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नया कानून नहीं, ख़बरों का स्पेस बढ़ाना जरूरी है

 

अभी मोहल्लालाइव पर बड़ी बहस चल रही है। बहस कि ख़बरों में मिलावट के ख़िलाफ़ कानून बनाना चाहिए या नहीं? लेकिन इस बहस से पहले सवाल यह है कि ख़बरों में मिलावट हुई है इसका परीक्षण कैसे होगा? किसी भी ख़बर को असली और मिलावटी साबित करने के लिए किसी मानक का निर्माण कैसे होगा? या फिर ये कि क्या ऐसा कोई मानक बनाया भी जा सकता है – जो ख़बरों की शुद्धता प्रमाणित कर सके?

 

आप किसी भी मीडिया संस्थान में जाइए और देखिए कि बच्चों को आखिर पढ़ाया क्या जाता है? आप पाएंगे कि सभी मास्टर बच्चों से कहते हैं कि ख़बरों की प्रस्तुति ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) तरीके से होनी चाहिए। लेकिन व्यवहारिक तौर पर ऐसा कर पाना बेहद कठिन है। जाति, धर्म, क्षेत्र, लिंग, वर्ग, भाषा जैसे प्रभावों के अलावा हर व्यक्ति की निजी महत्वाकांक्षाएं और कुंठाएं होती हैं। शायद इन्हीं वजहों को ध्यान में रख कर कुछ विद्वान तो यहां तक दावा करते हैं कि ख़बर की प्रस्तुति हमेशा सब्जेक्टिव (व्यक्तिपरक) होती है वो ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) हो ही नहीं सकती। ये बात काफी हद तक सही लगती है। ऐसा नहीं होता तो एक ही ख़बर दो अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से पेश नहीं की जाती। किसी भी ख़बर के कुछ ख़ास तत्वों को छोड़ कर बाकी तत्व व्यक्तिपरक ही होते हैं। अब दिल्ली में मेट्रो हादसे को ही लीजिए। उसमें मारे गए और घायल हुए लोगों की संख्या जैसे कुछ वस्तुनिष्ठ तत्वों को छोड़ कर मीडिया में प्रस्तुत किए गए बाकी तत्व व्यक्तिपरक ही हैं। हिंदुस्तान जैसे अख़बार श्रीधरन को खुदा साबित करने में लगे हैं और उनके पक्ष में जोरदार वकालत कर रहे हैं। वहीं नई दुनिया जैसे कुछ अख़बार भी हैं जो कहते हैं कि दोषी चाहे कोई भी उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए। यहां मैं उनमें छपने वाले लेखों की बात नहीं कर रहा हूं। ये बात उनकी ख़बरों से निकल रही है।

 

ऐसे में हमें फिर से उसी मूल सवाल पर लौटना होगा। हमें खुद से सवाल करना होगा कि अनगिनत बोली, भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म से मिल कर बने भारतीय समाज में ख़बर की मौलिकता तय करने के लिए मानक बनाया जा सकता है या नहीं? गौर करने पर आप पाएंगे कि ऐसा कोई मानक नहीं बनाया जा सकता इसलिए मिलावट की जांच के लिए किसी कानून की ज़रूरत नहीं। लेकिन अगर किसी को लगता है कि ऐसा कोई न कोई कानून ज़रूर बनाया जाना चाहिए तो फिर उससे ये पूछना चाहिए कि जहां पहले से ही तय कानूनों का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगाम लगाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जा रहा हो वहां इस कानून का दुरुपयोग नहीं होगा इसकी गारंटी कैसे और कौन देगा?

 

इस पर चर्चा आगे बढ़ाने से पहले मैं कुछ उदाहरण देता हूं। इसी साल की शुरुआत में धर्म की आलोचना करने के अधिकार से जुड़ा एक लेख छापने पर स्टेट्समैन के संपादक और प्रकाशक को पश्चिम बंगाल में गिरफ़्तार किया गया इसलिए कि उस लेख के ख़िलाफ़ कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों ने कोलकाता में एक जोरदार प्रदर्शन किया था। दूसरा उदाहरण 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों से जुड़ा है। वहां पर अचानक एक पुलिस अधिकारी को लगा कि टेलीविजन चैनल की ख़बरों से इलाके में तनाव फैल सकता है। इसलिए अगले दिन यानी 27 नवंबर को उन्होंने पूरे इलाके में न्यूज़ चैनलों का प्रसारण रुकवा दिया ढूंढने पर ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएंगे, जहां पहले से तय कानूनों का फायदा उठा कर कभी कोई सरकार, कभी कोई बदमिजाज नेता तो कभी कोई कुपढ़ अधिकारी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर नकेल कसने लगता है।

