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संसद में टीआरपी की घंटी, मगर क्यों?


राज्य सभा में टेलीविजन के गिरते स्तर पर बहस। बहस में बहुत से सांसदों ने हिस्सा लिया। लेकिन तीन सांसद टीआरपी के विरोध में बहुत ज़्यादा मुखर थे। वो तीनों सांसद हैं – बीजेपी के रविशंकर प्रसाद, कांग्रेस के राजीव शुक्ला और सीपीएम की वृंदा करात। उन्होंने मीडिया की गिरती साख के लिए टैम और उसकी तरफ़ से हर हफ़्ते जारी होने वाले टीआरपी चार्ट को ज़िम्मेदार ठहराया। पूरी बहस और इन सभी की दलीलों को पढ़ने के बाद कुछ और सवाल भी उठते हैं।
1) क्या मीडिया संस्थानों को उनके अपराध के लिए क्लीन चिट देते हुए सिर्फ टैम को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है?
2) क्या बाज़ारवाद के दौर में बाज़ार के मानकों की अनदेखी की जा सकती है?
3) अगर टैम और टीआरपी खलनायक हैं तो फिर उनका विकल्प क्या होगा? किस चैनल को कितने दर्शक देखते हैं इसका पैमाना क्या होगा?
4) क्या उन सांसदों का मीडिया से जुड़े सवालों को उठाना सही है जिनके घर-परिवार के लोग इस कारोबार से जुड़े हों।

ये सब जानते हैं कि बीएजी फिल्म को राजीव शुक्ला की पत्नी अनुराधा प्रसाद चलाती हैं। रवि शंकर प्रसाद का उनसे घरेलु संबंध हैं और वृंदा करात एनडीटीवी की मालकिन की बहन हैं।

हो सकता है कि हमारा यह कहना बहुत से लोगों को पसंद नहीं आए, लेकिन हमारा मकसद उन्हें ठेस पहुंचना नहीं है। हम सिर्फ कुछ सवाल उठाना चाहते हैं ताकी संसद के बाहर भी मीडिया की गिरती साख पर एक व्यापक बहस हो सके।

एनडीटीवी एक समय अपने चरम पर था। एनडीटीवी इंडिया हिंदी न्यूज़ चैनलों में दूसरे नंबर पर पहुंच गया था। अंग्रेजी में एनडीटीवी 24×7 की बादशाहत को कोई चुनौती नहीं थी। तब तक टीआरपी से उसे कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन अचानक अंग्रेजी में दो नए चैनल आए और 24×7 को पीट कर आगे बढ़ गए। एनडीटीवी इंडिया भी पिटने लगा। एक-एक पायदान नीचे आते-आते आज वो पांचवे और छठे नंबर पर संघर्ष कर रहा है। टीआरपी के लिए सारे धतकर्म किए। सूर्यग्रहण के दिन ही देखिए … एनडीटीवी इंडिया ने ज्योतिषि बिठाया… लेकिन पांचवे स्थान से ऊपर नहीं उठ सके। क्यों? इसका विश्लेषण फिर कभी। अभी तो बस इतना ही कि सारे हथकंडे आजमाने पर भी एनडीटीवी टीआरपी नहीं बटोर पा रहा। टीआरपी का विरोध जाहिर है।

बीएजी फिल्म ने जब न्यूज़ 24 लॉन्च किया तब नारा दिया गया था कि “न्यूज़ इज बैक”। समाचार की दुनिया में क्रांति लाने का एलान करने वालों को जल्द ही हक़ीक़त का अहसास हो गया। फ्रंट फुट पर खेलने वाले बैकफुट पर चले गए। न्यूज़ इज बैक का नारा इतिहास में दफ़्न कर दिया गया। आज न्यूज़ 24 चैनलों की रेस में कहीं नहीं है। इस हफ़्ते वो आठवें नंबर पर है और टीआरपी है चार। बहस में टीआरपी को लेकर राजीव शुक्ला और रविशंकर प्रसाद का तल्ख होना समझा जा सकता है।

