Subscribe by Email

पान खाओ, नशा करो… खरीद कर पढ़ना मत

एक जमाना था कि खद्दर के झोले में लोग धर्मयुग रखकर बड़े गुमान से चलते थे। लोगों को वह पत्रिका कुछ वैसे ही धर्म (यहां धर्म का मतलब कर्तव्य है) का भान कराती थी, जैसे जामवंत जब तब हनुमान को उनकी शक्ति की याद दिलाते थे। उस पत्रिका को लोग समाज और उसका मानस बदलने का एक सशक्त जरिया मानते थे। अब समाज बदला या नहीं बदला लेकिन धर्मयुग नहीं रहा। आखिर बाजार के युग में धर्म कहां टिकता है? धर्मयुग नही टिकी। धर्मयुग ही क्यों, दिनमान, माया, रविवार जैसी पत्रिकाएं भी खत्म हो गयीं।

बाज़ार में अब भी पत्रिकाओं की भरमार है। किसी बुक स्टॉल या पेपर स्टैंड पर चले जाइए, आपको सैकड़ों की तादाद में पत्र-पत्रिकाएं दिख जाएंगी। कीमत भी 25-30 रुपये से कम नहीं। साप्ताहिक हो तो 15-20 रुपये। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। कागज, छपाई, वितरण और दूसरे खर्चों को जोड़कर देखें तो 20 या 30 रुपये खर्च करके कोई पत्रिका खरीदना घाटे का सौदा नहीं है। लेकिन सवाल है कि कैसी पत्रिकाएं? वे पत्रिकाएं, जो रंगीन पन्नों और मसालेदार चटपटी खबरों की पैकेजिंग के बूते चलती हैं या फिर वे, जो पुराने नाम पर दाम कमा रही हैं? वैसी पत्रिकाएं कहां हैं, जिनमें राजनीति की निर्मम चीरफाड़ से लेकर समाज को उद्वेलित करने वाले मुद्दे हों? जिनमें संपादक और रिपोर्टर की कलम पत्रकारीय मूल्यों की कसौटी पर खरी उतरती दिखती हों? जो बड़े-बड़े उद्योगपतियों-पूंजीपतियों-नौकरशाहों-राजनेताओं की खतरनाक चौकड़ी की कड़वी सच्चाइयों को आपके सामने रखने की हिम्मत रखती हों? आप अपने चश्मे की लेंस चाहे जितना भी बढ़ा दें, जल्दी वैसी पत्रिकाएं आपको मिलेंगी नहीं।

हर पाठक की अपनी पसंद होती है। एक पाठक के तौर पर वैसी ही बेहतरीन पत्रिका मुझे लगी प्रथम प्रवक्ता। उस पत्रिका के अगले अंक का इंतजार मुझे उसी दिन से रहता है, जिस दिन उसका मौजूदा अंक खरीदता हूं। बीते तीन साल में शायद ही कोई अंक मैंने ना खरीदी हो। उस पाक्षिक पत्रिका की पहले कीमत थी 12 रुपये, फिर बढ़कर हो गयी 15 रुपये। लेकिन कुछ महीने पहले आमंत्रण मूल्य के नाम पर देखा तो उसकी कीमत रह गयी पांच रुपये। कायदे से तो 15 रुपये में पढ़ी जाने वाली पत्रिका को पांच रुपये में पाकर खुश होना चाहिए लेकिन यकीन मानिए, मैं बहुत उदास हुआ। कम विज्ञापन वाले उस पत्रिका का संपादन एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार करते हैं, जिन्हें पत्रकारों के बीच ऋषि कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनका नाम रामबहादुर राय है। राजनीति और राजनेताओं पर उनकी पसंद-नापसंद हो सकती है लेकिन खबरों और उनके मूल्यांकन में वे और उनकी पत्रिका कोई भेदभाव करती है, ऐसा मुझे कभी नहीं लगा। और अगर लगता तो मैं उस पत्रिका का नियमित पाठक नहीं रहता। उस पत्रिका ने ही बताया कि कैसे एक बड़े उद्योगपति ने टेलीकॉम लाइसेंस में 50 हजार करोड़ का महाघोटाला किया, जो आपके इंकमटैक्स से जाता है। आज राजनीति में जिस वंशवाद को युवा शक्तियों का उदय बताया जा रहा है, उस वंशवाद की पोल उस पत्रिका ने खोली। जो दिल्ली की गूंगी-बहरी सत्ता प्रतिष्ठानों को किसानों की पीड़ा से रूबरू कराती है।

