सूडान की एक महिला पत्रकार इन दिनों चर्चा में हैं। उनका नाम है लुबना हुसैन और उन पर अभद्र कपड़े पहनने का आरोप है। इस आरोप में जुर्म साबित हुआ तो उन पर चालीस कोड़े बरसाए जा सकते हैं। आम तौर पर लोग सज़ा से बचना चाहते हैं। लेकिन लुबना ने तानाशाही कानून को चुनौती देने के लिए संयुक्त राष्ट्र की नौकरी छोड़ दी है। कानून के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ अदालती कार्रवाई शुरू करने के लिए सूडान के प्रशासन को संयुक्त राष्ट्र से इजाजत लेनी पड़ती। संयुक्त राष्ट्र लुबना के पक्ष में था। लेकिन लुबना ने नौकरी छोड़ दी। उनका कहना है कि महिलाओं के ड्रेस कोड से जुड़े कानून को वो चुनौती देंगी।
तीन जुलाई को एक कैफे पर पुलिस के छापे में 13 महिलाओं को हिरासत में लिया गया। उन सभी ने पैंट पहन रखा था जो इस्लामिक लॉ के ख़िलाफ़ है। उनमें से 10 महिलाओं ने इसके लिए तय सज़ा कबूल कर ली और उन पर दो दिन बाद यानी पांच जुलाई को पुलिस स्टेशन में कोड़े बरसाए गए।
लेकिन लुबना और दो अन्य महिलाओं ने इस पर अदालती कार्रवाई करने को कहा। बुधवार को सुनवाई शुरू हुई। उस मौके पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के अलावा बड़ी संख्या में राजनयिक भी मौजूद थे। उन सबकी मौजूदगी में जज ने लुबना से कहा कि “आप संयुक्त राष्ट्र की कर्मचारी हैं और नियमों के मुताबिक आप पर मुकदमा बिना इजाजत के नहीं चलाया जा सकता। आप संयुक्त राष्ट्र कर्मचारियों को मिली इम्यूनिटी के दायरे में आती हैं”। लेकिन लुबना ने वो इम्यूनिटी लेने से इनकार कर दिया और अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अब इस मामले की सुनवाई चार अगस्त को होगी। तब लुबना सामान्य नागरिक की हैसियत से कठघरे में खड़ी होंगी।
लुबना का कहना है कि उनकी लड़ाई उस कानून के ख़िलाफ़ है जिसमें महिलाओं के ड्रेस कोड से जुड़े नियमों को अभद्र व्यवहार के तहत रखा गया है। उनके मुताबिक ये न केवल सूडान के संविधान के ख़िलाफ़ है बल्कि इस्लामिक कानून के ख़िलाफ़ भी है। सूडान में 1989 से शरिया कानून लागू है। इसके तहत अभद्र कपड़े पहनने पर महिलाओं पर चालीस कोड़े बरसाए जा सकते हैं और 120 डॉलर का जुर्माना लगाया जा सकता है।
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