
हिंदुस्तान (17 और 18 जुलाई)
शुरुआत करेंगे हिंदुस्तान के दूसरे फ़ैसले से। यानी आज के फ़ैसले से। आज हिंदुस्तान में फ्रंट पेज से मेट्रो पर सीएजी की रिपोर्ट गायब है। आपको वो रिपोर्ट आठवें पेज पर बहुत छोटी ख़बर के तौर पर मिलेगी। जिसमें आधी-अधूरी जानकारी दी गई है। कुछ दिन पहले मेट्रो हादसे के बाद ये पहली रिपोर्ट है जो बताती है कि मेट्रो में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। उस पर भी ये रिपोर्ट किसी निजी संस्था ने नहीं जारी की है। ये सीएजी की रिपोर्ट है जिसे काफी अहम माना जाता है। फिर उस रिपोर्ट को इस तरह कोने में दबा देना कहां तक सही है।
इस बड़े खुलासे का एक बुरा हश्र करने के बाद हिंदुस्तान ने दो और उल्लेखनीय काम किए हैं। उसके दूसरे पृष्ठ पर आपको विज्ञापन के थोड़े हिस्से को छोड़ कर मेट्रो की तारीफ में एक बड़ी रिपोर्ट मिलेगी। उसका हेडर है “ये मेट्रो होगी ज़रा हटके”। इस रिपोर्ट में मेट्रो की भविष्य की योजनाओं को बताया गया है और तारीफ के कसीदे पढ़े गए हैं। यही नहीं मेट्रो पर सीएजी की रिपोर्ट से दोगुना स्पेस मेट्रो से ही जुड़ी एक और ख़बर को दिया गया है। चौथे पन्ने पर मौजूद इस ख़बर की हेडिंग है – “जमरूदपुर: आना-जाना हुआ आसान”। ख़बर में बताया गया है कि मेट्रो हादसे की जगह से किस तरह मलबा हटा लिया गया है।
पूरी स्थिति पर गौर करने के बाद जो सवाल उठता है कि आखिर हिंदुस्तान के संपादक पाठकों को इस तरह धोखा क्यों दे रहे हैं? “धोखा” कहना इसलिए सही है कि क्योंकि अख़बार के लिए क़ीमत चुकाने के बाद एक पाठक को पूरी जानकारी मिलनी चाहिए। मेट्रो के कामकाज से जुड़ी इस अहम जानकारी को दबा कर हिंदुस्तान के संपादकों ने अपने पाठकों को छला है। उन्होंने विश्वासघात किया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मृणाल पांडे को ये लगता है कि अख़बार की लागत उसके मूल्य से कई गुना ज़्यादा है इसलिए पाठकों को उसके मूल्य के हिसाब की जानकारी दी जाएगी।
बीते एक हफ्ते से मेट्रो हादसे के बाद जो कुछ भी हिंदुस्तान में छपा है उससे आप मौटेतौर पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकते हैं –
((क)) मेट्रो के रूप में श्रीधरन और कांग्रेस सरकार ने जनता को ऐसा नायाब तोहफा दिया है कि जिसके लिए जनता को श्रीधरन और कांग्रेस दोनों की पूजा करनी चाहिए।
((ख)) – मेट्रो हादसा बेहद छोटी गलती की वजह से हुआ। ये सही है कि उसमें कुछ लोगों की जान गई, लेकिन विकास के लिए लोगों को कीमत तो चुकानी ही पड़ती है। उस छोटी गलती के लिए मेट्रो चीफ और मेट्रो के किसी अधिकारी का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। शीला सरकार पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए।
((ग))– मेट्रो के ख़िलाफ़ सीएजी जैसी संस्थाओं में काम करने वालों समेत जो कोई भी सवाल उठा रहा है वो मूर्ख है और उसके सवालों की ज़रा भी परवाह नहीं की जानी चाहिए।
अब क्या हिंदुस्तान के मालिकों और माननीय संपादक मृणाल पांडे से ये पूछा जा सकता है कि आखिर मेट्रो, श्रीधरन और शीला दीक्षित के प्रति इस अंधभक्ति की वजह क्या है? आखिर इससे “हिंदुस्तान” का क्या हित जुड़ा है?
अब बात दूसरे फ़ैसले पर। आज हिंदुस्तान की पहली ख़बर भारत-पाकिस्तान के साझा बयान पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सफाई से जुड़ी है। उसे काफी प्राथमिकता के साथ छापा गया है। लेकिन कल के पहले पन्ने पर साझा बयान से जुड़ी ख़बर गायब थी। अख़बार की पहली हेडलाइन थी “चहक उठा डीयू कैंपस”। अब हिंदुस्तान के संपादक से पूछा जाना चाहिए कि जब मुख्य ख़बर को आपने भीतर के पन्नों पर धकेल दिया था तो आज उसके फॉलोअप को फ्रंट पेज पर जगह देने का क्या मतलब बनता है?
वैसे तो भारत-पाकिस्तान साझा बयान पर हिंदी के ज़्यादातर अख़बारों का कवरेज बेतुका था। उनसे लाख दर्जे बेहतर कवरेज टीवी चैनलों का था। किसी भी अख़बार ने सरकार से जोर देकर ये नहीं पूछा था कि आखिर आतंकवाद उस बयान से गायब क्यों है? जब आप मुंबई हमलों के बाद से पाकिस्तान से बातचीत नहीं कर रहे थे तो अचानक आपका हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? कहीं अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की भारत यात्रा से इस परिवर्तन का कोई ताल्लुक तो नहीं? अगर हां तो यह कहने में क्या गलत है कि भारत की विदेश नीति अमेरिका तय कर रहा है?
यही नहीं हिंदी के तमाम अख़बारों से विपक्ष की तरफ से उठाए गए सवाल गायब थे। किसी ने भी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया को छापने की जहमत नहीं उठाई। एक दो जगहों पर एक-दो लाइन में उनकी प्रतिक्रिया निपटा दी गई। कहीं तो वो लाइनें भी नसीब नहीं हुईं। लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाला रवैया हिंदुस्तान का ही था। उसने तो पहले पन्ने से ख़बर ही गोल कर दी। कोने में टीजर के तौर पर दो लाइन लिख दीं। आखिर क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह भारत विदेश नीति अमेरिका तय कर रहा है ठीक उसी तरह अख़बारों की संपादकीय नीति मनमोहन सरकार तय कर रही है?
बी एस पाबला
July 18, 2009 at 9:07 pm
पत्रकारिता आजकल हो कहाँ रही है?
अविनाश वाचस्पति
July 19, 2009 at 6:46 pm
चलिए कुछ तो दे रहा है
हम तो समझ रहे थे
सिर्फ पैसे ले रहा है
और रद्दी दे रहा है
पर जो दे रहा है
वो तो महारद्दी है।
Rakesh Singh
July 23, 2009 at 10:04 pm
दैनिक हिन्दुस्तान के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात नहीं है | मालूम नहीं आपका दैनिक हिन्दुस्तान के प्रति क्या विचार है पर मैं तो इसे कांग्रेस का माउथ पिस ही मानता हूँ | सालों से ऐसा ही है अपना दैनिक हिंदुस्तान |