((प्रेस क्लब का पांच साल से ऑडिट नहीं हुआ है। मौजूदा कमेटी पर बड़े घोटाले का आरोप। ट्रेजरार के मुताबिक लेन-देन के दस्तावेज़ पर उनके दस्तख़त नहीं। कच्ची पर्चियों पर बड़े-बड़े पेमेंट का आरोप। नए सदस्य बनाने में धांधली का आरोप। क्लब के कई पूराने और वरिष्ठ सदस्यों ने बीते तीन साल के कामकाज पर श्वेतपत्र जारी करने की मांग की है। उन्होंने मौजूदा कमेटी को भंग करके घोटाले की जांच की मांग की है। उनका ये भी कहना है कि किस हक़ से जनरल सेक्रेटरी क्लब को निजी हाथों में सौंप रहे हैं। आरोप बड़े हैं और उनके जवाब में जनरल सेक्रेटरी का क्या कहना है … ये सब इस रिपोर्ट में।))
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पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ (बाएं से दूसरे)
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हंगामे के बाद अब जनरल सेक्रेटरी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को हटाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। प्रेस क्लब के कुछ पुराने मेम्बर और पदाधिकारी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को हटाने के लिए हस्ताक्षर अभियान शुरू कर रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रेस क्लब में गैर कानूनी काम चल रहा है और बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है। इसे रोकने के लिए उन्होंने मौजूदा कमेटी को तुरंत भंग करने और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
प्रेस क्लब के मौजूदा ट्रेजरार नदीम अहमद काजमी के मुताबिक शुरुआती “चंद हफ़्तों को छोड़ दिया जाए तो उसके बाद लेन-देन के किसी भी दस्तावेज पर उनके हस्ताक्षर नहीं मिलेंगे। ऐसा इसलिए कि प्रेस क्लब के जनरल सेक्रेटरी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ सारे लेन-देन अपने ही हस्ताक्षर से करते हैं।” उनका ये भी आरोप है कि “इस पर सवाल उठाने पर पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ बद्तमीजी पर उतर आते हैं।”
प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष राहुल जलाली (ये पुष्पेंद्र के कार्यकाल में भी अध्यक्ष रह चुके हैं) के मुताबिक तीसरी जीत से पुष्पेंद्र का अहंकार बढ़ गया है। इस हद तक कि वो क्लब को अपनी निजी संपत्ती समझने लगे हैं। जलाली के मुताबिक “प्रेस क्लब में किसी खुफिया विभाग की तरह काम कर रहा है। वहां किसी को अकाउंट्स का ब्योरा नहीं दिया जाता यहां तक कि कई मेम्बर्स को भी नहीं। सारे दस्तावेज पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ट के पास रहते हैं।” यही नहीं उनके मुताबिक पिछले पांच साल से प्रेस क्लब का ऑडिट नहीं हुआ है। तीन साल पहले इंटरनल ऑडिट करवाया गया था तो शुरुआती कुछ दिनों में ही पता चला कि साढ़े तीन लाख रुपये से ज्यादा की धांधली हुई है। जैसे ही ये धांधली सामने आई तो फिजूलखर्ची रोकने के नाम पर ऑडिट रोक दिया गया। उसके बाद से किसी को नहीं पता कि अकाउंट्स का हाल क्या है? कच्ची पर्ची पर बड़े-बड़े पेमेंट हो रहे हैं। आखिर क्यों? क्या कोई अनैतिक फायदा उठाने की कोशिश तो नहीं है? हाल ही में वैट का छापा पड़ा है। इसलिए मैं चाहता हूं कि क्लब के अधिकारी एक श्वेत पत्र जारी करें जिसमें पिछले तीन साल के लेन-देन का पूरा ब्यौरा दिया जाए।”
