सियासत में सम्मानजनक स्थान हासिल कर चुकी पिछड़ी जातियों और दलितों के नुमाइंदे मीडिया में वो मुकाम हासिल नहीं कर सके हैं। आखिर क्यों? क्या ये उनकी नाकामी है। नहीं। ये उनकी नाकामी कतई नहीं… ये तो अगड़ों की साज़िश है। आप वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया का ये लेख पढ़ें और सदियों से चली आ रही इस साज़िश को करीब से समझें। भारतीय मीडिया के जातिवादी और सामंती चेहरे को करीब से देखें। ((सामयिक वार्ता से साभार))
———————————-
सुशील का फोन आया ‘सर आज भी नेशनल एडिशन में पहले पन्ने पर बाई लाइन स्टोरी लगी है। ये चौथी है सर! पहले भी नेशनल एडीशन में तीन स्टोरी लगी थी। एक तो लीड भी बनी थी सर! सुशील बहुत खुश था। वह उत्तर प्रदेश के उस पिछड़े जिले से स्थानीय संस्करण के लिए बाई लाइन खबरें तो ढेरों निकाल लेता है, साथ ही उसने कई ऐसी स्टोरी की हैं जिन्हें कई संस्करणों में निकलने वाले समाचार पत्र ने बहुत ही प्रमुखता से छापा है। सुशील देश में पत्रकार तैयार करने वाले बेहतरीन ब्रांड के संस्थान से निकला है। वह अपनी कक्षा में पहला छात्र था जिसकी चिट्ठी ने पाठकों के पत्रों के बीच अपनी जगह बनाई थी। उसने जनसत्ता के संपादक को एक दिन समाचार पत्र में छपी कुछ गलतियों को सुधारने के लिए एक चिट्ठी लिखी थी। संपादक ने उसे धन्यवाद पत्र भी भेजा था।
लेकिन संस्थान से निकलने के बाद उसे कहीं नौकरी नहीं मिली। वह अपने नाम के साथ जातिबोधक का इस्तेमाल भी नहीं करता था। मैंने अचानक यहां जातिबोधक की बात शुरू क्यों की, इसका ब्योरा आगे। अभी वो सवाल कि आखिर सुशील को नौकरी क्यों नहीं मिली? ऐसे बहुत सारे छात्र छात्राएं है जिनमें बेहतरीन तरीके से काम करने का भरोसा है लेकिन उन्हें नौकरी मिलने में बहुत परेशानी होती है। मैं ऐसे छात्र छात्राओं की एक डायरी लिखने के बारे में सोच रहा हूं। सुशील के साथ पढ़ने वाले कई-कई हज़ार की नौकरियां दिल्ली में पा चुके थे। लेकिन वो बस एक चांस के लिए दौड़ता-भागता रहा। फिर वो दिन भी आया जब उसने थक कर कहा कि वह कहीं भी जा सकता है। उसे तो बस काम चाहिए। उसके लिए फिर यहीं उत्तर प्रदेश में हाथ जुड़ई की गई कि भईया उसे काम दे दो। दो-ढाई हज़ार रुपये के ठेके पर उसे काम का अवसर मिल गया। लेकिन उसे मिले इस अवसर के पीछे जो कथा जुड़ी है वह जानना ज़रूरी है।
सुशील को जब नौकरी देने की सिफ़ारिश की गई तो उसके बारे में ख़ासतौर से बताया गया कि वह दलित है। ये बताने के पीछे एक उद्देश्य था। यह कि मीडिया में दलितों का प्रतिनिधित्व कम है। निजी संस्थानों में तो बहुत कम और ऊंचे पदों पर तो बिल्कुल नहीं। जिन्हें बताया गया वे सचमुच में प्रगतिशील हैं। सामाजिक परिवर्तन की विचारधारा में जीते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि मीडिया में जाति का क्या मतलब? काम आना चाहिए। बहरहाल, उन्होंने बुला लिया। लेकिन दो तीन दिनों के बाद ही उनका फोन भी आ गया। उन्होंने उसकी शिकायत की कि वह यहां कैसे