राज्य सभा में टीआरपी का सवाल उठाने वालों से ये पूछना चाहिए कि बाज़ारवाद को बढ़ावा देने के बाद क्या ऐसा मुमकिन है कि बाज़ार के मानकों को हटा दिया जाए। टीआरपी भी एक ऐसा ही मानक है जिससे सिर्फ़ न्यूज़ चैनलों ही नहीं बल्कि मीडिया इंडस्ट्री की दिशा तय होती है। चैनलों पर विज्ञापन का रेट तय होता है और कमाई तय होती है। ये तो मुमकिन है कि टीआरपी की जगह आप कोई नया पैमाना लाएं और बाज़ार को उसे कबूल करने के लिए तैयार करें। लेकिन ऐसा कोई मानक हो ही नहीं – ये मुमकिन नहीं।

यहां कुछ लोग तर्क देते हैं कि टीआरपी अगर एक महीने बाद आएगी तो दबाव कम होगा। ये तर्क सही नहीं है। एक महीने बाद जो चैनल टीआरपी की रेस में पिछड़ेंगे तो क्या अगले महीने दबाव नहीं रहेगा? रहेगा और उतना ही दबाव रहेगा। चाहे टीआरपी छह महीने बाद ही क्यों न आए? इसलिए टीआरपी मीडिया बाज़ार का एक बहुत बड़ा सच है और बेहतर है कि सभी इस सच को कबूल करते हुए कुछ अच्छा करने की कोशिश करें।

रविशंकर प्रसाद का भाषण

जो प्रोग्राम्स के कंटेंट हैं, उनका भी असर बढ़ा है। अगर कोई प्रोग्राम पूअर होता है, लोग उसको लाइक नहीं करते हैं, लेकिन महोदय, दिक्‍कत कहां आ रही है, यह बहुत समझने की जरूरत है। दिक्‍कत यहां आती है कि क्‍या बिकता है, क्‍या चलता है, क्‍या लोग देखना चाहते हैं? अब सवाल पूछिए कि ऐसा क्‍यों होता है? मुझे याद है, मेरे एक बड़े अच्छे दोस्त थे, जो टेलीविजन के कॉरिस्पोंडेंट थे। वे पॉलिटिकल इस्यूज को कवर करते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि रवि जी, मैं दो सपेरों को लेकर आगरा गया था, क्‍योंकि मुझे दो सांप खोजने थे, जो साथ-साथ नाचते थे। मैंने कहा कि आपको क्‍या हो गया है? उन्होंने कहा कि क्‍या बोलूं, आजकल यही बिकता है, इसलिए खोज कर रहा था। उपसभाध्यक्ष महोदय, सबसे बड़ी चिंता यही है और इससे बड़ा सवाल यह उठता है, लोग कहते हैं कि ये लोग देखना चाहते हैं। इसके साथ यह सवाल उठता है कि आप दिखाना क्‍या चाहते हैं? आपको किसने यह अधिकार दे दिया कि देश क्‍या देखना चाहता है, इसकी सही समझ आपको ही है। They are important issues. We need to understand them. महोदय, जो मैंने समझा है, वह यह है कि इस पूरे घालमेल के पीछे जो एक सबसे बड़ी परेशानी है, वह है TRP की राजनीति। the politics of Television Rating Points. जो आज सबसे अधिक अन-साइंटिफिक तरीके से हो रहा है। कोई कहता है कि हमारा चैनल सबसे बड़ा तेज़ चैनल है, तो कैसे है? आज की TRP में हमारा प्वाइंट ऊपर है, तो दूसरा कहता है कि उनकी TRP का प्वाइंट एक बजे तक ऊपर था, तीन बजे के बाद हम ऊपर चले गये हैं। उपसभाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस हाउस को बड़ी नम्रता से यह बताना चाहता हूं कि The greatest fraud is being played on the country in the management of the TRP; and I say so with full sense of responsibility. यह देश कोई 110 या 112 करोड़ का है। यहां एक या दो प्राइवेट एजेंसीज हैं। उन्होंने कहां से यह अधिकार प्राप्त कर लिया और देश में कुछ हजार मीटर्स रख लिये तथा कुछ शहरों में रख दिये। बस, उनको यह मोनोपली मिल गयी कि हम यह तय करेंगे कि इनकी रेटिंग A है और इनकी रेटिंग B है। जब आपकी रेटिंग अच्छी होगी, तो आपको विज्ञापन मिलेगा। रेटिंग अच्छी करने के लिए आई बॉल चाहिए। आई बॉल करने के लिए बस, यही बिकता है। This is the whole unfortunate nexus. मुझे मालूम है कि हमारे टेलीविजन में काम करने वाले एक से एक अच्छे लोग हैं। हमारे न्यूज़ चैनल्स में एक से एक अच्छे लोग हैं, जो देश को यह बताना चाहते हैं कि देश कैसे आगे बढ़ रहा है तथा देश कहां उलझ रहा है? उनके पास इसकी एक से एक स्टोरी है, लेकिन उनसे कहा जाता है कि आपकी स्टोरी बिकती नहीं है, क्‍योंकि इसमें TRP नहीं है। That is the real problem.

