अविनाश ने जो बातें कही हैं , उनमें बहुत दम है। और इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि “अश्लीलता कोई राजनीतिक या सामाजिक (या यहां तक कि निजी) विचारधारा नहीं है। यह हमारी सभ्यता की वो सरहद है, जहां कब दीवार खड़ी कर दी गयी, हमें पता ही नहीं चला”। लेकिन अश्लीलता परिभाषित नहीं की जा सके – ऐसा भी नहीं है। इसकी परिभाषा है। ये परिभाषा बहुत हद तक सब्जेक्टिव है। मतलब हमारे समाज में जो अश्लील है, यूरोप के लिए वो श्लील हो सकती है। यूरोप के अलग-अलग देशों में भी ये परिभाषा बदल सकती है। ये भी मुमकिन है कि यूरोप में जो अश्लील मानी जाए जापान में उसे लोग यूं ही नज़रअंदाज कर दें। हर देश के कानून में वहां के सामाजिक परिदृष्य को रख कर अश्लीलता की परिभाषा गढ़ी गई है।
लेकिन सभी जगह अश्लीलता की परिभाषा में कुछ केंद्रीय तत्व हैं। जिनमें सबसे अहम है कि कोई भी रचना साहित्यिक, कलात्मक, राजनीतिक, सामाजिक और वैज्ञानिक मानदंडों पर कहां तक खरी उतरती है। उस रचना की मंशा क्या है और उसके पीछे तर्क क्या है? अगर किसी भी कृति में इनमें से कोई भी तत्व ठोस स्तर पर मौजूद है तो आप उसे सीधे तौर पर अश्लील करार नहीं दे सकते हैं।
इसलिए यहां सवाल यह नहीं कि इंटरनेट पर मौजूद पोर्न पर प्रतिबंध लगे या नहीं। सवाल यह है कि मीडिया जिसकी पहली जिम्मेदारी सरकार के तीनों संवैधानिक स्तंभों पर निगरानी रखने की है… गरीबों, पिछड़ों, दलितों के हक़ में खड़े होने की है, अगर यही मीडिया “अश्लील” धंधा करने लगे तो यह कहां तक सही है। अगर अश्लीलता परोसने के नाम पर सविता भाभी जैसी वेबसाइट पर रोक लग सकती है तो मीडिया संस्थानों की इन “अश्लील” वेबसाइट्स पर रोक क्यों नहीं लग सकती?
लुस्ट मैंने पढ़ी नहीं। कॉलेज के जमाने में लोलिता को जरूर पढ़ा था। वो एक ऐसे इंसान की कहानी है जो मानसिक तौर पर “बीमार” है। उसकी उत्तेजना उसकी चेतना पर इस कदर हावी होती है कि 12 साल की लड़की लोलिता (जो उसकी सौतेली बेटी भी है) से प्यार कर बैठता है। उस कहानी के अधेड़ नायक हमबर्ट को हमेशा इस अपराध का अहसास रहता है। वो पछतावे की आग में जलता है लेकिन खुद पर उसका नियंत्रण नहीं।
हमबर्ट पश्चिमी समाज से है जहां की नैतिकता हमसे बहुत भिन्न है। उदाहरण के तौर पर देखिए कि अमेरिका में बिल क्लिंटन राष्ट्रपति पद पर रहते हुए सेक्स स्कैंडल में फंसते हैं। उन्हें समाज और परिवार दोनों माफ़ कर देते हैं। इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी कई बार सेक्स स्कैंडल में फंस चुके हैं। हर बार समाज माफ कर देता है। फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी तीन शादी कर चुके हैं। तीसरी शादी मॉडल कार्ला ब्रूनी से होती है। तीन शादियों के असावा उनके एक-दो अफेयर और रह चुके हैं।
यह वो समाज है जहां पर बुजुर्ग एक लड़की से फ्लर्ट कर सकता है। खुलेआम। और कोई इस पर एतराज नहीं करता। यह वो समाज है जहां एक सोलह साल की लड़की बिना कपड़ों के मेनस्ट्रीम अख़बारों में फोटो छपवा सकती है और कानून ग़लत नहीं मानता। यह समाज उस समय भी काफी खुला हुआ था जब लोलिता छपी थी। लेकिन वहां लोलिता की अश्लीलता पर लंबी बहस चली। आखिर में उसे अश्लीलता की श्रेणी से सिर्फ इसलिए बाहर रखा गया क्योंकि उपन्यास के नायक में अपराध बोध था। उसे ग्लानि थी।