चल सकता है? उसे तो नलकूप और ट्यूबवेल (संभव है कि यहां शब्दों में थोड़ा फेरबदल हो लेकिन भाव यह है कि वह किसी खास तरह के दो सामानों में फर्क नहीं कर पा रहा था) में अंतर ही नहीं मालूम है। लेकिन तब उनसे फिर अनुरोध किया गया कि यदि संभव हो तो उसे कुछ दिनों तक मौका दें। वरना चाहें तो वापस भेज दें। लेकिन सुशील को मौका मिला। उसके बाद सुशील के बारे में शिकायतों की जगह खुद उसका फोन आता था। शिकायतें उसके पास भी थीं, लेकिन उन पर चर्चा फिर कभी।
मीडिया में काम करने वालों की सामाजिक पृष्ठभूमि के अध्धयन में एक बात तो कई बार सामने आ चुकी है कि वहां समाज की बहुसंख्यक आबादी की जाति का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। शायद इस पर बातचीत जरूरी नहीं लगे कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि का प्रतिनिधित्व कितना अनिवार्य है? पूरी दुनिया में इस पर बहस हो चुकी है। दुनिया के कई देशों में मीडिया में सामाजिक संतुलन बनाने की योजनाबद्ध कोशिश भी देखने को मिली है। यहां के हालात के बारे में संक्षेप में जानकारी दी जा सकती है।
वाशिंगटन पोस्ट के संवाददाता कूपर के भारतीय समाचार पत्रों पर दस वर्षों के शोध को यहां रखा जाए तो 1990 के दशक में दलितों की आबादी 15 करोड़ थी लेकिन इनमें से कोई भी किसी दैनिक समाचार पत्र का संवाददाता या उपसंपादक नहीं था। शोध के दौरान दक्षिण में वे जिस वरिष्ठ दलित पत्रकार से मिलें उन्होंने भी कभी किसी बड़े समाचार पत्र के लिए काम नहीं किया था। सामाजिक न्याय आंदोलन के केंद्र तमिलनाडु में 1 करोड़ 20 लाख की दलित आबादी में कुल 10-15 संवाददाता और उप संपादक काम करते थे। लेकिन जाति छिपा कर। उन्हें यह डर हमेशा सताता रहा कि जाति मालूम हो गई तो आगे बढ़ना मुश्किल हो जाएगा।
सामाजिक विकास अध्धयन संस्थान ( सी एस डी एस) के योगेन्द्र यादव और मीडिया स्टडीज ग्रुप की तरफ से मैंने एवं स्वतंत्र शोधकर्ता जितेन्द्र कुमार ने मीडिया के 37 संस्थानों के प्रमुख पदों पर विराजमान 315 लोगों के बीच एक सर्वे किया था। मीडिया में फैसले लेने वाले पदों पर हिन्दू उच्च जाति के पुरूषों का हिस्सा 71 प्रतिशत है जबकि कुल आबादी में उनका हिस्सा आठ प्रतिशत है। केवल 17 प्रतिशत महिलाएं हैं। यहां गौर करने वाली बात है कि महिलाओं की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति (32 प्रतिशत) अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है। क्या यह महज संयोग है कि आधुनिक लोकतंत्र का लबादा 60 वर्षों तक ओढ़कर रखने के बाद भी द्विज हिंदुओं (द्विजों में ब्राह्मण, कायस्थ, राजपूत, वैश्य और खत्री) की मीडिया में स्थिति पुरातनकालीन संस्थाओं की तरह बरकरार है। उनकी जनसंख्या 16 प्रतिशत है लेकिन मीडिया में उनकी हिस्सेदारी 86 प्रतिशत है। केवल ब्राह्मण (इसमें भूमिहार, त्यागी भी शामिल हैं) के हिस्से में 49 प्रतिशत है। राष्ट्रीय मीडिया के 315 प्रमुख पदों में एक भी दलित और आदिवासी नहीं है। अन्य पिछड़े वर्ग का राष्ट्रीय मीडिया में प्रतिनिधित्व चार प्रतिशत है।