वृंदा करात का भाषण

Then, one more thing I want to talk about, on news Channels. Our news channels have a certain element of support because there should be no censorship on news. Just now, I was sitting in the Central Hall of Parliament. I do not want to mention the news channel because I am not specifically targeting or pointing to this or that news channel. There, it says, so and so, नीचे लिखा है News. What is being shown on that channel, right now? ‘Belly dancing’ with women who have very little clothes on. Now, since when this belly dancing, depicting women with very little clothes on constitutes news? The point is, even as far as news is concerned, this is the manipulation of news to utilise women’s bodies, to push up the TRP ratings. This exactly is what I say, Sir, highly objectionable. Within this also, something is probably more shocking and, that is, the use of children and use of children’s bodies.

राजीव शुक्ला का भाषण

एक बात रवि शंकर जी ने उठाई और बाकी लोगों ने भी उठाई। …(समय की घंटी)… सर, यह मेरा लास्ट प्वायंट है। यह बात टी0आर0पी0 को लेकर है। यह सारा झंझट शुरू होता है, TAM नाम की एक एजेंसी से, जोकि एक प्राइवेट एजेंसी है, जिसके पीछे advertisers हैं। एक बड़ी advertising agency इसको स्पोंसर करती है। उसका वेस्टेड इंटरेस्ट चाहे जो भी हो, वह हर हफ्ते– क्‍या टाइम्स ऑफ इंडिया की हर हफ्ते सर्कुलेशन की रिपोर्ट आती है? क्‍या हिन्दुस्तान टाइम्स या दैनिक जागरण अथवा अन्य अखबारों की हर हफ्ते सर्कुलेशन की रिपोर्ट आती है कि इस हफ्ते कितने अखबार बेचे? अगर नहीं, तो फिर न्यूज चौनल की हर हफ्ते क्‍यों आती है कि इतना देखा गया या इतना नहीं देखा गया? इससे क्‍या होता है कि कम्पीटीशन होता है। कुछ दिनों में आप देख लीजिएगा, मैं चेतावनी दे रहा हूँ, कि संसद का एक भी कवरेज नहीं होगा, प्रधान मंत्री या नेता-विपक्ष किसी का कोई कवरेज नहीं होगा। हम तो न्यूज चौनल नहीं चलाते, वृंदा जी ने कहा vested interest, लेकिन यह सही है कि हमारी पत्नी यह चलाती हैं। उसमें शुरू में यह हुआ कि पूरी न्यूज दो, न्यूज दिखाओ, न्यूज दिखाओ। बाद में यह हुआ कि बजट की TRP एक आई है, अगर वह TAM की rating सही है। TAM के बहुत कम मीटर हैं। बिहार, बंगाल आदि जगहों में वह कहते हैं कि साहब, यहाँ के लोग गरीब हैं, इनमें परचेजिंग पावर नहीं है, इसलिए वहाँ मीटर मत लगाओ। मुम्बई और गुजरात में बहुत-सारे मीटर लगाओ, क्‍योंकि वहाँ के लोगों की परचेजिंग पावर बहुत है। उन्होंने उसमें पाँच, छ: या सात