भविष्य की पत्रकारिता का माध्यम क्या होगा? अख़बार, टेलीविजन या फिर इंटरनेट। भारतीय संदर्भ में फिलहाल यह कहा जा सकता है कि अगले 40-50 साल तक तो ये तीनों ही माध्यम बने रहेंगे। बस अंतर इतना आएगा कि कुछ साल बाद अख़बारों का फैलाव कम होगा और इंटरनेट की पहुंच में विस्तार होगा। पहली दुनिया के कुछ देशों में ऐसा होने लगा है और तीसरी दुनिया के देशों में भी ऐसा ही कुछ होगा। फिर वो वक़्त भी आएगा जब इंटरनेट पत्रकारिता का सबसे ताक़तर माध्यम होगा। ये करीब-करीब तय है। इसमें वक़्त भले ही लग जाए, लेकिन इस बदलाव को रोका नहीं जा सकता।
अगर इंटरनेट भविष्य की पत्रकारिता का माध्यम है तो इस माध्यम में जितनी उम्मीद है उतनी ही निराशा भी। उदाहरण के लिए आप हिंदी पत्रकारिता के दो बड़े ब्रांड देखिए। नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर। ये दोनों ब्रांड काफी लोकप्रिय हैं। लेकिन इनकी लोकप्रियता सार्थक काम की वजह से नहीं बल्कि पोर्न की वजह से है। अगर आप कभी नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर जाएं तो वहां पर आपको दायीं तरफ सुपरहिट ख़बरों की लिस्ट मिलेगी। वहां क्लिक करने पर आप 24 घंटे, एक हफ़्ते और एक महीने में सबसे ज़्यादा पढ़ी गई ख़बरों की सूची देख सकते हैं। एक महीने की सूची पर क्लिक करने के बाद आप पाएंगे कि वहां पर नब्बे फ़ीसदी ख़बरें सेक्स से जुड़ी हैं।
इसी को भुनाने के लिए नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर बायीं तरफ ऐसी कई श्रेणियां बनाई गई हैं जिनमें सिर्फ़ ऐसी ही ख़बरें मिलती हैं। वेब तड़का मार के… फोटो धमाल… मस्त ख़बरें … और घर परिवार। इन चारों कॉलम में तीन-तीन यानी कुल मिला कर 12 मसाले परोसे जाते हैं। मसाले इसलिए कि उनमें से किसी को भी ख़बर नहीं कहा जा सकता। मसलन घर परिवार श्रेणी में आज सबसे ऊपर है “बुआ की लड़की से हो गया प्यार”। “वेब तड़का मार के” की श्रेणी में सबसे पहले है “सुष्मिता सेन… सविता भाभी”।
यही हाल दैनिक भास्कर का है। वहां भी ऐसे मसालों के लिए दो कॉलम खास तौर पर चलाए जाते हैं। मिर्च मसाला और ज़रा हट के। इन दोनों कॉलम में ऐसी ही घटनाओं और किस्सों का ब्योरा होता है जिन्हें आप अश्लील कह सकते हैं। जैसे कैथोलिक फादर ने दी सेक्स टिप्स… बर्लुस्कोनी की पार्टी में न्यूड गर्ल्स… सबसे रचनात्मक अश्लील विज्ञापन। हेल्थ-साइन्स कॉलम में भी ज़्यादातर ऐसी ही ख़बरें रहती हैं।
ऐसे में कहा जा सकता है कि वर्तमान में पत्रकारिता के जो दोनों माध्यम हैं – अख़बार और टेलीविजन वो हमें थोड़ा परेशान जरूर कर रहे हैं लेकिन भविष्य में पत्रकारिता का जो माध्यम है वो डरा रहा है। वो बता रहा है कि अगर आज कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में पत्रकारिता का स्तर ख़तरनाक तरीके से गिरेगा। उस हद तक गिरेगा जिस हद तक हम और आप सोच भी नहीं सकते। इसलिए ज़रूरी है कि मीडिया पर हो रही तमाम बहस में अभी से वेब पत्रकारिता को भी शामिल किया जाए। चाहे वो बहस ख़बर पर हो या फिर बहस पैसे जुटाने के लिए अनैतिक हथकंडों पर – क्योंकि पोर्न को ख़बर के तौर पर पेश करने का ताल्लुक ख़बर से भी है और पैसे जुटाने के लिए अनैतिक हथकंडों से भी।
कुछ समय पहले तक मीडिया पर होने वाली बहस को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांट दिया जाता था। अख़बार और टेलीविजन। अख़बार वाले न्यूज़ चैनलों पर सेक्स और क्राइम परोसने का आरोप लगाते। उनकी आलोचना करते थे और खुद को बेहतर साबित करने में जुटे रहते थे। कहते कि न्यूज़ चैनलों को आत्ममंथन करना चाहिए। न्यूज़ चैनलों पर नकेल कसनी चाहिए। टीवी पत्रकार कहते थे कि हमें दोष देने से पहले अख़बारों को अपने भीतर झांकना चाहिए। हर रोज कई-कई पन्ने नंगी तस्वीरों से रंग देते हैं और उसके बाद नैतिकता की दलील देते हैं। दोनों माध्यमों की इस लड़ाई में सामूहिक तौर पर मीडिया की गिरती साख पर चर्चा नहीं हो सकी।
