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क्या मीडिया का काम सिर्फ़ उन्माद फैलाना है?

दस दिन तक केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम और पश्चिम बंगाल सरकार के सुर में सुर मिलाने के बाद अब अख़बारों का जोश भी ठंडा पड़ गया है। बीते दस दिनों में उन्होंने खूब उन्माद फैलाया। लालगढ़ में सैन्य कार्रवाई के समर्थन में जोरदार हवा बनाई। लगा कि उनकी ललकार सुनकर कोबरा फोर्स के जवान एक दिन के भीतर ही सारे माओवादियों का सफाया कर देंगे और लालगढ़ को उनके चंगुल से छुड़ा लेंगे।


चिदंबरम ने 19 जून को पश्चिम बंगाल सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा था कि आखिर माओवादियों पर अब तक प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है? अख़बारों ने इस बयान की अहमियत को समझे बगैर और तकनीकी पक्ष को सामने रखे बगैर चिदंबरम को काफी बड़ा बना दिया। किसी ने ये नहीं पूछा कि चिदंबरम, आंध्र प्रदेश में तो कांग्रेस की सरकार है और लंबे समय तक रही है – क्या उसने नक्सलवाद पर काबू पा लिया है? किसी ने नहीं पूछा कि छत्तीसगढ़ (पहले मध्य प्रदेश और अब छत्तीसगढ़) में लंबे समय तक आपकी हुकूमत रही, क्या आपने वहां पर नक्सली हिंसा रोक दी?

19 जून को जब कोबरा फोर्स ने लालगढ़ में प्रवेश किया तो अगले दिन सारे अख़बारों की सुर्खियों में उन्मादी राष्ट्रवाद झलक रहा था। कोबरा फोर्स ने कसा लालगढ़ पर शिकंजा – जैसी सुर्खियों का लब्बोलुबाब यही था कि फोर्स के जवानों की गोलियों से माओवादियों को कोई नहीं बचा सकता। इस कवरेज में एक बात और चिंताजनक थी। लगभग सभी अख़बारों ने माओवादियों को घृणित अपराधी की तरह पेश करते हुए कहा कि उन्होंने महिलाओं और बच्चों को आगे कर दिया है। वो इनका इस्तेमाल ढाल की तरह कर रहे हैं। मतलब अगर कर्ण का वध करना है तो सबसे पहले उसका कवच हटाना होगा। ये लिखते वक्त वो भूल गए कि अगर सुरक्षाबलों की गोलियों से बेकसूर मारे जाएंगे, तो उनके पास एक आधार रहेगा ये कहने का कि माओवादियों ने उनका इस्तेमाल ढाल के तौर पर किया और न चाहते हुए भी उन्हें गोली लग गई। मीडिया ने अपने इस रवैये से सुरक्षाबलों को उत्पीड़न का एक आधार भी दे दिया।

लालगढ़ के मामले में एक अजीब किस्म का रोमांच और थ्रिल भरने की बेतुकी कोशिश के साथ अख़बारों ने एक शख़्स को हीरो के तौर पर पेश किया। वो शख़्स हैं पी चिदंबरम। चिदंबरम ने 19 जून को पश्चिम बंगाल सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा था कि आखिर माओवादियों पर अब तक प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है? अख़बारों ने इस बयान की अहमियत को समझे बगैर और तकनीकी पक्ष को सामने रखे बगैर चिदंबरम को काफी बड़ा बना दिया। किसी ने ये नहीं पूछा कि चिदंबरम, आंध्र प्रदेश में तो कांग्रेस की सरकार है और लंबे समय तक रही है – क्या उसने नक्सलवाद पर काबू पा लिया है? किसी ने नहीं पूछा कि छत्तीसगढ़ (पहले मध्य प्रदेश और अब छत्तीसगढ़) में लंबे समय तक आपकी हुकूमत रही, क्या आपने वहां पर नक्सली हिंसा रोक दी? सबने बिना सोचे समझे चिदंबरम की वाह-वाह और बुद्धदेव की हाय-हाय करने में कई पन्ने बरबाद कर दिये।


कोई मनमोहन सिंह से ये क्यों नहीं पूछता कि आप पिछले कई साल से ये कह रहे हैं कि नक्सली समस्या को दूर करने के लिए आपके पास ठोस योजना है – तो आखिर वो योजना कौन सी है? क्या नक्सल प्रभावित इलाकों में सारे लोगों को मार देना या फिर उनको पलायन करने पर मजबूर कर देना ही आपकी रणनीति है? अगर हां तो कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी नज़र उन जंगलों और पिछड़े इलाकों में छिपे प्राकृतिक खजाने पर है जिसे नक्सलियों के दबदबे की वजह से तथाकथित सभ्य समाज अपने अधिकार में नहीं ले सका है?