धर्म निरपेक्ष लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में मुस्लिम प्रतिनिधित्व तीन प्रतिशत है जबकि जनसंख्या में उनका हिस्सा 13.4 प्रतिशत है। अंग्रेजी मीडिया में ईसाईयों का प्रतिनिधित्व चार प्रतिशत है, जबकि जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी 2.3 प्रतिशत। प्रमुख पदों पर पिछड़ी जाति की महिलाएं नहीं है। मुस्लिम और ईसाई धर्मों की पिछड़ी जातियों के नुमाइंदे भी प्रमुख पदों पर नहीं के बराबर है। सर्वे में इससे ज़्यादा महत्पूर्ण यह संकेत मिलते है कि आने वाले वर्षों में भी मीडिया की सामाजिक पृष्ठभूमि में कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है। क्योंकि एक से दस के बीच के पदों में नीचे जो नियुक्तियां हो रही है, वह पुरानी सामाजिक पृष्ठभूमि की ही वाहक है।
1996 में पहली बार यह ख़बर सामने आई कि भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची में एक भी दलित नहीं है। अब यह अलग बात है कि इस तथ्य को आम बनाने में अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट के नई दिल्ली ब्यूरो प्रमुख कैनेथ कूपर के शोध की भूमिका रही। उनके शोध के आधार पर अंग्रेजी के एक पत्रकार बी.एन. उनियाल ने लिखा कि “अचानक मुझे लगा कि मैं 30 साल से पत्रकारिता में हूं और मुझे एक भी दलित पत्रकार नहीं मिला। एक भई नहीं। सबसे तकलीफ़देह तो यह है कि मुझे कभी इसका अहसास तक नहीं हुआ कि हमारे पेशे में इतना बड़ा अभाव है।” हमने खुद बिहार में 1985 के आसपास एक सर्वे किया था जो कि स्थानीय हिन्दी के समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुआ था। उस समय बिहार की राजधानी पटना में एक दलित संवाददाता मिले थे लेकिन उनके दलित होने की जानकारी कुछ लोगों को ही थी और वो बिहार के नहीं थे।
मैंने हिंदुत्व की राजनीति के केंद्र बने फैजाबाद (अयोध्या) में 14 अप्रैल 2009 को बाबासाहेब के जन्मदिन पर एक सवाल किया। वहां सैकड़ों की तादाद में राष्ट्रवाद के मुखर राष्ट्रीय समाचार पत्रों के संवाददाता है लेकिन उनमें एक भी दलित नहीं है। मैंने पूछा कि क्या कभी ये कल्पना की जा सकती है कि किसी समाचार पत्र में उच्च जाति के लोग नहीं हो तो वह समाचार पत्र या चैनल कैसा होगा? मीडिया में सामाजिक संतुलन नहीं होने की वजहों का रिश्ता बहुत गहरा है। लेकिन सतही तौर पर इन वजहों को यहां समझने की कोशिश की जा सकती है।
7 जून 2006 को हमलोगों के सर्वे के आधार पर अंग्रेजी के चैनल सीएनबीसी टीवी 18 में तीन मीडिया संस्थानों के समाचार प्रमुख और मालिकों– हिन्दुस्तान टाइम्स की शोभना भरतिया, पॉयनियर के चंदन मित्रा एवं द हिन्दू के एन. राम और योगेन्द्र यादव के साथ बातचीत का आयोजन किया था। उस बातचीत में संपादक-मालिक चंदन मित्रा ने इस सर्वेक्षण को आले दर्जे का घटिया काम बताया। उन्हें यह मंजूर नहीं था कि समाचारों के पीछे जातीय पूर्वाग्रह