“सच का सामना” बंद होना चाहिए या नहीं – इस पर बहस तेज़ हो रही है। वैसे ऐसे कार्यक्रमों में कोई बुराई नहीं। लेकिन क्या सच में हमारा समाज ऐसे किसी भी सच का सामना करने के लिए तैयार है? शुरुआती कुछ खुलासों से ऐसा नहीं लगता। आप सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली को ही लीजिए। विनोद कांबली ने इस कार्यक्रम के दौरान कह दिया कि सचिन ने उनकी उतनी मदद नहीं की। चाहते तो कर सकते थे। लेकिन नहीं की। बाद में इसका खंडन किया। लगभग गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा कि उनकी मंशा ऐसा नहीं थी। लेकिन लोग कांबली की सफ़ाई कबूल करें भी तो कैसे? उन्होंने टीवी पर कांबली को खुद इस सच से पर्दा उठाते देखा। सचिन से रिश्तों में दूरी बढ़ गई। दोनों दोस्त अब दूर हो गए।
यह बात उस दोस्ती की है जिसकी लोग मिसाल दिया करते थे। खेल की दुनिया में लोग उनकी दोस्ती की कसम खाते थे। दोनों को करीब से जानने वाले बताते हैं कि इस घटना ने इतनी दरार पैदा कर दी जिसे भविष्य में पाटना बहुत मुश्किल होगा।
बहुत से लोग इसके लिए कांबली को दोषी ठहरा रहे हैं। वो उन्हें अहसानफरामोश बता रहे हैं। कह रहे हैं कि सचिन पर अंगुली उठा कर कांबली ने ग़लत किया। लेकिन सच तो यही है कि ये सभी आरोप बेतुके हैं। कांबली ने कुछ ऐसा नहीं कहा जिससे उनकी नीयत पर सवाल उठाया जाए। अगर आप परिस्थितियों की तार्किक विवेचना करें तो कांबली का कोई दोष नज़र नहीं आएगा।
दो दोस्तों का करियर एक साथ शुरू होता है। दोनों की प्रतिभा में कोई बहुत अंतर नहीं। दोनों बहुत जल्दी ही कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचते हैं। ताबड़तोड़ रिकॉर्ड बनाते जाते हैं। तभी भूचाल आता है। एक दोस्त पिछड़ने लगता है। पिछड़ने वाला दोस्त आगे बढने वाले की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देखता है। आगे बढ़ने वाला उसे सहारा देने की पूरी कोशिश करता है। उसकी ईमानदारी में कोई कमी नहीं। लेकिन हाथ छूट जाता है। वो बहुत आगे निकल जाता है। उसका दोस्त बहुत पीछे छूट जाता है। इस पीछे छूटे हुए दोस्त को लगता है कि आगे बढ़ने वाले ने एक कोशिश और की होती तो आज वो भी उसके साथ होता। साथ न सही, इतना पीछे तो नहीं होता। क्या दोस्ती में ये बात नहीं कही जा सकती? क्या इसका स्पेस नहीं दिया जा सकता कि अगर किसी को कुछ खटक रहा हो तो वो कह सके?
कांबली ही नहीं ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। यह एक मानवीय स्वभाव है। क्या सुदामा जब कृष्ण की तरफ़ देखते थे तो उनके मन में ये बात नहीं उठती थी कि कृष्ण चाहें तो उनकी मदद कर सकते हैं? उठती थी और यकीनन उठती थी तभी तो कृष्ण ने इसे भांप कर उनकी मदद की। कृष्ण को भगवान कहा गया है वो मन की बात भांप सकते थे। दिमाग की तरंगों को पढ़ सकते थे। सचिन और कांबली इंसान है – सचिन दोस्त के मन में उभरते दर्द को पहचान नहीं सके। और एक सार्वजनिक मंच पर कांबली का यही दर्द सामने आ गया।
सार्वजनिक मंच। किंतु यहीं विश्राम करता है। बात बढ़ी क्योंकि ये सार्वजनिक मंच पर कही गई थी। लेकिन दोस्ती का तकाजा तो यही कहता है कि ऐसी ग़लती माफ़ कर दी जाए। सचिन कह सकते थे कि यार तूने ग़लत किया। तुझे ऐसे किसी शो में ये सब नहीं कहना चाहिए था। लेकिन शायद मेरी तरफ से ही कोई कमी रह गई होगी तभी तुझमें यह अहसास घर कर गया। सचिन कामयाब हैं और ये बड़कपन उनकी कामयाबी में चार चांद लगा देता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ… आखिर क्यों?
