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ये किस तरह की पैकेजिंग है प्रभाष जी?


जनतंत्र डॉट कॉम पर रांची के एक जागरुक पाठक ने लिखा है कि हिन्दी के बड़े पत्रकार प्रभाष जोशी हाल ही में संपन्न आम चुनाव के दौरान खबरों की खरीद फरोख़्त के शर्मनाक धंधे के ख़िलाफ़ खम ठोंककर मैदान में उतर पड़े हैं लेकिन अफ़सोस है कि प्रभाष जी ने एक अखबार प्रभात ख़बर को इस धंधे से अलग बताने का हास्यास्पद प्रयास किया है जबकि प्रभात ख़बर ने भी ख़बरों के धंधे में बढ़ चढ़कर हिस्सा बटोरा है। पाठक ने इसके उदाहरण भी बताए हैं। प्रभाष जोशी के चुनाव पैकेज के ख़िलाफ़ अभियान का मसला हो या फिर मीडिया के भीतर कई दूसरे गंभीर सवाल हो। उसकी धार तब कमजोर हो जाती है जब कुछ को कठधरे में खड़ा करके और कुछ को देवता के रूप में पेश करने का प्रयास शुरू हो जाता है। दरअसल किसी भी सवाल के उसके पूरे आकार में नहीं आने के ऐसे ही ख़तरे होते हैं। क्या प्रभाष जी चुनावी पैकेज के मामले में प्रभात ख़बर को पाक साफ घोषित नहीं करते तो उनका यह अभियान शुरू नहीं हो सकता था?

इससे जुड़ा दूसरा पहलू है कि क्या यह अभियान महज नैतिकता भर से जुड़ा है? यदि नैतिकता से भी जोड़ा जाए तो क्या इस तरह किसी अभियान को आगे बढ़ाया जा सकता है कि तेरे से मेरी नैतिकता अच्छी है। आखिर किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में किसी पत्रकार के चुनाव अभियान में शामिल होना और उसके प्रचार में जुटना किस पत्रकारीय नैतिकता का उदाहरण हो सकता है। देश में कई ऐसे राजनीतिज्ञ है जिन्हें पार्टियां अपना उम्मीदवार नहीं बनाती। यदि उसमें से एक दो के उम्मीदवार नहीं बनाए जाने को लेकर सवाल खड़े किए जाए तो उसके क्या अर्थ निकाले जा सकते है? हरिवंश तब के प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के प्रेस अटैची रह चुके हैं और बांका के बांके दिग्विजय सिंह से उसी समय की उनकी मित्रता है। मित्रता के कई आधार होते हैं उन पर चर्चा करना हमारा मकसद नहीं है। लेकिन एक पत्रकार के किसी भी राजनीतिक नेता के साथ किस तक तरह के संबंध है और उससे पत्रकारिता कितनी प्रभावित होती है यह हमारी चिंता का जरूर विषय होता है। प्रभाष जी ने पहले अपने कॉलम में बांका के बांके के टिकट नहीं मिलने पर शोर मचाया और फिर उनके चुनाव प्रचार में हरिवंश और एक डायरीधारी के साथ पहुंच गए। ये किस तरह की पैकेजिंग है? गांधीवादी रजी अहमद ने यदि प्रभाष जी से पूछा कि आप इसमें कहां फंस गए? तो ये सबसे बड़ा सवाल है। विचारों के टुकड़े-टुकड़े करके इस्तेमाल में लाया जाए तो उसे सुविधापरस्ती के अलावा क्या कहा जा सकता है? दूसरी बड़ी बात है कि रजी अहमद ने अपने मित्र प्रभाष जोशी से जो सवाल किया वो कोई हरिवंश से नहीं करेगा। कोई कद्दावर पत्रकार अपने प्रभाव और मान सम्मान का ठीक ठीक उपयोग नहीं करता है तो वह इतिहास में वैसी ही जगह हासिल कर पाता है। इस देश में कई ऐसे पत्रकार हुए है जिन्होंने राजनीतिक नेताओं का निष्पक्षता की आड़ लेकर पक्ष में जमकर प्रचार कार्य किया और फिर उनसे भरपूर लाभ उठाया। सब को पता है कि उन्हें पत्रकारिता की जमीनी दुनिया में किस तरह से याद किया जाता है।

