बीते एक सप्ताह में टेलीविजन चैनलों ने एक ख़ौफ़नाक युद्ध को उत्सव बना दिया। और एक अजीब से राष्ट्रप्रेम में करगिल की तथाकथित जीत का ये उत्सव मनाया गया। एक चैनल ने कहा “ज़रा याद करो कुर्बानी” … दूसरे चैनल से आवाज़ आई… “जां तक लुटा जाएंगे”… तीसरे ने कहा… अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। जोर-शोर से विजय दिवस मनाया गया और उन शहीदों को याद किया गया। उन शहीदों को मेरी तरफ से भी श्रद्धांजलि। लेकिन ये पूरा उत्सव (वैसे इसमें उत्सव जैसा कुछ भी नहीं) ख़त्म हो गया, विजय दशमी मना ली गई। और इक्का दुक्का उदाहरणों को छोड़ कर कहीं कोई गंभीर बात नहीं हुई।
करगिल सैनिकों के लिए जीत थी। लेकिन वो युद्ध हुआ तो भारत की नाकामी की वजह से। हमारी सीमा में पाकिस्तानी सैनिक घुस आए और बंकर बना लिये। हमारे पास खुफिया रिपोर्ट थी। बीएसएफ और खुफिया एजेंसियों के पास जानकारी थी। लेकिन वक़्त पर कार्रवाई नहीं हुई। वो सरकार की नाकामी ही थी कि एक युद्ध हमें अपनी सीमा के भीतर लड़ना पड़ा। हमारे 527 जवान मारे गए, 13 सौ से ज़्यादा जवान घायल हुए। मगर एक भी मंत्री और अधिकारी पर आंच नहीं आई। करगिल रिव्यू कमेटी की सिफारिशों पर भी पूरी तरह अमल नहीं हुआ। यहां तक कि जिस युद्ध के लिए बीजेपी की सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहिए था। उसी युद्ध को जीत साबित करके वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए। आज दस साल बाद भी मीडिया का चेहरा नहीं बदला है। बीते एक दशक में हमने बहुत से जख़्म सहे हैं। लेकिन सच्ची बात कहने से हम आज भी कतराते हैं।
सभी चैनलों ने सिर्फ भावनात्मक मुद्दों को ही छुआ। आज तक जैसे कुछ चैनलों का जोर यही बताने पर रहा कि दस साल पहले भारतीय सेना के साथ उसने भी इतिहास रच दिया था। तब आज तक चैनल नहीं था। एक आधे घंटे का प्रोग्राम था। मगर रिपोर्टरों की फौज तो उसने भी भेजी थी। एनडीटीवी ने भी कमोवेश इसी तर्ज पर रिपोर्टिंग की। बरखा दत्त घूम घूम बताती रहीं कि दस साल पहले उन्होंने किन जगहों से रिपोर्टिंग की थी। तब वहां क्या दृष्य था। गोलियों की आवाज़। तोपों की गड़गड़ाहट। जो चैनल दस साल पहले अस्तित्व में नहीं थे… वो भी ये बताते नहीं थके कि उनके पास भी कुछ ऐसे लाल हैं, जिन्होंने जान जोखिम में डाल कर करगिल की रिपोर्टिंग की थी।
अच्छी से अच्छी चीज भी ज़्यादा हो जाए तो नुकसान करती है। देशप्रेम भी अगर आपको सही सोचने से रोके और उन्माद की हद तक पहुंचा दे तो यह भी घातक है। देशभक्ति को भुनाने के लिए एक चैनल आईबीएन 7 पर आंसुओं की गंगा बहने लगी। मेहमानों के ग़म में डूब कर एंकर भी आंसू बहाने लगी। मेहमानों ने तो खुद पर काबू पा लिया। आखिर शहीद के मां-बाप थे। बीते दस साल में उन्होंने न जाने कितनी बार अपने जिगर के टुकड़े की याद में आंसू बहाए होंगे। अब आंसुओं को पलकों के भीतर छुपाना आ गया है। ग़म को जाहिर किए बगैर जीना आ गया है। लेकिन कुछ ज़्यादा ही भावुक एंकर खुद पर काबू नहीं पा सकी। भर्रायी आवाज़ के साथ एंकरिंग करती रही… आंसू बहते रहे … ये देशभक्ति का ये सुपहिट तमाशा था। कितना चला कितना नहीं … ये टीआरपी से पता चलेगा। वैसे उस चैनल की टीआरपी इन दिनों गिरी हुई है।
इस पूरे उन्माद के बीच रविवार को एनडीटीवी के हम लोग में थोड़ी गंभीर बहस हुई। पंकज पचौरी स्टाइल में। वो आंकड़ों के खिलाड़ी हैं… कुछ कागज भी साथ रखते हैं। एक चार्जशीट तैयार कर आए थे। करगिल रिव्यू कमेटी की सिफारिशें जो लागू नहीं हुई हैं उनका ब्योरा लाए थे। इसलिए हमलोग में थोड़ा अटक-अटक कर ही सही एक गंभीर बात तो हुई। वरना इन चैनलों ने तीन दिन तक दर्शकों पर खूब इमोशनल अत्याचार किया है। मैं एक दर्शक की हैसियत से ये बात कह रहा हूं। इसका जनतंत्र से कोई लेना-देना नहीं।
करगिल पर कुछ रिपोर्ट जो पढ़ी जा सकती हैं।
1) करगिल रिव्यू कमेटी की सिफारिशें
2) करगिल युद्ध के दौरान इंडिया टुडे का खुलासा
4) करगिल युद्ध पर एशियन एज की रिपोर्ट
5) युद्द का आर्थिक असर– इंडिया टुडे
nirmla.kapila
July 27, 2009 at 7:57 pm
सच कहें तो ये विजय अभियान मनाना ही शर्मनाक बात थी। ये तो शोक दिवस के रूप मे उन वीरों को श्रद्धांजलि के रूप मे मनाना चाहिये था, जो सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। इस दिन को विजय अभियान के रूप मे ताम झाम से मनाना उन शहीदों के जख्मों पर नमक छिडकने जैसा है। और हैरानी की बात है कि किसी ने भी इसके ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठाई आपने ये बात उठा कर बहुत साहस का परिचय दिया है।
मेरी एक कविता से दो पँक्तियां -
ये है मेरा हिन्दोस्तान
पडोसी देश से नहीं है खतरा
बस यात्रा अपना सिद्धाँत
फिर भी हो कारगिल घटना
तो सरकार मनाये विजय अभियान
ये है मेरा हिन्दोस्तान
बहुत बहुत आभार्