इसलिए कि हमारा समाज अभी ऐसे किसी भी निजी सच का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार प्रीतीश नंदी की माने तो जो भी उस कार्यक्रम में पहुंच रहा है वो पैसे के लालच में पहुंच रहा है। उसके रिश्तेदार और साथी इसी उम्मीद में साथ देते हैं कि शायद वो एक करोड़ रुपये जीत जाए। लेकिन अगर वो एक करोड़ रुपया नहीं जीत सका तो सच का सामना में पूछे गए कुछ सवाल और उनके जवाब उसकी ज़िंदगी को तहस-नहस कर देंगे।
जब समाजवादी पार्टी के सांसद कमाल अख़्तर राज्यसभा में उस वाकये का जिक्र करते हैं कि एक महिला से एंकर ने सवाल पूछा कि क्या आप गैरमर्द से रिश्ते बनाएंगी। वो महिला जवाब देती है कि नहीं। मशीन कहती है ये झूठ है। उस वक़्त उस महिला पर क्या गुजरी होगी? वो सहम गई होगी। अनहोनी की आशंका में भीतर से हिल गई होगी। उस महिला ही क्यों उसके पति पर क्या गुजरी होगी? कमाल अख़्तर की बात जायज है। उसके पति पर क्या गुजरी होगी? कमाल अख़्तर की बात जायज है। अब उस महिला को पूरी ज़िंदगी इस सच का दंश झेलना है। अगर उसने एक करोड़ रुपये जीत लिए होते तो कितने भी कटु सत्यों से फर्क नहीं पड़ता। उसकी हैसियत इतनी होती कि जब समाज उसकी तरफ़ तिरस्कार भरी नज़रों से देखता तो वो उस समाज से अपना रिश्ता तोड़ सके। लेकिन अब तो उसे उसी समाज में वापस लौटना है। वो भी बगैर एक करोड़ रुपये के। उस गली-नुक्कड़ के लोग उसका और उसके पति का जीना दूभर कर देंगे। यहां हम बस यही दुआ कर सकते हैं कि ऐसा कुछ नहीं हो।
अभी कुछ प्रगतिशील लोगों के लेख पढ़ रहा था। कुछ ने स्टार प्लस के सच का सामना का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि हमारी सामाजिक सोच इतनी संकीर्ण क्यों है कि हम खुले में मलमूत्र कर सकते हैं लेकिन किस नहीं कर सकते। हम सेक्स पर खुल कर बात क्यों नहीं कर पाते? हर बात वहीं आकर क्यों अटक जाती है? हम हर चीज सेंसर क्यों करने लगते हैं? हमारे सांसदों को जनता की बुनियादी मुश्किलों को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए। वो ऐसे मुद्दों पर बहस छेड़ कर संसद का वक़्त क्यों ख़राब करते हैं?
इन सवालों का जवाब दिया जा सकता है। लेकिन उनसे यह सच झूठ में नहीं बदल जाएगा कि हमारा समाज अब भी सामंती है। ऐसा भी नहीं होगा कि उन सवालों के जवाब दे देने भर से अचानक सबकुछ सही हो जाएगा। सचिन की नाराज़गी दूर हो जाएगी। कांबली को यह ग्लानि नहीं रहेगी कि हाय! उन्होंने क्या कह दिया। उस महिला को उसका परिवार और समाज दोनों पहले की तरह कबूल कर लेगा और उसका दंश भी समाप्त हो जाएगा।
इसलिए सही है कि आप बहस करें और समाज की यौन कुंठाओं को दूर करने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करें। तमाम तरह के सवालों पर तीखी बहस करें। लेकिन ऐसा करने से पहले सच का सामना बंद कराएं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो कई घर तबाह हो जाएंगे। जिस देश में पांच हज़ार रुपये के लिए लोग हत्या कर सकते हैं वहां एक करोड़ रुपया बहुत होता है। एक करोड़ रुपये का ये लालच बहुतों की ज़िंदगी बर्बाद कर देगा। यह भी याद रखिएगा कि स्टार प्लस और उसके मालिक रूपर्ट मर्डोक ऐसी किसी भी तबाही की जिम्मेदारी नहीं लेंगे। ये कंपनी और उसका मालिक दोनों विदेशी हैं। उन्हें भारतीय संवेदनाओं और लोगों की कोई चिंता नहीं। उन्हें तो सिर्फ़ मुनाफ़े से मतलब है। इसलिए तबाह होने वाले घरों की ज़िम्मेदारी तो हमारे ही समाज को लेनी होगी। हमको और आपको लेनी होगी।
Ganesh Prasad Jha
July 25, 2009 at 4:48 pm
