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"…तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति"

अगर आधे घंटे का एक टेलीविज़न शो सदियों पुरानी संस्कृति को उखाड़ फेंक रहा हो, तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति। ऐसी कमज़ोर और बेबुनियाद संस्कृति, जो हज़ारों साल पुरानी होने का दम भरती हो और दुनिया की सबसे मज़बूत तहज़ीब, सबसे सम्मानित समझी जाती हो।

सच का सामना सिर्फ़ भारत ही नहीं कर रहा, यहां जर्मनी में भी हो रहा है. इंडियन लोगों में चर्चा हो रही है और बहस भी। लेकिन ताज्जुब इस बात पर कि जब सात समंदर पार समोसा और बिरयानी को नहीं भुला पाए, जब अरहर की दाल के बिना दिन का खाना पूरा नहीं होता, तो ख़ुद अपने देश में एक बनावटी और नक़ल किया हुआ शो कैसे तहज़ीब पर ख़तरा बन सकता है।

जो लोग इसे अमेरिका के नक़्शे क़दम पर चलने की बात बता रहे हैं, ज़रा एक बार फिर सोचें। आप कहां अमेरिका के पीछे नहीं चलते. क्या पहनावे में नहीं चलते। शर्ट पैंट और टाई में नहीं चलते, बर्गर सैंडविच के साथ नहीं चलते। क्या ये आपकी ज़िन्दगी के अहम हिस्सा नहीं बन गए हैं। क्या आप जिस कंप्यूटर पर अभी पढ़ रहे हैं, उसमें अमेरिका के पीछे पीछे नहीं चल रहे। तो फिर काहे की परेशानी. दो तरह का पैमाना रखने की क्या ज़रूरत। ज़्यादातर लोकप्रिय टीवी शो की तरह सच का सामना भी एक नक़ल है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

और नक़ल होने दीजिए। लोग ख़ुद तय कर लेंगे कि कौन सी नक़ल उनके लिए ठीक है, कौन नहीं। अब तक वे ऐसा ही तो करते आए हैं। उन्हें मौक़ा तो दीजिए। संसद में और यहां वहां हवा बना कर क्यों कन्फ़्यूज़ कर रहे हैं।

पिछले 15 साल में टेलीविज़न चैनलों का इतिहास रहा है, न सिर्फ़ भारत, बल्कि पश्चिमी देशों में भी। जब भी कोई नया रियालटी या गेम शो शुरू होता है, लोगों में दिलचस्पी जगती है और कुछ दिनों बाद बाज़ार मंदा हो जाता है। फिर आता है नया शो, कुछ नए तेवर और विवादों के साथ। फिर कुछ दिन इनके चलते हैं, फिर तीसरे की ज़रूरत पैदा हो जाती है। मिसालें आपके सामने हैं। हू वान्ट्स टू बी मिलेनियर का हिन्दी संस्करण कौन बनेगा करोड़पति जब हिट था,तो था, जब पिटा तो ऐसा कि तीसरी सीरीज़ बनाने की हिम्मत ही नहीं हुई। द वीकेस्ट लिंक पर आधारित कमज़ोर कड़ी कौन भी कभी हिट था, फिर इश्तेहार के लाले पड़ने लगे। ब्रिटेन में कभी आर यू बेटर दैन के फ़िफ़्थ ग्रेडर की तूती बोलती थी, जिसकी नक़ल शाहरुख़ के साथ क्या आप पांचवीं पास से तेज़ हैं। लेकिन फिर यानी ऐसी चीज़ों का आना जाना लगा होता है, हर बार आप दूसरे का नक़ल कर लेते हैं और कभी भी आपकी संस्कृति उनके साथ कहीं और नहीं निकल गई। सो इस बार भी नहीं निकलेगी।

हाल के दिनों में जो रियालटी शो आ रहे हैं, बिग ब्रदर्स से लेकर जंगल तक में रहने का या फिर सच का सामना। हर जगह निजी ज़िन्दगी की उधेड़बुन और गहरे छिपे राज़ सामने आ रहे हैं। बड़ी दिलचस्पी होती है किसी का राज़ जानने में। पड़ोसियों के, अपने साथ काम करने वालों के। फ़लां का अफ़ेयर किससे चल रहा है, फ़लां की बीवी किसके बारे में क्या सोचती है?