बीते दस दिनों में किसी भी अख़बार में लालगढ़ की समस्या इतनी विकराल क्यों हुई- इसका पूरा ब्योरा नहीं मिलता। बस इतना ही लिखा जा रहा है कि सरकारी तंत्र की नाकामी है। सरकार स्थानीय आदिवासियों और अनुसूचित जाति के लोगों में विकास का कोई सपना नहीं जगा सकी। लगातार उपेक्षा से आदिवासियों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। इसी गुस्से में पिछले साल 2 नवंबर को उन्होंने केंद्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के काफिले को उड़ाने के लिए बारूद बिछा दिया। भगवान की दुआ से विस्फोट तब हुआ जब काफिला गुजर चुका था। उसके बाद पुलिस ने आदिवासियों पर ज्यादती की और इस ज्यादती ने आग में घी का काम किया। हिंसा भड़क उठी। लालगढ़ पर माओवादियों का कब्जा हो गया।

क्या ये कहना मामले को हल्का बनाना नहीं है? क्या मीडिया की यही भूमिका है कि सरकार की हां में हां मिला कर बेकसूर लोगों को गोलियों से भुनवा दें? क्या सच पर पर्दा डाल कर बेकसूरों के क़त्ल में हम बराबर के भागीदार नहीं बन रहे हैं? कोई भी अख़बार पाठकों को ये बताने की कोशिश क्यों नहीं करता कि आखिर प्रतिबंध से पहले और प्रतिबंध के बाद व्यावहारिक स्तर पर कितना अंतर पड़ेगा। प्रतिबंध के तकनीकी पहलू क्या हैं। किसी अख़बार ने सरकार से ये नहीं पूछा कि प्रतिबंध तो पहले भी नक्सली संगठनों पर लगाए जा चुके हैं – क्या उससे ये समस्या हल हो गई? कोई मनमोहन सिंह से ये क्यों नहीं पूछता कि आप पिछले कई साल से ये कह रहे हैं कि नक्सली समस्या को दूर करने के लिए आपके पास ठोस योजना है – तो आखिर वो योजना कौन सी है? क्या नक्सल प्रभावित इलाकों में सारे लोगों को मार देना या फिर उनको पलायन करने पर मजबूर कर देना ही आपकी रणनीति है? अगर हां तो कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी नज़र उन जंगलों और पिछड़े इलाकों में छिपे प्राकृतिक खजाने पर है जिसे नक्सलियों के दबदबे की वजह से तथाकथित सभ्य समाज अपने अधिकार में नहीं ले सका है?


ये भी कहा गया कि ज़िंदल ने बाकी 10 फ़ीसदी हिस्सा स्थानीय लोगों को उचित मुआवजा देकर हासिल किया है। जिंदल के पक्ष में मीडिया ये भी दावा करता है कि मुआवज़ा ऐसा है जो पहले कभी नहीं दिया गया। यहां याद रखियेगा कि मीडिया यही बात सिंगूर में टाटा को दी गई ज़मीन के वक़्त भी कहता था। ठीक इसी तरह कहा जाता था कि टाटा ने लोगों को ऐसा मुआवजा दिया है जो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था।

दरअसल, ये सारा खेल ज़मीन का है। पश्चिम बंगाल में भूमिहीन किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लालगढ़ में भी यही हाल है। वो खेती के लिए जमीन चाहते थे। जीने के लिए बुनियादी सुविधाएं चाहते थे। लेकिन सरकारी उपेक्षा बढ़ती गई। उसी बीच जब ये ख़बर आई कि मिदनापुर में लालगढ़ से पंद्रह किलोमीटर दूर सालबोनी में 4800 एकड़ जमीन जेएसडब्ल्यू स्टील को दी गई है तो आदिवासियों का गुस्सा भड़क गया। सरकार कहती है कि इस ज़मीन का 90 फ़ीसदी हिस्सा उसका था और जो उसने ज़िंदल को स्टील प्लांट के लिए दिया है (यहां पूछना चाहिए कि सरकार किसकी है लोगों की या जिंदल की)। ये भी कहा गया कि ज़िंदल ने बाकी 10 फ़ीसदी हिस्सा स्थानीय लोगों को उचित मुआवजा देकर हासिल किया है। जिंदल के पक्ष में मीडिया ये भी दावा करता है कि मुआवज़ा ऐसा है जो पहले कभी नहीं दिया गया। यहां याद रखियेगा कि मीडिया यही बात सिंगूर में टाटा को दी गई ज़मीन के वक़्त भी कहता था। ठीक इसी तरह कहा जाता था कि टाटा ने लोगों को ऐसा मुआवजा दिया है जो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था।


