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इंसाफ़ की आस में असम बंद असरदार

उधार - असम टाइम्स

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असम में पत्रकार पराग दास हत्याकांड के आरोपी को रिहा करने के ख़िलाफ़ मानवाधिकार संगठनों और पत्रकार संगठनों के बंद का व्यापक असर देखा गया। पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता पराग दास की हत्या 13 साल पहले कर दी गई थी। मृदुल फूकन को उनकी हत्या का आरोपी बनाया गया था। लेकिन सेंशन्स कोर्ट ने अपने फ़ैसले में उसे बेकसूर ठहराते हुए बरी कर दिया। मानवाधिकार संगठनों में इस बात को लेकर काफी रोस है। उसी के ख़िलाफ़ उन्होंने बंद का एलान किया था।

पराग कुमार दास हत्याकांड की जांच सीबीआई कर रही थी। लेकिन वो अदालत में आरोपी मृदुल फूकन का गुनाह साबित नहीं करा सकी। मानव अधिकार संग्राम समिति (एमएएसएस – मास) के मुताबिक सीबीआई की अधूरी जांच और कमजोर चार्जशीट की वजह से पराग दास के हत्यारों को सज़ा नहीं मिल सकी है। इससे जाहिर होता है कि सीबीआई हत्यारों को बचाना चाहती थी।

पराग दास की हत्या 17 मई 1996 को हुई थी। इस हत्या के पीछे उल्फा का हाथ बताया जाता है। लेकिन 29 जुलाई, 2009 को अदालत के फ़ैसले के बाद उल्फा की तरफ से समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया को एक चिट्ठी भेजी गई। पीटीआई के मुताबिक इस चिट्ठी में उल्फा ने कहा है कि मृदुल फूकन की रिहाई से साफ होता है कि पराग दास की हत्या एक सुनियोजित साजिश के तहत हुई थी। उल्फा के मुखिया अरबिंद रजकोवा के मुताबिक “अदालती कार्रवाई तो महज एक दिखावा था। सच तो यही है कि सरकार हत्यारों को सज़ा दिलाना ही नहीं चाहती थी”। इस बीच मानव अधिकार संग्राम समिति (एमएएसएस – मास) ने न्याय के लिए संघर्ष जारी रखने का एलान किया है। इस संगठन के नेताओं का कहना है कि जब तक पराग दास के कातिलों को सज़ा नहीं मिलेगी वो चैन से नहीं बैठेंगे।

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