उदयन शर्मा की याद में हुए संवाद में शरद यादव ने अहम मुद्दा उठाया। वो सभा के आखिर में बोले इसलिए उनकी बात आगे नहीं बढ़ सकी। लेकिन उन्होंने जो मुद्दा उठाया, उस पर व्यापक बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सभा में वो लोग नहीं पहुंचे जो फैसले करते हैं। उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल ही नहीं देश के तमाम हुक्मरान हिंदी अख़बारों को दोयम नज़रिये से देखते हैं और अंग्रेजी अख़बारों को लेकर सम्मोहित हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण देकर कहा कि वो जब प्रधानमंत्री थे हर सुबह अंग्रेजी अख़बारों को जितना ध्यान देकर पढ़ते थे और उनकी ख़बरों को जितना अहमियत देते थे, उन्होंने हिंदी अख़बारों को वो अहमियत कभी नहीं दी। ये ऐसे प्रधानमंत्री की बात थी जिन्होंने हमेशा हिंदी भाषी क्षेत्रों से राजनीति की। जो हमेशा हिंदी भाषी क्षेत्रों से चुने गए। जिन्हें हिंदी का बड़ा वक्ता गिना गया और जो खुद को हिंदी का कवि बताते रहे। आखिर क्यों? हिंदी के पत्रकार वो सम्मान हासिल नहीं कर सके जो अंग्रेजी के पत्रकारों को मिला? हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं के पत्रकारों की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या सिर्फ़ सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहाराया जा सकता है या फिर कहीं न कहीं इसके लिए “हम” खुद भी जिम्मेदार हैं. “हम” मतलब हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के तमाम पत्रकार और संपादक।
ये बहुत बड़ा मुद्दा है और इस पर बहस के दौरान आज हम सरकारी नीति की बात नहीं करेंगे। उस पर कागद बहुत कारे किए जा चुके हैं और हुक्मरानों की उस ऐतिहासिक साज़िश को बार-बार दोहराने से कोई फायदा नहीं है। भारतीय भाषाओं के ख़िलाफ़ साज़िश कामयाब हुई क्योंकि हमारे नुमाइंदों ने उसके ख़िलाफ़ लड़ने की जगह उससे समझौता कर लिया। लिहाजा आज हम हिंदी पत्रकारिता को केंद्र में रख कर सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी जिम्मेदारियों की बात करेंगे और अपने गुनाह गिनेंगे। इसके लिए हमें कुछ तथ्यों को ध्यान में रखना होगा।
भारतीय अख़बारों के कुल सर्कुलेशन में 26 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सेदारी अकेले हिंदी की है। रीडरशिप सर्वे में अंग्रेजी के सबसे अधिक बिकने वाले अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया का दसवां स्थान है। हिंदी के चार, तमिल के दो, मराठी, बांग्ला और तेलुगु भाषाओं के एक-एक अख़बार उससे आगे हैं। हिंदी के सबसे बड़े अख़बार दैनिक जागरण से टाइम्स ऑफ इंडिया की रीडरशिप एक चौथाई है। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पाठकों के लिहाज से हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के अख़बार अंग्रेजी से कितना आगे हैं।
अब बात अंग्रेजी और हिंदी न्यूज़ चैनलों की। किसी भी समय अंग्रेजी के सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले चैनल की तुलना में हिंदी का नंबर वन चैनल पांच गुना ज़्यादा देखा जाता है। यही नहीं अगर देश के पहले 10 समाचार चैनलों की बात हो तो उनमें से शुरुआती छह हिंदी के होंगे।
फिर हिंदी अख़बारों, चैनलों और पत्रकारों की अहमियत कम क्यों है? इस सवाल को आप जब भी किसी “समझदार” आदमी से पूछिएगा तो वो कहेगा क्योंकि बाज़ार की दिशा अंग्रेजी से तय होती है। लेकिन ये पूरा सच नहीं है। बाज़ार उपभोक्ताओं से तय होता है। जिसके पास जितने ज़्यादा उपभोक्ता उसका उतना बड़ा बाज़ार और उसकी उतनी बड़ी ताक़त होनी चाहिए। इस लिहाज से देखा जाए तो हिंदी पत्रकारिता का बाज़ार बहुत बड़ा है। हाल के वर्षों में उसका विस्तार भी खूब हुआ है। ऐसे में हिंदी पत्रकारों की अहमियत कम नहीं होनी चाहिए। फिर क्यों शरद यादव ने कहा कि उस सभा में वो लोग नहीं हैं जो फ़ैसले लेते हैं… जो देश चलाते हैं।