एक बात और जो समझ में आती है, भागदौड़ की ज़िन्दगी ने लोगों का बहुत कुछ छीना है। यार दोस्त भी छीन लिया और राज़दार भी। अब अपनी बात बताने को पेट में कुलबुली होती है लेकिन कोई ऐसा मिलता नहीं। बीवी को बता दिया तो तलाक़ की नौबत आ सकती है। ऐसे में दसेक साल पहले एक आभासी दोस्त मिला था। इंटरनेट. चैट पर किसी को दोस्त बनाती और घंटों बतियाती, दिल का हर राज़ बताती एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई। लेकिन कमी तो खलती है न। वह आभासी शख़्स कौन है? कैसा दिखता है? कोई गारंटी नहीं। दिल का राज़ बता रहे हैं सैन फ्रांसिस्को की किसी 21 साला सारा पार्कर को और यह बात हमें पता भी न लग पाई कि वह राज़ जा रहा था नोएडा के किसी 37 साल के गौरव के पास, जो सारा बन कर मज़े ले रहा था।

तो वर्चुअल यानी आभासी दुनिया से निकल कर रीयल लाइफ़ में खेलना ज़रा दूसरी अनुभूति देता है। लोगों के राज़ जब पता लगते हैं तो मज़ा आता है। और ऐसे लोग ज़रा जाने पहचाने हों तब तो और मज़ा आता है। खाने में तड़का लग जाता है। ऐसे रियालटी शो में पूरे फ़ेमस लोग तो नहीं आते। उनके पास काम ज़रा ज़्यादा रहता है, तो इनकी कोशिश होती है फ़्लॉप हीरोज़ को साथ लाने की। शिल्पा शेट्टी जब बॉलीवुड के लिए बेगानी हो चलीं, तो उन्हें बिग ब्रदर्स में मौक़ा दिया गया। राहुल महाजन और मोनिका बेदी को इंडियन बिग ब्रदर्स में और विनोद कांबली सरीखे लोगों को सच का सामना में। ज़ाहिर है यह मौक़ा उन्हें एक बार फिर चर्चा में ले आता है।

तरीक़ा बहुत आसान है। जैसे आप बच्चों को सिखाते हैं कि भला क्या है, बुरा क्या। फिर भी कुछ बच्चे शराब पीने लग ही जाते हैं, कुछ सिगरेट पर रुक जाते हैं और कुछ ड्रग्स तक पहुंच जाते हैं। और ऐसी रिवायत हर जगह है। वेस्टर्न देशों में भी आपको ख़ूब टी-टोटलर मिलेंगे। कॉफ़ी तक से परहेज़ करने वाले मिल जाएंगे। कहेंगे कि अगर दो कप कॉफी पी ली तो रात को नींद नहीं आएगी। वैसे ही सच का सामना देखने वालों को भी ख़ुद ही फ़ैसला कर लेने दीजिए। क्या परेशानी है? वीर सांघवी अगर कहते हैं कि वह रिमोट का इस्तेमाल करेंगे तो ऐसा और लोग भी कर सकते हैं। अगर वाक़ई शो संस्कृति को मार रही हो तो फिर संस्कृति ही इसे मार देगी। भारत की संस्कृति कोई जुमा जुमा आठ दिन की संस्कृति तो है नहीं। आप शो का टीआरपी ज़ीरो पहुंचा दीजिए, फिर ख़ुद ब ख़ुद दुकान बंद करनी होगी।

और जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, ज़रा एक बार यह भी सोचिए कि क्या आप इसका विरोध कर रहे हैं या इसका प्रचार। जिस चीज़ की जितनी ज़्यादा चर्चा होगी, उस चीज़ को लेकर लोगों की दिलचस्पी उतनी ज़्यादा होगी। तो आप इसका विरोध करके दरअसल आप शो वालों को फ़ायदा ही पहुंचा रहे हैं।

जर्मनी के बॉन से वरिष्ठ पत्रकार अनवर जमाल अशरफ़

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14 Responses to "…तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति"

  1. राकेश सिंह Reply

    July 28, 2009 at 3:07 am

    अनवर जमाल अशरफ़ जी ये आपसे किसने कह दिया कि ये रियलिटी शो पूरी भारतीय संस्कृति को उखाड़ फेंक रही है ? ये आपके दिमाग का फितूर है कि आप ऐसा समझ रहे हैं | सच का सामना एक बहुत ही वाहियात प्रोग्राम है जिसका विरोध होना ही चाहिए | क्या आप चैनलों की धोखाधड़ी का समर्थन करते हैं |

    ब्लॉग में लिखते समय भाषा की एक मर्यादा होती है | भांड़ में जाए ऐसी संस्कृति का क्या मतलब है?