 

लिहाजा, आज ज़रूरत मिलावट को रोकने के लिए किसी कानून की नहीं बल्कि मीडिया संस्थानों में ख़बरों का स्पेस बढ़ाने की है। ऐसा करने के लिए सबसे पहले विज्ञापनों के नाम पर सरकारी ब्लैकमेलिंग बंद होनी चाहिए। विज्ञापन नीति से ये दो क्लॉज हटाए जाने चाहिए।

पहला - अगर किसी मीडिया संस्थान का काम राज्यहित में नहीं है तो सभी शर्तें पूरी करने के बावजूद उसका विज्ञापन रोका जा सकता है।

दूसरा - अगर कोई मीडिया संस्थान सभी शर्तें पूरी नहीं करता है तो भी उसे किन्हीं खास परिस्थितियों में विज्ञापन दिया जा सकता है। 

 

इन दोनों क्लॉज को हटाने के साथ ये भी अनिवार्य बनाया जाए कि अगर किसी सरकार को लगता है कि किसी मीडिया संस्थान का काम राज्य हित में नहीं और उसका विज्ञापन रोकना चाहिए तो उसे सबसे पहले ये बात अदालत में साबित करनी होगी। साथ ही सभी राज्यों और केंद्र के जनसंपर्क कार्यालय को हर छह महीने पर ये ब्योरा सार्वजनिक करना चाहिए कि किस मीडिया संस्थान को किस मंत्रालय की तरफ से कितना विज्ञापन दिया गया। ताकि यह पता चल सके कि कहीं विज्ञापन जारी करने में कोई घपला तो नहीं हुआ है। मतलब कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन अख़बारों का सर्कुलेशन और न्यूज़ चैनलों की टीआरपी ज़्यादा है उन्हें कम विज्ञापन दिए गए हैं और जिनके कम उन्हें ज़्यादा। इन बदलावों के साथ ही अख़बार के कर्मचारियों पर सरकारी दबाव कम होगा और ख़बरों की गुणवत्ता में काफी सुधार होगा। सत्ता के ख़िलाफ़ जाने वाली ख़बरों को भी सही सम्मान मिलने लगेगा। उदाहरण के लिए आज के अख़बार ही देखिए। आप पाएंगे कि अमेरिकी दबावों में पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने के मनमोहन सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विपक्षी नेताओं के आरोप नहीं के बराबर छपे हैं। आखिर क्यों? कई बार तो सरकारें ऐसा करने के लिए दबाव डालती हैं और कई बार अख़बार भविष्य में किसी दबाव से बचने की कोशिश में ऐसा कर बैठते हैं। ये मैनुपुलेशन बंद होना चाहिए।

 

हाल के दिनों में ये मांग भी तेज हुई है कि मीडिया संस्थानों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना चाहिए। ये मांग बहुत हद तक जायज है। ख़बरों के सूत्र और स्रोत के मामले में नहीं लेकिन आर्थिक मामलों में ऐसा ज़रूर करना चाहिए। सबको पता चलना चाहिए कि किस मीडिया संस्थान को कहां से आमदनी हो रही है। अभी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए अख़बारों का भ्रष्ट मैनेजमेंट पत्रकारों पर भी अनैतिक तरीके से पैसे जुटाने के लिए दबाव बना देता है। पत्रकार संस्थान के लिए पैसे जुटाने के साथ खुद के लिए भी पैसे वसूलने लगते हैं। लेकिन जैसे ही आमदनी के स्रोत का खुलासा करना अनिवार्य होगा ऐसे अनैतिक हथकंडे बंद होने लगेंगे। पत्रकारों पर भी उस तरह का कोई दबाव नहीं पड़ेगा।

 

कुल मिला कर पहले से ही मौजूद कानूनों में, नीतियों में थोड़ा-बहुत सुधार करने से ख़बरों में मिलावट न केवल कम की जा सकती है बल्कि अख़बारों और न्यूज़ चैनलों में ख़बरों का स्पेस भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा तभी होगा जब सरकार और मीडिया संस्थान दोनों इच्छाशक्ति दिखाएंगे।

 

पूरी बहस पढ़ने के लिए मोहल्लालाइव पर जाएं

 

 

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