अनवर जमाल अशरफ़ के लेख के बाद “सच का सामना” पर होने वाली बहस ने नया मोड़ ले लिया है। समरेंद्र के दोनों लेख – लूटपाट, क़त्ल और व्यभिचार के लिए एकजुट हों ! और सबसे पहले तो बंद करो “सच का सामना” में संस्कृति की बात कहीं नहीं थी। लेकिन अनवर के लेख के बाद अब सारा ध्यान भारतीय संस्कृति पर केंद्रित हो गया है। हालांकि अनवर ने भाड़ शब्द का इस्तेमाल एक मुहावरे के तौर पर किया है, लेकिन विरोध करने वालों को सबसे ज़्यादा एतराज इसी बात का है कि लेखक ने भारत की महान संस्कृति को भाड़ में क्यों झोंक दिया? इससे लगता है कि क्यों नहीं जनतंत्र पर एक बहस भारतीय संस्कृति पर भी हो जाए। जो भी इस महान संस्कृति पर अपनी बात रखना चाहते हैं वो खुल कर कहें। हम उनकी राय को सम्मान पूर्वक जगह देंगे। इसकी शुरुआत करते हैं अनवर के लेख पर आई कुछ जोरदार टिप्पणियों से। आप इन्हें पढ़ें और सहमति-असहमति दर्ज कराएं।
अनवर के लेख पर काफी बहस हुई है। लेकिन इस बहस में लेख के मुख्य विषय से ज़्यादा ज़ोर एक खास वाक्य पर है। बहुत से लोगों को एतराज़ है कि अनवर ने “भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति क्यों लिख दिया।” हालांकि अनवर ने ये नहीं लिखा कि भारतीय संस्कृति भाड़ में जाए। इसके ठीक उलट पूरे लेख को पढ़ें, तो उनकी ये राय साफ ज़ाहिर होती है कि भारतीय संस्कृति इतनी मज़बूत है कि एक टीवी शो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसी बात को और भी ज़ोर देकर और चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में कहने के लिए ही उन्होंने लिखा है कि “अगर आधे घंटे का एक टेलीविज़न शो सदियों पुरानी संस्कृति को उखाड़ फेंक रहा हो, तो भाड़ में जाए ऐसी संस्कृति।” इस वाक्य का ये अर्थ निकालना कि लेखक भारतीय संस्कृति को भाड़ में झोंकना चाहते हैं, भाषाई अभिव्यक्ति की कच्ची समझ के सिवा कुछ नहीं है। पहला वाक्य अगर ठीक से समझ में न आ रहा हो, तो भी पूरे लेख को पढ़ने के बाद तो लेखक की राय समझ में आ ही जानी चाहिए। अंतिम पैराग्राफ से ठीक पहले वाले पैराग्राफ में अनवर ने लिखा है, “अगर वाक़ई शो संस्कृति को मार रहा हो, तो फिर संस्कृति ही इसे मार देगी। भारत की संस्कृति कोई जुमा जुमा आठ दिन की संस्कृति तो है नहीं।” इसके बाद भी कुछ लोग पता नहीं क्यों इतने भड़के हुए हैं? कहीं इसके पीछे वजह ये तो नहीं कि लेख ‘अनवर जमाल अशरफ’ ने लिखा है?