  2. Atul Kumar Reply

    July 28, 2009 at 3:34 am

    I totally agree with Mr. Anwar Jamal Ashraf’s comment. I think Indian culture and civilization is so strong that one such show can not damage it in anyway. I would like to thank Mr.Anwar for his wonderful assessment and a marvellous satire.
    Thanks, Atul.

  3. भारत भारती Reply

    July 28, 2009 at 7:56 am

    भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति – bhai tu india aaja fir bat karte h !!

    bat to teri sunane layak thi lekin…..

    bhad me jaye wo tamij jo kucch likhte waqt gayab ho jati h …..

    bhai, pahle tu india aa ja fir bat karte h…..

  4. Neeraj Rohilla Reply

    July 28, 2009 at 3:13 pm

    Finally, someone who can write some sense about this non-sense.

    Taajjub ki baat hai ki sirf “Bhaad mein jaaye” ke naam se hi logon ko mirchi lag gayee. Kya hota ja raha hai logon ko? Jis baat se hum sehmat nahin kya woh har baat galat hai?

  5. अनवर जी..बहस बहुत दिनों से गर्म है…लेकिन मैंने अब तक ऐसा संतुलित लेख नहीं पढ़ा। इसके लिए आपको बधाई कि आप बौद्धिक सड़ांध के भेड़ियाधसान में जीने वाले लोगों से दो दो हाथ करने से नहीं डरे….जिन्हें सही मायने में ये ही समझ में नहीं आता कि वो असल में सच का सामना का विरोध कर क्यों रहे हैं? ना ही उन्हें आपका ये लेख समझ में आया..ना ही उन्हें वो प्रोग्राम ही समझ में आता है..। संस्कृति के इन ठेकेदारों की कुछ टिप्पणियों को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे देश के इस आक्रोशित आबादी का मानसिक स्तर कितना
    उम्दा है। जिन्हें आपके कुछ शब्दों का अर्थ तक नहीं समझ में आया…भला उन्हें वो आधे घंटे का एक प्रोग्राम कितना समझ में आएगा…जिसमें महज समाज…संस्कृति या फिर मनोविज्ञान ही नहीं बाजार भी इन्वाल्व है..।
    बहुत अजीब बात ये है कि इनमें से कोई भी उस शख्स को लानत मलानत नहीं भेजता..जो एक करोड़ रुपए के लिए
    ना केवल अपनी बल्कि अपने से जुड़े लोगों की भी मर्यादाएं सरेबाजार नीलाम कराने को तैयार है..। एक बार फिर
    आपको ढ़ेर सारा साधुवाद…आपने लोगों को इस पूरी बहस में सोच का एक नया आयाम दिया है…

  6. अजित Reply

    July 28, 2009 at 11:38 pm

    अनवर जी

    भाड़ में जाए वाली लाइन समेत आपका ओपनिंग स्टेटमेंट मझे भी आपत्तिजनक लगा। आपकी इस लाइन को पढ़कर मुझे दो खास लोग याद आ गए, उनमें से एक थे एक वामपंथी क्रांतिकारी जो अक्सर ही कहा करते थे कि,
    भाड़ में जाए वो देश जहाँ कुत्ते बिस्किट खाते हैं,कारों में घूमते हैं और दूसरी तरफ गरीब दो रोटी को तरस तरस कर पथरीली जमीन पर एड़िया दरेर दरेर कर मर जाते हैं।

    दूसरे थे हमारे कालोनी के गप्पू दादा, जो अक्सर कहा करते थे,

    भाड़ में गए वो जवानी जिसमें………..जिसमें……….।

    आप समझ गए होंगे कि गप्पू दादा किन धर्मार्थ कार्यों की बात करते थे…….

