ऐतिहासिक मंदी ने दुनिया भर के मीडिया संस्थानों की हालत ख़राब कर दी है। विस्तार की योजनाएं ठप पड़ी हैं। कई बड़ी कंपनियों पर कर्ज का बोझ बेतहाशा बढ़ गया है। बहुत से अख़बार बंद हो चुके हैं। वेबसाइट भी घाटे में हैं। लेकिन इन सब निराशाजनक ख़बरों के बीच द इकोनमिस्ट ने मुनाफा कमाया है। क्यों और कैसे – ये बता रहे हैं बॉन से ओंकार सिंह जनोटी। ओंकार एक ऐसे उभरते हुए पत्रकार हैं जिनमें असीम ऊर्जा है और व्यापक समझ भी। वो इन दिनों जर्मनी के डॉयचे वेले को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
डिजिटल एज कहे जाने वाले इस दौर में समाचारों में कमी नहीं है. लेकिन दुनिया भर में मशहूर और दिग्गज मानी जाने वाली टाइम और न्यूज़वीक मैग्ज़ीन की हालत ख़स्ता है. विज्ञापन से होने वाली आय के मामले में बीते साल न्यूज़वीक को 27 फीसदी नुकसान हुआ और टाइम को 14 फीसदी तिजोरी ख़ाली देखनी पड़ी. लेकिन पब्लिशर्स इंफार्मेशन ब्यूरो के मुताबिक़ द इकोनमिस्ट मैग्ज़ीन ने न सिर्फ मंदी को पटख़नी दी, बल्कि आमदनी को भी 25 फीसदी बढ़ाया. अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया पर बारीक नज़र रखने वाले द एटलांटिक डाट कॉम के कांट्रिब्यूटिंग एडीटर माइकल हाइशोर्न और एडीटोरियल डायरेक्टर बॉब काह्न कहते हैं कि अब वक्त बदल रहा है.
दरअसल 21 साल पहले 1988 तक न्यूज़वीक का सर्कुलेशन 35 लाख था, लेकिन बीते साल ये घटकर 27 लाख पर पहुंच गया. इससे भी बुरा हाल टाइम का रहा. 20 साल पहले 50 लाख प्रतियां बिकती थीं पर अब 34 लाख ही ख़रीदी जा रही हैं. माइकल हाइशोर्न कहते हैं कि एक दूसरे से लगातार आगे निकलने की होड़ में इन दोनों पत्रिकाओं से कमोबेश एक जैसी ही रणनीति बनाई और इसी का नुक़सान दिखाई पड़ रहा है.
बीते 20-21 साल में खाड़ी की लड़ाई से लेकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, फिर इराक़ और अफ़गानिस्तान जैसे मामले अमेरिका के सामने आए. सरकारों के साथ साथ इनसे जुड़ी ख़बरों को लेकर टाइम और न्यूज़ीवीक ने खूब वक्त बिताया. एक ने नौ लिखा तो दूसरे ने दस. दोनों पत्रिकाओं की सामग्री भी मिलती जुलती रही. लेकिन इनसे दूर द इकोनमिस्ट ने अपनी ख़बरों का विश्लेषण पाठक के लिए ब्याज के समान किया. ‘कुछ न कुछ ज़्यादा ही मिलेगा’ की तर्ज़ पर. बॉब काह्न कहते हैं कि द इकोनमिस्ट एक ख़ास वर्ग में अपनी पैठ बना चुकी है. आठ लाख प्रतियां बिक रही हैं.
उम्मीद है कि जल्द ही वह न्यूज़वीक को पीछे छोड़ देगी. अन्य मैग्ज़ीनों की तुलना में द इकोनमिस्ट पर डिजिटल मीडिया की मार कम पड़ी है या यूं कहें कि ये मार उसने सह ली है. यहां पर डिजिटल मीडिया का मतलब इंटरनेट और ब्लॉगिंग है. द इकोनमिक्स में सबकी पसंद के लिहाज़ से कुछ न कुछ है. ख़ुद को ग्लोबल एलीट मानने वाले समाज के बड़े तबक़े में इसकी मांग बढ़ती जा रही है. 6.99 डालर की द इकोनमिस्ट एक ऐसे वक्त में हर हफ्ते 75 हज़ार कापियां बेच रही है, जब सूचनाएं मुफ्त में मिल जाती हैं. ये सब डिजिटल मीडिया का कमाल है. लेकिन क्या डिजिटल मीडिया संचार के पुराने माध्यमों को ख़त्म कर देगा. कहा जा रहा है कि ख़त्म नहीं करेगा लेकिन उनकी जगह कुछ नया देगा. बॉब कहते हैं कि द इकोनमिस्ट का भी उदाहरण है इससे पता चलता है कि कैसे दम तोड़ते जंगल में जिंदा रहा जा सकता है.