बांका के बांके के
यहां भी यह देखने को मिला कि प्रचार की रणनीति कैसे तैयार की जाती है। वहां एक डायरीधारी ने कुछ लिखा। उसे पहले प्रभात ख़बर ने छापा और उसके बाद उसका प्रभाष जी ने अपने लोकप्रिय कॉलम कागद कारे में उल्लेख कर दिया। प्रभात ख़बर द्वारा डायरी लेखक को प्रमाणित किया गया और फिर प्रभाष जी ने प्रभात ख़बर की प्रमाणिकता को अपना प्रमाण पत्र पेश कर दिया। ये प्रचार की बहुत बारीक रणनीति होती है। इसमें अच्छे-अच्छे फंस जाते हैं। पाठक तो सबसे ज़्यादा भ्रमित होता है। पत्रकारिता के सामने जिस तरह के संकट खड़े हैं उस स्थिति में वैसे लोगों की सख़्त ज़रूरत है जो वास्तव में सवालों को संबोधित कर सकें। मंचों पर कई बार देखने को मिलता है कि बोलने वाला का ज़्यादातर वक़्त उन नामों को ही संबोधित करने में चला जाता है जो उनके आमने-सामने और ऊपर-नीचे बैठे रहते हैं। उस स्थिति में तो और ज़्यादा वक़्त नामों का उल्लेख करने में चला जाता है जब नामों की फेहरिस्त सुनकर कई झुकी गर्दनें तनने लगती है और कई छुपे चेहरे सामने आने की कोशिश में लग जाते हैं। नाम गिनाएंगे तो सवाल कब उठेंगे?

अनिल चमड़िया इस लेख में जिस टिप्पणी का जिक्र कर रहे हैं उसे पढ़ने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं। ये टिप्पणी रांची के जयकिशन की है। प्रभाष जोशी के लेख पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी थी और प्रभाष ख़बर को साफ सुथरा बताने पर एतराज जताया था।

चौकीदार का चोर होना

जनतंत्र ने वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया का यह लेख कथादेश के मीडिया विशेषांक से उधार लिया है। इस मीडिया विशेषांक में ऐसे बहुत से लेख हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं।

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12 Responses to ये किस तरह की पैकेजिंग है प्रभाष जी?

  1. अविनाश Reply

    August 3, 2009 at 3:28 am

    अनिल जी के इस लेख में कुछ ऐसी बातें हैं – जिसको लेकर मैं थोड़ा असमंजस में हूं। राजनीतिज्ञों से पत्रकार के रिश्‍ते को लेकर उनका आग्रह और व्‍याख्‍या की मांग करता है। राजनीतिज्ञों से पत्रकारों के रिश्‍ते की लंबी और समृद्ध शृंखला रही है। सवाल ये है कि इन रिश्‍तों का फलाफल क्‍या होता है? अगर इन रिश्‍तों की आड़ में अनैतिक रूप से माल बनाने की साज़‍िश होती है – तो ये ग़लत है – वरना पत्रकार भी इंसान है और राजनीतिज्ञ भी – दोनों दोस्‍त तो हो ही सकते हैं।

    बहरहाल, जहां तक प्रभात ख़बार के ख़बरों के धंधे में फंसने की बात है, तो इस बारे में आपकी टिप्‍पणी में पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों का भी खयाल नहीं रखा गया है। समरेंद्र जी, रांची के जयकिशन की चिटठी मेरे पास भी आयी थी। मैंने हरिवंश जी से पूछा भी था इस बारे में। उन्‍होंने मुझे वो सप्‍लीमेंट दिखाया – सुबोधकांत सहाय के प्रचार वाला – जिसके आधार पर जयकिशन ने आरोप लगाया है। उस सप्‍लीमेंट में साफ़-साफ़ लिखा है कि यह स्‍पॉन्‍सर्ड सप्‍लीमेंट है। उस मद में आने वाले पैसे का हिसाब-किताब है। जबकि दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान समेत कई अख़बारों ने प्रत्‍याशियों की ख़बर छापने के बदले जो पैसे लिये, उसका कोई हिसाब-किताब नहीं है। प्रभाष जी का अभियान इसी छुपे हुए धन की नैतिकता और पाठकों के साथ होने वाले अन्‍याय से जुड़ा है।

