7 अप्रैल 2009। ये वही दिन था जब दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने गृह मंत्री पी चिदंबरम के सामने जूता उछाला था। उसके बाद सबने न्यूज़ चैनलों पर देखा कि कुछ सुरक्षाकर्मी बांह पकड़े हुए जरनैल सिंह को बाहर ले गए। ये भी देखा कि अपमानित चिदंबरम का सांवला चेहरा लाल हो गया था, फिर भी चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान छलक आई। इस चतुर सियासतदान ने तुरंत जरनैल को माफ़ कर दिया और पुलिस से कहा कि कोई केस दर्ज नहीं किया जाए। लेकिन अपमान सिर्फ़ चिदंबरम का ही नहीं देश के गृह मंत्री का हुआ था। वो भी एक पत्रकार के हाथों। न्यूज़ चैनलों के लिए ये एक मसालेदार ख़बर थी। इस ख़बर को सभी चैनलों पर खूब दिखाया गया। इतना कि लोगों के जेहन में जरनैल का चेहरा दर्ज हो गया। दैनिक जागरण को छोड़ अख़बारों के पहले पन्ने पर तस्वीर और ख़बर छापी गई। दैनिक जागरण में ख़बर की जगह एक माफीनामा छपा। जिसमें घटना पर खेद जताया गया था।
अगले दो-तीन दिन ये ख़बर सुर्खियों में छाई रही। उसके बाद चुनाव के दौरान कई जूता कांड हुए। हर बार जरनैल सिंह और चिदंबरम का वो विजुअल न्यूज़ चैनलों पर बार-बार दिखाया जाता रहा। चटखारे लेकर किस्से सुनाए गए। अख़बारों में भी उस घटना का जिक्र हुआ। जरनैल सिंह का जिक्र हुआ। उनके लिए जरनैल एक “सेलेबल कमोडिटी” बन गए थे। जिन्हें बेचकर कुछ टीआरपी हासिल की जा सकती थी। सर्कुलेशन बढ़ाया जा सकता था। लेकिन गुरुवार को जब जरनैल सिंह को दैनिक जागरण ने बर्खास्त किया तो मीडिया ख़ामोश हो गया। कुछ अख़बारों में सिंगल कॉलम ख़बर और दिन में न्यूज़ चैनलों में हल्का सा जिक्र। उसके अलावा कहीं कुछ नहीं। आखिर कुछ दिन पहले तक जो शख़्स “सेलेबल कमोडिटी” था वो अचानक मीडिया के पन्ने से गायब कैसे हो गया?
ये मीडिया का वो चेहरा है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है। मीडिया के बाज़ार में आपकी अहमियत हो सकती है, लेकिन किसी भी छोटी-बड़ी बात पर जब वही संस्थान आपको निकाल देगा तो आप खुद को बहुत अकेला पाएंगे। जो कल तक आपके साथ खड़े थे, उनमें से कई अपनी पूंछ बचाते फिरेंगे। कतराने लगेंगे। ये भी हो सकता है कि आपके ही कुछ दोस्त नियमों की दुहाई दे कर ये कहने लगें कि आपकी ग़लती बहुत बड़ी थी। उस ग़लती के एवज में मिली सज़ा सही है।
मीडिया में ऐसे ढेरों पत्रकार मिल जाएंगे जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, लेकिन उन्हें पैसा और प्रमोशन दोनों मिल रहा है। कई ऐसे भी हैं जो खुफ़िया एजेंसियों से लेकर कंपनियों तक की प्लांट ख़बरों को एक्सक्लूसिब बना कर छापते हैं और एक साथ दो-दो जगहों से तनख़्वाह लेते हैं, लेकिन उनकी नौकरी पर ख़तरा कभी नहीं मंडराता। उन सारे वाकयों को ध्यान में रखते हुए अगर आपसे पूछा जाए कि क्या जरनैल सिंह की ग़लती माफ़ नहीं की जा सकती थी? क्या उन्हें चेतावनी देकर या कुछ दिन सस्पेंड करके नौकरी पर बहाल नहीं किया जा सकता था? क्या उनका गुनाह इतना बड़ा था कि दैनिक जागरण प्रबंधन, पी चिदंबरम और मनमोहन सरकार उसे भुला नहीं सकते थे?