लेकिन उस पत्रिका की कीमत पंद्रह से घटकर पांच रुपये हो जाना क्या दर्शाता है? क्या हमारे यहां बेहतर की तलाश खत्म हो गयी है? या लोग अच्छा लेखन और अच्छी रिपोर्ट पढ़ना नहीं चाहते? लोग एक दिन में पंद्रह रुपये की पान चबाकर थूक देते हैं लेकिन एक अच्छी पत्रिका के लिए पंद्रह दिन पर पंद्रह रुपये खर्च करना मुनासिब नहीं समझते। वो भी उन सवालों का जवाब जानने के लिए, जो उनकी जिंदगी से सीधे जुड़े हुए हैं। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो आने वाले दस-बीस साल में शायद हम व्यवस्था की सड़ी गली मान्यताओं और सरकार के उजले चेहरे के पीछे का काला सच सामने लाने वाले हस्ताक्षर देखने को तरस जाएंगे। 12 साल पहले राजकिशोर ने पंफलेट सरीखा एक पाक्षिक निकाला था दूसरा शनिवार। कागज भले अच्छे नहीं थे लेकिन विचार और खबरें बेहतरीन थीं। लेकिन तब पांच रुपये में उस पत्रिका को खरीदने वाले नहीं मिले और महज चंद महीनों में ही उसने दम तोड़ दिया। वो डर और उससे उपजी कड़वाहट तो दुख और निराशा ही पैदा कर सकती है। तो क्या निराश हुआ जाए?

लेखक टेलीविजन में वरिष्ठ पत्रकार हैं

Share This Post

4 Responses to पान खाओ, नशा करो… खरीद कर पढ़ना मत

  1. रंगनाथ सिंह Reply

    July 30, 2009 at 12:26 pm

    विचित्र मणि जी,
    हम लोगों को इन पत्रिकाओं को बढ़ावा देने के लिए व्यक्तिगत प्रयास करना चाहिए।
    इस मुद्दे को आगे बढ़ाना भी जरूरी है।

  2. शशि सिंह Reply

    July 30, 2009 at 2:08 pm

    विचित्र भाई, कहां आप सच्चाई से साक्षात्कार करने के लिए धर्मयुग और प्रथम प्रवक्ता की दुहाई देने बैठ गये। आज तो सच से रू-ब-रू होने के लिए है न अपना टीवी शो… वो क्या नाम है उसका… हां याद आया “सच का सामना”

  3. किशोर कुमार Reply

    October 2, 2009 at 7:25 pm

    धर्मयुग और दिनमान जैसी पत्रिकाओं और उस परंपरा की दूसरी भी पत्रिकाओं की अकाल मौत सचमुच यह चिंता का विषय है। मुझे लगता है कि डिजिटल मीडिया के आने के बाद प्रबुद्ध पाठकों के समक्ष ढेर सारे विकल्प होने के कारण भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है।
    मुझे लगता है कि प्रथम प्रवक्ता भी वेव पर आ जाए और कुछ समय बाद पाठकों से डिजिटल संस्करण को पढ़ने के लिए पैसों की मांग की जाए तो शायद वह प्रिंट संस्करण से ज्यादा लोकप्रिय रहेगा।
    हालांकि कि यह बात ठीक है कि बाजारवाद ने गंभीर पत्र-पत्रिकाओं के लिए ज्यादा जगह नहीं छोड़ी है। लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है। इसे सामाजिक सरोकारों वाली पत्रकारिता के लिए संक्रमणकाल माना जाना चाहिए।

  4. निराशा! कदापि नहीं…! मानसिकता बदलने की कोशिश कीजिए, मौन खिन्नता से कोई भला नहीं होने वाला। पान का खर्चा बचाने की भी ज़रूरत नहीं…पत्रिकाएं खरीदने के लिए अलग से भी पैसा जुटाया-बचाया-संजोया-निकाला जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>