    अनिल जी, मैं ये भी बताना चाहता हूं कि प्रभात ख़बर ने चुनाव के दौरान अपने पहले पन्‍ने पर लगातार पाठकों और नेताओं को इस बारे में आगाह किया कि अगर उनका रिपोर्टर इस तरह की किसी भी अनर्गल और अनैतिक डिमांड करे, तो मुख्‍यालय में ख़बर करें। कार्रवाई होगी। आपको जानना चाहिए कि प्रभात ख़बर ने ऐसे कई रिपोर्टरों के खिलाफ़ कार्रवाई की भी। मोतिहारी का बरसों पुराना संवाददाता इसी चक्‍कर में प्रभात ख़बर से निकाला गया।

    अनिल जी, मुझे आपकी भाषा को लेकर भी आपत्ति है। अगर आप संजीदा पत्रकार हैं, तो आपको बांका का बांके या डायरीधारी जैसे संबोधनों से बचना चाहिए। अगर उन डायरीधारी पत्रकार से आपका तात्‍पर्य अनुराग चतुर्वेदी से है, तो उनकी अपनी पहचान है। आपको उनका नाम लेना चाहिए। उन्‍होंने अपना पत्रकारिता धर्म निभाया। दिग्‍व‍िजय की रैली को कवर किया। यही लिखा कि रैली की भीड़ दिग्विजय को मिल रहे अभूतपूर्व जनसमर्थन की कहानी कह रही थी। क्‍या ग़लत लिखा – तस्‍वीर छपी थी, जिसमें सचमुच भीड़ दिख रही थी और चुनाव परिणाम ने भी इसको पुष्‍ट ही किया।

    यहां मैं आपको बताना चाहूंगा कि हरिवंश जी उस रैली में गये। मित्र थे। जाना अस्‍वाभाविक नहीं था। दोनों समाजवादी पृष्‍ठभूमि के लोग हैं। लेकिन उन्‍होंने अपना पत्रकार धर्म भी निभाया। उन्‍होंने अपनी उस बांका यात्रा पर खुद एक शब्‍द भी नहीं लिखा। जबकि प्रभाष जी ने ऐसे लिखा, जैसे पूरी भारतीय राजनीति‍ में साहस की एक अकेली गाथा दिग्विजय सिंह ही लिख रहे हों। प्रभाष जी के अतिवाद और हरिवंश जी की “सावधानी” को आप जैसे पत्रकार अगर नहीं पढ़ पाएंगे, तो दूसरों से क्‍या उम्‍मीद करें।

    मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि कुछ ल‍िखें, तो उससे पहले तथ्‍यों की एक बार और पड़ताल कर लें। जिनसे संबंधित तथ्‍य हैं, उनसे एक बार बात कर लेने में कोई हर्ज नहीं है।

  2. अरविंद शेष Reply

    August 3, 2009 at 12:30 pm

    अविनाश जी की टिप्पणी के संदर्भ में कहना चाहूंगा कि किसी को भी लोकसभा चुनावों या उसके बाद के प्रभात खबर के अंकों, उसके विज्ञापनों, “खबरों” का अध्ययन करना चाहिए।
    मैं नहीं जानता कि “दर्शक” नाम से प्रभात खबर में टिप्पणियां कौन लिखता है। लेकिन सिर्फ शिक्षकों के विरोध प्रदर्शन पर लिखी टिप्पणी देखने लायक है कि कैसे एक अखबार सरकार का पक्ष बन जाता है…।
    प्रभात खबर की सावधानियों की बाबत एक और उदाहरणः
    पटना के एक्जीबीशन रोड में जिस युवती को सरेआम नंगा किया गया, प्रभात के पहले पन्ने पर उसकी अलग-अलग तस्वीरें (साफ-साफ उसकी पहचान को दर्शाने वाली) नाम और परिचय सहित प्रकाशित किया गया।
    पता नहीं इसमें पत्रकारिता के किस धर्म और नैतिकता का निर्वाह किया जा रहा था।
    ऐसे उदाहरण इस अखबार में और भी मिल सकते हैं। हालांकि इस मामले में यह कोई अकेला बहादुर अखबार नहीं है।

