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जब नंगी तस्वीरों से काम चले तो ख़बर कौन पूछे?

हिंदी मीडिया की मौजूदा हालत के लिए आखिर कौन-कौन जिम्मेदार हैं? जनतंत्र पर इस सवाल से जुड़ी एक बहस चल रही है। हमने उदयन शर्मा की याद में हुए संवाद के बहाने इस मुद्दे पर कुछ सवाल उठाए थे। फिर प्रोफेसर आनंद कुमार का वो लेख छापा जिनमें कई सवालों के जवाब थे। अब उसी बहस को आगे बढ़ा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह। जनसत्ता से संजय कुमार सिंह का गहरा नाता रहा है। उन्होंने इस अख़बार को 1987-2002 तक पंद्रह साल दिये हैं। अब वो अनुवाद के जरिए अपनी जीविका चला रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में आर वेंकटरमन की पुस्तक “माइ प्रेसिडेंशियल इयर”, एन के सिंह की “द प्लेन ट्रूथ”, जे एन दीक्षित की “इंडो पाक रिलेशन” और लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा की “वीर कुंवर सिंह” समेत बीस से ज़्यादा चर्चित पुस्तकों का वो अनुवाद कर चुके हैं। आप जनतंत्र पर उनका ये लेख पढ़िए और हिंदी पत्रकारिता की दशा-दिशा पर चल रही बहस को आगे बढ़ाइए।

हिन्दी पत्रकारिता की दशा दिशा पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। एक समय हिन्दी के मानक कहे गए अखबार जनसत्ता का हवाला देकर बातें तो की जा सकती हैं पर उसका कोई मतलब नहीं है। अगर यह तथ्य है कि अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी अखबारों के मुकाबले अंग्रेजी वालों को ज्यादा महत्त्व देते रहे तो इसका मतलब है और ऐसा क्यों है यह समझना कोई मुश्किल नहीं है और इसके लिए अगर कोई दोषी है तो वो हम ही हैं। इनमें पत्रकार, संपादक, मालिक सलाहकार सब की भागीदारी है। हिन्दी और अंग्रेजी के अखबारों, पाठकों, पत्रकारों, मालिकानों में बहुत फर्क है और इनकी तुलना नहीं की जा सकती। हिन्दी और अंग्रेजी की जरूरतें अलग हैं तो संसाधन भी अलग हैं। इनके लिए काम करने वालों की पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान और क्षितिज में भी भारी अंतर है। इन सारी बातों का ख्याल रखकर ही हिन्दी का कोई अच्छा अखबार (या प्रकाशन) निकाला जा सकता है। इसमें ढेरों समस्याएं हैं और शायद इन्हीं समस्याओं से जूझने की मजबूरी में हिन्दी के कई अच्छे संपादक कम ही उम्र में मौत के शिकार हो गए। वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने एक इंटरव्यू में कहा भी है कि समीर जैन ने जो तनाव दिए उससे राजेन्द्र माथुर उबर नहीं पाए।

अब आइए हिन्दी के प्रति मालिकानों का नजरिया देखें। शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस समूह से ही करते हैं। यह संस्थान अंग्रेजी के अपने अखबार को चमकाने में जितना जोर लगा रहा है उससे बहुत कम परिश्रम / खर्च में जनसत्ता को बहुत बढ़िया और सफल अखबार बनाया जा सकता है। व्यावसायिक फायदे की बात को इस संस्थान में थी ही नहीं और सब जानते हैं कि एक्सप्रेस समूह के अखबार एक्सप्रेस बिल्डिंग और एक्सप्रेस टावर जैसी इमारतों के किराए से चलते थे। रामनाथ गोयनका के नहीं रहने के बाद संपत्ति के बंटवारे के कारण भले ही यह संभव न रह गया हो पर जब वे थे तो भी क्या वहां अंग्रेजी और हिन्दी को समान महत्त्व मिला हुआ था ? जनसत्ता में वर्षों किसी की तरक्की नहीं हुई। एक अच्छी भली टीम को बनाए रखने के लिए संस्थान की ओर से कुछ किया गया ऐसा अहसास कम से कम मुझे तो नहीं है। जनसत्ता बहुत बिकता था, खूब पढ़ा जाता था पर जब फैसिमाइल संस्करण निकालना संभव हुआ तो हिन्दी पट्टी से संस्करण हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स के शुरू हुए। दिल्ली से छपकर पटना या बिहार में जिस जनसत्ता की 30,000 प्रतियां बिकती थीं वह पटना से छपने वाले नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान के बाद भी क्या उतना ही बिकता रहता?