भी काम करते हैं। उन्हें लगता है कि जाति आधारित भारतीय समाज में पत्रकार जातीय भावना से ऊपर उठे होते हैं। एक तो विरोध का तीखा स्वर है और सामाजिक संतुलन बनाने की किसी कोशिश की ज़रूरत से भी इनकार का भाव है। दूसरा पक्ष हिन्दुस्तान टाइम्स की मालिक का बयान हैं। शोभना भरतिया ने भी कहा कि पत्रकारों की नियुक्ति जातीय आधार पर नहीं की जाती है और वो जातीय आधार पर नियुक्ति के ख़िलाफ़ हैं। लेकिन जब उनके संस्थान में शीर्ष के पदों पर काबिज एक खास जाति की सूची पेश की गई तो वे उसे वह ग़लत नहीं ठहरा सकीं। इनके विपरीत तमिल ब्राह्मण मालिकों की संस्था द हिन्दू के एन. राम ने न केवल सर्वे का समर्थन किया बल्कि सर्वे के मुताबिक मीडिया संस्थानों में पिछड़े, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के घोर अभाव को दूर करने के लिए सचेत प्रयास करने पर जोर दिया। उन्होंने अमेरिका के मीडिया संस्थानों में किए गए ऐसे सचेत प्रयासों के नतीजे भी टेलीविजन पर जाहिर किए।
यहां कुछेक अनुभवों को भी जोड़ा जा सकता है। 22 दिसंबर 2008 को जयपुर के पूर्व राजपरिवार के विजित सिंह के मामले में अदालती सुनवाई के बाद जसराज भुरंडा को दिनभर की रिपोर्टिंग करने के बाद लाइव में खड़ा कर दिया गया तो पहली दिक्कत ये थी कि जसराज भुरंडा अछूत माने जाने वाली जातियों के बीच से आते हैं। दूसरा वे कैमरा पर्सन हैं। जैसे ही राजकुमार की रिपोर्टिंग करते हुए वो बहैसियत रिपोर्टर खड़े हुए उन्हें फोन करके कहा गया कि उन्हें लाइव में खड़ा होने के लिए दूसरा जन्म लेना होगा। ये लेख लिखने से कुछ समय पहले अमित ने बताया कि उसे पहली नौकरी इसीलिए मिल सकी क्योंकि उसने अपने नाम के साथ अपना जातिसूचक हटा लिया था। ये उसने अपने एक शुभचिंतक दूबेजी की सलाह पर किया था। राजस्थान के एक पत्रकार मित्र ने तो वर्षों पहले बताया था कि एक दिन उन्हें उनके ‘वरिष्ठ’ ने कह दिया कि वे अपने नाम के साथ ‘सैनी’ नहीं लिखा करें।
रोजाना ऐसी शिकायतें मिलती है कि जिन नामों में जातिसूचक नहीं होता है, इंटरव्यू के दौरान उसे पता लगाने के लिए तरह-तरह के सवाल किये जाते हैं। तमाम बातों पर एकमत होने के बाद जब नौकरी फाइनल करने का समय आता है और अगर आवेदक की जाति का पता चल जाता है तो उसका सलेक्शन रिजर्व में चला जाता है। कोई भी मीडिया में काम की तलाश करने वाले पिछड़े, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों से बातचीत करने की हिम्मत पैदा करके ये सब जानने की कोशिश कर सकता है। इससे एक लंबी डायरी तैयार होती है।
कुल मिलाकर जो निष्कर्ष निकलते हैं उनमें पहला है, मीडिया में विभिन्न मेहनतकश जातियों के प्रतिनिधित्व का अभाव। दूसरा, मीडिया की डिग्री लेने के बाद नौकरी की तलाश करने निकले पत्रकारों पर जाति बताने या छुपाने का दबाव। तीसरा, जो लोग जाति छुपाकर काम कर रहे हैं, उसकी प्रताड़ना। चौथा, जिनकी जाति का रहस्य खुल चुका है उनके साथ निचले स्तर का व्यवहार। पांचवा, पिछड़े और दलित जाति पर पिछड़े-दलित विरोधी दिखने का दबाव। छठा, नौकरी के लिए भटकते ऐसे लोगों पर वर्चस्ववादी संस्कृति का पक्षधर दिखने का दबाव।