लेकिन इस चुनाव में जिस पैमाने पर ख़बरों का सौदा हुआ, नेताओं की दलाली हुई – उससे प्रिंट और टीवी के बीच की दूरी मिट गई। या यूं कहें कि टीवी की तुलना में प्रिंट ज़्यादा नंगा हो गया। अब दोनों ही माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को यह हक़ नहीं रहा कि वो अपने बचाव में झूठा ही सही कोई नैतिक आधार गढ़ सकें। उन्हें इसका अहसास है। यही वजह है कि हाल के दिनों में कई मंचों पर टेलीविजन और प्रिंट दोनों ही माध्यमों के लोग जमा हुए और मीडिया की साख बचाने के लिए एक नई बहस शुरू हुई। इस बहस का नतीजा निकलेगा या नहीं – ये कहना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर है कि ये बहस पहले से कहीं ज़्यादा व्यापक है। पहली बार छटपटाहट दोनों ही तरफ़ नज़र आ रही है।
लेकिन इस बहस से मीडिया का एक धड़ा अभी दूर है। इसकी एक वजह ये है कि उसे अभी उतनी मान्यता नहीं मिली है जितनी प्रिंट और टीवी को मिली हुई है। दूसरी वजह कि टीवी और प्रिंट के लोगों ने इस बहस में वेब के पत्रकारों को शामिल नहीं किया है। टीवी और प्रिंट के बहुत से पत्रकार को वेब पोर्टल में काम करने वालों को पत्रकार ही नहीं मानते। कायदे से उन्हें थोड़ा बड़ा दिल दिखाना चाहिए। उन्हें इस बहस में वेब पत्रकारों को भी शामिल करना चाहिए। ये सही है कि ये धड़ा बालपन में है और उसे जवान होने में वक़्त लगेगा। लेकिन यह भी सही है कि भविष्य का यह माध्यम वर्तमान के दोनों माध्यमों से ज़्यादा सशक्त है। चूंकि इसमें दोनों ही माध्यमों (प्रिंट और टीवी) की ताकत का समावेश है इसलिए जब इसका पूरी तरह विस्तार हो जाएगा तो इसकी पहुंच टीवी और अख़बार दोनों से कहीं ज़्यादा होगी। ये घर, दफ़्तर, स्कूल, गली-नुक्कड़ और चौराहा… सभी जगह मौजूद होगा। मोबाइल के रूप में हमेशा आपके साथ होगा।
यहां पर कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि इंटरनेट पर पूरी तरह सेंसर लगाना मुमकिन नहीं। ये सबको मालूम है कि इंटरनेट पर अगर किसी को पोर्न देखना है तो उसे रोका नहीं जा सकता। इसलिए यहां बात सेंसरशिप की हो ही नहीं रही। प्रिंट से लेकर टेलीविजन दोनों ही माध्यमों में अलग-अलग उपभोक्ताओं के लिए अलग-अलग पत्रिकाएं और चैनल हैं। जिन्हें खेल से लगाव है, वो खेल पत्रिका खरीदते हैं और स्पोर्ट्स चैनल देखते हैं। जिन्हें सिनेमा से लगाव है तो स्टार डस्ट और फिल्म फेयर मंगाने के साथ फिल्मी चैनल देखते हैं। वो सभी पत्रिकाएं और चैनल समाचार की श्रेणी में नहीं आते।
उसी तरह इंटरनेट पर मौजूद करोड़ों वेबपोर्टल में कुछ ही मीडिया संस्थान की श्रेणी में आते हैं। उनमें से ज़्यादातर को मीडिया संस्थानों ने ही शुरू किया है। अख़बार और न्यूज़ चैनलों के सभी ब्रांड आपको वेब पर भी मिलेंगे। आज नहीं तो कल उन्हें भी वो तमाम सुविधाएं मिलेंगी जो प्रिंट और टीवी के पत्रकारों को मिलती हैं। इसलिए उन पर भी मीडिया के लिए बने सभी कायदे-कानून लागू होने चाहिए। उनसे भी ये उम्मीद की जाएगी कि वो सभी मर्यादाओं का पालन करें।
ऐसे में न्यूज़ से जुड़े वेबसाइट के संपादकों से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या पोर्न को ख़बर के तौर पर परोसा जा सकता है? क्या किसी मीडिया संस्थान को यह हक़ दिया जा सकता है कि वो अधिक विज्ञापन जुटाने के लिए ख़बरों से खिलवाड़ करे? और जिसे यह छूट चाहिए तो फिर उसे मीडिया संस्थान की कैटेगरी में क्यों रखा जाए? ये वही सवाल हैं जिनसे आज टेलीविजन और प्रिंट मीडिया दोनों जूझ रहे है। न्यूज़ चैनलों ने तो सेल्फ रेगुलेशन के लिए न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के तौर पर एक मंच भी तैयार किया है। उसे कुछ अधिकार भी दिए गए हैं। हालांकि अभी यह सक्रिय औऱ सशक्त भूमिका नहीं निभा पा रहा। फ़ैसला ख़िलाफ़ जाने पर न्यूज़ चैनल अपने ही मंच को डराने-धमकाने लगते हैं। अभी ये हाथी के नकली दांत की तरह है। लेकिन बहस तेज होने के साथ इस पर कुछ ठोस कदम उठाने का दवाब बढ़ेगा। तो क्या ऐसा ही कोई मंच मीडिया के वेब पोर्टलों पर नज़र रखने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए? मुद्दा बड़ा है और इस पर अभी से बहस होनी चाहिए। अगर इस बहुत ही ताक़तवर माध्यम को अभी से नहीं साधा गया तो इसमें नुकसान सबका है।
babban
July 21, 2009 at 12:39 am
absolutely true. u hv raised very basic & fundamental questions. may god give them some sense!