मैंने ज़िंदगी में डायरी छोड़ कर कुछ नहीं लिखा (सिवाए जनतंत्र पर एक लेख के)। कभी कभार दोस्तों को ई-मेल भेज देता हूं। लेकिन मैं एक अच्छा पाठक जरूर हूं। इसलिए साहित्य की ज़्यादातर बहसों से वाकिफ़ हूं। चाहे वो प्रेमचंद को जातिवादी ठहराने की कोशिश हो या फिर उदय प्रकाश को लेकर चल रहा ताज़ा विवाद। मेरा इस विवाद से कोई नाता नहीं, लेकिन एक जागरुक पाठक होने के नाते मुझे भी अपनी बात कहने का हक़ है। इसी हक़ का इस्तेमाल करते हुए मैं भी अपनी बात कहूंगा। खुल कर कहूंगा।
सबसे पहले तो यह कि उदय प्रकाश ने जो गुनाह किया है उसके लिए उनका बचाव नहीं किया जा सकता। भविष्य में जब भी उदय प्रकाश के इस गुनाह का मूल्यांकन किया जाएगा तो आज जो भी उनके बचाव में खड़े हैं, वो सभी उनके इस गुनाह में बराबर के भागीदार माने जाएंगे। वो जाने-अनजाने में एक ऐसी प्रवृति को जन्म दे रहे हैं जिसमें कोई भी साहित्यकार किसी फासीवादी … किसी भी दंगाई के गले में बांह डाले घूमेगा और आलोचना करने वालों से कहेगा कि “तुम मेरे कर्म को मत देखो मेरा साहित्य पढ़ो। मैं निजी ज़िंदगी में कुछ भी होऊं तो क्या लेकिन साहित्य में तो साम्यवादी हूं। गरीबों की बात करता हूं… पिछड़ों, दलितों के साथ हूं। तुम मेरे साहित्य की वजह से मुझे चाहते हो… इसलिए मेरे उसी रूप की पूजा करो”।
लेकिन असल ज़िंदगी में ऐसा होता नहीं है। खासकर मध्यवर्गीय बौद्धिक समाज में तो कतई नहीं। यहां मृत व्यक्तियों के कर्मों का लेखा-जोखा तैयार किया जाता है। उसने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में चाहे कितने ही क्रांतिकारी कर्म क्यों न किए हो… उसे हमेशा वर्तमान में तोला जाता है। इसलिए उदय प्रकाश को हमेशा ये ख़्याल रखना चाहिए था कि वो योगी आदित्यनाथ के करीब नहीं जाएं। उसके साथ मंच साझा नहीं करें। अगर मंच साझा हो गया तो उससे कोई सम्मान नहीं लें। लेकिन उन्होंने दोनों ही काम किए। सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में किए। ऐसे में उनकी निंदा होगी ही। उनके कपड़े फाड़े जाएंगे और बार-बार माफी मांगने के लिए कहा जाएगा।
औरत
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी
जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो
मेरी मां रही होगी।
मेरी चिंता यह है कि
भविष्य में वह आखिरी
स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी
मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूंगा।
……….
रमाशंकर यादव “विद्रोही” की कविता (कथादेश से उधार)
यहां बहुत से लोग यह कह रहे हैं कि उदय प्रकाश का सत्यार्थ प्रकाशित हो गया। अब उन्हें छोड़ दिया जाए। कबाड़खाने में भी बहस थोड़ी तल्ख हुई तो अशोक पांडे ने अपने अधिकार का “नाजायज” इस्तेमाल करते हुए बहस बीच में रोक दी। क्यों भई, आपने ऐसा किस सिद्धांत के तहत किया। कहीं आप सब अपने को “नित्शे” का सुपरमैन तो नहीं समझते हैं कि आप चाहें तो बहस शुरू होगी और मना करें तो थम जाएगी? जब आप सबने अपनी राय रख ली तो बाकी लोगों को भी हक़ है कि वो भी अपनी बात कहें।
अभी तो बहस शुरू हुई है। पहली बार साहित्य जगत में व्याप्त उन तमाम तरह के “वाद” पर सुगबुगाहट होने लगी है जिनमें ज़्यादातर साहित्यकार लिप्त हैं, लेकिन उन पर बात करने से कतराते हैं। इस बहस को रोकने की जगह आगे बढ़ाएं। इसी बहाने क्यों नहीं एक बार साहित्य जगत की चीरफाड़ कर ली जाए। साम्यवाद और समाजवाद को छोड़ कर यहां जितने भी वाद हैं सब पर मंथन कर लिया जाए। धर्मवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और वंशवाद सब पर बहस कर ली जाए।
शुरुआत करते हैं साम्प्रदायिकता से। उदय प्रकाश से जुड़ा विवाद साहित्य समाज के इसी चेहरे को दिखाता है। उदय प्रकाश जैसे कई साम्प्रदायिक तत्व साहित्य समाज में मौजूद हैं। इसे समझने के लिए आप रामचंद्र शुक्ल का ही उदाहरण लीजिए। उन्होंने जब मलिक मोहम्मद जायसी के बारे में लिखा है कि “वे मुसलमान होते हुए भी अच्छे इंसान थे” … तो इसका क्या मतलब था। दरअसल इसके पीछे उनके अंत: मन में बैठी वो धारणा रही होगी कि मुसलमान अच्छे इंसान हो ही नहीं सकते थे। ये साम्प्रदायिकता नहीं तो क्या है?