द अटलांटिक डॉट कॉम के दोनों संपादक कहते हैं कि गुणवत्ता की जीत हमेशा होती है और द इकोनमिस्ट भी इसी का नमूना है. अपने आपको साप्ताहिक अख़बार कहने वाली इस पत्रिका के पास दुनिया भर की ख़बरें होती हैं. मैग्ज़ीन में दुनिया के प्रति चीन का नज़रिया होता है और रूस के साथ संबंधों की मरम्मत का लेखा जोखा. पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आतंकवाद को द इकोनमिस्ट पुराना लेकिन आर्थिक मदद से न ख़त्म होने वाला मर्ज़ बताती है. हर ख़बर की हेडलाइन में गज़ब की सटीकता और स्पष्टता है.
फ़रवरी में विज्ञान और तकनीक के पेज में द इकोनमिस्ट ने भीड़ पर लेख छापा. इसका सार था कि पुलिस किस तरह भीड़ को नियंत्रित कर सकती है. इसमें ब्रिटेन के एक प्रोफेसर ने बताया कि किस तरह की भीड़ हिंसा पर उतारू होती है और किस तरह की नहीं. ये सारी बातें ब्रिटेन की यूनिवर्सिटियों में हुई रिसर्च के हवाले से कही गईं.
हाल ही में मेक्सिको ड्रग मामले पर द इकोनमिस्ट ने लिखा कि इससे प्रतिबंध हटा देना चाहिए. मैग्ज़ीन ने बड़ी चतुरता से दुनिया भर में हुए कई सर्वे का जिक्र किया. ब्लॉगिंग के ज़रिए हो रही बहस को भी इसमें जोड़ दिया. लेख से लगने लगा कि ये ही तो समस्या का हल है. ये ख़बर भी ज़बरदस्त लोकप्रिय हुई. इसे उन्होंने भी पढ़ा जिनके पास फ़ैसले लेने की ताकत है. हाइशोर्न कहते हैं कि द इकोनमिस्ट ने लोगों को प्रभावित करने और ख़ुद को महत्वपूर्ण साबित करने की क्षमता हासिल कर ली है. ये पत्रिका ऐसी चीज़ें छाप रही है जो दुनिया की किसी दूसरी मैग्ज़ीन में नहीं मिलेंगी. यहां तक की कई घंटों तक गूगल में सर्च करने पर भी नहीं मिलेंगी. लेकिन इस दौर में अब सूचनाएं दोहराई जाती हैं, आगे बढ़ती हैं. ऐसे में द इकोनमिस्ट के प्रभावशाली विश्लेषण और इसके बाद मैग्ज़ीन की शानदार पैकेजिंग ने डिजिटल दौर में भी इसकी अलग पहचान बरक़रार रखी है.
इंटरनेट की दुनिया में भी अगर द इकोनमिस्ट को देखें तो न तो गूगल पर इसकी ख़बर का लिंक दिखाई देगा और न अन्य सर्च इंजनों पर. इस पत्रिका के पास अपने नाम की बेवसाइट तक नहीं है. इसे इकोनमिस्ट डॉट कॉम से काम चलाना पड़ रहा है. कई अन्य वेबसाइट्स पर सोशियल नेटवर्किंग साइट्स के लिंक मिलते हैं लेकिन द इकोनमिस्ट ने अपनी वेबसाइट को इससे दूर रखा है. हाइशोर्न का अंदाज़ा है कि द इकोनमिस्ट के कई ख़रीदारों को इसकी वेबसाइट की जानकारी तक नहीं है. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. न ही मैग्ज़ीन पर और न ही वेबसाइट पर. वेबसाइट पर वो पूरी जानकारियां नहीं रहतीं, जो ताज़ा मैग्ज़ीन में रहती हैं. हालांकि वेबसाइट पर ख़बरों की 20 श्रेणियां हैं और उन्हें मजबूती देता अर्काइविंग सिस्टम भी मौजूद है लेकिन द इकोनमिस्ट का सारा ध्यान मैग्ज़ीन पर ही है.
द इकोनमिस्ट को लगता है कि बेवसाइट संबंधी कुछ कमियां उसके लिए भाग्यशाली हादसों की तरह है. इस दौर में भी उसकी पहचान मैग्ज़ीन से ही है, जिसमें उसके पाठकों को वज़न लगता है. इंटरनेट की दुनिया में देखें तो टाइम की बेवसाइट पर हर महीने 47 लाख हिट आते हैं, न्यूज़वीक को भी 20 लाख हिट मिलते हैं. प्रिंट में इन्हें मात देती दिखाई पड़ रही द इकोनमिस्ट की वेबसाइट पर भी सात लाख लोग आ ही रहे हैं और संख्या बढ़ती जा रही है. यही वजह है कि अब टाइम जैसी पत्रिका को भी द इकोनमिस्ट की राह पकड़नी पड़ रही है. टाइम के संपादक ख़ुद यह कह चुके हैं कि वह हाई वैल्यू वाली द इकोनमिस्ट के प्रशंसक हैं. न्यूज़वीक भी बदलने जा रही है, इसमे कोई शक नहीं कि ये बदलाव कैसे होंगे.
