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बेरहम सरकार, जंगली विपक्ष

सलीके से सिर ढंकने वाली महबूबा मुफ्ती को संसदीय सलीका नहीं आता। अगर आता तो जम्मू कश्मीर विधानसभा में सोमवार को जो कुछ हुआ, वह नहीं होता। महबूबा इस कदर आपा नहीं खोतीं कि स्पीकर की गरिमा का भी उन्हें खयाल नहीं रहता। वह युवा हैं लेकिन घाटी की एक वरिष्ठ नेता हैं। उनका व्यवहार उनकी पार्टी और प्रदेश की संसदीय राजनीति के लिए एक अनुकरण होना चाहिए, ना कि ऐसा जिसे देखकर किसी भी संजीदा व्यक्ति का मस्तक शर्म से झुक जाए। स्पीकर का माइक खींचना विरोध प्रदर्शन का सौम्य तरीका नहीं हो सकता, जबकि संसदीय परंपरा तो बहुत हद तक मर्यादा और लोक-लाज की पगडंडी से होकर ही गुजरती है।

महबूबा के किए पर खिन्न होने का ये कतई मतलब नहीं है कि जम्मू कश्मीर की सरकार जो कुछ शोपियां बलात्कार और हत्या मामले में कर रही है, उसे सही ठहराया जा सकता है। जैसे जैसे 15 अगस्त 1947 से हमारी दूरी बढ़ती जा रही है, सरकारें वैसे वैसे ही अभावुक और संवेदनहीन होती जा रही हैं। यह सिर्फ जम्मू कश्मीर का मामला नहीं, बल्कि देशव्यापी समस्या है और खुद केंद्र सरकार का भी व्यवहार कहीं भी राज्य सरकारों से दो बित्ता ऊंचा नहीं दिखता।

सरकारों के निर्मम होने पर बाद में चर्चा हो सकती है लेकिन अभी बात शोपियां मामले पर। बीते 29 और 30 मई की रात शोपियां में दो महिलाओं के साथ पहले बलात्कार हुआ, फिर उनकी हत्या। किसने बलात्कार और हत्या की, इसका पता लगाने में ऊर्जावान युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार अब तक नाकाम है। उस घटना के बाद पीड़ितों के परिवारवालों ने मामला दर्ज कराना चाहा, तब पुलिस का वही गंदा चेहरा सामने आया, जो हिंदी फिल्मों में अक्सर देखने को मिलता है। पहले तो मामले को दबाने की कोशिश की गयी।

खुद मुख्यमंत्री के पिता और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला ने लीपापोती वाले बयान दिये तो दूसरों की बात क्या की जाए। लेकिन जब लोगों का गुस्सा सड़कों पर फूटा, तब सरकार को भी हरकत में आने का नाटक करना पड़ा। जल्दबाजी में एक आयोग का गठन किया गया, जिसने 21 जून को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उसमें संबंधित पुलिस अधिकारियों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश की गयी थी। इस मामले में स्थानीय एसपी जाविद अहमद और दूसरे चार पुलिसकर्मियों के साथ सात अधिकारियों को सस्पेंड किया जा चुका है। लेकिन जिन्होंने दो जिंदगियां खोयीं और जिंदगी भर के लिए जिनके सीने पर बलात्कार और हत्या की आग धधकती रहेगी, वे इतने पर खामोश होने को तैयार नहीं हुए। होना भी नहीं चाहिए। आखिर गुनहगार का चेहरा सामने आना चाहिए और उसे कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए।

धीरे धीरे इस घटना के दो महीने होने जा रहे हैं। लेकिन पता नहीं बलात्कारियों और हत्यारों को जमीन निगल गयी या आसमान खा गया। अब तक उनका कोई अता-पता नहीं है। क्या सरकार उन्हें बचा रही है या सरकार इतनी नाकारा हो चुकी है कि उसके हाथ गुनहगारों की गर्दन तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं? सरकार सुस्त पड़ी है तो विधानसभा चुनावों में हारने वाली पीडीपी और उसकी नेता महबूबा मुफ्ती को चुस्ती दिखाने का मौका मिला। लेकिन महबूबा को भी बलात्कार और हत्या पीड़ितों से नहीं, बल्कि इससे उपजी भड़काऊ राजनीति की दरकार है। तभी तो उन्होंने वह किया, जो संसदीय गरिमा के अनुकूल भले ना हो लेकिन अपने लोगों में उनकी वाहवाही को जरूर बढ़ा देगा। शायद उन्हें लगता है कि इससे उनका सियासी आधार काफी मजबूत हो जाएगा।

लेकिन वह भ्रम में हैं।
याद कीजिए कि पिछले साल अमरनाथ आंदोलन के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले मुजफ्फराबाद में जाने की जब उन्होंने जिद की थी और वह भी भारतीय कायदे-कानूनों को तोड़कर तो घाटी की जनता ने उन्हें इस पर अपना समर्थन नहीं दिया। तभी तो विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी चारों खाने चित्त हो गयी। शोपियां मामले में भी अमर्यादित होने की जरूरत नहीं है। सरकार को उसकी करनी का फल तो जनता दे देगी।

विचित्र मणि टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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One Response to बेरहम सरकार, जंगली विपक्ष

  1. nirmla.kapila Reply

    July 28, 2009 at 12:07 pm

    आपकी पोस्ट सदा कुछ सोचने पर मजबूर करती है। आभार।

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