अविनाश ने सही लिखा है कि आज आपको ऐसे बहुत से साहित्यकार मिल जाएंगे जिन्हें बीजेपी शासित प्रदेशों से विज्ञापन लेने में भी कोई गुरेज नहीं। वो दिखावा करते हैं उनका बीजेपी से कोई रिश्ता नहीं। लेकिन बीजेपी शासन के दौरान तमाम सुविधाओं से उन्हें कभी परहेज नहीं रहा। वो मोदी को गाली देते हैं। लेकिन बीजेपी के दूसरे नेताओं से साथ गलबहियां करने में उन्हें कभी दिक्कत नहीं महसूस हुई। ये हिंदी साहित्य समाज की हिप्पोक्रेसी है। “हंस” को ही देखिए उसमें मध्य प्रदेश सरकार के विज्ञापन छपते हैं। लेकिन राजेंद्र यादव तो पहले ही कह चुके हैं कि वो हंस को ज़िंदा रखने के लिए वो ऐसा कर रहे हैं। चलिए उनकी इस मजबूरी को समझते हुए हम इस बात को आगे नहीं बढ़ाते हैं। लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने लिए बीजेपी शासित सरकारों से फायदे लिए। उनके नाम गिनाने बैठेंगे तो पूरी साहित्य बिरादरी के मुंह पर कालिख पुत जाएगी। 60-70 फ़ीसदी लोग नंगे नज़र आएंगे।
जन-गण-मन
मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें
फिर साधू के काका मरें
यानी सारे बड़े-बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूं – आराम से
उधर चल कर बसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा
……….
रमाशंकर यादव “विद्रोही” की कविता (कथादेश से उधार)
अब बात जातिवाद की। जब दलित विचारक डॉक्टर तुलसी राम ये कहते हैं कि साम्प्रदायिकता से ज़्यादा ख़तरनाक जातिवाद है तो उनके इस कथन के पीछे एक लंबा इतिहास है। जाति की इन बेड़ियों में समाज आज भी सिसक रहा है। आरक्षण ने सियासत में इन बेड़ियों को तोड़ दिया है। लेकिन साहित्य जगत में ये सड़ांध अब भी है। असर इतना है कि कई सवर्ण साहित्यकारों के बच्चे बड़े विश्वविद्यालयों में रीडर, प्रोफेसर बन गए हैं। ऐसा देखा गया है कि घर के माहौल का पढ़ाई-लिखाई पर असर पड़ता है। हो सकता है कि उनके बच्चे ऐकेडेमिक्स में जाने का मन बना चुके हों। लेकिन अधिकतर हिंदी के ही अध्यापक क्यों बने? क्योंकि इस विषय में बच्चों को अवसर दिलाना उनके मां-बाप के लिए आसान था। ऐसे साहित्यकारों में नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह से लेकर कई नाम गिनाए जा सकते हैं। नामवर सिंह की बेटी-दमाद, डॉक्टर नागेंद्र की बेटी .. शांति स्वरूप की बेटी, महेंद्र कुमार की बेटी, के डी शर्मा की बेटी और दामाद … सभी लेक्चरर, रीडर और प्रोफेसर जैसे पदों पर तैनात हैं। ये साहित्य जगत का वंशवाद और जातिवाद है।
ये जातिवाद का ही असर है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यायल के हिंदी विभाग में अभी तक पिछड़ी जातियों से एक भी शिक्षक नहीं है। दलितों और अनुसूचित जनजातियों के एक-एक नुमाइंदे हैं। वो भी इसलिए कि उच्च शिक्षा में उनके लिए आरक्षण पहले लागू हो गया था। अगर आरक्षण नहीं होता तो वहां के सवर्ण मठाधीश उन्हें भी दाखिल नहीं होने देते। जिस तरह इन मठाधीशों ने दलित साहित्य को उपेक्षा की नज़र से देखा है उसी तरह दलितों को भी उपेक्षित वंचित रखते। जेएनयू में शुरू से सिर्फ़ तीन ही जातियों का कब्जा रहा है। राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ।
यही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में भी पिछड़ों का यही हाल है। वहां के हिंदी विभागों में भी पिछड़ी जातियों के शिक्षक अंगुलियों पर गिनाए जा सकते हैं। जबकि अगड़ी जातियों के शिक्षकों को आप गिनते-गिनते थक जाएंगे। राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ के अलावा यहां पर एक और जाति भूमिहार का दबदबा है। साम्यवादी और प्रगतिशील हिंदी समाज का जातिवादी चेहरा है।
किसी ने खूब कहा है कि अगर किसी व्यक्ति का असली चेहरा देखना हो तो उसे सत्ता दे दो। विभूति नारायण राय को देखिए। उन्हें हाल ही में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा का कुलपति बनाया गया। कुलपति बनने के साथ ही उन्होंने अपने कुनबे का उद्धार कर दिया। उपेंद्र राय, डॉक्टर अनिल कुमार राय “अंकित”, भरत भारद्वाज, मनोज राय एक साथ बिरादरी के कई वंचितों का कल्याण कर दिया। जातिवाद का आलम यह है कि विभूति नारायण राय की हर दो नियुक्तियों में एक भूमिहार मिलेगा। क्यों क्या किसी और जाति में काबिल लोग नहीं थे?