यहां केवल दलित और पिछड़ा लिखते हुए हाथ भी परेशानी महसूस कर रहा है कि आदिवासी शब्द यहां क्यों नहीं आ रहा है। आदिवासी नहीं लिख सकता क्योंकि आदिवासी विलुप्त होती कई अपनी जातियों की स्थिति के बराबर भी मीडिया में नहीं है। पिछले दिनों आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि उनके यहां कई पिछड़े और दलित पत्रकार नौकरी की तलाश में आए और सबने खुद को आरक्षण के विरोध में दिखाने की पूरजोर कोशिश की। एक छोटा सा सर्वे ये किया जा सकता है कि जो पिछड़े दलित मीडिया में काम कर रहे हैं उनका वैचारिक झुकाव किस तरफ हैं और क्यों है? लेकिन उपरोक्त बातों से भिन्न यहां एक बात करनी है जो सुशील की कथा से भी जुड़ती है और एन राम के सामाजिक प्रतिनिधित्व के जोरदार वकालत से भी जुड़ती है।
पत्रकार तैयार करने वाली दक्षिण भारत की प्रमुख संस्था एसीजे के चेयरमैन ने लिखा कि उन्हें दलित पृष्ठभूमि के “अच्छे” विद्यार्थियों की जरूरत हैं। दरअसल इस “अच्छे” पर ही बातचीत करनी चाहिए। प्रगतिशील जाति पाति नहीं देखना चाहता। प्रगतिशील को अच्छा दलित चाहिए। ये जाति पाति को नहीं देखने और अच्छे दलित की जरूरत का विचार कैसा है? क्या यह सचमुच उस विचार से अलग है जो घोषित तौर पर दलितों और पिछड़ों के बीच से आने वालों को अयोग्य बताकर मीडिया में अवसर देने से रोकता है? सुशील की जाति अयोग्य नहीं है। इसे तो सुशील ने मौका मिलते ही अपनी कक्षा में साबित किया। उसे बस एक मौका मिला। वह मौका जिससे उसे वंचित किया गया। उसे मौका ही ये कहकर नहीं दिया गया कि वह तो उस मौके के लायक ही नहीं है। दूसरा नौकरी में भी मौका मिलते ही वो खुद को संस्थान द्वारा तय योग्यता पर खरा उतारने में सफल रहा। सुशील को प्रशिक्षण के बाद क्या चाहिए था? वह उस पृष्ठभूमि से आया है जिसे लगातार बेदखल किया जाता रहा है। वह बेदखल किए जाने के भय के मनोविज्ञान से दबा रहता है। वह नौकरी की तलाश करने जब जाता है तो भी वह दिख जाता है और जब नौकरी पा लेता है तो भी दिखने लगता है। लेकिन जैसे ही उसे एक भरोसा मिलता है तो वह किसी से दौड़ से आगे निकलने की क्षमता भी रखता है। इसी तरह से अच्छे दलित का क्या अर्थ हो सकता है?
अच्छा दलित भी एक जाति की चाहत है। आखिर किसी के मानसिक धरातल पर एक अच्छे दलित की तस्वीर बनती होगी तो वह कैसी होगी। दिखने में ऐसा होना चाहिए? बोलने में ऐसा होना चाहिए? ऐसा मतलब कैसा? किसकी तरह का? मानसिक धरातल पर समाज में वर्चस्व रखने वाली संस्कृति के ही हाथपांव से उस अच्छेपन का निर्माण होता है? दलित जब हम संबोधित करते है तो उसकी एक छवि होती है उस दलित को स्वीकार करने की जररूत ही परिवर्तनगामी विचार हो सकता है। जो अच्छा हो गया उसे किसी की प्रगितशीलता की कितनी जरूरत है। आरक्षण के बाद की दूसरी तीसरी पीढ़ी को इसकी कितनी जरूरत हो सकती है?