अब पाठकों की संख्या और विज्ञापनों पर आते हैं। देश में हिन्दी भाषी अधिक हैं तो हिन्दी के पाठक भी अधिक हैं। जरूरी नहीं है कि इससे हिन्दी के अखबारों को विज्ञापन भी उसी अनुपात में मिले। क्योंकि हिन्दी का पाठक – पाठक चाहे जितना अच्छा हो, ग्राहक अच्छा नहीं होता। अंटी में कुछ हो तो विज्ञापन देखकर कुछ खरीदेगा पर अभी यह स्थिति हिन्दी पढ़ने वालों की नहीं है। इसे पाठक, विज्ञापनदाता, संपादक, मालिक और बिक्री के साथ-साथ विज्ञापन वाले भी जानते हैं। इस कमी या कमजोरी की भरपाई के तरीके हो सकते हैं पर इस बारे में सोचने और उसे अमल में लाना जानलेवा हो जाए, तो कौन इस चक्कर में फंसे? वैसे भी इस तरह के काम एक व्यक्ति अपने बूते नहीं कर सकता है पूरी टीम करती है और हिन्दी में इस तरह के लाभ का फल टीम को देने का रिवाज मेरे ख्याल से कभी रहा ही नहीं। यह बात कुछ हद तक चैनलों पर भी लागू होती है।

हिंदी अख़बारों, चैनलों और पत्रकारों की अहमियत कम क्यों है ? इस बारे में मैं जनसत्ता के ही अपने साथी संजय सिन्हा का उल्लेख करूंगा जिसका कहना होता था कि हमारे समय में अंग्रेजी और हिन्दी स्कूल की फीस में जितना अंतर होता था आज वेतन में उसी अनुपात में अंतर है। यह सत्य भले ही कड़वा है पर है सच। इसके अलावा, किसी भी चीज की कीमत मांग और पूर्ति से तय होती है – हिन्दी पत्रकारों की उपलब्धता मांग ज्यादा होने के बावजूद क्या अंग्रेजी वालों के मुकाबले बहुत ज्यादा नहीं है ? जनसत्ता में तरक्की नहीं मिलने पर कई बार मन हुआ कि नौकरी छोड़ दूं पर कहीं कोई नौकरी नहीं थी। अनुवाद करके मैं शुरू से ही पैसे पूरे कमा लेता था, आखिरकार नौकरी छोड़ भी दी पर दूसरी आज तक नहीं मिली। जब जेब ही खाली रहेगी तो बाकी की अहमियत के क्या कहने। जहां तक हिन्दी की मौलिकता का सवाल है, अगर उसे दुरुस्त मान भी लिया जाए तो गुणवत्ता का क्या होगा। काम लायक जानकारी आपको अंग्रेजी अखबार से ही मिलती है। हिन्दी वाली खबर चाहे जितनी बड़ी हो काम की सूचना कई बार (और ज्यादतर) अंग्रेजी में ही मिलती है। आज हिंदी अनुवाद की भाषा है और हिंदी के ज़्यादातर अख़बार अनुवाद के भरोसे ही चलते हैं। दुख की बात यह है कि ज्यादातर अनुवाद भी दो कौड़ी के ही होते हैं।