    तीसरे आप मिले जो एक सीरियल को आपत्तीजनक मानने के कारण पूरी भारतीय संस्कृति का भाड़ में झोंकने की सलाह दे रहे हैं।
    इन तीन उदाहरणों से जाहिर है कि लोग अलग अलग कारणों से अलग-अलग चीजों को भाड़ में झोंकना चाहते हैं।

    खैर आपकी व्यक्तिगत राय का हम सम्मान करते हुए आप से पूछना चाहते हैं कि जब किसी कल्चर इश्यू पर कोई बहस चल रही हो और तभी बीच में कोई खड़ा हो, विपक्ष से चिल्लाकर कहे कि,

    भाड़ में जाओ तुम सब लोग, जो मुझसे असहमत हो……!!

    आप को कैसा लगेगा इस पर विचार कीजिएगा। आप की भाषा कितनी अलोकतांत्रिक और मूलतः अधिनायकवादी है।
    अनवर जी आप ने लिखा है,
    “ऐसी कमज़ोर और बेबुनियाद संस्कृति, जो हज़ारों साल पुरानी होने का दम भरती हो…………और दुनिया की सबसे मज़बूत तहज़ीब, सबसे सम्मानित समझी जाती हो।”

    हो सकता है कि भारतीय संस्कृति कमजोर हो और जैसा कि आप ने कहा है, यह बेबुनियाद हो यानि इसकी कोई बुनियाद न हो !!
    और लोग झूठ मूठ का ऐसा कोई दम भरते हों…..

    हो सकता है कि, इसे दुनिया की सबसे सम्मानित और मजबूत तहजीब समझना लोगों की भारी भूल हो !!

    लेकिन आप… इन आप्त वाक्यों के बिना भी अपनी बात रख सकते थे ??

    अगर मैं गलत हूँ तो,
    कृप्या इस टिप्पणी को भी उसी भाड़ में झोंक दीजिए।

    आज ही किसी ब्लाग पर एक शेर पढ़ा, आप जरा गौर फरमाइगा…

    कुछ तो तुर्शी बयान में रखिये

    एक लज़्ज़त ज़बान में रखिए

    • Anwar J Ashraf Reply

      July 29, 2009 at 11:46 am

      प्रिय अजितजी,
      काश, भीड़ में घुसने की जगह आप भी नीरज रोहिल्लाजी या विवेक सत्य मित्रम की तरह विवेक के साथ उस लाइन का मतलब समझ लेते. ज़रा इस तंज़ को समझ लेते कि ऐसा कोई ऐरा ग़ैरा कार्यक्रम हमारी संस्कृति को नहीं छील सकता. मेरी सलाह है कि आप इस लेख को दोबारा पढ़ें.
      -अनवर

