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प्रणब का बजट और मीडिया की तल्खी

प्रणब मुखर्जी के बजट को मीडिया ने आड़े हाथों लिया है। कुछ अख़बारों ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया दी है। बजट की आलोचना में कुछ पत्रकार तो व्यक्तिगत हो गए हैं। देश के बड़े-बड़े कारोबारी, जिन्हें धंधा करना है, वो बजट की आलोचना संतुलित तरीके से कर रहे हैं लेकिन पत्रकार कुछ ज़्यादा ही इमोशनल हो गए। आगे बढ़ने से पहले एक नज़र कुछ उदाहरणों पर।

दैनिक हिंदुस्तान ((पृष्ट संख्या – एक))
हेडर – बाबू मोशाय का इंद्रजाल
सब हेडर – वित्त मंत्री ने नापा नौ गज, फाड़ा दो गज
इंट्रो – यूपीए सरकार की दूसरी पारी का पहला बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कमाल कर दिया। उन्होंने बंगाल के विश्वप्रसिद्ध जादूगर पी सी सरकार जैसी बाजीगरी दिखाई। चुनावी वादों और सरकार के 100 दिन के अजेंडा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने वोटर को हंसाया तो जरूर, लेकिन थमाया कुछ खास नहीं। गुड़ कम दिया, गुड़ सी मीठी बातें ज़्यादा कीं। बजट भाषण में बजट कम था भाषण ज्यादा। घोषणाएं ज़्यादा थीं, क्रियान्वयन की ठोस योजनाएं कम।

सुधारों पर साधी चुप्पी – उन्होंने विनिवेश और श्रम कानूनों जैसे टेढ़े सवालों के खरगोश देखते-देखते गायब कर दिए। नौ फ़ीसदी विकास के सफेद कबूतर को फिजां में उड़ा दिए लेकिन यह नहीं बताया कि खस्ताहाल इंडस्ट्री और शिथिलप्राण सर्विस सेक्टर के मौजूदा माहौल में इकॉनमी को छह से सीधे नौ फीसदी तक वे आखिर कैसे ले जाएंगे।

दैनिक भास्कर ((पृष्ट संख्या – एक))
हेडर – मानसून में सूखा
सब हेडर – सेंसेक्स ने लगाया 870 अंकों का गोता
इंट्रो – तमाम उम्मीदें ध्वस्त हो गईं। मानसूनी बजट सूखा ही रहा। आम आदमी को सरकार के सौ दिनी एजेंडे से आस बंधी थी, बादल घुमड़े, लेकिन बिना बरसे चले गए। आयकर में वित्त मंत्री ने कृत्रिम बारिश की। टीवी चैनल से हटते ही लोगों के हाथ लगा साल भर में मात्र 1030 रुपये का फायदा… यानी सरकार ने घोषणा करके महज धुंध पैदा की। 10 लाख से ऊपर की आय पर 10 प्रतिशत सरचार्ज ख़त्म कर ज़रूर इक्कीस हज़ार रुपये की बचत कराई। वामपंथियों का अड़ंगा हटने से सरकार को जो खुला आकाश मिला, बजट में उसका कहीं प्रभाव नहीं दिखा।

पृष्ठ संख्या – एक
हेडर – भारी वित्तीय घाटे की आशंका में ढहा बाज़ार
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को जैसे ही 2009-2010 का वित्तीय घाटा 6.8 फ़ीसदी पहुंचने की आशंका जताई, 15000 के ऊपर कारोबार कर रहा बीएसई सेंसेक्स औंधे मुंह नीचे आ गया। विशेषज्ञों के अनुसार बजट में वित्तीय घाटे से निपटने के कारगर उपायों का जिक्र नहीं है। न ही, किसी प्रमुख सुधार की घोषणा की गई है, जिससे आर्थिक संकट से उबरा जा सके। यही वजह है कि निवेशकों ने इस हद तक नकारात्मक प्रतिक्रिया दर्शाई है।