जनतंत्र के लेख में देश के सबसे “सम्मानित” मीडिया हाउस का उदाहरण दिया गया है। पर समस्या यह है कि कई बार अंग्रेजी के संवाददाता की अच्छी खबर का घटिया अनुवाद भी हिन्दी के संवाददाता की अच्छी खबर से बेहतर होता है। इसके कई उदाहरण मिल जाएंगे और अपवाद हर जगह होते हैं। पर सच यही है। गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी का संवाददाता रखने के लिए ऐसे व्यक्ति की तलाश करनी होगी जो हिन्दी के साथ संबंधित राज्य की भाषा भी जानता हो और वहां रहने का इच्छुक हो। यह मुश्किल है। इसके मुकाबले सभी गैर हिन्दी क्षेत्रों में अंग्रेजी के रिपोर्टर की खबर का डेस्क पर अच्छा अनुवाद हो सकता है। मालिकानों को यह सस्ता पड़ता है। यह स्थिति हिन्दी के खिलाफ है, पर है। तो इसे मानना ही पड़ेगा। इसी तरह, जनतंत्र ने अपने लेख में लिखा है कि संबंधित टीवी संस्थान में अंग्रेजी के पत्रकार बहुत ज़्यादा हैं। लेकिन गाज उन पर नहीं गिरी, निकाले गए हिंदी के पत्रकार। इसका कारण भी यही नजर आता है कि अंग्रेजी के पत्रकार टूटी-फूटी ही सही, हिन्दी में काम कर लेंगे, दर्शक, पाठक, श्रोता उन्हें झेल भी लेंगे पर हिन्दी का पत्रकार अंग्रेजी में काम करें – यह किसे मंजूर होगा। यह गलत है। ऐसा नहीं होना चाहिए पर स्थितियां हमारे खिलाफ हैं, हल हमें ही ढूंढ़ना होगा।

यह सही है कि देश में सबसे ज्यादा हिंदी अख़बारों का सर्कुलेशन होने के बाद भी हिंदी में एक भी मौलिक समाचार एजेंसी नहीं है। भाषा और वार्ता दोनों एजेंसियां अनुवाद के सहारे चलती हैं और इनका अनुवाद ऐसा होता है कि ज्यादातर हिन्दी के अखबार भी दोनों एजेंसियों की सेवा नहीं लेते हैं। एक की अंग्रेजी और दूसरे की हिन्दी की सेवा लेकर काम चलाते हैं। मालिकान अनुवाद की एजेंसी चला रहे हैं और ग्राहक को उसकी सेवा पसंद नहीं, फिर भी एजेंसी चल रही है – लेकिन कब तक चलती रहेगी ? आपने कभी सुना कि हिन्दी वालों ने कभी कहा हो कि हिन्दी की दोनों समाचार एजेंसियां (अनुवाद वाली ही) अच्छी नहीं हैं, उपयुक्त या पर्याप्त सेवा नहीं दे पाती हैं। इन्हें ठीक करने की जरूरत है। हिन्दी वाले ऐसा नहीं करके खुद पीटीआई की खबरों का अनुवाद कराएंगे जो भाषा पहले से कर रही है। भाषा का अनुवाद कैसे बेहतर या काम लायक हो यह हिन्दी अखबार वाले नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा ? और फिर अगर कभी (भगवान न करे) भाषा या वार्ता को बंद कर दिया जाए तो हम रोएंगे कि हिन्दी के पत्रकार बेरोजगार हो गए।

