“सच का सामना” के बचाव में कई महारथी मैदान में उतर आए हैं। वीर सांघवी का कहना है कि अगर आपको रिएल्टी टीवी पसंद नहीं तो अपना मत रिमोट से जाहिर कीजिए। चैनल बदल दीजिए। वो भी ऐसा करते हैं इसलिए भारत के तमाम दर्शकों से उनकी अपील है कि वो भी ऐसा ही करें। वीर सांघवी के मुताबिक सच का सामना या फिर ऐसे किसी भी कार्यक्रम को बंद करना सेंसरशिप को बढ़ावा देना है। वो ऐसी किसी भी सेंसरशिप के पक्ष में नहीं।
मीडिया से जुड़ी चर्चित वेबसाइट “एक्सचेंज फॉर मीडिया” पर एक लेख छपा। चार दिन पहले। कोई प्रद्युमन महेश्वरी हैं। मीडिया के बड़े जानकार मालूम होते हैं। उन्होंने सरकार से कहा है कि वो टीवी चैनलों को उनके हाल पर छोड़ दें। वो “सच का सामना” के समर्थन में यहां तक कह देते हैं कि नेताओं की कई हरकतें ऐसी होती हैं जिनसे बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। तो क्या उन पर भी पाबंदी लगा दी जाए। यह भी कहते हैं कि सभी चैनलों को इस कार्यक्रम के समर्थन में एकजुट हो जाना चाहिए।
अब आप समझ सकते हैं कि “सच का सामना” के समर्थन में कितने बड़े-बड़े लोग मैदान में उतर आए हैं। इस बीच एक ख़बर यह भी है स्टार प्लस ने इस शो को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। इसके समर्थन में पूरी फौज खड़ी की जा रही है। नए-नए तर्क गढ़े जा रहे हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी और क्रिएटिविटी को सबसे मजबूत ढाल के तौर पर पेश किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अगर “सच का सामना” रोका गया तो ये रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की हत्या होगी। बचाव की इन दलीलों में कितना दम है इस पर हम विस्तार से चर्चा करेंगे। शुरुआत करते हैं कि आखिर सच का सामना में रचनात्मकता कितनी है और कितनी नहीं?
“सच का सामना” एक नकल है। अमेरिका के रिएल्टी सो “मूमेंट ऑफ ट्रूथ” की नकल। अंग्रेजी का हिंदी संस्करण। सवाल उठता है कि क्या कोई नकल रचनात्मक हो सकती है? हर कृति के पीछे एक सिद्धांत होता है। एक विचार होता है। इसलिए हम किसी भी कृति को रचनात्मक तभी कह सकते हैं जब वो एकदम नई हो। उससे जुड़ा विचार एकदम नया हो। यहां ये कहा जा सकता है कि इस परिभाषा के आधार पर दुनिया की कई ऐतिहासिक रचनाएं क्रिएटिव नहीं मानी जाएंगी। लेकिन रचनात्मकता की परिभाषा में एक और बात जुड़ी है। वो ये कि अगर कोई नकल पहले से मौजूद किसी विचार, किसी कृति को नया आयाम, नए मायने देती हो उसे भी रचनात्मक (क्रिएटिव) कहा जा सकता है।
मैंने “मूमेंट ऑफ ट्रूथ” कभी नहीं देखा है। भारत में उसका कभी प्रसारण ही नहीं हुआ तो देखता कैसे? लेकिन उसके बारे में पढ़ा जरूर है। और उससे ये कह सकता हूं कि अमेरिकी शो “मूमेंट ऑफ ट्रूथ” और स्टार प्लस के “सच का सामना” में कोई अंतर नहीं है। दोनों में 21 सवाल और छह पड़ाव हैं। दोनों को पेश करने का तरीका एक है। यहां तक कि दोनों का बंपर भी एक जैसा ही है। बस अंतर है तो किरदारों का। प्रतियोगियों का। फिर इसे क्रिएटिव कैसे कहा जा सकता है? ये शुद्ध तौर पर एक नकल है और इसमें कोई क्रिएटिविटी नहीं है।
अब वो दलील कि इससे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ख़तरा है। सेंसरशिप को बढ़ावा मिलेगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मैं पक्षधर हूं और सेंसरशिप का विरोधी। ऐसे किसी भी कानून का विरोध करता हूं जो इस मौलिक अधिकार के आड़े में आए। लेकिन अभिव्यक्ति की आज़ादी और अराजकता में कुछ तो अंतर होगा? सच का सामना का मसला अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ा हुआ नहीं है। यह तो मुनाफा कमाने की होड़ में अराजक होना है। मूमेंट ऑफ ट्रूथ अमेरिकी समाज को देखते हुए बनाया गया है। वहां बहुत सी चीजें ऐसी हैं जिन्हें अगर भारत में हू-ब-हू लागू कर दिया जाएगा तो भूचाल आ जाएगा। लेकिन किसी के भेजे में यह बात घुसती ही नहीं।