दैनिक जागरण
पृष्ट संख्या – एक
हेडर – सौ खरब का तिलिस्म
सब हेडर – शहरी गरीबों, किसानों पर रीझे प्रणब दा
इंट्रो – मंदी के मारों को राहत, एक बड़ा टैक्स गायब और ऊपर से कर रियायत, सबको लुभाने वाली तरह-तरह की अदाएं और सरकारी स्कीमों के लिए पैसे की धाराएं…. दस लाख करोड़ के खर्च का तिलिस्म है यह!!! इसके असर पर मत जाइए, बस दादा का बजट जादू देखते जाइए। प्रणब दा का बजट लोगों पर पुराना नपा-तुला लोकलुभावन कांग्रेसी सम्मोहन करता है और सुधारों के मंत्र या घाटे की चिंताओं को फिलहाल पीछे रखता है। वित्त मंत्री ने उद्योगों को लुभाने के लिए कोई खास अदा नहीं दिखाई, इसलिए शायद शेयर बाज़ार ने भी बजट को पीठ दिखा दी है।

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ये एक बानगी है। अख़बारों को उठाकर पढ़ें तो सबने अपनी ख़बरों में तल्ख अंदाज में बजट की ख़बर ली है। ये और बात है कि संपादकीय में उन्होंने रफू करने के लिए बजट की थोड़ी तारीफ़ कर दी है। जिन मुद्दों पर उद्योगपति ख़ामोश थे या फिर संतुलित प्रतिक्रिया दे रहे थे पत्रकार उन मुद्दों पर अपनी इच्छा और अनिच्छा का खुलेआम इज़हार कर रहे थे। सारी रिपोर्टिंग एक खास नज़रिये के तहत हुई। वो नज़रिया ये है कि सरकार सभी को टैक्स में छूट दे। महंगाई में कमी लाने के लिए ठोस कदम उठाए। आधारभूत ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करे। स्वास्थ्य और शिक्षा को सुरक्षित करे। सभी उद्योगों को रियायतें दें। जाहिर है ये सारे कदम उठाए जाएंगे तो सरकार का वित्तीय घाटा बढ़ेगा और उस घाटे को कम करने के लिए सरकारी कंपनियों का विनिवेश कर दिया जाए। सरकार अपनी हिस्सेदारी बेच कर घाटे को कम कर ले ताकि अर्थव्यवस्था पर कोई आंच नहीं आए।

अख़बारों में काम करने वाले सभी मध्य वर्ग से हैं और उनका मध्यवर्गीय विरोधाभास ख़बरों में झलक रहा है। हमें अपने लिए सबकुछ चाहिए। उच्च वर्ग जिसमें मीडिया संस्थानों के मालिक शामिल हैं और मध्यवर्ग जिसमें कर्मचारी शामिल हैं, को जब सरकार कुछ देती है तो मीडिया की बोलती बंद हो जाती है। शायद यही वजह है कि एफबीटी को हटाने के लिए मीडिया ने बड़े पैमाने पर मुहिम चलाई। अख़बारों को मिलने वाली रियायतों पर सबने चुप्पी साध ली। लेकिन जब देश की गरीब जनता को सरकार थोड़ा बहुत देती है तो मीडिया की प्रतिक्रिया तीखी हो जाती है। ये अलग बहस का मुद्दा है कि सरकार ने जो गरीबों की दिया है वो किसी दिखावे से कम नहीं। आखिर क्यों?

दरअसल, पिछले एक महीने से सभी अख़बार अपने पाठकों को तरह-तरह के सपने दिखा रहे थे। बिना आधार के ख़बरें छाप रहे थे या यूं कहें कि अफवाहें फैला रहे थे। कोई कह रहा था कि मकान की कीमतें और कम होंगी। रियल्टी सेक्टर में फिर से बहारे आएंगी… उसे टैक्स हॉलीडे दिया जाएगा। तो कोई आईटी सेक्टर के लिए टैक्स हॉलीडे को बढ़वाने में लगा था। कोई कर्मचारी को टैक्स में भारी छूट दिला रहा था। वगैरह… वगैरह। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ तो उनकी बौखलाहट बढ़ गई। इसे समझने के लिए आप सोमवार को हिंदुस्तान में छपी पहली ख़बर पर नज़र डालिए।

हिंदुस्तान ((तारीख – 6 जुलाई, पृष्ठ संख्या – एक, रिपोर्टर- मदन जैड़ा))
हेडर – रियल एस्टेट की होगी बल्ले-बल्ले!