ऑडिट का सवाल क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य जावेद फरीदी भी उठाते हैं। उनका कहना है कि “प्रेस क्लब में गैरकानूनी काम हो रहा है। पुष्पेंद्र की सारी गतिविधियां गैर कानूनी हैं। चार्टेड अकांउट फर्म चंडोक एंड वॉकर ने क्लब के हिसाब किताब का पांच साल से ऑडिट नहीं किया है। कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अब क्लब के अकांउट आडिट नहीं हो सकता है क्योंकि कई ज़रूरी दस्तावेज नहीं हैं। कंपनी लॉ बोर्ड के पास जो आखिरी ऑडिटेड बैलेंस शीट गई थी वो थी प्रकाश पात्रा और सजींव आचार्य की थी। उसके बाद कोई ऑडिटेड रिपोर्ट नहीं भेजी गई है”। ये पूछने पर कि फिर प्रेस क्लब के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? तो उनका कहना है कि “ये सारी छूट प्रेस क्लब के नाम पर मिल रही हैं। सरकार और संस्थाएं भी प्रेस क्लब पर हाथ डालने से कतराती है। इसी का फायदा उठाया जा रहा है।”
पुष्पेंद्र पर एक आरोप ये भी है कि क्लब में नए सदस्य बनाने में भी नियमों को ताक पर रखा गया है। पुष्पेंद्र के ही दूसरे कार्यकाल में मैनेजिंग कमेटी ने ये तय किया था कि नए मेम्बर तब तक नहीं बनाए जाएंगे, जब तक कि नई इमारत नहीं बन जाती है। जिस समय ये फ़ैसला लिया गया था उस समय कमेटी के सदस्य दिनेश तिवारी इसकी पुष्टि भी कहते हैं। लेकिन बीते तीन साल में सैकड़ों की संख्या में मेम्बर बनाए गए हैं और वो भी बिना मैनेजिंग कमेटी को विश्वास में लिये। उनके मुताबिक “पुष्पेंद्र से पूछा जाना चाहिए कि वो ये सारे फ़ैसले किस आधार पर ले रहे हैं? ये भी कि उन्होंने क्लब के संविधान के ख़िलाफ़ इसकी जिम्मेदारी निजी हाथों में सौपने का फ़ैसला कैसे ले लिया?”
बीते दो दिन से पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ से बात करने की कोशिश की जा रही थी। संयोग से आज उन्होंने फोन उठा लिया। उसके बाद जब जनतंत्र ने उनके ऊपर लगे आरोपों के बारे में पूछा तो वो हत्थे से उखड़ गए। उनके मुताबिक ये सारे आरोप बेबुनियाद हैं। वो “प्रेस क्लब के जनरल सेक्रेटरी” हैं और उन्हें “फ़ैसले लेने का पूरा हक़ है।” पुष्पेंद्र ने ये भी कहा कि रविवार को उन्होंने ही “कपूर को प्रेस क्लब में भेजा था। वो क्लब का किचन आउटसोर्स करना चाहते हैं”। उनके मुताबिक “क्लब में कर्मचारी काम नहीं करते हैं और उन्हें पालने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है”। ये पूछने पर कि आखिर ये कपूर है कौन? पुष्पेंद्र की आवाज़ लड़खड़ाने लगती है। वो कहते हैं कि “इसके बारे में आपको सत्यप्रकाश बताएंगे। सत्यप्रकाश क्लब के मेम्बर हैं।”
जनतंत्र ने पुष्पेंद्र से ये भी पूछा कि आखिर वो लेन-देन के दस्तावेज़ पर ट्रेज़रार के हस्ताक्षर क्यों नहीं लेते हैं? उनका जवाब था कि “मौजूदा ट्रेज़रार को कोई समझ नहीं है इसलिए वो उनसे कुछ पूछना ज़रूरी नहीं समझते हैं”। हालांकि बौखहालट में पुष्पेंद्र ने और भी बहुत कुछ ऐसा भी कहा जो लिखा नहीं जा सकता।
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