लेकिन उसी विकसित और खुले समाज में कई दूसरे उपन्यासों पर प्रतिबंध लगा। कई फिल्मों का प्रदर्शन रुका। लेटी चैटरलीज लवर ऐसी ही एक किताब थी। जिस पर ब्रिटेन में लंबी बहस चली। यह किताब और इस पर बनी फिल्म ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के कई देशों में प्रतिबंधित की गई। अगर आप प्रतिबंधित फिल्मों और किताबों की सूची पर एक नज़र डालेंगे तो बहुत सी ऐसी फिल्में और किताबें मिलेंगी, जिन्हें अश्लीलता के आधार पर बैन किया गया था। यह उस समाज की बात हैं जहां सेक्स को टैबू नहीं माना गया है। जहां एक ही छत के नीचे एक कमरे में मां-बाप और दूसरे कमरे में बच्चे अपने दोस्तों के साथ सो सकते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट इसी अश्लील श्रेणी में आती हैं। वहां पर औरतों को एक कमोडिटी (उत्पाद) के तौर पर पेश किया गया है। ये बहुत संकीर्ण नज़रिया है। एक सामंती सोच। सदियों से चली आ रही सामंती सोच। जिसके तहत औरत को सिर्फ उपभोग की सामाग्री समझा जाता है। आप इन सभी साइट्स पर जाइए। आपको वहां फ्रंट पेज पर एक भी पुरुष की तस्वीर नहीं मिलेगी। आखिर क्यों? क्योंकि उनका मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ महिलाओं की नंगी तस्वीरें लगा कर हिट्स हासिल करना है।
यह सब कहने का मतलब सिर्फ़ इतना ही है कि अश्लीलता परिभाषित की जा सकती है और उसे परिभाषित करने का एक अहम आधार सामाजिक चेतना है। इस लिहाज से भारत में अश्लीलता की परिभाषा भारतीय सामाजिक चेतना के आधार पर होगी। यूरोपीय, अमेरिकी और जापानी चेतना के आधार पर नहीं।
लेकिन भारत में तो एक छोटा धड़ा विकसित है और इस विकसित धड़े को हर चीज के साथ सेक्स में भी ब्रिटेन और जापान जैसी छूट चाहिए। उससे बड़ा धड़ा मध्यवर्ग का है जो बंद कमरे में पोर्न भले ही देख ले, लेकिन सार्वजनिक तौर पर उसे यह कबूल नहीं है। यह उसकी हिपोक्रेसी है। लेकिन उसकी नज़र में यही मर्यादा, लिहाज और आंख की शर्म है। हालांकि अब धीरे-धीरे उसकी सोच बदल रही है।
तीसरा और सबसे बड़ा धड़ा गरीब है। भूख से बिलखते बच्चे। उम्र से पहले बूढ़े हो चुके जिस्म। इनके सामने सबसे बड़ा सवाल रोजी-रोटी का है। अच्छा कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य … ये सब इनके लिए सपने हैं। वो सपने जो हर रोज़ दम तोड़ते हैं। सेक्स से जुड़ी कुंठाओं से मुक्ति का सवाल तो बहुत बाद में आता है।
अब इस समाज में मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए। मीडिया का कौन सा कर्म, अश्लीलता के दायरे में गिनना चाहिए? मीडिया को किस बात के लिए संविधान में दी गई अभिव्यक्ति की आज़ादी के तहत सुरक्षा मिलनी चाहिए? और उसे किस काम के लिए सरकार की तरफ़ से सुविधाएं, विज्ञापन और बेलआउट पैकेज मिलना चाहिए? ये सवाल बड़े हैं और इनका जवाब बहुत ज़रूरी है। इससे आने वाली नस्लों का और देश का भविष्य जुड़ा है।
मैंने पिछले लेख में ही कहा था कि साइबर क्रांति के युग में पोर्न को रोकना मुमकिन नहीं। सभी पोर्न साइटों पर सेंसर लगाना भी मुमकिन नहीं। यह भी कहा था कि अगर किसी को पोर्न का धंधा करना है तो वो करे। इसलिए यहां सवाल यह नहीं कि इंटरनेट पर मौजूद पोर्न पर प्रतिबंध लगे या नहीं। सवाल यह है कि मीडिया जिसकी पहली जिम्मेदारी सरकार के तीनों संवैधानिक स्तंभों पर निगरानी रखने की है… गरीबों, पिछड़ों, दलितों के हक़ में खड़े होने की है, अगर यही मीडिया “अश्लील” धंधा करने लगे तो यह कहां तक सही है। अगर अश्लीलता परोसने के नाम पर सविता भाभी जैसी वेबसाइट पर रोक लग सकती है तो मीडिया संस्थानों की इन “अश्लील” वेबसाइट्स पर रोक क्यों नहीं लग सकती?
टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की वेबसाइट इसी अश्लील श्रेणी में आती हैं। वहां पर औरतों को एक कमोडिटी (उत्पाद) के तौर पर पेश किया गया है। ये बहुत संकीर्ण नज़रिया है। एक सामंती सोच। सदियों से चली आ रही सामंती सोच। जिसके तहत औरत को सिर्फ उपभोग की सामाग्री समझा जाता है। आप इन सभी साइट्स पर जाइए। आपको वहां फ्रंट पेज पर एक भी पुरुष की तस्वीर नहीं मिलेगी। आखिर क्यों? क्योंकि उनका मकसद सिर्फ़ और सिर्फ़ महिलाओं की नंगी तस्वीरें लगा कर हिट्स हासिल करना है।
इन वेबसाइट्स के कर्म को आप साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और कलात्मक किसी भी लहजे से सही नहीं ठहरा सकते। यहां भाषा बहुत “सस्ती” है। ख़बरों के तौर पर परोसे गए उस “अश्लील” साहित्य को पढ़िए। हर ख़बर में महिलाओं का अपमान किया गया है। संपादक की पसंद में लड़कियों की अर्धनग्न तस्वीरें लगाई गई हैं। मस्त माल जैसी उपमा दी गई है। क्या है ये सब? आप इसे पत्रकारिता कहेंगे और ऐसा करने वालों को पत्रकार?
एक बात और। कुछ बड़े मीडिया संस्थानों के इस “कुकर्म” की तुलना खजुराहो से नहीं करनी चाहिए। खजुराहो इतिहास की धरोहर है। उसे पर्यटन विभाग ने नहीं बनाया है। जिस दिन पर्यटन विभाग सेक्स टूरिज्म को हथियार बना ले और भारत की सकल राष्ट्रीय उत्पाद में जापान की तरह सेक्स टूरिज्म का हिस्सा एक फीसदी के करीब पहुंच जाए, उस दिन इन अख़बारों की तुलना पर्यटन विभाग से कीजिएगा। गनीमत है कि अभी पर्यटन विभाग मीडिया संस्थानों की तरह नंगई पर नहीं उतरा है।
shyamalsuman
July 25, 2009 at 7:06 am
समसामयिक सुन्दर सटीक आलेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा।
सादर
श्यामल सुमन
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
शशि सिंह
July 25, 2009 at 10:35 am
हुम्म… तर्कों में धार है। उम्मीद है मौला समझदारों को थोड़ी नादानी बख्सेगा। अगर समझदारों पर मौला की न चली तो कम से कम इतनी उम्मीद जरूर है कि नादानों की नादानी बची रहे जिससे सामाजिक ताना-बाना नष्ट होने से बच सके।
रंगनाथ सिंह
July 26, 2009 at 12:41 am
हिन्दी भाषा में भी ऐसी सलीकेदार बहसें हो सकती हैं !!
अब अविनाश अपना पक्ष स्पष्ट करें तों बात आगे बढ़े।
Sagar
August 11, 2009 at 10:14 pm
Dhanyavad !
Aapke vichar ke antim 3 parichhed sahit tamam muddon par sahmat huwa ja sakta hai , Lekin sawal ye hai ki jawab dega kaun ?
Aap ek jagrook vicharak hain , jaroor jante hongen ki Rajya Sabha aur Lok Sabha men Antim din kaun si charcha huyi , aur bina kisi natije par pahunche anishchit kal ke liye asthagit ho gayi .
Hamara samaj aur ham bhi to yehi kar rahen hain .
Sadar – Sagar