हमारे हिंदी साहित्य समाज में एक और चीज देखने को मिलती है। वो है वैचारिक आतंकवाद। चीन युद्ध के समय बाबा नागार्जुन ने वामपंथियों के ख़िलाफ़ क्या लिखा सब उनके पीछे पिल पड़े। यहां तक कि उनके ख़िलाफ़ एक किताब तक संपादित कर दी गई। शायद अपूर्वानंद ने उस किताब का संपादन किया था। लेकिन सिंगूर, नंदीग्राम, लालगढ़ में जो कुछ हुआ उस पर सब खामोश हैं।
आखिर में, कुछ अपवाद के तौर पर मौजूद ईमानदार, कर्मनिष्ठ और सच्चे लेखकों के प्रति पूरा आदर भाव रखते हुए … बस इतना ही कहूंगा कि हमारे ज़्यादातर हिंदी साहित्यकार अंदर से कांग्रेसी और भाजपाई होते हुए भी बाहर से साम्यवादी है। धर्मांध और साम्प्रदायिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष हैं। दलितों, पिछड़ों के अधिकारों का क्रूर तरीके से हनन करते हुए भी शोषितों… वंचितों के हितैषी हैं। इसलिए आज ये बेहद जरूरी है कि हम उदय प्रकाश के “कुकर्म” के बहाने शुरू हुई बहस को रोके नहीं बल्कि उसे आगे बढ़ाएं। उन तमाम मुद्दों पर खुल कर चर्चा करें जिन पर हिंदी साहित्य समाज बात करने से बचता है।
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रंगनाथ सिंह
July 25, 2009 at 12:51 am
vidrohi ji ki kavita lagane le liye aabhar…
Abhishek
July 26, 2009 at 5:24 am
Hi Kabir,
Quite an interesting article. Covers a lot of ground and shows how hypocrisy is increasingly becoming order of the day amongst literati and academics. It also clearly shows how this ‘elite and intellegntia’ is increasingly attracted towards soft hindutva (something that is part of the middle class mindset though it is not visible in daily life)and the ill effects thereof. Its a praiseworthy attempt to expose the mentality which has pushed India back into ‘feudal era’.
Abhishek
ramesh
August 5, 2009 at 10:22 am
aap ne sahi likha hai vibhuti rai ne apni jati k jin logo ki niyukti ki hai unme se ek naklchi guru k nam se famous hai.wo hai anil kumar rai ankit, 17 books dusare ki books se chori kar k liki hai. aise log shirf jati k karan appoint ho gaye.jinhe jail main hona tha wo university main professer hai.
jai jatiwad jai bharat
ANIL KAPOOR
August 19, 2009 at 4:11 pm
ok,ok,ok I am hundred percent satisfy with your call and your thouts and i want to say that please see inside of the media houses.there’s picture are not very healthy.I am new student of media and communication and atleast today i saw that castism and cast difference are also there.now u see and i sea and then discus on this issue. ok bye
संदीप
August 19, 2009 at 6:02 pm
कबीर भाई,
वाकई बहस शुरू हुई है तो उसे तार्किक परिण्ाति तक पहुंचाने का प्रयास किया जाना चाहिए। वरना यह भी खाए-अघाए बुद्धिजीवियों की तुच्छ, व्यक्तिवादी दिशाहीन बहस बन कर रह जाएगी। मुझे जानकारी नहीं थी अशोक जी ने कबाड़खाना पर बहस को बंद कर दिया था, संभवत: उन्होंने सोचा होगा कि बहुत हो चुकी छीछालेदर, लेकिन मेरा मानना है कि वे व्यक्तिगत आरोपों-प्रत्योरोपों को सार्थक दिशा में मोड़ने का प्रयास कर सकते थे, और उदय प्रकरण के बहाने सांप्रदायिकता के खिलाफ बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की दीर्घकालिक एकजुटता और रणनीति पर लोगों को एकजुट किया जा सकता था। खैर, इस बारे में अपने ब्लॉग शब्दों की दुनिया पर विस्तार से लिखूंगा।