कई जानकार ये कहते हैं कि हमारी अपनी सरकारों में तो इतनी संवेदना भी नहीं, जितनी ब्रितानिया हुकूमत में थी। ऐसा कह कर मैं नक्सली हिंसा को जायज नहीं ठहराना चाहता। हिंसा का पुरजोर विरोध होना चाहिये। बस इतना ही कहना चाहता हूं कि कोई भी हिंसा करे वो ग़लत है लेकिन सबसे ख़तरनाक सत्ता (राज्य) का हिंसक होना है।

हम क्यों नहीं समझते कि किसी भी इलाके में ज़मीन पर पहला हक़ वहां के लोगों का होता है, किसी सरकार का नहीं। अगर आपको किसी इलाके की ज़मीन किसी कंपनी को देनी है तो वहां के लोगों को सामूहिक तौर पर विश्वास में लेना होगा। लेकिन मिदनापुर में ऐसा नहीं हुआ। लोगों को लगा कि बीते बासठ साल में सरकारों ने तो हमारा शोषण किया, तिरस्कार किया – फिर उसे हमारी ज़मीन छीनने का क्या हक़? लोगों ने विरोध प्रदर्शन किये। नाराजगी जाहिर की जिसे सरकार ने अनसुना कर दिया। सरकार की इस लापरवाही से मामले ने विस्फोटक रूप अख्तियार कर लिया।

लालगढ़ और वहां पर हो रही सैन्य कार्रवाई के समर्थन में मीडिया का एक तर्क ये भी है कि इस देश में किसी को भी हिंसक होने का हक़ नहीं है। बात सही है। ये गांधी का देश है। यहां अहिंसात्मक आंदोलन से हमने आज़ादी हासिल की है। पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया है। लेकिन ऐसा कहते वक़्त मीडिया एक बड़ी भूल कर देता है। आज़ाद हिंदुस्तान में ढेरों अहिंसक आंदोलन हुए हैं…जिन्हें बेरहमी से कुचल दिया गया है। इसीलिये कई जानकार ये कहते हैं कि हमारी अपनी सरकारों में तो इतनी संवेदना भी नहीं, जितनी ब्रितानिया हुकूमत में थी। ऐसा कह कर मैं नक्सली हिंसा को जायज नहीं ठहराना चाहता। हिंसा का पुरजोर विरोध होना चाहिये। बस इतना ही कहना चाहता हूं कि कोई भी हिंसा करे वो ग़लत है लेकिन सबसे ख़तरनाक सत्ता (राज्य) का हिंसक होना है।

यहां एक बात और ध्यान रखने की है। बीते कुछ साल में हमने कई बार देखा है कि सरकार ने आतंकवादी संगठनों से बातचीत के लिए पेशकश की। हमने देखा है कि उत्तर पूर्व के आतंकी संगठनों से बात करने के लिए विशेष अधिकारी विदेश भेजे गए हैं। लेकिन ऐसे कितने वाकये हैं जब सरकार ने अपनी तरफ से सीजफायर घोषित करने के बाद नक्सलियों को बिना शर्त बातचीत का न्योता दिया है? बस आंध्र प्रदेश में एक बार ऐसी कोशिश हुई। छह महीने के लिए सीजफायर भी हुआ। लेकिन सरकार की मंशा सुलह की नहीं थी। वो नक्सलियों की कोई मांग मानने को तैयार नहीं हुई। नक्सली भी पूरा झुकने को तैयार नहीं हुए। बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। क्या पिछली बार की ग़लतियों को दूर करके बातचीत का माहौल फिर से तैयार नहीं किया जा सकता? आखिर मीडिया की जिम्मेदारी क्या है – अमन की वकालत करना या उन्माद फैलाना?

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