सविता भाभी। जी हां… हाल ही में सविता भाभी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ये एक पोर्न कार्टून साइट है, जिसके चरित्र का नाम है सविता भाभी। कुछ ही दिन में ये वेबसाइट भारत में काफी लोकप्रिय हो गई थी। इतनी कि दुनिया के सबसे अधिक “नैतिक राष्ट्र” में नैतिकता का सवाल उठ खड़ा हुआ। इंटरनेट पर ऐसी हज़ारों पोर्न वेबसाइट भारत में धड़ल्ले से खुलती हैं। साइबर कैफे में लोग घंटों ऐसी वेबसाइटों पर चिपके रहते हैं। लेकिन नैतिकता का सवाल सिर्फ़ और सिर्फ़ सविता भाभी नाम की साइट पर उठा। सरकार भी तुरंत हरकत में आई और उसने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। अब ये साइट भारत में नहीं खुलती है।
ये एक ऐसी वेबसाइट थी, जो खुलेआम दावा करती थी कि वो पोर्न कार्टून वेबसाइट है। लेकिन यहां तो कई अख़बार अपने पन्नों पर और अपनी वेबसाइट पर वैसा ही अश्लील मसाला देते हैं, अश्लील तस्वीरें छापते हैं, फिर भी सम्मानित बने हुए हैं। जब एक पोर्न वेबसाइट से भारतीय सरकार और समाज की नैतिकता आहत हो रही थी तो फिर मीडिया संस्थानों की इन वेबसाइट पर सब चुप क्यों हैं? क्यों नहीं सवाल उठाया जाता कि उन वेबसाइट्स को तुरंत बंद कर दिया जाए? उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। अगर इतना करने की हिम्मत सरकार में नहीं है तो कम से कम इन्हें मीडिया संस्थान की श्रेणी से बाहर तो किया ही जाना चाहिए। उनसे कह दिया जाना चाहिए कि अगर आपको यह काम करना है को उसे अख़बार के बैनर से बाहर कीजिए। अलग से कंपनी बनाइए। वेबसाइट को उसके तहत रजिस्टर करके जो मन चाहे “धंधा” कीजिए।
नवभारत टाइम्स की साइट भी ऐसी ही एक साइट है। वहां एक जगह पर कई हीरोइनों की अर्धनग्न तस्वीरें छपी हैं और उसके ऊपर लिखा है “संपादक” की पसंद। साइट पर एक कॉलम दिया हुआ है… यह है फ्रेश माल– इस कॉलम में नई हीरोइनों की तस्वीरें मिलेंगी। उसी तरह देशी-विदेशी मॉडल और सितारों के नाम पर कई कॉलम बनाए गए हैं। ज़्यादातर में आधी नंगी तस्वीरें डाली गई हैं।
यही हाल दैनिक भास्कर का भी है। हालांकि तुलनात्मक नज़रिये से वहां पर छितरई कम है, लेकिन अश्लील तस्वीरें और साहित्य वहां भी हैं। जैसे हॉलीवुड कॉलम में एक अश्लील तस्वीर के साथ ख़बर चिपकी होगी “केइरा ने भी दिया न्यूड सीन” या फिर “बिग ब्रदर में कमाल ढाती सोफी की ब्रेस्ट।”
बात सिर्फ तस्वीरों तक ही सीमित नहीं है। वहां पर आपको अश्लील साहित्य भी मिलेगा, जिन्हें ख़बरों के तौर पर पेश किया गया है। देश और दुनिया में अनैतिक संबंधों से जुड़ी जितने तरह ख़बरें हैं वो यहां पर खास ध्यान देकर लिखी गई हैं। अमेरिका या फिर ऑस्ट्रेलिया या फिर अफ्रीका – दुनिया के किसी कोने में कोई सेलिब्रिटी कपड़े उतारता है तो यहां आपको उसका विवरण मिलेगा। हास्य और व्यंग कॉलम में अश्लील और भद्दे चुटकले मिलेंगे। रिश्ते-नाते कॉलम में अवैध संबंधों की दास्तान मिलेंगी। हेल्थ कॉलम में मर्दानगी बढ़ाने के तमाम उपाय होंगे।
आगे बढ़ने से पहले नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर पिछले एक महीने में सबसे अधिक पढ़ी गईं खबरों की सूची पर एक नज़र डाल लेते हैं। ये कुछ उदाहरण हैं। लगता है कि इन वेबसाइट्स के संपादकों का एक ही काम है। वो दिन भर बैठ कर दुनिया भर की साइट और एजेंसियों पर छपी ऐसी तमाम कूड़ा ख़बरों को बटोरते रहते होंगे। फिर अपने किसी प्यादे को बुला कर आदेश देते होंगे कि उसे जितना चटखारा ले कर लिख सके लिखे। जितना छौंक लगा सके लगाए। अब ये किस किस्म की पत्रकारिता है, ये या तो ऐसे “संपादक” महोदय बता सकते हैं या फिर उनके खुदा।