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी सोमवार को आम बजट पेश करते हुए हाउसिंग लोन के ब्याज पर इनकम टैक्स छूट में इजाफ़ा कर सकते हैं। वैसे इससे आम लोगों को कम बल्कि रियल एस्टेट सेक्टर को ज़्यादा राहत मिलेगी। फिर भी उन लोगों को इसका फायदा ज़रूर मिलेगा जो 25 लाख रुपये से अधिक का फ्लैट खरीदने की सोच रहे हों।

((पृष्ठ संख्या – सात, रिपोर्टर – उमाकांत लखेड़ा))
हेडर – फिर आर्थिक सुधारों की राह दिखेगी बजट में यूपीए सरकार की दूसरी पारी का पहला आम बजट पेश करने जा रहे हैं वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के पास राजस्व घाटे की खाई को पाटना सबसे बड़ी अग्नि परीक्षा है। उनके सामने सौ दिन का सरकार का एजेंडा तो है ही अगले पांच साल का आर्थिक रोडमैप तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती है। साथ ही उन पर आयकर सीमा 1.5 से 2.5 लाख करने का भी दबाव भी है। सूत्रों के अनुसार घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश का बड़ा विकल्प सरकार के पास बचा है जिससे सामाजिक क्षेत्र के लिए संसाधन जुटाया जा सकता है।

दैनिक भास्कर ((तारीख- 6 जुलाई, पृष्ठ संख्या – एक))
हेडर – रियायतों की उम्मीद
वेतन भोगियों को लाभ– सरकार हाउसिंग लोन के ब्याज पर आयकर छूट की सीमा 1.50 लाख से बढ़ा कर 3 लाख रुपये प्रति वर्ष तक कर सकती है।

यह हो सकता है बजट में
एफबीटी हटाया जा सकता है
हाउसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यटन, आतिथ्य के लिए विशेष रियायतें
ट्राजेंक्शन टैक्स में रियायतें वगैरह … वगैरह
कहां से आएगा धन
पब्लिक सेक्टर कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी बेची जा सकती है। साथ ही इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड जारी हो सकते हैं। वगैरह… वगैरह

ये कुछ उदाहरण भर हैं। अख़बारों में छपी ख़बरों पर अगर गौर करें तो ज़्यादातर जगहों पर अटकलों को ख़बरों की शक्ल दी गई है। इसके अलावा किसी खास सेक्टर के किसी खास शख़्स से बात कर उसकी मांगों को रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया। बजट के बाद भी यही तरीका जारी रहा। उसी तरह कुछ खास लोगों से बात करके उनकी नाराज़गी को रिपोर्ट के तौर पर पेश कर दिया गया। किसी भी अख़बार ने किसी सेक्टर के ज़मीनी हक़ीक़त को सामने लाने के लिए कोई ख़ास मेहनत नहीं की। दिल्ली, मुंबई से बाहर की ख़बरें… जो मंदी की सही तस्वीर को सामने लाती, इस बार (कुछ अपवादों को छोड़ कर) गायब रहीं। ये किसी भी बड़े मुद्दे को कवर करने का बेहद सतही तरीका है और इससे ज़्यादातर हिंदी अख़बार इस बार भी नहीं बच सके।
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खुद को बचा न सके दिग्गज भी

बजट को लेकर टीवी न्यूज़ चैनलों का नज़रिया भी संकीर्ण रहा। युवा पत्रकारों की बात रहने दें, कुछ जगहों पर तो बड़े-बड़े दिग्गज भी नाराज़गी और चाहत जाहिर करने से खुद को नहीं रोक सके। बजट के तुरंत बाद चर्चा में एनडीटीवी 24X7 पर प्रणॉय रॉय ने कारोबारी नेस वाडिया से बजट पर प्रतिक्रिया मांगी। नेस वाडिया ने जब उसकी तारीफ़ की तो उन्होंने नेस से कारोबारियों को उम्मीद के मुताबिक छूट नहीं मिलने का जिक्र किया। इस पर नेस ने कहा कि प्रणॉय आप कुछ ज्यादा ही “हार्श” (कठोर) हो रहे हैं। उधर सीएनएन-आईबीएन पर जब सीपीआई नेता डी राजा बजट के कुछ नकारात्मक मुद्दों को उठा रहे थे तो राजदीप सरदेसाई ने चुटकी लेते हुए कहा कि आप लोग यूपीए के किसी कदम की कभी तारीफ़ नहीं कर सकते क्या? अरे भई विपक्ष का काम सरकार की तारीफ़ करना नहीं है बल्कि उसकी कमजोरी का सामने लाना है। वैसे भी ये कोई राष्ट्रीय संकट का मुद्दा तो नहीं है जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एकजुट हो जाएं।

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