जिन आंखों में समाजवाद का सपना तैरता हो, उन्होंने ना जाने कितनी बार जॉर्ज फर्नांडीस पर अभिमान किया होगा। 60 और 70 के दशक के जॉर्ज को देखकर ये उम्मीद जगती थी कि हुकूमतें चाहे कितनी भी जालिम हों, उनके खिलाफ एक जॉर्ज है, जो जान की बाजी लगाकर खड़ा होने को तैयार रहता है। इमरजेंसी के बाद हाथों में हथकड़ी लगी जॉर्ज की तस्वीर ने जॉर्ज को कइयों का आदर्श और हीरो बना दिया था। जॉर्ज कम्युनिस्ट तो कभी नहीं रहे लेकिन चे गुएवारा की याद को भारतीय मानस पर उन्होंने जरूर उतार दिया था। लेकिन नब्बे का दशक आते आते उन्हीं जॉर्ज के मुंह से समाजवाद की बातें हास्यास्पद लगने लगीं।
वीपी सिंह के खासमखास बनने से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के तारनहार बनने के सफर में जॉर्ज ने अपनी समाजवादी पूंजी गंवा दी। अब उस पूंजी की यादें भर बाकी थीं और उसका एहसास पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान हुआ। नीतीश कुमार की जेब में पड़ी पार्टी जनता दल एकीकृत ने बीमारी और बुढ़ापा का हवाला देकर मुजफ्फरपुर सीट से जॉर्ज का टिकट काट दिया। तब जॉर्ज ने कहा या उनसे कहलवाया गया कि समाजवादी पिछले दरवाजे से संसद में नहीं जाते। पार्टी (या नीतीश?) की अनिच्छा के बावजूद जॉर्ज मुजफ्फरपुर से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गये। जॉर्ज के समाजवाद की ये आखिरी अनुभूति थी।
जॉर्ज चुनाव हार गये। जिंदगी के आखिरी मोड़ पर मिली हार ने जॉर्ज को विचलित भी किया होगा। समाजवादियों के लिए तो हार या जीत से ज्यादा अहम जंग होती है। जॉर्ज चुनाव हार गये मगर आत्मसम्मान की लड़ाई तो जीत गये थे। लेकिन चुनाव नतीजे के ढाई महीने बाद ही जॉर्ज ने नीतीश के कहने पर राज्यसभा में जाना स्वीकार कर लिया। हार कर भी जीतने वाले जॉर्ज यहां जीत कर भी हार गये। कहा जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव के समय जॉर्ज को उनकी एक महिला मित्र ने जबरन लोकसभा का चुनाव लड़वाया था और अब उसी मित्र ने नीतीश की रहम पर राज्यसभा के लिए भी उन्हें तैयार किया। अब पर्दे के पीछे चाहे जिसका दिमाग चलता हो लेकिन दुनिया के सामने तो जॉर्ज का भूतपूर्व समाजवादी चेहरा ही दिखता है। वह चेहरा अपने समाजवाद के सारे सच और झूठ की लाश को लेकर बेबस और दीन-हीन नजर आ रहा है।
उस चेहरे के पीछे एक कुटिल चेहरा मुस्कुरा भी रहा है। वह भी समाजवादी होने का दावा करता है और महानता के दांव भी आजमाता है। वह चेहरा है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का। राज्यसभा के लिए जॉर्ज फर्नांडीस के पर्चा भरते वक्त नीतीश ने उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े। उन्हें महान नेता बताया लेकिन जॉर्ज क्या उस दिन महान नेता नहीं थे, जब लोकसभा के लिए उनका टिकट काट दिया गया था? अगर बीमार, बूढ़े और अशक्त जॉर्ज लोकसभा के योग्य नहीं हैं तो वह राज्यसभा में अपनी जवाबदेही कैसे पूरी कर लेंगे? क्या तब उनकी बीमारी और वृद्धावस्था उनके कामकाज के आड़े नहीं आएगी? सीने में नश्तर चुभोकर मरहम लगाना महानता नहीं, बर्बरता का ही चालाक संस्करण होता है। नीतीश ने अपने गुरु जॉर्ज के साथ यही किया।
लेकिन इतिहास और भविष्य हर करनी का लेखा-जोखा रखता है। किस मोड़ पर किसकी राजनीति की हवा निकल जाए, यह कोई नहीं जानता। लालू ने चुनाव से पहले यह थोड़े ना सोचा था कि अपनी शातिर सियासी चाल के बावजूद चुनाव बाद वे ना तो घर के रहेंगे ना घाट के। पंद्रह साल तक बिहार को उन्होंने अपनी निजी जागीर से ज्यादा कुछ नहीं समझा। अब सत्ता का अभिमान अगर नीतीश को इस भ्रम में रखता है कि वह बिहार के लिए अपरिहार्य हैं और राजनीति के जोड़-घटाव का नतीजा अपने मनमाफिक निकाल लेंगे तो एक दिन यह उनके लिए भी खतरनाक हो सकता है। उनके गुरु जॉर्ज फर्नांडीस की तरह ही।
विचित्र मणि टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हैं
mithilesh
August 8, 2009 at 11:25 pm
sahi likha hai apne. nitish kumar koi bhi kadam bina rajnitik napha nuksan ke nahi uthate. is mamle me bhi yahi hua hai. kal tak jarje ki photo jdu office se hata dene wale nitish ne unhe rajyasabha bhejne ka phaisla liya to wah chalaki hi hia.
amit tyagi
August 9, 2009 at 6:27 pm
bahut badhiya lekh likha hai vichitra mani ne.