सही तो ये होता कि दैनिक जागरण और पी चिदंबरम दोनों उस बात को भूल जाते और जरनैल सिंह को नौकरी से नहीं निकाला जाता। वैसे भी खुद जरनैल सिंह अपनी ग़लती मान चुके थे। इंसाफ़ का तकाजा भी कहता है कि सज़ा देने से पहले उन हालात पर गौर किया जाए जिनके कारण कोई ग़लती या गुनाह हुआ है। जरनैल सिंह ने 1984 में सिखों का नरसंहार देखा है। उन्होंने पत्रकार बनने का फ़ैसला इसलिए लिया क्योंकि वो मानते थे कि दंगा पीड़ितों के साथ मीडिया ने भी न्याय नहीं किया था। बीते 25 साल में कानून के रखवालों ने जिस तरह सिखों को छला है और इंसाफ़ का मजाक उड़ाया है उससे गुस्सा आना स्वभाविक है। आम चुनाव से ठीक पहले जब सिख दंगों के दो आरोपियों जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को सीबीआई क्लीन चिट की ख़बर आई तो कानून में यकीन रखने वाले हर शख़्स को ठेस लगा। जरनैल सिंह को भी ये बात नागवार गुजरी। उन्होंने इस पर गृह मंत्री पी चिदंबरम से सवाल किया। चिदंबरम ठोस जवाब देने की जगह बात टालने लगे। जरनैल का गुस्सा बढ़ गया और उनसे गलती हो गई।
जरनैल घटना के बाद से ही ये कह रहे थे कि एक पत्रकार को इतना इमोशनल होने का कोई हक़ नहीं। वो इमोशनल हुए थे और ये उनकी ग़लती थी। जब कोई शख़्स अपने किए पर शर्मिंदा हो और उसका गुनाह ऐसा नहीं हो जिससे किसी को कुछ खास नुकसान पहुंचा हो तो उसे भुला देना ही बेहतर होता है। इससे क्षमादान देने वाले का सम्मान बढ़ता है। लेकिन जरनैल सिंह के मामले में ऐसा नहीं हुआ। दैनिक जागरण प्रबंधन से भी चूक हो गई। ऐसे में क्या मीडिया के बाकी साथियों का ये दायित्व नहीं था कि वो इस मामले को संवेदनशील तरीके से उठाए ताकि दैनिक जागरण प्रबंधन अपने फ़ैसले पर फिर से विचार करने लगे और अपनी ग़लती सुधार ले? ऐसा भी नहीं हुआ। आखिर क्यों? क्या हममें इतना भी साहस नहीं कि अपने साथियों की बात को सही तरीके से रख सकें? अगर नहीं, तो फिर हम सत्ता की तानाशाही रवैये और भ्रष्टाचार को चुनौती कैसे देंगे?
इन सवालों पर चर्चा से पहले आप एक किस्सा सुनिए। ये किस्सा किसी और संदर्भ में कई साल पहले मशहूर साहित्यकार राजेंद्र यादव ने सुनाया था। पुराने जमाने में बंदर को पकड़ने के लिए शिकारी छोटे मुंह वाले लोटे में चना रख देते थे और उस बर्तन को सीकड़ से बांध देते थे। बंदर चना निकालने के लिए बर्तन में हाथ तो डाल देता था। लेकिन चने को जैसे ही मुट्ठी में बंद करता उसका हाथ बाहर नहीं निकलता। अब बंदर आज़ाद भी होना चाहे और चने का मोह उसे मुट्ठी खोलने नहीं दे। उलझन में फंसे बंदर को शिकारी आकर पकड़ लेते थे।
आज पत्रकारों की स्थिति इसी बंदर की तरह है। मुख्यधारा के ज़्यादातर पत्रकारों की मुट्ठी भर गई है। ये भरी हुई मुट्ठी उसके डर, लालच, छटपटाहट और गुलामी… सबकी बड़ी वजह है। इसने ज़्यादातर पत्रकारों को बहुत स्वार्थी बना दिया है। इतना कि वो अपने फ़ायदे से ऊपर कुछ भी नहीं सोच पाते। न समाज के बारे में, न जनता से जुड़े मुद्दों के बारे में और ना ही अपने साथियों के बारे में। कई तो बेहद छोटे-छोटे फायदे के लिए उन लोगों के ख़िलाफ़ ही साज़िश करते नज़र आएंगे जिनके साथ रात-दिन काम करते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि किसी दिन कोई उनकी जड़ें भी ऐसे ही खोद देगा तब वो भी सड़क पर होंगे। दिन-रात रोजी-रोटी की चिंता में गलते रहेंगे। ये सब कहने का मतलब ये कतई नहीं कि पत्रकारों को अच्छी पगार नहीं मिलनी चाहिए या उन्हें हमेशा झोलछाप बने रहना चाहिए। बस इतना ही कहना चाहता हूं कि अच्छे पैसे मिलने का मतलब ये तो नहीं कि मानवीय संवेदनाओं की हत्या कर दी जाए। अपनी कलम, साथी, समाज और देश को धोखा दिया जाए?
यही वजह है कि पत्रकारों पर मीडिया संस्थानों की ज़्यादती की ख़बरें आनी बंद हो गईं हैं। आप सबको याद होगा… अब से कुछ समय पहले जेट एयरवेज ने जब 1900 कर्मचारियों को बाहर निकाला था तब मीडिया ने तीन दिन तक उस ख़बर को पेर कर रख दिया था। लेकिन हाल के दिनों में एनडीटीवी से 200 कर्मचारी निकाल दिए गए। न्यूज़ एक्स से 78 कर्मचारी निकाले गए… कुछ संस्थानों को छोड़ कर हर जगह पर कर्मचारियों की छंटनी कम हुई या फिर पगार में कटौती की गई। लेकिन वो ख़बरें कहीं नहीं आईं। ऐसे मामलों में मीडिया संस्थानों में एक आम सहमति दिखती है। आम सहमति कि संस्थानों की तरफ से पत्रकारों के साथ होने वाली ज़्यादती की ख़बरें न तो छापी जाएंगी और ना ही दिखाई जाएंगी। ये तो वैकल्पिक मीडिया की मेहरबानी है कि हम और आप पत्रकार बिरादरी की इन घटनाओं से वाकिफ हो जाते हैं वरना आपके बगल में बैठा साथी किस दिन गायब हो जाए आपको ये भनक तक नहीं लगेगी।
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