दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इन दिनों जो कुछ हो रहा है वैसा क्लब के इतिहास में कभी नहीं हुआ। रविवार की घटना से आप प्रेस क्लब की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं। साथ ही मीडिया के एक खराब पहलू को भी जान और समझ सकते हैं। ये भी कि पत्रकारिता के इस पवित्र पेशे में किस हद तक सड़ांध हो गई है। जो बेहद छोटे लाभ के लिए गुणा-गणित में जुटे हों वो समाज और देश के बारे में कैसे सोचेंगे।
रविवार, 28 जून 2009 को दिल्ली के प्रेस क्लब में पुलिस दाखिल हुई। मामला प्रेस क्लब में घुसपैठ का था। चश्मदीदों के मुताबिक वहां करीब 11 बजे एक कपूर नाम का शख़्स करीब 40-45 लोगों के साथ दाखिल हुआ। 8-10 लोगों को उसने बार काउंटर पर भेज दिया। उतनी संख्या में उसके साथी किचन में दाखिल हुए और बाकी स्टोर में। वहां मौजूद सभी कर्मचारियों से कपूर ने कहा कि वो चाबी उसके साथियों को सौंप कर घर चले जाएं। कर्मचारियों ने पूछा क्यों? तो उसने जवाब दिया कि अब प्रेस क्लब का ठेका उसे दे दिया गया है। प्रेस क्लब के माननीय जनरल सेक्रेटरी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने उसे प्रेस क्लब चलाने का ठेका दे दिया है। बात बड़ी थी। प्रेस क्लब के दर्जनों कर्मचारियों की रोजी रोटी पर ये पुष्पेंद्र की सीधी लात थी। उन्होंने तुरंत इसकी जानकारी अपनी यूनियन को दी। करीब डेढ़ घंटे में क्लब के बाकी कर्मचारी और यूनियन के पदाधिकारी भी वहां पहुंच गए। लेकिन कपूर कुछ सुनने को तैयार नहीं था। उसे हर हाल में चाबी चाहिये थी और उसके साथी क्लब के कर्मचारियों से हाथापाई करने लगे। यूनियन ने पीसीआर को फोन किया और करीब डेढ़ बजे पुलिस भी वहां पहुंच गई।
इस हंगामे के बीच वहां कई मेम्बर भी पहुंच चुके थे। उन्होंने ये सारा वाकया अपनी आंखों से देखा। ऐसे ही एक मेम्बर ने कहा कि ये तो हद हो गई… ना कोई जनरल मीटिंग, ना कोई प्रस्ताव कोई भी पदाधिकारी ऐसे कैसे प्रेस क्लब की जिम्मेदारी किसी ठेकेदार को सौंप सकता है। बात बढ़ती देख ठेकेदार ने अपने साथियों को इशारा किया और सारे के सारे वहां से भाग गए। इस पूरे मामले की लिखित शिकायत पुलिस को की जा चुकी है।
उसके बाद करीब चार बजे प्रेस के जनरल सेक्रेटरी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ वहां पहुंचे। पहुंचने के साथ ही उन्हें कर्मचारियों ने घेर लिया। कर्मचारी संगठन के जनरल सेक्रेटरी जितेंद्र के मुताबिक जब उन्होंने पुष्पेंद्र से पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया है? तो उनका जवाब था “ये मेरा क्लब है यहां का मैं जनरल सेक्रेटरी हूं मुझे किसी …… से पूछने की ज़रूरत नहीं है।” एक शब्द ऐसा है जिसे हम नहीं लिख सकते हैं इसलिए उसकी जगह खाली छोड़ दी गई है। मामला बढ़ता देख थोड़ी देर में ही पुष्पेंद्र वहां से चंद ही मिनट में “खिसक” लिए। जिस समय ये सबकुछ हो रहा था वहां पर कई मेम्बर मौजूद थे। उन्होंने भी इसकी पुष्टि की है।
“जनतंत्र” ने इस बारे में पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ट से बात करने की काफी कोशिश की। उनके फोन की घंटी बजती रही लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। प्रेस क्लब जाने पर पता चला कि वो वहां नहीं पहुंचे हैं। देर शाम कई बार फिर फोन मिलाया गया, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला।
इस पूरे प्रकरण से प्रेस क्लब के कई पुराने सदस्य हैरान हैं। वो समझ नहीं पा रहे कि आखिर पुष्पेंद्र ने ऐसा किस हैसियत और किस मंशा से किया? प्रेस क्लब कोई उनकी निजी जायदाद तो नहीं फिर बिना सदस्यों से सलाह मश्वरा किए उन्होंने इसे किसी ठेकेदार के हवाले क्यों कर दिया? क्लब के कई सदस्य इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग कर रहे हैं। उनके मुताबिक ये प्रेस क्लब की मूल भावना और संविधान के ख़िलाफ़ है। इसके पीछे कोई सोची समझी साजिश है.. कोई घोटाला है और हर हाल में उसकी जांच होनी चाहिए।
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