बड़े-बड़े लोग भारत को अमेरिका बना देना चाहते हैं। अमेरिका की अच्छाइयां यहां लागू नहीं होंगी, लेकिन सारी बुराइयों को सामाजिक परिवर्तन के नाम पर लागू कर दिया जाए। क्यों नहीं कहा जाता कि सरकार शिक्षा पर पैसे खर्च करे। हमारे मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल जब कहते हैं कि सरकार की औकात इतनी भी नहीं कि एक केंद्रिय विद्यालय खुलवा सके तो कोई कुछ नहीं कहता। कोई ये नहीं पूछता कि जब इतनी औकात नहीं तो फिर इमेजिंग इंडिया के नाम पर डेढ़ लाख करोड़ रुपये खर्च करने की क्या जरूरत है? भारत के लोगों को पहले शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और खाना चाहिए या फिर यूनीक नंबर? इसलिए “सच का सामना” को अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ना ग़लत है। मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोसने की वकालत मत कीजिए।
यह तर्क तो निहायत ही घटिया है कि हमारे नेता बहुत कुछ ऐसा करते हैं जो ख़राब लग सकता है। फिर उन पर पाबंदी क्यों नहीं लगे। कुछ नेता ख़राब काम करते हैं तो क्या सभी को ख़राब काम करने का हक़ मिल जाना चाहिए? ये तो अराजकता को दावत देने जैसा है। इस तर्क के हिसाब से अपराध, भ्रष्टाचार जैसी बुराइयों को भी जायज ठहराया जा सकता है। कहा जा सकता है कि नेताओं पर भी क़त्ल के आरोप लगे हैं तो जनता को भी क़ातिल होने दीजिए। चंद नेताओं पर बलात्कार के आरोप हैं तो जनता को भी बलात्कारी होने दीजिए।
एक्सचेंज फॉर मीडिया पर लिखने वाले ने ये अपील भी की है कि सारे चैनलों को एकजुट हो कर सच का सामना के ख़िलाफ़ किसी भी कार्रवाई का विरोध करना चाहिए। आज स्टार प्लस पर कानूनी डंडा चला तो कल कलर्स और दूसरे चैनलों पर चलेगा। यह अपील भी खूब है। चोरी और सीनाजोरी। यह कुछ ऐसा ही शहाबुद्दीन जैसा कोई शख़्स अपराध कर, अपने इलाके में जाकर छुप जाए। ताकि पुलिस जब कार्रवाई के लिए पहुंचे तो इलाके के लोग उसका बचाव करें।
आजकल एकजुटता का इस्तेमाल भी खूब होता है। विज्ञापन चाहिए तो एकजुट होकर कटोरा फैलाओ। सॉफ्ट लोन चाहिए तो एकजुट होकर दबाव बना दो। बेलआउट पैकेज चाहिए तो भी एकजुट हो जाओ। मतलब एक हो जाओ और जो मन में आए सो करो। फिर मन करे तो महिला को निर्वस्त्र किए जाने की तस्वीरें बार-बार दिखाओ। मासूम गवाहों की तस्वीरें नाम और पते के साथ फ्रंट पेज पर छाप दो। हॉलीवुड की अभिनेत्रियों की अर्धनग्न तस्वीरों पर एक-एक घंटे का प्रोग्राम बना कर पेश कर दो। जितना हो सके नंगई पैलाओ।
आखिर में बस इतना ही कि भारत को अमेरिका मत बनाइए। इसे भारत ही रहने दीजिए। हमारी अपनी समस्याएं कम नहीं हैं। आज भी 70 फीसदी से ज़्यादा लोग गरीब हैं। इलाज नहीं मिलने से लोग मरते हैं। भूख है। बेबसी है। जाति का ज़हर है। धर्मांध दूसरों का लहू बहाते हैं। घर और बाहर दोनों जगह महिलाएं सिसकती हैं। अगर एकजुट होना ही है तो देश में नई बुराइयों और चुनौतियों को दावत देने के लिए नहीं बल्कि सकारात्मक सामाजिक और आर्थिक बदलाव के लिए एकजुट हों।
इस लेख में जिन तथ्यों का जिक्र हुआ है उनके बारे में जानने के लिए लिंक नीचे दिए जा रहे हैं -
1) सच का सामना पर वीर सांघवी का लेख
arvindshesh
July 27, 2009 at 6:06 pm
bahut badhiya samrendra ji. mai abhi apne gaon me hoon. aakar mai bhi is par likhunga…
विजय प्रकाश
July 27, 2009 at 6:24 pm
वीर सांघवी का यह कहना अगर आपको रिएल्टी टीवी पसंद नहीं तो अपना मत रिमोट से जाहिर कीजिए.यह कहना ठीक ऐसे ही है की हम नंगे है, ऐसे ही रहेंगे, आप को अच्छा न लगता हो तो न देखें.चलो माना वीर जी मानसिक रूप से परिपक्व हैं और ऐसे “सच”न देखने का निश्चय निभा लेते हों.
किन्तु वर्जित फल में आकर्षण होता है और जो कच्ची उम्र के हैं उनका क्या? उनकी मानसिकता पर इस तथाकथित सच से क्या प्रभाव पड़ेगा,इस बारे में सोचने की आवश्यकता है.
और जहां तक सेंसरशिप को बढ़ावा देने वाली बात है आप बुद्धिजीवी नंगई के पक्ष में ही हो हल्ला क्यों मचाते हैं? सेंसरशिप के कई और पहलू भी हैं कृपया उन पर भी तो ध्यान दिजिये.
विजय प्रकाश
समरेंद्र
July 27, 2009 at 6:25 pm
अरविंद जी, आप आइये। आपको बहुत से मुद्दों पर बहुत कुछ लिखना है। मैं इंतज़ार कर रहा हूं।
रंगनाथ सिंह
July 27, 2009 at 7:26 pm
लगता है एकजुट होना ही पड़ेगा !!