आखिर किसी को देखकर यह कहा जाए कि वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लायक नहीं है तो इसका क्या अर्थ है कि उसका चेहरा वैसा नहीं है जिस तरह के चेहरे को सुंदरता की पदवी दी गई है। जो लड़का और लड़की आरक्षण की सुविधा की वजह से किसी सरकारी संस्थान में पढ़ने के अवसर पा सका है वह कैसे अपने कपड़े लत्ते, दिखने के तौर तरीके, उठने बैठने और बतियाने के वैसा सलीका सीख सकेगा जिसकी जरूरत नौकरी देने वालों को होती है। उसे उस संस्कृति से तो दूर खदेड़कर रखा गया है। अपने चेहरे का खुरदुरापन कैसे दूर कर सकेगा। जरा इस बात की कल्पना की जाए कि उसे आरक्षण की वजह से जहां पढ़ने का मौका मिला है वहां वो कैसे खुद को टिकाए रखने की कोशिश करता रहा है। उसकी कक्षा में बहुमत सदस्य होते है जो उसके विपरीत की वर्चस्ववादी पृष्ठभूमि से आए होते हैं।
दरअसल, मीडिया में सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल जितना महत्वपूर्ण और जरूरी है उस पर सोचने और काम करने वाले लोग या संस्थाएं अभी नहीं है। जो लोग है वे छद्म ओढे हुए हैं। वे वास्तव में कोई इस स्थिति में परिवर्तन नहीं चाहते हैं। दूसरा, जो लोग वास्तव में परिवर्तन चाहते भी हैं, वे जाति की संरचना को बेहद सतही तौर पर लेते हैं। वे अपने अंदर गहरे बैठे जातीय पूर्वाग्रहों की पहचान नहीं कर पाते हैं। वे जाति पाति का विरोध करते हुए समाज में वर्चस्व रखने वाली जाति की तलाश एक नये नाम से करने में लग जाते हैं।
बहरहाल, यह विषय जितने बरीकी से तमाम स्थितियों पर बातचीत करने की जरूरत महसूस कराता है, वह केवल इस तरह के एक लेख में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। केवल इतना जरूर कहा जा सकता है कि लोकतंत्र को जिन अर्थों में हम ग्रहण करते हैं उन अर्थों में उसे बिना सामाजिक संतुलन के बचा पाना संभव नहीं रह गया है।
Sudhir
July 11, 2009 at 3:51 pm
Hello Editor
You are completely wrong , as far as i know aaj bhi dalit vahin hain jahan pehle the kuch mamuli sasudhar hua hau shayad. jeb sirf unki bhari hui hain jau dalitvaad ke baten kar rahe hain daliton ki nahi.
yeh sab kuch aisa he hain ki chor chor chillao aur chor kau chod ke sabkau pakad lau.
Samaj ki vastvik sacchai aaj bhi vahi hain jau 10 pehle thi , jab se dalitvaad ka nara shuru hua.
Mayavati kahan dalit rah gayi jab 100 crore ka ghotala hau , kaun sa dalit neta aaj dalit hain. infact koi bhi neta dali ya garib nahi hain.yeh bus aam janta he hain jau in positions kau sambhal ke rakhe hue hain.
Dalit ki life main sudhar aayega jab voh educate hau jaayenge aur koi bhi political party aisa hone nahi degi. so common dalit people would be dalit only .
अरविंद शेष
July 11, 2009 at 3:56 pm
इस लेख के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया समरेंद्र जी। जनतंत्र जैसे मंच अब उन मठों की साजिशों पर से पर्दा उठाने में जो भूमिका निभा रहे हैं, उम्मीद इसी से बंधती है।
दोबारा धन्यवाद।
Sanjay Kumar Singh
July 11, 2009 at 5:31 pm
अनिल चमड़िया का यह लेख मैं पूरा नहीं पढ़ पाया। पहले तो मुझे इसका विषय ही नहीं जमा और फिर चंदन मित्रा तक पहुंचते-पहुंचते लगा कि वे ठीक कह रहे हैं। प्रतिशत और गणना से नियुक्तियां नहीं हुआ करतीं। किसी संस्थान में दो नौकरी हो तो एक पुरुष और एक स्त्री को रख लो। किसी संस्थान में 100 नौकरी हो तो 53 पुरुष और 47 महिला (दो-एक हिजड़ों और फिर समलैंगिकों को एक वर्ग मानें तो उनके हिसाब से संशोधन करना पड़ेगा या फिर उनकी शिकायत रह जाएगी) और 47 महिलाओं में पौने 12 मुसलमान और 53 पुरुषों में सवा 13 या 14 मुसलमान नहीं रखा जा सकता है।
जाति के हिसाब से मैं ऊंची जाति का हूं और पूरा नाम ही लिखता हूं। (दीगर है कि छोटी जाति के कुछ लोग भी मेरा उपनाम लगा लेते हैं पर वह अलग विषय है।) यह सच है कि टेस्ट लेकर मुझे जनसत्ता में डेस्क पर काम करने के लिए चुना गया था। ओम थानवी के संपादक बनने के बाद मुझे लगा कि वहां का माहौल मेरे काम करने लायक नहीं है। मैंने नौकरी छोड़ दी। अब वहां पत्रकारों में उंची जाति का एक आदमी कम हो गया तो यह मेरी गलती है। इसमें संपादक या मालिक की जाति से क्या लेना-देना। ऐसा नहीं है कि ऊंची जाति के लोगों को मीडिया में बुलाकर नौकरी दी जाती है। जनसत्ता छोड़े सात साल हो गए सिर्फ अनुवाद करके दिल्ली में टिका हुआ हूं पर आज तक किसी ने नहीं पूछा कि नौकरी करोगे ? कितना कमाते हो ? कितने की नौकरी चाहिए ?