अनिकेत
आपका लेख पढ़ा भाड़ में जाये ऐसी संस्कृति। ये शब्द अटपटा है इसमें मुझे कोई शक नहीं है और आप भी इस बात को मान लीजिये। भले ही थोड़ा समय ले लें। लेकिन आपको मानना पड़ेगा कि आपने शब्द तो गलत इस्तेमाल किया है। यहां मैं आपको बता दूं मेरा मकसद सिर्फ आपको गलत साबित करना नहीं दरअसल मेरा मकसद है उस शब्द को गलत साबित करना जिसे भाड़ में झोंकना कहते हैं। एक शो उस चैनल पर प्रसारित होता है जिसकी छवि देश में पारिवारिक चैनल की तरह बन चुकी है। अब उस चैनल पर एक 55 साल के आदमी से सवाल पूछा जाता है कि क्या आप कभी वेश्याओं के साथ सोयें हैं। और वो आदमी काफी सोच विचार के बाद कहता है कि हां। तो यहां सवाल ये नहीं है कि उसने वेश्याओं के साथ सोकर अच्छा किया या बुरा। जाहिर है ये उसका निजी मामला है वो कुछ भी करता फिरे। या फिर उर्वशी ढोलकिया से सवाल पूछा जाता है कि आप स्कूल से इस लिये निकाली गईं क्योंकि आप प्रेगनेंट हो गईं थीं। जाहिर है इन सवालों से अगर उन्हे फर्क नहीं पड़ रहा जिनकी ये सवाल मिट्टी पलीद कर रहे हैं तो दूसरे क्यों परेशान हैं। तो भाई आप ये सोच लीजिये कि हमारा समाज जिस दौर से गुजर रहा है उसे बदलाव का सबसे बड़ा दौर कहा जाता है। हम गरीबी से थोड़ा अमीरी के चरण की तरफ बढ़ रहे हैं जाहिर है जब पैसा आता है तो अपने साथ कई बुराईयां भी लाता है। इस लिये अगर इस तरह के सेलेब्रिटी खुलेआम इस तरह की बुराइयों को कबूल करने का प्रचलन शुरू कर देंगे तो समाज के लिये बड़ी दिक्कत तो हो ही सकती है। जाहिर है आप हों या हम… हम लोग भी कई तरह की बुराइयां करते हैं लेकिन अपने से छोटों से छुपाने की कोशिश भी रहती है। इसकी वजह साफ है कि अगर हम खुलेआम वो तमाम चीजें करेंगे तो अपने से छोटों को कैसे रोक सकते हैं। मेरी आपसे वितनी है की आप ऐसी संस्कृति को भाड़ में झोंकने की बजाय इस पर गर्व करें। जमाना लाख बदलने का दावा करे लेकिन हमारी संस्कृति में आज भी ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा हैं जो इस तरह के शोज का विरोध करने के लिये उठ खड़े हुए हैं। मुझे लगता है तस्वीर का दूसरा पहलू ज्यादा बेहतर है। इसी लिये तो हमे इस संस्कृति पर गर्व है। आप भी जरा इस नजरिये से सोचने की कोशिश करें।
नौशाद अली
आप को बता दूं कि मेरे और आप को छोड़ कर कुल जमा सात लोगों ने टिप्पणी की है। उनमें से तीन ने आप की टिप्पणी का वही अर्थ समझा है जिसकी तरफ मैंने इशारा किया है। जबकि चार लोगों ने आपके अपने मनमाने अर्थ को स्वीकार किया है। आप के प्रतिउत्तर के क्रम को ध्यान में रखें तो भी कुल जमा पांच में से तीन आप से सहमत थे। जो आपके विरोध में थे उनके विरोध का स्वर बेहद हल्का था जबकि आप के समर्थन में आए कमेंट जोरदार तरफदारी भरे थे।
आप मुझे अपना छोटा भाई समझ कर समझाएं कि यह भीड़ में शामिल होने का जुमला आपने क्यों कर उछाला। यहां पर आए कमेंट के हिसाब से तो बड़ी भीड़ आपके पक्ष में है। आपके पक्ष में खड़े लोगों ने तो कमेंट देने के साथ ही आपके लेख को अब तक के सर्वश्रेष्ठ लेख का प्रमाणपत्र भी दिया है। जबकि जिन तीन लोगों ने आपके इंट्रो को आपत्तिजनक माना है उनमें से किसी ने भी आप पर कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया है। भाई, मैं आप से यह भी पूछना चाहूंगा कि यह “विवेक” कौन है ? यह हमेशा उन्हीं लोग के साथ क्यूं खड़ा होता है जो आपके पक्षधर हों और आपके लेख को “अब तक का” सर्वश्रेष्ठ निष्पादन बताएं ?