      • चण्डीदत्त शुक्ल Reply

        September 21, 2009 at 6:03 pm

        ख़ूबसूरत लेख लिखा है अनवर साहब ने…अब मुझ पर टिप्पणीकार ना चढ़ बैठें कि शब्द कैसे ख़ूबसूरत हो सकते हैं? वो कोई सुंदरी तो हैं नही, जो ख़ूबसूरत होते हैं। साहब जी, कुछ चीज़ें सेटायर के तौर पर, कटाक्ष की माफ़िक लिखी जाती हैं…उन्हें इतना दिल-से लगाने की ज़रूरत ही नहीं है। अनवर भाईजान की बातों को समझने में कहीं ना कहीं चूक हो गई है…बस इतना ही है…। भारतीय संस्कृति से उनके प्रेम पर शक करना किसी भी भारतीय पर शक करना है, क्योंकि वो मज़बूती के साथ बताते हैं…भारत की संस्कृति कोई जुमा जुमा आठ दिन की संस्कृति तो है नहीं।
        जो दगा दे, उसे कब तक दोस्त मानते रहें। यही नहीं, जो कुछ खा-पी लेने से भ्रष्ट हो जाए, वो धर्म नहीं है। जो चूं-चूं का शोरबा जैसे प्रोग्रैम से नष्ट हो रही है, उस संस्कृति को लेकर क्यों रोते रहें? आप नहीं मानते ऐसा, तो फिर डर कैसा…भारतीय संस्कृति कल-परसों की तो है नहीं…फिर हाय-तौबा क्यों?
        मैं विषयांतर नहीं कर रहा…मैं तो मज़े-मज़े में एक ज़रूरी बात कर रहा हूं कि सच का सामना जैसे कार्यक्रम अगर किसी संस्कृति से बड़े हों, तब ज़रूर उनसे डरिए…लेकिन भोंपू बजाऊ टीवी प्रोग्रैम की क्या हैसियत है साहब और अनवर साहब ने एक सच्ची बात कह दी तो राशन-पानी लेकर उन पर चढ़ दौड़े। भला क्यों? हमारी संस्कृति अक्षुण्ण है, अटूट है, कभी नहीं झुकेगी…सच का सामना जैसे खोखले कार्यक्रम संस्कृति का क्या बिगाड़ लेंगे। विचित्र मणि की बात से मैं सहमत हूं कि आप जो चीजें मना हैं, सबके सामने नहीं करने लगते, लेकिन क्या इस आदर्शवाद की बिना पर हर तरह के कार्यक्रम बैन किए जा सकते हैं? फ़िल्म दीवार का वो डायलाग याद है ना…पहले उस आदमी को लाओ, जिसने मेरे माथे पर लिख दिया था…तेरा बाप चोर है…सारी बुराइयां खत्म कर लो भाई, फिर बिना वज़ह अपनी एनर्जी सच का सामना जैसी फालतू चीज के पीछे खर्च करना। दोस्तों…ये मत समझिएगा कि मैं सच का सामना का समर्थक हूं…मैं तो खुद ये प्रोग्रैम देखता ही नहीं हूं…सच कम, सेक्स ज्यादा…पर महत्वहीन चीजों को इतना ज्यादा महत्व देना भी उनका समर्थन करना ही है..इसलिए इस इश्यू से ब्रेक लीजिए और आइए कुछ ज़रूरी बात में जुटें। और भी ग़म है ज़माने में इस बेमुराद के सिवा।

        • आईएम नागार्जुन Reply

          September 25, 2009 at 3:50 am

          अरे भई चंडीदत्त, इस मुद्दे पर तो करीब दो महीने पहले ब्रेक लिया जा चुका है। बड़े-बड़े महारथी तलवार भांज कर चले गए। आप बहुत देर बाद मैदान में कूदे हैं और दूसरों को ब्रेक लेने की सलाह दे रहे हैं। रही बात संस्कृति कि तो अनवर ने ठीक ही कहा था अगर “सच का सामना” से संस्कृति को ख़तरा होगा तो संस्कृति इस कार्यक्रम को मार देगी। आप सबने देखा कि कैसे यह प्रोग्राम तीन महीने के भीतर ही समेट दिया गया। और तीन महीने बाद भी हमारी संस्कृति पहले जैसी ही है। आज भी अख़बारों में महिलाओं के बलात्कार की ख़बरें छपती हैं। देश की राजधानी में आए दिन दहेज के लिए महिलाएं जला दी जाती हैं। जाति के नाम पर लोगों के साथ भेदभाव उसी तरह जारी है। धर्म के नाम पर भीड़ उसी तरह वहशी बन जाती है। यह भी गौर फरमाइए कि सच का सामना करने जितने भी लोग पहुंचे उनमें से एक भी इतना सच्चा नहीं निकला की एक करोड़ रुपये जीत सके। मतलब झूठ-फरेब, छल-कपट, हिंसा-उन्माद, यह सब हमारी संस्कृति में इस कदर बस चुका है कि कोई चाह कर भी इनसे ऊपर नहीं उठ पाता। इसलिए यकीन मानिए कि ऐसे प्रोग्रामों से हमारी संस्कृति को कोई ख़तरा नहीं।