यही वजह है कि कभी-कभी खुद ही एसा लगने लगता है कि चीवी चैनलों और यहां तक कि समाचार चैनलों पर भी एक सरकारी रेगुलेटरी बिठा ही दी जानी चाहिए. हमारी पत्रकार बिरादरी में भी एसे दुष्टों की कमी नहीं है जो अपनी चौधराहट चमकाने के लिए समाज में जहर घोलने का काम करते हैं. सरकार जब-जब रेगुलेटरी की बात करती है तो चैनल के हिस्सेदार बन गए कुछ मठाधीश पत्रकार फ्री प्रेस की बात करने लगते है और एसे किसी सरकारी कदम को प्रेस का गला घोंटने वाला कदम करार देते है. पर वे अपने आप पर कोई सेल्फ रेगुलेटरी नहीं लगाते. जो चैनल पर अनर्गल काम करते हैं उसे एसा करने से रोकते भी नहीं. हम पत्रकार और मीडिया के कुठ चौधरी टाइप लोग जो तिकड़म करके सादारण पत्रकार से करोड़पति और अरबपति पत्रकार बन गए हैं, अपने मालिक की पहले से लबालब झोली में और कुछ खरब रुपए डालने और कुछ खुद खुद बटोर ले जाने की नापाक कोशिश के तहत एसी गलत-सलत चीजें रचते रहते हैं और इस तरह के कदमों से बार-बार गलतियां करके सरकार को रेगुलेटरी बिठाने का मौका तश्तरी में परोसकर दे रहे हैं. एसे में जब रेगुलेटरी बैठ जाएगी तो फिर हाय-तौबा मचाएंगे और सभी पत्रकार साथियों से अपील करने लगेंगे कि अब भाई सब मिलकर डंडा-बैनर उठाओ, काली पट्टी बांधो और चलो सड़क पर हाय-हाय-डाउन-डाउन करने. पर अब जब भी एसा मौका आए तो उन णठाधीशओं से पूछा जाना चाहिए कि भाई अनैतिक तरीके से रुपए बटोरने के लिए प्रपंच रचने से पहले क्या हमसे पूछा ता जो आज आए हो मदद मांगने. एसे ही मठाधीश पत्रकार पत्रकारिता और साथ-साथ समाज का सर्वनाश करते रहे है. एसा इसलिए भी लग रहा है कि रुपर्ट मरडाक तो कहने आए नहीं होंगे कि सच का सामना कार्यक्रम शुरू करो, किया तो होगा अपने किसी मठाधीश पत्रकार साथी ने ही. नहीं कुछ तो कम से कम आईडिया ही पेल दिया होगा कि फलां देश में इस तरह का एक कार्यक्रम चला था, यहां भी वैसा ही कुछ पकाकर चलाएं तो टीआरपी आसमान छूने लगेगी और खूब नोट बरसेंगे. दरअसल, जो खुद करोड़पति-अरबपति बन जाता है उसे समाज की चिंता रह कहां जाती है. उसे इससे क्या लेने-देना कि उसके किए से परिवार और समाज टूट और बिखर जाएगा. एसे लोग समाज के बूचड़ है. हमारा सिर शर्म से इसलिए झुक रहा है कि वे लोग और कोई नहीं हमारी ही पत्रकार विरादरी के हैं. इस तरह के कार्यक्रम चलाना प्रेस की आजादी का बेजा इस्तेमाल है. एक समय की बात है. हमारा अखबार जब नया-नया शुरू हुआ था तो हर डेस्क पर लैंडलाइन फोन लगा था और उन सब में एसटीडी था. खबरों का संग्रह अच्छे से हो सके इसलिए यह सुविधा दी गई थी. पर भाईयों ने अपने घर, परिवार और दूरदराज को मित्रों-संबंधियों को दबाकर इतना एसटीडी काल किया कि महीने भर में ही लाखों का बिल आ गया. अगले ही महीने यह सुविधा बंद कर दी गई और हर एसटीडी काल के लिए पर्ची भरने और बोर्ड के आपरेटर से काल मिलवाने की व्यवस्था शुरू करा दी गई. सच का सामना लगता है कुछ एसा ही करवाएगा ताबूत में आखिरी कील ठोंकवा कर ही रहेगा. सरकार भी चाहेगी की रोज-रोज की किचकिच से अच्छा है इसी बहाने हथौड़ा मार ही दो, लोहा जो गर्म है.
jawed ansari
July 25, 2009 at 4:59 pm
Aap ka lekh waise to bahut achcha hai lekin yeh sahi lagta ke ” Sach Ka Samna” jaise show ke doara samajik risto per koe asar hoga.Hara samaj kache dhage bana hua nahin hai, jaisa ke aap ne kaha hai ke log paise ke liye iss show meim participate kar rhain hai, To yeh kaise mana ja sakta hai ke ye jo riste bane hai wah paise ke abhaw mein bana hi rah sake? ek baat aur iss show mein jo participation ho rha hai wah kafi pada lika aur samajdar log hain jinka samaj mein ek rutba hai.Iss show se unki jindagi mein aisa kuch nahin asar pad sakta hai, unke liye ye nae baat nahin hai. Lekin iss “Sach Ka Samna” ka ek asar jarur hone wala hai ke logon mein yeh jagrukta jarur aane wala hai ke apne adhikaron ke bare mein netawo ko sach ka samna mein lane ki maang bad sakta hai.
Jahan tak Kambli aur Sachin ke riston ka sawal hai, wah us din hi khatm ho gya tha jab kamble ne retirement ki gosna kiya tha.Kambli yeh sach unko dus lakh jitwa diya tha jo unke liye kafi ahmiat rakhta hai.
Jo bhi ho Main aap ke iss baat se sahmat nahin hu ke “Sach Ka Samna” Band hona chahiye.
अनूप शुक्ल
July 25, 2009 at 5:13 pm
अच्छा लेख लिखा है। कांबली की प्रतिक्रिया सहज थी और उसने कोई पाप नहीं किया था।