मैं नहीं जानता विवेक इन लोगों को आप के लिखे शब्दों का कौन सा अर्थ समझाता है। आपको पता हो तो आप उससे पूछकर अजीत,विचित्र,अजय और भारत को भी वह विवेकवान अर्थ बता दें। जिससे उन व्यक्तियों को भी आप के लिखे का सही अर्थ बूझा सके जिनके साथ विवेक नहीं है। अगर आप ने मेरे मत को भीड़ का मत इस ब्लाग से आई टिप्पणियों के इतर मिले प्रतिक्रियाओं के आधार पर कहा है तो जरा ठहर कर सोचिएगा। हो सके तो विवके को साथ मिलकर सोचिएगा कि कोई ऐसा क्यूं कर लिखे जिसका ज्यादातर लोग उल्टा अर्थ ही निकालने लगें। आप ही सोचिए, विवेक ठहरे एक अकेली जान। वो इस भीड़ में भला कितने लोगों के पास जा-जा कर उनके समझे उल्टे अर्थ को सीधा कर सकेंगे।
अनवर जी मुझे लगता है कि लेखन सिर्फ सदभावना या व्यक्तिगत ईमादारी की उपज नहीं हैं। लेखन का जरिया बनने वाली भाषा के स्वचयनित शब्द और उनकी अर्थसंभावनाओं की लेखन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विश्वास जानिए, हमें तो वक्त-बेवक्त “दाग” याद आते हैं। वो अक्सर कहा करते थे…
आसाँ नहीं है दाग,यारों से कह दो
कि आती है उर्दू जबां आते आतेअजीत
प्रिय अजीत जी,
काश, भीड़ में घुसने की जगह आप भी नीरज रोहिल्लाजी या विवेक सत्य मित्रम की तरह विवेक के साथ उस लाइन का मतलब समझ लेते. ज़रा इस तंज़ को समझ लेते कि ऐसा कोई ऐरा ग़ैरा कार्यक्रम हमारी संस्कृति को नहीं छील सकता. मेरी सलाह है कि आप इस लेख को दोबारा पढ़ें.-अनवर
हमको तो भाई बहुत सही लगा लेख। बात सब पते की कही गई है। मैं हर रोज़ सच का सामना देखता हूं। और कभी ऐसा नहीं लगा कि कोई संस्कृति वंस्कृति जैसी बात है। इस लेख को पढ़ने के पहले और पढ़ने के बाद भी प्रोग्राम देखा। शुद्ध मनोरंजन का मसाला है। लोगों को सोचना चाहिए कि इसे सिर्फ एक सीरियल की तरह देखा जाए। उसमें जज्बाती होने की ज़रूरत नहीं है। इसमें कल्चर का क्या काम? वैसे जो बातें लेख में उठाई गई हैं, बहुत दिलचस्प तरीके से उठाई गईं। अनवर जी को बधाई।
- मनीष
हम नहीं जानते कि भारतीय संस्कृति को लोग किन अर्थों में लेते हैं। उसे परंपरा का वाहक मानते हैं या फिर आधुनिकता की राह में अड़चन। लेकिन एक बात जरूर जानते हैं कि संस्कृतियां गुस्से का महज वाहक नहीं होतीं और ना ही वो भाड़ में जाती हैं। किसी बात का विरोध या उस पर आपत्ति से संस्कृतियों की कमजोरी सामने नहीं आती। ये बात सही है कि चंद सवाल पूरी संस्कृति का मानस तैयार नहीं करते लेकिन कई बार वैसे सवाल समाज को सुचारू रूप से चलाने में बाधक जरूर बन जाते हैं। सच का सामना वैसा ही मसला है जो वस्तुत: सेक्स का सामना बनकर रह गया है। आपके बच्चे हर गाली का मतलब जानते हैं लेकिन आप बच्चों के सामने गाली नहीं देते। आप चाहें तो घर में माता-पिता, भाई-बहनों के बीच शराब या सिगरेट पी सकते हैं लेकिन आप नहीं पीते। कह सकते हैं कि पी लेंगे तो क्या होगा। पति-पत्नी के बीच कोई छुपाव नहीं होता लेकिन वो भी एक दूसरे के सामने नंगे नहीं रहते। आप कह सकते हैं कि अगर बच्चों के सामने गाली देने,घर में शराब-सिगरेट पी लेने या पति-पत्नी वाले उदाहरण से भारतीय संस्कृति नष्ट हो रही हो तो भाड़ में जाये ये संस्कृति। साधुवाद!
