द्र सरकार ने केवल डीएवीपी के जरिये उपभोक्ता मामले के निदेशालय द्वारा 7 करोड़ 52 लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए। फिलहाल 20 फरवरी के बाद के खर्चों का ब्यौरा नहीं है। वह ब्यौरा भी उपलब्ध किया जाए तो यह राशि बढ़ सकती है। इसकी तुलना पिछले वर्षों में इस निदेशालय द्वारा विज्ञापन के मद में किए गए खर्च से की जाए तो इतनी राशि के खर्च करने के उद्देश्यों का रहस्य खुल सकता है।

दूसरे केन्द्र सरकार के विज्ञापनों को जारी करने वाली डीएवीपी कोई एकलौती संस्था नहीं है। विज्ञापन नीति में कई तरह के परिवर्तन किए गए हैं। दूसरी एजेसिंयों द्वारा भी विज्ञापन जारी किए जाते है। उपभोक्ता मामले की तरह दूसरे जिन विभागों या मंत्रालयों के विज्ञापन बड़े पैमाने पर इस दौरान जारी किए गए है वे भी गौरतलब है। परिवार कल्याण (आईईसी) द्वारा 2 करोड़ 76 लाख के विज्ञापन जारी किए गए। स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग द्वारा 1 करोड 72 लाख से ज्यादा, नई और रिचार्जेबल ऊर्जा द्वारा 2 करोड़ 95 लाख से ज्यादा, पंचायती राज द्वारा 1 करोड़ 74 लाख से ज्यादा, ग्रामीण विकास विभाग द्वारा 2 करोड़ 19 लाख से ज्यादा, भू संसाधन द्वारा 2 करोड़ 37 लाख से ज्यादा खर्च किए गए।

इस दौरान सबसे ज्यादा विज्ञापन में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा किया गया जो रकम 14 करोड़ से भी ज्यादा रुपये है। योजना फंड से 5 करोड़ 45 लाख से ज्यादा और गैर योजना फंड से 8 करोड़ 94 लाख रुपये चुनाव पूर्व के दो महीनों के दौरान खर्च किए गए। चुनाव आयोग को इस संबंध में लिखा जा चुका है कि सरकार द्वारा चुनाव पूर्व विज्ञापन के मद में खर्च की रकम में बढ़ोतरी के कारणों का अध्धयन कराया जाए। अभी तक ये सवाल उठते रहे है कि चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के अमीर उम्मीदवारों ने प्रचार माध्यमों में इतनी जगह खरीद ली कि प्रचार माध्यमों ने पैसे का भुगतान नहीं करने वाले उम्मीदावारों के चुनाव प्रचार में किसी तरह का सहयोग नहीं किया। लेकिन सच उससे कहीं अधिक कड़वा है।
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सरसरी नज़र में कुछ तथ्य

- बीते दस साल में विज्ञापन पर दिल्ली सरकार का खर्च – तकरीबन 50 करोड़ रुपये
- 2008-2009 वित्तीय वर्ष में दिल्ली सरकार का विज्ञापनों पर खर्च – तकरीबन 22.56 करोड़ रुपये
- चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने भी विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहाया
- दो महीने में अकेले डीएवीपी के जरिये 7.52 करोड़ रुपये खर्च
- परिवार कल्याण (आईईसी) की ओर से 2.76 करोड़ रुपये खर्च
- स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने 1.72 करोड़ रुपये खर्च किये
- नई और रिचार्जेबल ऊर्जा द्वारा 2.95 करोड़ रुपये
- पंचायती राज द्वारा 1.74 करोड़ रुपये
- ग्रामीण विकास विभाग की तरफ से 2.19 करोड़ रुपये
- भू-संसाधन विभाग की तरफ से 2.37 करोड़ रुपये
- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सबसे अधिक – 14 करोड़ रुपये खर्च किये
- योजना फंड से 5.45 करोड़ रुपये
और
- गैर-योजना फंड से 8.94 करोड़ रुपये खर्च किये गये (सिर्फ़ दो महीनों में)

((अगर आखिरी तीन वित्तीय वर्ष के दौरान प्रचार पर सरकारी खर्च के आंकड़े जुटाए जाएं तो बहुत से चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। अगर इन आंकड़ों में ये तथ्य भी शामिल कर लिया जाए कि किस अख़बार और किस चैनल को सबसे ज़्यादा पैसे दिये गए तो और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। इससे सरकार और मीडिया की साठगांठ का पूरा खुलासा होगा। कुछ लोग इस आंकड़े को जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे पास जैसे ही वो तथ्य आएंगे हम आपको ज़रूर बताएंगे।))

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