इसका जवाब भी खुद शरद यादव ने दिया, जिसे और विस्तार से लिखा जा सकता है। उन्होंने अपने लहजे में यह समझाने की कोशिश की कि किसी भी डुप्लिकेट को ओरिजनल के बराबर सम्मान नहीं मिल सकता। जिस तरह हम सभी ने मिल कर अपने देश की मौलिकता को नष्ट कर उसे पश्चिमी देशों का पिछलग्गू बना दिया, ठीक उसी तरह हिंदी समेत तमाम दूसरी भाषाओं की मौलिकता को नष्ट करके उन्हें अंग्रेजी का पिछलग्गू बना दिया गया है। इसलिए आज हमारी कोई पूछ नहीं है। अब यहां पर कई शब्द वीर (शब्दों को पकड़ कर माथा फोड़ने वाले) मौलिकता को पकड़ कर बैठ सकते हैं कि हिंदी की मौलिकता नष्ट नहीं हुई। लेकिन नष्ट हुई है और खूब नष्ट हुई है। आज हिंदी अनुवाद की भाषा है और हिंदी के ज़्यादातर अख़बार अनुवाद के भरोसे ही चलते हैं। कई चैनल भी अनुवाद के भरोसे चलाए जाते हैं। नाइट शिफ्ट के दौरान अंग्रेजी की 10-15 ख़बरें पकड़ा दी जाती और कहा जाता उनका अनुवाद करके सुबह का बुलेटिन निकाल लेना। ऐसा नहीं कि अंग्रेजी चैनल वाले हिंदी ख़बरों का अनुवाद नहीं करते लेकिन ऐसी ख़बरों की संख्या बहुत थोड़ी होती है। ज़्यादातर हिंदी ख़बरों का स्तर उनके चैनल के लायक नहीं होता।
अनुवाद का आसरा कितना अधिक है इसे समझने के लिए आप देश के सबसे “सम्मानित” मीडिया हाउस का उदाहरण लीजिए। वो मीडिया हाउस अंग्रेजी और हिंदी दोनों चैनल चलाता है। उसके अंग्रेजी चैनल के संवाददाता सभी राज्यों में हैं। जहां तक उसके हिंदी चैनल का सवाल है तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्व के सभी राज्यों में एक भी संवाददाता नहीं। यही नहीं हाल ही में उसने बड़ी संख्या में कर्मचारी निकाले। संख्या बल में अंग्रेजी के पत्रकार बहुत ज़्यादा हैं। लेकिन गाज उन पर नहीं गिरी, निकाले गए हिंदी के पत्रकार। उसी प्रक्रिया में उड़ीसा और मध्य प्रदेश से भी हिंदी के रिपोर्टर हटा दिए गए। अब उसके रिपोर्ट देश के सिर्फ छह शहरों में है। बाकी जगह उसे स्ट्रींगरों और अंग्रेजी रिपोर्टरों के भरोसे रहना है। अब अनुवाद पर निर्भरता पहले से कहीं ज़्यादा है।
ये सिर्फ एक उदाहरण भर है। आप गौर कीजिए। देश में सबसे ज्यादा हिंदी अख़बारों का सर्कुलेशन होने के बाद भी हिंदी में एक भी मौलिक समाचार एजेंसी नहीं मिलेगी। भाषा और वार्ता दोनों एजेंसियां अनुवाद के सहारे चलती हैं। एएनआई अंग्रेजी में ख़बरें भेजती। विदेशी न्यूज़ एजेंसियों की बात ही रहने दीजिए।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है हिंदी अख़बारों की सोच। वो गुलाम मानसिकता से बाहर नहीं आ सके। इसलिए उन्होंने भाषा को भी गुलाम मानसिकता से आज़ाद नहीं होने दिया। ये बहुत बड़ा आरोप है, लेकिन आप इसे खारिज नहीं कर सकते। अगर मौलिक काम की बात उठाइयेगा तो आप पाएंगे कि हिंदी के किसी अख़बार ने डेवलपमेंट रिपोर्टिंग के मामले में पी साइनाथ जैसे पत्रकार को जन्म नहीं दिया है। हिंदी के किसी अख़बार ने पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को कभी गंभीरता से उठाने की कोशिश नहीं की। किसानों की बदहाली पर अंग्रेजी के अख़बारों में जितना कुछ छपता है हिंदी के अख़बारों में नहीं छपता। हिंदी में आज एक भी “द हिंदू”, या “इंडियन एक्सप्रेस” जैसा अख़बार नहीं है। “डाउन टू अर्थ” जैसी पत्रिका नहीं है। कई बार तो हिंदी अख़बारों के सिटी पेज पर आपको अपराध की ख़बरों से इतर कुछ मिलेगा ही नहीं। कला और संस्कृति के नाम पर फूहड़ तस्वीरें पेश की जाती हैं। संपादकीय पेज पर अंग्रेजी के बड़े लेखकों और पत्रकारों के लेख अनुवाद किए हुए मिल जाएंगे। आतंकवाद, नक्सलवाद समेत सभी बड़े मसलों पर हिंदी अख़बारों का कवरेज बेहद सतही और एकतरफा होता है। हिंदी के किसी अख़बार में सत्ता को चुनौती देने का साहस नहीं। आज़ादी के बाद के इतिहास में झांकने पर एक दो उदाहरण मिलेंगे उससे अधिक नहीं। खोजी पत्रकारिता के नाम पर, कुछ अपवादों को छोड़ कर, हिंदी के अख़बार और चैनल लोगों के बेडरूम में झांकने लगते हैं। यहां किसी व्यक्ति विशेष को दोष देना ठीक नहीं, क्योंकि यही हिंदी पत्रकारिता का मूल चरित्र है।