- विचित्र मणि
भाड़ में जाए वाली लाइन समेत आपका ओपनिंग स्टेटमेंट मझे भी आपत्तिजनक लगा। आपकी इस लाइन को पढ़कर मुझे दो खास लोग याद आ गए, उनमें से एक थे एक वामपंथी क्रांतिकारी जो अक्सर ही कहा करते थे कि भाड़ में जाए वो देश जहाँ कुत्ते बिस्किट खाते हैं,कारों में घूमते हैं और दूसरी तरफ गरीब दो रोटी को तरस तरस कर पथरीली जमीन पर एड़िया दरेर दरेर कर मर जाते हैं।
दूसरे थे हमारे कालोनी के गप्पू दादा। जो अक्सर कहा करते थे भाड़ में गए वो जवानी जिसमें…जिसमें… आप समझ गए होंगे कि गप्पू दादा किन धर्मार्थ कार्यों की बात करते थे।
तीसरे आप मिले जो एक सीरियल को आपत्तीजनक मानने के कारण पूरी भारतीय संस्कृति का भाड़ में झोंकने की सलाह दे रहे हैं। इन तीन उदाहरणों से जाहिर है कि लोग अलग अलग कारणों से अलग-अलग चीजों को भाड़ में झोंकना चाहते हैं। खैर आपकी व्यक्तिगत राय का हम सम्मान करते हुए आप से पूछना चाहते हैं कि जब किसी कल्चर इश्यू पर कोई बहस चल रही हो और तभी बीच में कोई खड़ा हो, विपक्ष से चिल्लाकर कहे कि भाड़ में जाओ तुम सब लोग, जो मुझसे असहमत हो। आप को कैसा लगेगा इस पर विचार कीजिएगा। आप की भाषा कितनी अलोकतांत्रिक और मूलतः अधिनायकवादी है।
अनवर जी आप ने लिखा है “ऐसी कमज़ोर और बेबुनियाद संस्कृति, जो हज़ारों साल पुरानी होने का दम भरती हो और दुनिया की सबसे मज़बूत तहज़ीब, सबसे सम्मानित समझी जाती हो।”
हो सकता है कि भारतीय संस्कृति कमजोर हो और जैसा कि आप ने कहा है, यह बेबुनियाद हो यानी इसकी कोई बुनियाद न हो। और लोग झूठ मूठ का ऐसा कोई दम भरते हों। हो सकता है कि, इसे दुनिया की सबसे सम्मानित और मजबूत तहजीब समझना लोगों की भारी भूल हो। लेकिन आप… इन आप्त वाक्यों के बिना भी अपनी बात रख सकते थे ?अगर मैं गलत हूँ तो कृपया इस टिप्पणी को भी उसी भाड़ में झोंक दीजिए। आज ही किसी ब्लाग पर एक शेर पढ़ा। आप जरा गौर फरमाइगा..
कुछ तो तुर्शी बयान में रखिये
एक लज़्ज़त ज़बान में रखिए- अजीत
बहस बहुत दिनों से गर्म है। लेकिन मैंने अब तक ऐसा संतुलित लेख नहीं पढ़ा। इसके लिए आपको बधाई कि आप बौद्धिक सड़ांध के भेड़ियाधसान में जीने वाले लोगों से दो दो हाथ करने से नहीं डरे। जिन्हें सही मायने में ये ही समझ में नहीं आता कि वो असल में सच का सामना का विरोध कर क्यों रहे हैं? ना ही उन्हें आपका ये लेख समझ में आया। ना ही उन्हें वो प्रोग्राम ही समझ में आता है। संस्कृति के इन ठेकेदारों की कुछ टिप्पणियों को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे देश के इस आक्रोशित आबादी का मानसिक स्तर कितना उम्दा है। जिन्हें आपके कुछ शब्दों का अर्थ तक नहीं समझ में आया। भला उन्हें वो आधे घंटे का एक प्रोग्राम कितना समझ में आएगा? जिसमें महज समाज, संस्कृति या फिर मनोविज्ञान ही नहीं बाजार भी इन्वाल्व है। बहुत अजीब बात ये है कि इनमें से कोई भी उस शख्स को लानत मलानत नहीं भेजता, जो एक करोड़ रुपए के लिए ना केवल अपनी बल्कि अपने से जुड़े लोगों की भी मर्यादाएं सरेबाजार नीलाम कराने को तैयार है। एक बार फिर आपको ढ़ेर सारा साधुवाद। आपने लोगों को इस पूरी बहस में सोच का एक नया आयाम दिया है।
- विवेक सत्य मित्रम्
जौहर अली
August 3, 2009 at 5:36 am
अनवर के पक्ष से अनिकेत ने जो नया खतरनाक कुतर्क को गढ़ा है उसके प्रयुक्त करके कोई यह भी पूछ सकता है कि क्या अनवर अपनी भाषिक बद्तमीजी को सिर्फ इसलिए नहीं स्वीकार करना चाहते क्योंकि इस पर आपत्ति जताने वाले सभी लोग हिन्दू नामों वाले थे? अनिकेत के कुतर्क को थोड़ा विस्तार दें तो कोई यह भी पूछ सकता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि लिखने वाला अनवर जमाल था सिर्फ इसलिए प्रतिरोध का स्वर बेहद शालीन था?
कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों ने इस देश के सांप्रादायिक माहौल को ध्यान में रखते हुए अपने प्रतिरोध में पर्याप्त नरमी रखी जिससे उनका प्रतिरोध सांप्रादायिक रंग न ले ले? अनिकेत के कुतर्क एक बार और प्रयोग करें तो कोई यह भी पूछ सकता है कि अनवर के समर्थन में आने वाले सभी कमेंट हिन्दुओं के क्यों हैं?
अनवर और अनिकेत की जानकारी के लिए बता दूँ कि हिन्दी के सबसे वरिष्ठ और सम्मानित आलोचक नामवर सिंह ने एक समारोह में लौंडे शब्द का प्रयोग कर दिया। इसके बाद इस शब्द के प्रयोग से जो घमासान मचा उसे देखने के लिए अनवर और अनिकेत चाहें तो एक साथ बैठकर मोहल्लालाइवडाटकाम पढ़ सकते हैं।
मित्रों, गर नामवर सिंह के एक सामान्य शब्द के प्रयोग से इतना ताण्डव मच सकता है तो फिर एक पूरे मुहावरे के गलत प्रयोग पर सामान्य प्रतिरोध होने से आप लोग कुत्सित तर्कों की तरफ क्यों बढ़ने लगे? दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि सच का सामना को ले कर हो रही बहस से भारतीय संस्कृति के बचने या बिगड़ने का क्या संबंध है?
अनवर से किसने कहा कि यह टीवी सीरियल भारत की संस्कृति को ढहा देगा? कबीर या समरेन्द्र में से किसी एक ने उन देशों का नाम गिनाये हैं जो भारत नहीं थे लेकिन उन देशों मे सच का सामना धारावाहिक बंद कर दिया गया। अनवर और अनिकेत को समाजिक संरचना और सभ्यता के बीच का फर्क मालूम है भी या नहीं? जहाँ तक भारतीय संस्कृति पर बहस की बात है, बेहतर हो कि इस बहस का पहला लेख अनवर जमाल से लिखवाया जाए. क्योंकि अनवर जमाल ने ही इस जुमले को सबसे पहले उछाला था ?
इसलिए सबसे पहले वो स्पष्ट करें कि उनकी नजर में भारतीय संस्कृति क्या है? और दूसरा लेख अनिकेत से लिखवाया जाए, क्योंकि उनके महान कमेंट के बाद ही माडरेटर ने इस बहस का आह्वाहन किया है। चलते-चलते अनवर, अनिकेत समेत सभी साथियों को इकबाल का मकबूल शेर याद दिलाना चाहूंगा…
यूनान मिश्र रोमां, सब मिट गए जहाँ से
लेकिन अभी है बाकि नामों निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरें जहाँ हमारा
सारा जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसके यह गुलिस्तां हमारा
विचित्र मणि
August 3, 2009 at 10:48 am
यह बहुत खतरनाक परिपाटी शुरु हो रही है। अगर किसी मसले पर विवाद तीखा हो तो फिर उसे जाति और धर्म से जोड़ दो,ये राजनीति मे तो शुरु से चलता आ रहा है लेकिन इस गिरावट को हर स्तर पर उतारना समाज को जाने अनजाने कटुता के गड्ढे में गिराना है। भाड़ में जाए संस्कृति वाले लेख का विरोध इस लिए नहीं हो रहा है कि लेख किसी कौम से संबंधित है बल्कि इस लिए कि संस्कृतियां बात बात पर भाड़ में झोंकने के लिए नहीं होती हैं। वो हजारों साल की परंपरा की खूबियों और खामियो का समुच्चय होती हैं। वो आपके अतीत को आपके भविष्य से जोड़ने वाली कड़ी होती हैं। वो सामुदायिक भावना को विकसित करने वाली होती हैं। उन्हें किसी के नाम-उपनाम से पैदा हुए विरोध से जोड़कर ना देखा जाए तो यही अच्छा रहेगा।
- विचित्र मणि
अविनाश
August 3, 2009 at 11:10 am
मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि अनवर के कमेंट पर अनिकेत ने ऐसा क्या लिख दिया कि आपने बहस का रुख मूल गली से दूसरी गली में कर दिया। सच का सामना एक ऐसा मुद्दा है, जो इन दिनों लोगों को गर्म किये हुए है। मैं अपना कमेंट इसी पर दे रहा हूं, न कि अनिकेत के एजेंडे पर। इस स्वीकार के साथ के अनवर जमाल अशरफ ने जो लिखा, सही लिखा और सौ फीसद सही लिखा।
कुछ महीनों पहले भोपाल में भारतीय भाषाओं के कवियों का जुटान हुआ था। हिंदी और उड़िया के सत्र में मैं था। मैंने लगभग कवियों को ध्यान से सुना और मंच से जाकर उन कवियों से एक सवाल किया। सवाल ये था कि अगर भाषा की दीवार छोड़ दी जाए, तो हमने भारतीय आकांक्षाओं और संवेदनाओं की काव्यमय अभिव्यक्ति अभी सुनी। ज़्यादातर कवि उपदेशक की भूमिका में नज़र आये। या फिर अपने समय से क्षुब्ध, नाराज़, हताश। कोई कवि अपनी नागरिक भूमिका को लेकर खुद कठघरे में नहीं खड़ा कर रहा। एकमात्र अरुण कमल ने एक कविता पढ़ी, जिसका शीर्षक संभवत: पुराने अलबम से था। कविता का संक्षेपण कुछ यूं था कि अलबम देखते हुए एक पुरानी तस्वीर पर कवि की नज़र पड़ती है। इसमें वित्तमंत्री के साथ वो नज़र आ रहा है। उन दिनों बिहार में बाढ़ आयी हुई है। लोग त्रस्त हैं। बौखलाये हुए हैं। इस ख़राब समय में सुरक्षित कवि को वित्तमंत्री नाश्ते पर बुलाता है। और विदा करते हुए कहता है कि अपना ख़याल रखिएगा। इतनी सी कविता में हमारी नागरिक भूमिका एक्सपोज़ हो जाती है।
दरअसल हम अपनी ज़िंदगियों को लेकर इतने आक्रांत रहते कि उसका सिरा दूसरों को पकड़ाने से डरते रहते हैं। मैं अगर दिल्ली के शालीमार गार्डेन में रहता हूं, तो यह क्यों लिखूंगा कि यहां बुनियादी सुविधाओं का इतना अभाव है कि ज़िंदगी नर्क हो गयी है – इससे मेरा स्टेटस घटेगा। लोगों की नज़रों में मेरा वज़न घट जाएगा। सच का सामना भारतीय ज़िंदगियों के इसी विरोधाभास को सामने लाने की एक कोशिश है। वरना ये कोई सच नहीं है कि पत्नी के साथ बिस्तर पर होते हुए कोई दूसरी औरत के बारे में सोच रहा है और एक भाई के सामने बहन कह रही है कि हां, उसे पार्टियों में नॉनवेज़ चुटकुले शेयर करने में मज़ा आता है।
दरअसल कनफेशन का कॉन्सेप्ट हमारा नहीं है। हम तो पाप करते हैं, चुपके से गंगाजल छिड़क कर पवित्र भी हो जाते हैं। ईसाइयत में ये कॉन्सेप्ट है। ये समाज को मानसिक रूप से हल्का करने के लिए सही चीज़ है। हमारे यहां ये परंपरा से नहीं, एक टीवी शो के जरिये घुस रही है। जिस समाज की जड़ों में कोई संस्कार नहीं होता है, वह जब आता है – तो ऐसे ड्रामे क्रिएट करते हुए आता है। ठीक वैसे ही, जैसे फ्यूडल इस्टैब्लिशमेंट के बाद जब जनतंत्र आता है, तो बहुत सारी अराजकताओं के साथ आता है। इसी कांटेस्ट में मैं मायावती की सरकार का बचाव करता हूं और एक हद तक मुलायम-लालू की सरकार का भी। उनकी अराजकताओं ने प्रदेशों की विकास-यात्रा का जो भी बंटाधार किया हो, लेकिन समाजिक चेतना को एक क़दम आगे ही बढ़ाया है।
आपलोगों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि सच का सामना को जारी रहने दीजिए। प्लीज़।
जौहर अली
August 3, 2009 at 2:17 pm
ब्लाग माडरेटर जी
आपने हमारे कमेंट को एडिट क्यों किया है ?