चमड़िया जी अगर पिछड़ों का भला चाहते हैं तो वैसे भी उन्हें मीडिया में और खासकर हिन्दी मीडिया में काम करने के लिए प्रेरित न करें, यही अच्छा है। मीडिया और हिन्दी मीडिया में चाहे लाख बुराई हो पर जाति के आधार पर या आबादी के अनुपात में मीडिया में पिछड़ों को रखवाकर न तो पिछड़ों का भला किया जा सकता है और न मीडिया का। जाति के आधार पर नियुक्ति की बात करनी है तो मीडिया ही क्यों – कहीं भी यह संभव नहीं है कि आबादी के अनुपात में नौकरी दी जा सके। अध्ययन और सूचना के लिहाज से लेख अच्छा-बुरा हो सकता है पर यह कोई मुद्दा नहीं है और न ही शिकायत का विषय।
सच तो यह है कि मीडिया की जगह आप संसद से लेकर सेना तक फिट करते चले जाइए। आपके लेख तैयार होते जाएंगे।
ambrish kumar
July 11, 2009 at 8:14 pm
sahi likha hai.
Dilip Mandal
July 12, 2009 at 1:00 am
बेहद जरूरी मुद्दे उठाए हैं अनिल जी ने। अमेरिका और यूरोपीय देशों में इस बारे में बहस खुलकर होती है और न्यूजरूम की डायवर्सिटी अब वहां के मीडिया हाउस के एजेंडे पर है। लेकिन भारत में ये बहस बहुत ज्यादा कड़वाहट पैदा करती है। हमारा लोकतंत्र अभी सहमा-सहमा सा दिखता है। इस लेख को छापने के लिए धन्यवाद।
roshaniwarghat
July 27, 2009 at 4:03 pm
media me dalito ki kami kyu hai bahot hi serious question hai aur isko sulzana hai to pahale sawarno ko apane vichar ko badalana chahiye lekin wo apane vichar badalna hi nahi chahate to dalit aage kaise jayenge aur koi dalito ke hit ka koi sawal utatha hai to ye koi bahas ka subject nahi hai kah ke usko ignored kiya jata hai isliye dalit hamesha piche rahate hai.
dhiraj kamble
July 27, 2009 at 4:27 pm
sir,maine aapka lekh padha,padhakar bahut achcha laga. jis tarah se aapne media me dalito ki kami bataya hai, iska wahi karan ho sakata hai ke media me jitne bhi uchcha pad par hote hai wo log ye kabhi nahi chahate ki koi dalit unke barabar ya unke saath kam kare. ye to sadiyose chali aa rahi parmpara hai. jo pahale to dikhai deti thi,mahasus bhi hoti thi lakin aaj sirf mahasus hoti hai dikhai nahi deti. usi ko batane ka kaam aapne dankke ki cot par kiya hai . our jo gine-cune reporter dalit hote bhi hai to wo apne aapko is “bheed” me akela mahasus karne ki wajahse apne aap ko is duniya se chupate hai. aaj in “chupe rustomo” ko samne aane ki jarurat hai kyunki inke balbute par hi aajka dalit samaj tika hua hai .