हम हिंदी… हिंदी करते रहे लेकिन हमने हिंदी समाज की ज़रूरतों को शिद्दत से उठाने की कोशिश कभी नहीं की। इसे समझने के लिए एक बार फिर कपिल सिब्बल का ही उदाहरण लीजिए। अंग्रेजी दां कपिल सिब्बल ने जब अपने अंग्रेजी समुदाय के लिए (वो भी भारत के लोग हैं और उनका अनादर करने की कोई मंशा नहीं है।) दसवीं बोर्ड की परीक्षा ख़त्म की तो अधिक ऊंची आवाज़ में ये सवाल उठाना चाहिए था कि सिब्बल जी आपके देश में कितने बच्चे दसवीं तक पहुंचते हैं। दस में पांच तो पांचवी कक्षा से पहले और बाकी बचे हुए पांच में से तीन दसवीं से पहले पढ़ाई ही छोड़ देते हैं। फिर आप दसवीं से बोर्ड हटा कर क्या तीर मार लीजिएगा? उनसे कहना चाहिए था कि सिब्बल जी आपका फ़ैसला इंडिया के लिए है भारत के लिए नहीं। इंडिया बहुत विकसित है, कृपया अब भारत के विकास पर ध्यान दीजिए। लेकिन हम अंग्रेजी अख़बारों की तरह उस फ़ैसले की वाहवाही में जुट गए। कायदे से चाहिए था कि हम इसी फ़ैसले के आधार पर सभी राज्यों के पिछड़े इलाकों में अपने संवाददाता दौड़ा देते … सीरीज शुरू करते और कहते देखिए सिब्बल जी इस इलाके के लोग भी पढ़ना चाहते हैं, लेकिन उनके पढ़ने के लिए एक अदद स्कूल तक नहीं… स्कूल है तो मास्टर नहीं… मास्टर है तो उसके सिर पर खाने बनाने की जिम्मेदारी भी है… देखिये स्कूल में पीने का पानी नहीं… टॉयलेट नहीं… ब्लैकबोर्ड नहीं। लेकिन हमने हिंदी समुदाय की ज़्यादा बड़ी ज़रूरत पर ध्यान नहीं दिया। प्राइमरी शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत पर हिंदी अख़बारों से कहीं अधिक लेख अंग्रेजी अख़बारों में छपे।
अंत में बस इतना ही कि पूरे परिदृष्य पर नज़र डालने के बाद हम कह सकते हैं कि हिंदी अख़बार और हिंदी न्यूज़ चैनल न तो हिंदी समाज की ज़रूरतों को सही तरीके से उठाते हैं और ना ही उसका सही प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा कहने में कुछ भी गलत नहीं। शायद इसलिए हम कभी एस पी सिंह, कभी उदयन शर्मा और कभी राजेंद्र माथुर की तरफ मुड़ कर देखते हैं। इस उम्मीद में कि उनके जैसा ही कोई इस धरती पर जन्म लेगा और हिंदी पत्रकारों को उनकी कुंठा, उनके संकीर्ण नज़रिए और उनके भोकुस दलाल चरित्र से उबार कर नया सम्मान दिलाएगा।
Ganesh Prasad Jha
July 13, 2009 at 10:47 pm
आपने दैनिक जारगण को हंदी का सबसे बड़ा अखबार कहा है और टाइम्स आफ इंडिया को सरकुलेशन में दैनिक जागरण का चौथाई, पर यह भी तो देखिए कि दैनिक जागरण में पढ़ने को क्या मिलता है. सिर्फ गली-मुहल्ले की खबरें. राश्ट्रीय खबरें न के बराबर. जहां का जगरण का एडीशन पढ़ेंगे उसी आसपास के इलाकों की गलियों की खबरें उसमें मिलेंगी. देश की राजधानी और बाकी राज्यों में क्या बड़ी खबरें हैं इससे उस अखबार को कोई मतलब नहीं. एसे में लोग टाइम्स आफ इंडिया में कम से कम देश भर की बड़ी खबरें तो पढ़ सकते हैं. हिंदू और एक्सप्रेस जरूर अच्छे अखबार हैं. पर वे भी अब पहले जैसे नहीं रहे. स्तर सभी अंग्रेजी अखबारों का गिरा है. इसलिए जान लीजिए कि दैनिक जागरण के ज्यादातर पाठक चाय दुकान, पान दुकान, नाई दुकान वाले और रिक्शा वाले, दूधवाले, परचूनवाले, फुटपाथवाले और रेड़ी-ठेला वाले ही हैं. पढ़े-लिखे और विद्वानों-चिंतकों के समाज में दैनिक जागरण की पैठ नहीं के बराबर है. नहीं है भी कह सकते हैं. जिसकी खबरें छपती हैं वह जरूर खरीद लेता है. यही वजह है कि जागरण हर सिंगल कालम और फिलर खबर के नीचे भी दस-पांच नाम जरूर डाल देता है ताकि नहीं कुछ तो दस-पांच प्रतियां बिक जाएंगी. साफ है कि उसकी नीति नाम छापो-अखबार बेचो की है. असल खबर देने की नीति नहीं. दैनिक जागरण एक गंभीर अखबार कभी नहीं रहा.
