
विचित्र मणि, वरिष्ठ पत्रकार
इसी साल 24 अप्रैल को डॉक्टर कलाम सरकारी यात्रा पर अमेरिका जा रहे थे। उन्हें इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर कॉन्टीनेंटल एयरलाइंस की फ्लाइट संख्या सीओ-083 से न्यूयॉर्क जाना था। तब उस एयरलाइन कंपनी के कर्मचारियों ने सुरक्षा जांच के नाम पर डॉक्टर कलाम की जेब में रखा पर्स और उनका मोबाइल ही नहीं उतरवाया, बल्कि जूते तक खोलवा लिये। कायदे से भारत का पूर्व राष्ट्रपति उस वीआईपी श्रेणी में आता है, जहां उसे ऐसे शक और जलालत की नजर से नहीं देखा जा सकता। लेकिन अमेरिकियों ने किसी दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष या पूर्व राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान करना कब सीखा?
लेकिन हमने ही कब सीखा? जब भी भारतीय मान-अपमान की उलझन में फंसे तो उसे अपने महान राष्ट्रपिता को जरूर याद कर लेना चाहिए। कलाम के मामले में भी गांधी जी की जिंदगी से जुड़ी एक शानदार घटना को याद किया जा सकता है। गोलमेज सम्मेलन के लिए अपने महात्मा लंदन गये हुए थे। वहां पर एक शाम उनकी मीटिंग ब्रिटेन की महारानी के साथ तय हुई और जगह राजमहल यानी बकिंघम पैलेस। बकिंघम पैलेस में तब तीन मुख्य द्वार होते थे। सबसे पहले पड़ने वाले दरवाजे से सामान्य प्रतिनिधियों को भीतर ले जाया जाता था। दूसरे दरवाजे से छोटे मोटे देशों के राष्ट्राध्यक्षों की एंट्री होती थी, जबकि तीसरे और आखिरी दरवाजा दुनिया के ताकतवर राष्ट्राध्यक्षों और ब्रिटिश राज परंपरा की नजरों में अति महत्वपूर्ण लोगों के लिए ही खोला जाता था। गांधी जी को एक कार से बकिंघम पैलेस ले जाया गया। ड्राइवर ने सोचा कि एक गुलाम देश का अधनंगा व्यक्ति तो पहले ही गेट से भीतर जाएगा। इसलिए उसने पहले गेट पर ही गाड़ी रोक दी। गांधी जी ने पूछा कि यहां क्यों रोका तो ड्राइवर ने दरवाजों का व्याकरण समझा दिया। तब गांधी जी ने थोड़ी तेजी और गंभीरता से कहा- शोफर, ड्राइव ऑन एंड मूव टू थर्ड एंड लास्ट गेट। ड्राइवर पर गांधी जी के कहे का ऐसा असर हुआ कि वो धड़धड़ाते हुए सीधे आखिरी गेट पर जा पहुंचा। वहां पहुंचकर गांधी जी ने ब्रिटेन की महारानी को समझाया कि 25 करोड़ आबादी वाले भारत के प्रतिनिधि से कैसे मिला जाता है।
गांधी जी तो समाज के आखिरी आदमी के लिए जीते थे। उस आखिरी आदमी के मुहल्ले में वो सबसे आखिरी आदमी बनकर रहते भी थे। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के सामने जब भी हिंदुस्तानियों के वजूद का सवाल आया तो गांधी जी सम्मान का सीना तानकर खड़े हो गये। क्या अपने महात्मा की जिंदगी से हमें यह संदेश नहीं मिलता कि व्यक्तिगत सम्मान से भी ज्यादा बड़ा राष्ट्रीय सम्मान होता है और उस सम्मान के लिए जीया और मरा जा सकता है।
काका कलाम के प्रति किसी किस्म का अनादर भाव प्रकट किये बिना यह कहा जा सकता है कि विरोध में वे अमेरिका नहीं जाते तो ज्यादा अच्छा रहता। यही बात जॉर्ज फर्नांडीस के लिए भी लागू होती है, जिनकी अमेरिका में जामा तलाशी हुई थी। और हां, जिस अमेरिका को हमारे यहां स्वर्ग से भी बड़ा दर्जा दे दिया गया है, उस अमेरिका में गांधी जी कभी गये ही नहीं। ऐसा नहीं है कि उन्हें कभी बुलावा नहीं आया, लेकिन उन्होंने ये कहकर अमेरिका जाने से मना कर दिया कि जिस देश में डॉलर को देवता बनाकर पूजा जाता है, वहां गांधी नहीं जाएगा। गांधी के नाम का जाप करने वालों! गांधी के उस बुलंद आत्मसम्मान को कब तक अमेरिकी पैरों के नीचे कुचलते हुए देखते रहोगे?
Dr Durgaprasad Agrawal
July 24, 2009 at 2:45 am
डॉ कलाम की सुरक्षा जांच पर जो चिल्ल-पों हमारे देश में मची हुई है, मुझे वह बेमानी लगती है. यह कहना कि कलाम भले आदमी हैं, या बड़े वैज्ञानिक हैं, यहां अप्रासंगिक है. महत्व इतना ही है कि एक खास प्रोटोकोल के तहत उन्हें सुरक्षा जांच से मुक्त रखा गया है, और उक्त एयरलाइंस को भी इस प्रोटोकोल का सम्मान करना चाहिये था.
लेकिन जो बात मुझे ज़्यादा महत्वपूर्ण लगती है वह यह कि क्या सुरक्षा जांच एक जलालत है, जैसा आपने लिखा है? अगर वाकई यह एक जलालत है तो इससे मुक्ति चन्द वी आई पी लोगों को ही क्यों मिलनी चाहिये? हम लोग जब भी हवाई यात्रा करतेहैं, इन तमाम सुरक्षा जांचों से गुज़रते हैं, और हमें इसमें कोई अपमान नहीं लगता. यह लगभग वैसी ही बात है कि जब आप म6दिर जाते हैं तो अपने जूते बाहर उतार कर जाते हैं. उसमें किसी का अपमान नहीं होता. सुरक्षा जांच को भी इसी तरह लिया जाना चाहिये, और आवज़ तो इस बात की उठाई जानी चहिये कि इससे हरेक को, जी हां, हरेक को गुज़ारा जाए, कोई भी अपवाद न हो.