हजार मीटर लगा रखे हैं। उनमें क्‍या होता है, क्‍या नहीं होता है, किसकी रिपोर्ट देते हैं? वे कहते हैं कि कुत्ता और साँप की लड़ाई हुई, नाग-नागिन का प्रेम हुआ, इसकी TRP ज्यादा आ रही है। उसे वे दिखा रहे हैं। इस तरह इसमें TAM एक बहुत बड़ा विलेन है, यह जो TRP का सिस्टम TAM है। जौसा उन्होंने कहा कि एक प्राइवेट एजेंसी को इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह इस देश के हजारों करोड़ का बिजनेस तय करे, इस देश की संस्कृति तय करे कि इस देश में कैसे लोग रहेंगे, क्‍योंकि वही जिम्मेदार हैं। अगर यह न
हो, तो कोई इस तरह के प्रोग्राम्स भी न दिखाए, जिनकी आप आलोचना कर रहे हैं। उसकी मजबूरी में, क्‍योंकि इस चौनल की रेटिंग गिर गई, दूसरे की बक्‍़ गई …(समय की घंटी)… और उनको यह करना पड़ता है। इसलिए इस पर रोक लगा कर मेरे ख्याल से एक कमिशन बनाना चाहिए, जो कम-से-कम एक लाख मीटर लगाए, देश के हर राज्य में मीटर लगे और वह छ: महीने या साल-भर में अपनी यह रिपोर्ट दे कि इस चौनल की रेटिंग यह रही और उस चौनल की यह रही। न्यूज चौनल के मामले में तो यह जरूर कर देना चाहिए या न्यूज चौनल को आप TAM की परिधि से, उसकी ambit से बाहर निकालिए। उनकी रिपोर्ट छ: महीने बाद दीजिए। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के बारे में भी यह करना चाहिए कि उसके लिए एक independent commission होना चाहिए। उसमें ब्रॉडकास्टर्स भी हों, गवन्र्नमेंट के लोग भी हों और उसमें एक सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट का कोई जज हो। उसके एक लाख मीटर्स भी हों। वह यह रिपोर्ट दे कि कौन-सा प्रोग्राम कैसा है। तब तो आप इसे सम्भाल पाएँगे, वरना कुछ दिन में ऐसा होने वाला है कि आप सब लोगों की कोई कवरेज नहीं होगी, पार्लियामेंट का कोई कवरेज नहीं होगा, देश का कोई कवरेज नहीं होगा। दूरदर्शन के बारे में वे बताते हैं कि वह बिल्कुल तीन दिखाई देता है, जो तीन उसकी टी0आर0पी0 रेटिंग है, जबकि पूरे देश में उसका कवरेज है, मतलब वह हर जगह, नॉर्थ ईस्ट आदि सभी जगहों पर देखा जाता है। इस तरह यह TAM agency ही है, जो सारी चीज़ें तय करती है। इसके विरुद्ध पूरे सदन को एक होना पड़ेगा, सरकार को यह करना पड़ेगा। वे आकर यह बताते हैं कि नहीं-नहीं, इसमें फिर कहाँ से रेटिंग आएगी? ये क्‍या हैं? ये सब vested interests हैं। हजारों करोड़ का निर्णय लेने का अधिकार किसी एक प्राइवेट एजेंसी को, जिसकी लगाम advertisers के हाथ में है, advertising agency के हाथ में है, नहीं देनी चाहिए। यही मेरी सरकार से मांग है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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