नए अवतार में टाइम कुछ बेहतर हुई है. लेकिन इतना तय है कि पुरानी बुलंदियां रातों रात हासिल नहीं की जा सकेंगी. दोबारा ब्रांडिंग करने में करोड़ों डॉलर भी लगेंगे. लेकिन तब भी क्या द इकोनमिस्ट का फार्मूला अपनाने से सफलता मिल जाएगी, ये तय नहीं है. बॉब कहते हैं कि द इकोनमिस्ट की सफलता का राज़ सिर्फ उसका बेहतर होना ही नहीं है. न्यूज़वीक और टाइम के लिखने का तरीका कई बार द इकोनमिस्ट से बेहतर होता है. दोनों के पत्रकार दुनिया भर में घूमते हैं. लेकिन जो स्पष्टता द इकोनमिस्ट में है, वो इनमें नहीं. द एटलांटिक डॉट कॉम के कांट्रिब्यूटिंग एडीटर माइकल हाइशोर्न भी कहते हैं कि हर तरह के मीडिया के लिए वक्त से बदलना ज़रूरी हो गया है. उनके मुताबिक अब ख़ुद को बदलना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल भी हो गया हैं. उनके मुताबिक रेस्तरां, क्लब, खाने पीने का सामान बेचने वाली कई कंपनियों और फेसबुक की सफलता के उदाहरण से साफ है कि अलग और ख़ास पहचान होनी ज़रूरी है.
रमेश कुमार
July 27, 2009 at 3:49 pm
मीडिया में हो रहे बदलाव से जुड़ी एक अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद.
गौरव चौबे
July 27, 2009 at 4:32 pm
ओंकार जी, हम अपनी ही दुनिया में इतना उलझे रहते हैं कि दुनिया में क्या हो रहा है पता ही नहीं चलता। ग्लोबल मीडिया के बारे में इतनी अच्छी और वस्तुपरक, तथ्यात्मक जानकारी के लिए धन्यवाद।
टाइम मैगजीन ने एक समय में लोकप्रियता हासिल की थी तो उसकी वजह भी दुनिया भर के लोग हैं। सबने मिल कर उसे कोई नायाब चीज बनाया दिया था। आप भारत में ही देखिए टाइम मैगजीन में कुछ छप जाए तो लोग कहने लगते हैं अरे वाह… कमाल हो गया … देखा आपने … वाह क्या तीर मारा वगैरह वगैरह। जबकि हम सब जानते हैं कि वहां पर भी रिपोर्ट करने वाले लिखने वाले सब हमारे और आपके जैसे ही लोग हैं। बीते दस साल में कई ऐसे वाकये आए हैं जब टाइम मैगजीन ने ग़लत ख़बरों के लिए माफी मांगी है। फिर भी एक मिथक के तौर पर हम उसे पेश करते रहे। अब ये मिथक टूट रहा है।
द इकोनमिस्ट की कामयाबी के पीछे एक वजह ये भी हो सकती है कि दुनिया भर में सबसे विश्वसनीय ख़बरें पिंक पेपर … मैगजीन यानी बिज़नेस अख़बारों और पत्रिकाओं की मानी जाती है। दुनिया के तमाम कारोबारी और निवेशक उनकी ख़बरों को पढ़ कर बाज़ार का मूल्यांकन करते हैं और पैसा लगाते हैं। इसलिए उन पर भी ख़बरों को फूंक-फूंक कर देना का मानसिक दबाव ज़्यादा रहता है। मंदी के इस दौर में जब ज़्यादातर जगहों पर ऐरा-गैरा मसाला छप रहा था तो इकोनमिस्ट ने ख़बरों को विश्वनीय तरीके से पेश किया। उससे उसकी विश्वनीयता बढ़ी और इसका असर उसके कारोबार पर भी पड़ा।
आपके लेख से ये बात भी साबित होती है कि अगर कंटेंट में दम हो तो बिना ज्यादा शोर शराबे के भी कोई पत्रिका आगे बढ़ सकती है और कंटेंट में दम नहीं हो तो टाइम जैसी बड़ी पत्रिका का भी वक्त ख़राब हो सकता है।
अच्छी चीज पढ़वाने के लिए एक बार फिर धन्यवाद।