  3. अविनाश Reply

    August 3, 2009 at 12:59 pm

    अरविंद शेष जी को मालूम होना चाहिए कि अनिल चमड़‍िया ने जिस संदर्भ में अपने विचार रखे हैं, मेरी टिप्‍पणी उसी संदर्भ में है। दूसरे संदर्भों को रहने दीजिए। लोकसभा चुनावों के दौरान किसी एक ख़बर का प्रभात ख़बर से वे उदाहरण दें, जिससे ध्‍वनित होता हो कि किसी प्रत्‍याशी के पक्ष से ख़बर डिक्‍टेट की गयी हो। सिर्फ लफ्फाज़ी और पूर्वाग्रहों को किसी अख़बार के ख़‍िलाफ़ अपना तथ्‍य न बनाएं। रही बात दर्शक के कमेंट की, तो यह एक सरकार की प्रशंसा का एडिटोरियल व्‍यू हो ही सकता है – लेकिन एक प्रत्‍याशी की प्रशंसा के लिए यहां पैसे के लेन-देन का ज़‍िक्र चल रहा है। संभव है, प्रभात ख़बर कई मामलों में पत्रकारीय नैतिकता निर्वाह रत्ती भर भी नहीं कर रहा हो, लेकिन यहां बात जिस संदर्भ में चल रही है, उस पर अरविंद शेष बात करें, तो ज़्यादा बेहतर होगा।

  4. अरविंद शेष Reply

    August 3, 2009 at 2:06 pm

    उदाहरणों को लफ्फाजी या पूर्वाग्रह कहकर बचने (बचाने) की कोशिश संदर्भों को अलग करने के रूप में झलकती है। ज्यादा अच्छा हो कि किसी को अखबार का ही अध्ययन करने की सलाह दी जाए, जहां अखबार की “सावधानी” (जिस सावधानी की बात आपने की है) काफी मुखर रूप में दिखाई देती है।
    किसी का भी अपना पक्ष हो सकता है, वह किसी को पसंद या नापसंद कर सकता है, उसके अनेक कारण हो सकता हैं- इस बात को लेकर मेरी कोई आपत्ति नहीं है।

  5. रंगनाथ सिंह Reply

    August 3, 2009 at 3:49 pm

    अविनाश ने किसी आरोप से पहले तथ्यों की विस्तृत जांच का जो आग्रह किया है वो बिल्कुल सही है। बांका जैसे शब्दों के प्रयोग से बचने की सलाह भी मेरे हिसाबे उचित है। लेकिन

    सितारों के आगे जहां और भी हैं/इश्क के इम्तहा अभी और भी है !!

    प्रभात खबर के या किसी भी अखबार के समग्र चरित्र को लेकर बात करते वक्त बहस को व्यापक दायरे में रखना होगा। इसलिए अरविंद शेष ने जो टिप्पणी की है उससे उनकी पत्रकारीय नैतिकता से जुड़ी चिंता जाहिर होती है। अरविंद शेष गर इस बहस को नए आयाम देना चाहते हैं तो बहस में उनकी मौजूं चिंता को संदर्भच्युत कह कर खारिज करने की कोशिश खतरनाक है।
    अरविन्द शेष ने प्रभात खबर के ऊपर बिहार सरकार के मुखपत्र बनने के बारे में जो कहा है उस बिन्दु को बहस में शामिल करने से बहस की गुणवत्ता बढ़ेगी ही।

    स्वयं अविनाश ने माना है कि हरिवंश दिग्विजय की रैली में मित्रता निभाने गए थे। ऐसा लिखते वक्त अविनाश को जरा भी ध्यान है क्या कि,गर अखबारों के संपादक इसी तरह बीच चुनाव में अपनी यारी निभाते रहे तो उस अखबार के रिपोर्टरों और दूसरे कर्मचारियों की निरपेक्षता और मनोबल पर बहुत बुरा असर पड़ेगा !!

    अविनाश ने हरिवंश का बचाव करते हुए बड़ा ही भोला तर्क दिया है कि, हरिवंश ने उस चुनावी सभा से लौटने के बाद अपनी बांका यात्रा पर एक शब्द भी नहीं लिखा !!