अभी कुछ दिन पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने दावा किया कि उसकी वेबसाइट टाइम्स ऑफ इंडिया ऑनलाइन दुनिया की नंबर वन समाचार साइट हो गई है। बहुत खूब। बहुत बड़ी कामयाबी है। उसके 65 फ़ीसदी ग्राहक बाहरी देशों में भी हैं जो उसे एक बड़ा ग्लोबल ब्रांड बनाते हैं। समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर विनीत जैन इस कामयाबी पर इतरा भी रहे हैं। घूम-घूम कर बता रहे हैं। वेबसाइट और अख़बार में ख़बरें छापी जा रही हैं। लेकिन इसमें इतराने जैसी कोई बात नहीं। क्योंकि टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट जितना कूड़ा परोसती है उतना कूड़ा किसी और अख़बार की वेबसाइट नहीं परोसती। यकीन नहीं हो तो आप उसके सबसे अधिक पढ़े गए लेखों (मोस्ट रेड आर्टिकल्स) की सूची पर नज़र डालने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक कीजिए।
24 घंटे में सबसे अधिक पढ़ी गईं ख़बरें
48 घंटे में सबसे अधिक पढ़ी गईं ख़बरें
ये सूची बताती है कि टाइम्स ऑफ इंडिया का दावा कितना खोखला है। हर रोज उसकी साइट पर पहुंचने वालों में बड़ा तबका उनका है जो ख़बरों के रूप में अश्लील साहित्य पढ़ना चाहते हैं। अब वो चाहे तो इस आधार पर हिलेरी क्लिंटन के साथ अपने अख़बार की फोटो खिचवा कर ब्रांडिंग करता रहे। लेकिन सच को झुठलाया नहीं जा सकता।
दुनिया भर में इंडिया टाइम्स डॉट काम की रैंकिंग 180-200 के बीच रहती है। इस रैंकिंग में सबसे अधिक – 47.3 फीसदी हिस्सेदारी टाइम्स ऑफ इंडिया की है। अब आप जान ही चुके हैं कि वहां सबसे ज़्यादा क्या पढ़ा जाता है। उसके बाद 10.7 फीसदी हिस्सेदारी फोटोगैलरी की है – जिसमें अर्धनग्न और नग्न तस्वीरों की भरमार है। नवभारत टाइम्स का हिस्सा सिर्फ़ 3.6 फ़ीसदी है। फिर भी वहां क्या बेचा जा रहा है ये ब्योरा हम पहले ही दे चुके हैं। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या बेच कर विनीत जैन खुश हो रहे हैं?
साफ़ शब्दों में कहें तो आज कई बड़े अख़बारों की वेबसाइट की स्थिति उन पुराने मठों जैसी है, जहां धर्म-कर्म की आड़ में सारे धतकर्म होते थे। नैतिकता के नाम पर सबसे ज़्यादा गंदगी फैली रहती थी। बदलाव की आंधी में बहुत सारे पुराने मठ तो ध्वस्त हो गए, लेकिन ये नए मठ पैदा हो गए हैं। और इन मठों के मठाधीश पहले से कहीं ज़्यादा धूर्त हैं… पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं।
बी एस पाबला
July 21, 2009 at 11:41 pm
सच ही है कि बदलाव की आंधी में बहुत सारे पुराने मठ तो ध्वस्त हो गए। इन मठों के मठाधीश पहले से कहीं ज़्यादा धूर्त हैं… पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं।
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Australian-born Indian
July 30, 2009 at 4:59 pm
सरकार पोर्न् वेबसाइटों पर प्रतिबंधी लगाने की जि़म्मेदारी ही नहीं है. अगर किसी व्यक्ती को पोर्न देखना है तो वह अपना ही फै़सला होता है. यह एक पर्सनल चीज़ है और किसी और को नुक्सान नहीं करता है. यह “गणतंत्रा” का मतलब है. शायद क्योंकी मैंने अपनी पुरी जिं़दागी औस्ट्रेलीया में गुज़रा मैं ऐसा सोचता हूं. सविता भाभी जिं़दाबाद !!!!!!