जनतंत्र पर जरनैल सिंह की दो टिप्पणियां आई हैं। बहुत ही सधी हुई और सम्मानित भाषा में उन्होंने कुछ सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि कथित तौर पर इतना मुखर मीडिया होते हुए भी आखिर क्यों 1984 में सिखों का नरसंहार करने और कराने वाले अब तक आज़ाद घूम रहे हैं? आखिर कब तक इंसाफ़ की आस में लोग यूं ही दम तोड़ते रहेंगे? हमारी सरकारें इतनी क्रूर और न्यायिक व्यवस्था इतनी नपुंसक क्यों है कि न्याय की अवधारणा ही ख़तरे में पड़ गई है? सवाल बड़े हैं। उन सवालों का जवाब देना हमारे बस की बात नहीं, लेकिन हम उन पर विचार ज़रूर कर सकते हैं। सहमति और असहमति की गुंजाइश के साथ उन पर अपनी राय ज़रूर रख सकते हैं। आप भी जरनैल की उन दोनों टिप्पणियों को पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।
जनरैल की दोनों टिप्पणियां
सादर प्रणाम,
मेरे जिन साथियों ने सहानुभूति जतायी उनका शुक्रिया। जिन्होंने चुनाव के बाद मेरी नौकरी जाने को सही ठहराया उनका ज़्यादा शुक्रिया। मैं सच कह रहा हूं। मैंने जब दोनों तरह के कमेंट पढ़े तो दोनों कमेंट्स पर मेरा दिल सहमत हो रहा था। कुछ सज़ा मुझे ज़रूर मिलनी चाहिए थी। लेकिन कितनी? इस पर विचार हो सकता है। मेरा एक ही सवाल है। मुझे तो तीन महीने से बी कम समय में सज़ा मिल गई, जिन्होंने हज़ारों निर्दोषों का क़त्ल करवाया वो 25 साल भी खुले क्यों घूम रहे हैं। अब 13 जुलाई को टाइटलर केस में मेन विटनेस (मुख्य गवाह) (सुरेंद्र सिंह) भी दुनिया से चला गया। न्याय कब होगा??? हमारा कथित स्वतंत्र मीडिया सो क्यों गया है?
वीरेंद्र जी,
आपकी आलोचना सर माथे पर। लेकिन पत्रकारिता की मर्यादा आज किनके जूतों तले है उस पर भी कुछ कहें। मैंने ग़लत किया, लेकिन इसू (मुद्दा) सही था। लेकिन जो पैसा लेकर ख़बर छापें… जो अख़बार पैसे ना देकर रिपोर्टर को दलाली करने पर मज़बूर करें… जो अख़बार पैसा लेकर चुनाव हरवाएं और जितवाएं… जो लोग ख़बरों को डेलिबरेटली (जानबूझ कर) ग़लत ऐंगल (मोड़) देकर लिखें… जो अख़बारों के नाम पर ब्लैकमेलिंग करें… जो ईमानदारी से काम करने पर पत्रकार को ही सज़ा दें… जो अख़बार नेता के कहने पर पत्रकार को अख़बार से निकाल दें… जो अख़बार माफिया को भी विज्ञापन लेकर दूध का धुला बताएं … वो मुझसे कहीं बड़े अपराधी हैं। अगर आप इसी तरह सार्वजनिक तौर पर उन सबके ख़िलाफ़ भी बोलें तो मुझे आपकी आलोचना पर नाज होगा।
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virendra jain
July 15, 2009 at 4:05 pm
प्रिय ज़र्नैलजी
आपने बिलकुल सही बात की है किन्तु आपने अपनी बात कहने के लिए जिस सुविधा का दुरुपुयोग किया वह गोडसे की तरह की हरकत है जो हाथ जोड़ता हुआ हाथों में पिस्टल लेकर गया था . इंदिरा गाँधी से में असहमत था किन्तु बेअन्त सिंह द्वारा उनकी हत्या करने के तरीके से घोर असहमति है . जहाँ तक मेरी बात है लो कृपया मेरा ब्लॉग Nepathyleela.blogspot.com पढ़ कर लिखें में भी एक पत्रकार हूँ और व्यवस्था के खिलाफ ही निरंतर लिखता हूँ . दरअसल आपके तरीके से मुद्दे पर प्रकाश नहीं पढ़ा अपितु कांग्रेस को सहनिभुती मिली