न्यूज़ एक्स में बड़े पैमाने पर छंटनी कर दी गई है। छंटनी की प्रक्रिया शनिवार को शुरू हुई और अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक 48 लोगों को पिंक स्लिप पकड़ाया जा चुका है। आज भी कई लोगों को चिट्ठियां बांटी गई हैं और सूत्रों के मुताबिक कुल मिला कर 70 से ज़्यादा लोगों को हटाया जाना है।
न्यूज़ एक्स में करीब सभी महकमों में अहम पदों पर तैनात लोगों पर गाज गिरी है। पॉलिटिकल एडिटर अजय सिंह, डिप्टी पॉलिटिकल एडिटर संजय सिंह, दिल्ली के ब्यूरो चीफ बृजेश पांडे समेत कई वरिष्ठ पत्रकारों की नौकरी चली गई है। न्यूज़ एक्स के इस क़त्लेआम में प्रशासनिक हेड सुनील रनाडे, टेक्निकल हेड जॉनजीत के करीबी सुनील देशपांडे को भी हटा दिया गया है। ख़बरों के मुताबिक राहुल कुलश्रेष्ठ को कंपनी ने सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया है इससे ये अटकलें भी जोर पकड़ रही हैं कि टेक्निकल हेड जॉनजीत को भी हटाया जा सकता है। आईटी हेड अभिषेक कौशिक भी हटाए जा चुके हैं। बड़े अधिकारियों के अलावा मध्य और निचले पायदान पर तैनात कर्मचारियों पर भी मैनेजमेंट ने तलवार चलाया है।
दरअसल, छह महीने पहले न्यूज़ एक्स को इंडी मीडिया ने खरीद लिया था। ये कंपनी नई दुनिया के सीईओ विनय छजलानी और बिज़नेस स्टैंडर्ड के पूर्व संपादक जहांगीर पोचा ने मिल कर बनाई है। इस सौदे के साथ ही पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी की विदाई हो गई। उसके बाद नए मैनेजमेंट ने कार्यभार संभाला और न्यूज़ रूम के हेड अरूप घोष को टरमिनेट कर दिया गया। साथ ही विन्सले फर्नांडिस को भी उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया था। हालांकि तब गुस्से में अरूप घोष ने एलान किया था कि वो मैनेजमेंट के इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने का मन बना रहे हैं। लेकिन उसके बाद मामला ठंडा पड़ गया।
अप्रैल के बाद से ही वहां काम करने वाले कर्मचारियों को अंदाजा था कि कंपनी में बड़े पैमाने पर छंटनी होगी। लेकिन चुनाव को देखते हुए ये प्रक्रिया कुछ समय के लिए स्थगित रही। चुनाव बाद अब नए मैनेजमेंट ने अपना एजेंडा आगे बढ़ा दिया है। सूत्रों के मुताबिक अब कोशिश इस चैनल को नई टीम के साथ नए तेवर में लॉन्च करने की है।
shambhugaon
June 30, 2009 at 2:35 am
किन लोगों को आप पत्रकार कह रहे हैं। न्यूज चैनल और अख़बार में काम करने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता। आज टीवी अखबार में वो जमात काम कर रहे हैं। वो पत्रकार तो कतई नहीं हैं। जो अपने अधिकार के लिए नहीं लड़ सकते वो दूसरे के लिए क्या खाक लड़ेंगे। रही बात नौकरी की तो आजकल पत्रकारिता में गरीब घर को कोई नहीं होता। सब खाए पिए और अघाए घरों के बच्चे होते हैं। जो मिशन नहीं बल्कि माल छापने और दिखने के लिए आते हैं। पत्रकार होते तो वर्णाकूलर एक्ट और प्रेस एक्ट से जरूर वाकिफ होते। जमीर तो इनके पास होता ही नही।
एक बात आपसे जाननी है कि जब सूचना मंत्रालय छानबीन करके न्यूज चैनल का लाइसेंस देते है तो फिर लोग बेच कैसे लेते हैं। अगर खरीद फरोख्त होती रही तो कल दाऊद भी किसी से चैनल खरीद लेगा। इस पर अच्छी रिपोर्ट बन सकती है। क्योंकि चैनल का लाइसेंस साफ सुथरे लोगों को मिलने की बात सुनी है।