आपने लिखा है कि हिंदी के किसी अख़बार ने पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को कभी गंभीरता से उठाने की कोशिश नहीं की. यह कहना गलत है. जनसत्ता ने इसमें सबको मात दे दी है. आज भले नहीं, पर एक समय में जनसत्ता में इन विषयों पर काफी कुछ लिखा है. आपने आगे लिखा है कि-खोजी पत्रकारिता के नाम पर, कुछ अपवादों को छोड़ कर, हिंदी के अख़बार और चैनल लोगों के बेडरूम में झांकने लगते हैं. तो यहां भी मैं बता दूं कि खोज खबर का तो जनसत्ता में हफ्ते में दो दिन एक-एक पेज तथा खास खबर पर भी हफ्ते में दो दिन एक-एक पेज बहुत सालों तक छपता रहा. अब आदरणीय ओम थानवी जी उसे जारी रखना जरूरी नहीं समझते तो क्या करें. पानी पर भी जनसत्ता में काफी लिखा गया है. जनसत्ता में कला और सिनेमा पर भी हर हफ्ते अलग-अलग एक-एक पेज होता था. अब न वे लोग रहे और न…… अब न रहे वो पीनेवाले, अह न रही वो मधुशाला. अब तो हम सिर्फ उन मधुर यादों के सहारे जी रहे है. जनसत्ता को कोई यूं ही हिंदी का मानक अखबार नहीं मान लिया गया. अगर ज्यादा बिक रहा है तो लोगों से कहिए कि दैनिक जागरण को ही हिंदी का मानक अखबार मान लें. इससे कम से कम वहां की पैर छूने-छुआने की संस्कृति को भी एक राष्ट्रीय मान्यता मिल जाएगी. विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जानेवाला अखबार जो ठहरा.
समरेंद्र
July 14, 2009 at 11:59 am
गणेश जी, यही दिक्कत है हम सबकी। जब कोई मुद्दा उठाता है तो हम उसका भाव समझने की जगह कुछ शब्दों को पकड़ कर उसे पीटने लगते हैं। लेख में हर जगह पर “कुछ अपवादों को छोड़ कर” जोड़ा गया है। लेकिन आप उन्हीं कुछ अपवादों को गिनाने लगे हैं। आपने सही कहा दैनिक जागरण मानक नहीं है, लेकिन क्या यह सच नहीं कि वो देश का नंबर एक अखवार है। दैनिक भास्कर भी मानक नहीं लेकिन क्या ये सच नहीं है कि वो देश का नंबर दो अख़बार है। आप चाहे तो जनसत्ता को मानक घोषित कर सकते हैं, लेकिन आज उसे पढ़ते कितने लोग हैं। चंद हज़ार। आज उसमें ऐसी कितनी ख़बरें छपती हैं जिनका जिक्र होता है। मैं भी जनसत्ता पढ़ता हूं। पहले के जनसत्ता और अब के जनसत्ता में बहुत फर्क है। इसमें अकेले संपादक को दोष देने से कोई फायदा नहीं। वहां के कई रिपोर्टरों को मैं करीब से जानता हूं और ये भी जानता हूं कि वो जनसंपर्क से ऊपर की पत्रकारिता नहीं कर सकते। उनमें ख़बरें निकालने का माद्दा ही नहीं है। लेकिन आप जैसे कुछ लोग हिंदी पत्रकारिता की जब बात होती है तो एक मरणासन्न अख़बार “जनसत्ता” का नाम उछाल कर सभी बातों को खारिज करने में जुट जाते हैं। ये वही संकीर्ण नज़रिया है जिसका जिक्र किया गया है। यही हिंदी की संस्कृति है।