  7. विचित्र मणि Reply

    July 29, 2009 at 12:03 am

    हम नहीं जानते कि भारतीय संस्कृति को लोग किन अर्थों में लेते हैं। उसे परंपरा का वाहक मानते हैं या फिर आधुनिकता की राह में अड़चन। लेकिन एक बात जरूर जानते हैं कि संस्कृतियां गुस्से का महज वाहक नहीं होतीं और ना ही वो भाड़ में जाती हैं। किसी बात का विरोध या उस पर आपत्ति से संस्कृतियों की कमजोरी सामने नहीं आती। ये बात सही है कि चंद सवाल पूरी संस्कृति का मानस तैयार नहीं करते लेकिन कई बार वैसे सवाल समाज को सुचारू रूप से चलाने में बाधक जरूर बन जाते हैं। सच का सामना वैसा ही मसला है जो वस्तुत: सेक्स का सामना बनकर रह गया है। आपके बच्चे हर गाली का मतलब जानते हैं लेकिन आप बच्चों के सामने गाली नहीं देते। आप चाहें तो घर में माता-पिता, भाई-बहनों के बीच शराब या सिगरेट पी सकते हैं लेकिन आप नहीं पीते। कह सकते हैं कि पी लेंगे तो क्या होगा। पति-पत्नी के बीच कोई छुपाव नहीं होता लेकिन वो भी एक दूसरे के सामने नंगे नहीं रहते। आप कह सकते हैं कि अगर बच्चों के सामने गाली देने,घर में शराब-सिगरेट पी लेने या पति-पत्नी वाले उदाहरण से भारतीय संस्कृति नष्ट हो रही हो तो भाड़ में जाये ये संस्कृति। साधुवाद!

  8. Manish Tiwary Reply

    July 29, 2009 at 1:57 am

    humko to bhai bahut sahi laga lekh. baat sab pate ki kahi gayee hai. main har roz ‘sach ka samna’ dekhta hoon aur kabhi aisa nahin laga ki koyee sanskriti wanskriti jaisi baat. is lekh ko padhne ke pahle aur padhne ke baad bhi programme dekha. shudh manoranjan ka masala hai. logon ko sochna chahiye ki isse sirf ek serial ki tarah dekha jaye, usmein jazbaati hone ki zaroorat nahin hai. ismein culture ka kya kaam? waise jo baten lekh mein uthayee gayee hain, bahut dilchasp tareeqe se uthayee gayeen. Anwarji ko badhai.
    -manish

  9. अजीत Reply

    July 29, 2009 at 6:37 pm

    अनवर भाई,
    आप ने मुझे अपना लेख दुबारा पढ़ने की सलाह दी है। मैंने आपकी सलाह मान कर ऐसा किया। मैंने अपने कमेंट को भी दुबारा पढ़ा। और मैं इस नतीजे पर पहँुचा कि मैंने कहीं भी आपकी सच का सामना को लेकर रखी गई राय का समर्थन या विरोध नहीं किया है। मैंने सिर्फ इतना कहना चाहा है कि आपका आप का इंट्रो आपत्तिजनक है। इसी बात को ज्यादा अचूक तरीके से कहना हो तो मैं यह कहुँगा कि यह द्विअर्थी है। इसके एक अर्थ जो अनर्थकारी है कि तरफ मैंने इशारा किया। अब मैं आपके मुझे दिए प्रतिउत्तर को दुबारा पढ़ने जा रहा हूँ। उसके बाद अगली टिप्पणी करूँगा। शायद उसमें से कोई नया अर्थ फूट पढ़े।

  10. अजीत Reply

    July 29, 2009 at 7:54 pm

    अनवर भाई

    आप को बता दूँ कि मेरे और आप को छोड़ कर कुल जमा सात लोगों ने टिप्पणी की है। उनमें से तीन ने आप की टिप्पणी का वही अर्थ समझा है जिसकी तरफ मैंने इशारा किया है। जबकि चार लोगों ने आपके अपने मनमाने अर्थ को स्वीकार किया है।

    आप के प्रतिउत्तर के क्रम को ध्यान में रखें तो भी कुल जमा पाँच में से तीन आप से सहमत थे। जो आपके विरोध में थे उनके विरोध का स्वर बेहद हल्का था जबकि आप के समर्थन में आए कमेंट जोरदार तरफदारी भरे थे।

    आप मुझे अपना छोटा भाई समझ कर समझाएं कि यह भीड़ में शामिल होने का जुमला आपने क्यों कर उछाला। यहाँ पर आए कमेंट के हिसाब से तो बड़ी भीड़ आपके पक्ष में है। आपके पक्ष में खड़े लोगों ने तो कमेंट देने के साथ ही आपके लेख को अब तक के सर्वश्रेष्ठ लेख का प्रमाणपत्र भी दिया है।
    जबकि जिन तीन लोगों ने आपके इंट्रो पर आपत्तिजनक माना है उनमें से किसी ने भी आप पर कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया है।

    भाई, मैं आप से यह भी पूछना चाहुँगा कि यह ’विवेक’ कौन है ?
    यह हमेशा उन्हीं लोग के साथ क्यूँ खड़ा होता है जो आपके पक्षधर हों और आपके लेख को ’अब तक का’ सर्वश्रेष्ठ निष्पादन बताएं ??