जहां तक पी साईनाथ जैसे पत्रकार बनाने की बात है तो हिन्दी के अखबारों में गिनती के तो संवाददाता या पत्रकार होते हैं – पीर, बावर्ची, भिश्ती वही हों तो पी साईनाथ कैसे और कहां से बनेंगे? आपका कहना बिल्कुल सही है कि हम हिंदी … हिंदी करते रहे लेकिन हमने हिंदी समाज की ज़रूरतों को शिद्दत से उठाने की कोशिश कभी नहीं की। कपिल सिब्बल का उदाहरण आपने दिया ही है, मैं एक और उदाहरण देता हूं। हिन्दी पट्टी के कितने ही छात्र हर साल प्रतियोगिता परीक्षा में बैठते हैं, तैयारी करते हैं – अंग्रेजी का द हिन्दू पढ़ कर। अंग्रेजी छात्रों का और अंग्रेजी जानने समझने वाले हिन्दी भाषी छात्रों का भी यही प्रिय अखबार है। क्या हिन्दी का कोई अखबार ऐसे पाठकों की जरूरत पूरी करने की कोशिश कर रहा है ? नहीं न ? क्योंकि इसमें परिश्रम चाहिए, योग्य लोगों की सेवा लेनी होगी। तो इस पचड़े में क्यों पड़ें जब नंगी तस्वीरों और भूत बाबा आदि की खबरों से काम चल ही जाता है। रही सही कसर चुनाव में पैसे लेकर खबर छापने के खुलासे ने पूरी कर दी है। कुल मिलाकर हालात बहुत बुरे हैं। हाल फिलहाल सुधरने वाले नहीं लगते और इसके बारे में हिन्दी वालों को ही सोचना होगा।

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4 Responses to जब नंगी तस्वीरों से काम चले तो ख़बर कौन पूछे?

  1. मुझे लगता है सिर्फ सोचने से
    काम नहीं चलने वाला
    और करने वाला कोई
    रहा नहीं है।

  2. Archana Reply

    July 21, 2009 at 5:54 pm

    nangi tasveeren agar logon ka manoranjan hai to sachchi khabarein unki jarirat, log sachchi khabar jaanana chahte hai magar unke paas option nahin hai.

  3. राकेश सिंह Reply

    July 23, 2009 at 10:41 pm

    काफी अच्छा विश्लेसन किया है आपने | हिंदी अखबार को अपनी गुणवत्ता का कोई ख्याल नहीं है | दूसरी बात ये भी है की सारे प्रतिभाशाली लोग हिंदी से दूर रहते हैं | मैं अपने एक मित्र ‘कमलेश सिंह’ जी जिनकी मातृभाषा ही हिंदी है पर वो कुछ दिनों पहले तक अंग्रेजी मैं ही जामे थे |

    जब तक अच्छे लोग हिंदी से नहीं जुडेंगे तब तक बात नहीं बनेगी | हिंदी अखबार को आधुनिकता और परंपरा के बिच सही सामंजस्य स्तापित करना पडेगा | ज्यादातर हिंदी के अखबार किसी पार्टी का प्रचार मात्र बन कर रह गए हैं | दैनिक हिंदुस्तान को ले लीजिये, एक अँधा भी अखबार पढ़ कर समझ जाएगा की ये कांग्रेस को सपोर्ट करता है | आउटलुक हिंदी को लीजिये अलोक मेहता साहब बस एक ही चीज रटते रहते हैं और वो है संघ विरोध | संघ मैं अच्छाई और बुराई दोनों है, एक अच्छे पत्रकार को हमेसा अपनी विचारधारा को पत्रकारिता से अलग रखनी चाहिए | पत्रकारिता की अपनी जरुरत होती है उसपर अपनी विचारधारा थोपना ठीक नहीं | वैसे अंग्रेजी मैं भी इन दिनों ऐसा ही कुछ हो रहा है पर एक अंतर है वहां पे विषय का विस्तार दिखता है और विचारों के हिंदी की तरह नहीं थोपी जाती |

  4. राकेश सिंह Reply

    July 23, 2009 at 10:47 pm

    एक बात बताना भूल ही गया की इन दिनों हिंदी ब्लॉग जगत पे कई ऐसे लेख पढ़े जो हिंदी से कहीं अच्छे थे, हिंदी के अखबार वाले हिंदी ब्लॉग जगत का फायदा क्यों नहीं उठाते ?

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