आप इसे स्पष्ट करें तो हमें काफी सुविधा होगी।
हमने कोई अशालीन जबान का बरताव किया हो तो भी स्पष्ट करें।
शुरूआती पंक्तियों को काट कर आपने हमारे कमेंट का सिर ही काट दिया है। आपको समझ में आना चाहिए कि कमेंट माडरेटर को कमेंट रखने या हटाने का हक होता है लेकिन उसमें परिवर्तन करने का कोई नैतिक आधार नहीं है।
समरेंद्र
August 3, 2009 at 2:34 pm
आपने एक तथ्यात्मक गलती की थी। इसी वजह से आपके कमेंट से उस हिस्से को अलग कर दिया। अगर आपको ये बात गलत लगी तो इसके लिए माफ़ कीजिएगा।
अनिकेत
August 3, 2009 at 8:08 pm
मैंने अपनी टिप्पणी के अंत में एक सवाल उठाया था, सोचने के लिए। उसे जनतंत्र ने अलग से जगह देकर बहस को नया मोड़ दे दिया। बढ़िया है! लेकिन अविनाश को ये बहस पसंद नहीं आयी। तभी उन्होंने लिखा है, “मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि अनवर के कमेंट पर अनिकेत ने ऐसा क्या लिख दिया कि आपने बहस का रुख मूल गली से दूसरी गली में कर दिया।” यानी वो बहस का रुख मोड़ने का सबब पूछ रहे हैं। लेकिन अविनाश भाई, अभी मैंने आपकी साइट देखी। उसकी टैग-लाइन आपने रखी है “बात बेसबब, बहस बेहिसाब।” ऐसी मज़ेदार टैग-लाइन के साथ खुली बहस न्योतने वाले अविनाश, दूसरों से सबब पूछ रहे हैं। ये भी बढ़िया है!
अविनाश
August 4, 2009 at 10:50 am
अनिकेत भाई, बेसबब नहीं है, बासबब है। बात बासबब, बहस बेहिसाब।
अनिकेत
August 4, 2009 at 1:57 pm
…अर्र……गलती हो गई.
arun pandey
August 15, 2009 at 3:15 pm
Anwar ki likhne ki shaili achhchhi hai par vicharo ko lekar wo bahut baar ektarafa ho jaate hain. Bhartiya Sanskriti ki surksha mein kisi ka koi yogdaan nahi hai. Wo apne aap hi surkshit hai. Ye sanskrit mixture hai kuchh achchhi aur bahut si buri baaton ka. Isliye anwar ke lekh par bahas karne waale dono packsh ke log hi galat disha ki taraf chal pade hain. Sach ka samana ek ghatiya parantu popular serial hai. Ghatiya isliye ki ye adkachri nakal hai moment of truth ka. Isme aaye har contestent pre planning ke sath aayen hain jinka satya se koi vasta nahi. Sab kuchh pre planned hai, kambli se lekar urvashi dholakia tak. Isliye ek programme ke taur par ye ghatia hai. Baat ab sanskriti ki kar li jaye, lekin meri to samajh mein nahi aa rahi hai ki hamari kaun SE ANOKHI SANSKRITI HAI. Arre bhai pahale koi mujhe 5 solid point to bataye bhartiya sanstkriti ke. Mujhe to lagata hai filhaal ye England ke samvidhaan ki tarah hai jo bas parmparon ke adhar par chalta hai. Aap sabhi gyaniyon se apeal hai ki bhartiya sanskriti ke baare mein kuchh roshni daale mera matlab hai kuchh thos baaten batayen.
Param priya Vivek satya mitram se yahi kahoonga ki wo likhate waqat dhyan rakhen ki kuchha shabad bolne mein achchhe lagte hain but likhane mein wahiyat jara gaur karen BAUDHIK SANDAS N BHEDIYA DHASAN, ye dono word lekhak ke prati vitrishna jagate hain.
Dhanyawaad arun pandey