    मैं नहीं जानता विवेक इन लोगों को आप के लिखे शब्दों का कौन सा अर्थ समझाता है। आपको पता हो तो आप उससे पूछकर अजीत,विचित्र,अजय और भारत को भी वह विवेकवान अर्थ बता दें। जिससे उन व्यक्तियों को भी आप के लिखे का सही अर्थ बूझा सके जिनके साथ विवेक नहीं है।

    अनवर जी,

    गर आप ने मेरे मत को भीड़ का मत इस ब्लाग से आई टिप्पणियों के इतर मिले प्रतिक्रियाओं के आधार पर कहा है तो………..जरा ठहर कर सोचिएगा, हो सके तो विवके को साथ मिलकर सोचिएगा कि,
    कोई, ऐसा क्यूँ कर लिखे जिसका ज्यादातर लोग उल्टा अर्थ ही निकाल रहें हैं।

    आप ही सोचिए, विवेक ठहरे एक अकेेली जान, वो इस भीड़ में भला कितने लोगों के पास जा-जा कर उनके समझे उल्टे अर्थ को सीधा कर सकेंगे।

    अनवर जी मुझे लगता है कि लेखन सिर्फ सदभावना या व्यक्तिगत ईमादारी की उपज नहीं हैं। लेखन का जरिया बनने वाली भाषा के स्वचयनित शब्द और उनकी अर्थसंभावनाओं की लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
    विश्वास जानिए, हमें तो वक्त-बेवक्त ’दाग’ याद आते हैं, जो अक्सर कहा करते थे,

    आसाँ नहीं है दाग,यारों से कह दो
    कि आती है उर्दू जबां आते आते

  11. अनिकेत Reply

    August 2, 2009 at 5:32 pm

    अनवर के लेख पर काफी बहस हुई है। लेकिन इस बहस में लेख के मुख्य विषय से ज़्यादा ज़ोर एक खास वाक्य पर है। बहुत से लोगों को एतराज़ है कि अनवर ने “भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति क्यों लिख दिया।” हालांकि अनवर ने ये नहीं लिखा कि भारतीय संस्कृति भाड़ में जाए। इसके ठीक उलट पूरे लेख को पढ़ें, तो उनकी ये राय साफ ज़ाहिर होती है कि भारतीय संस्कृति इतनी मज़बूत है कि एक टीवी शो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसी बात को और भी ज़ोर देकर और चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में कहने के लिए ही उन्होंने लिखा है कि “अगर आधे घंटे का एक टेलीविज़न शो सदियों पुरानी संस्कृति को उखाड़ फेंक रहा हो, तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति।” इस वाक्य का ये अर्थ निकालना कि लेखक भारतीय संस्कृति को भाड़ में झोंकना चाहते हैं, भाषाई अभिव्यक्ति की कच्ची समझ के सिवा कुछ नहीं है। पहला वाक्य अगर ठीक से समझ में न आ रहा हो, तो भी पूरे लेख को पढ़ने के बाद तो लेखक की राय समझ में आ ही जानी चाहिए। अंतिम पैराग्राफ से ठीक पहले वाले पैराग्राफ में अनवर ने लिखा है, “अगर वाक़ई शो संस्कृति को मार रहा हो, तो फिर संस्कृति ही इसे मार देगी। भारत की संस्कृति कोई जुमा जुमा आठ दिन की संस्कृति तो है नहीं।” इसके बाद भी कुछ लोग पता नहीं क्यों इतने भड़के हुए हैं? कहीं इसके पीछे वजह ये तो नहीं कि लेख ‘अनवर जमाल अशरफ’ ने लिखा है?

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