    अविनाश तो अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं,क्या वो नहीं जानते कि अखबार के संपादक को हर विषय पर खुद नहीं लिखना पड़ता !! सामान्यतः वो जो चाहे जिससे चाहे लिखवा सकता है।

    देखा जाए तो पूरा का पूरा अखबार ही संपादक की जबान होता है। अखबरा में आयी हर चीज उसकी सहमति को दर्शाती है। किसने लिखा और किसने लिखवाया इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

    अविनाश ने एक और तर्क दिया है कि चुनाव परिणामों से दिग्विजय समर्थक खबरों की पुष्टि हुई। अविनाश के इस तर्क पर गालिब याद आ गए,

    इस सादगी पर कौन न मर जाए या खुदा
    वो लड़ते तो हैं मगर हाथ में तलवार ही नहीं

    अविनाश के इस तर्क को एक बार के लिए मान लिया जाए तो,

    कल को कोई अखबार यह भी कहेगा कि हमने जो खबरें (मूलतः विज्ञापन)छापी थीं वो बिल्कुल सही थीं। चुनाव परिणामों से इनकी पुष्टि हुई है।

    खैर,इसके अलावा अविनाश ने बहुत ही साहसिक ढंग से प्रभाष जोशी के संदिग्ध निष्पक्षता की तरफ इशारा किया है। प्रभाष जोशी जैसे वरिष्ठ पत्रकार की इस चालाक पक्षधरता के ऊपर भी बहस होनी चाहिए।
    किसी बहस में किसी एक बिन्दु के चारों तरफ गोला खींच कर उस निश्चित घेरे में बहस को जकड़ने से बहस का औचित्य ही खत्म हो जाता है।

    इसलिए अरविन्द शेष ने जो प्रश्न उठाए हैं और अविनाश ने जो सूत्र दिए हैं उन्हें ध्यान में रख कर यह बहस आगे बढ़े तो बेहतर।

  6. virendra jain Reply

    August 3, 2009 at 4:14 pm

    दो तीन बातें ध्यान में रख कर बात होनी चाहिए कि प्रभाष जी के लेख का शीर्षक पैकेजिंग का काला धंधा है पक्षधरता नहीं दूसरी कि प्रभाषजी ने उन लालजी टंडन के बयान को आधार बना कर बात शुरू की थी जो भाजपा के उम्मीदवार थे पर प्रभाषजी उनकी राजनीति को पसंद नहीं करते तीसरी बात यह कि बात को उसके मुख्य लक्ष्य से भटका दिया गया है .इस बहस में केंद्रबिंदु प्रभाष जोशी या हरिवंश नहीं हैं अपितु पैकेजिंग का काला धंधा है अनिल चमडिया या अरविन्द शेष को उनसे जो भी खुंदक हो उसको लेकर वे उनसे अलग से निबट सकते हैं किन्तु जब एक सही जगह चोट की जा रही हो तब बहस को भटकाने से चोरों को बल मिल सकता है

  7. aam admi Reply

    August 3, 2009 at 5:23 pm

    अविनाश जी,

    जहाँ तक मेरी समझ काम करती है, उसके हिसाब से चर्चा के केंद्र में पत्रकारिता की नैतिकता है. आपने लिखा है कि हो सकता है प्रभात ख़बर कई मामलों में पत्रकारीय नैतिकता निर्वाह रत्ती भर भी नहीं कर रहा हो, पर लोकसभा चुनावों के दौरान इस अखबार ने पत्रकारीय शुचिता का पूरा ख्याल रखा. अब क्या एक मसले पर पाक- साफ़ दिखने भर से बात खत्म हो जाती है? क्या पत्रकारीय नैतिकता को इस तरह एकांगी करके देखा जाना सही होगा किसी भी कोण से? आप यदि ईमानदारी बरतते हैं तो उसे पूरी तरह बरतना होता है और हर परिस्थिति में बरतना होता है. टुकडों में बरती गयी ईमानदारी का न तो कोई मतलब होता है और न ही इसे सही ठहराया जा सकता है. बाकी आप खुद समझदार हैं.

  8. Swetkamal Reply

    August 4, 2009 at 4:36 pm

    साथयों की इस बहस में मैं इतना भर जोड़ देना चाहता हूं कि दूध का धुला न दैनिक जारगण है और न प्रभात खबर. दूसरी तरफ दूध के धुले न तो हरिवंश जी हैं और न आदरणीय प्रभाष जोशी। हरिवंश जी के बारे में ज्यादा कहने की स्थिति में नहीं हूं क्योंकि मालूम नहीं है, पर प्रभाष जी के बारे में इतना तो जानता हूं कि जनसत्ता का एक एसा दौर भी था जब प्रभाष जी के मन में राज्यसभा में जाने की इच्छा जागृत हो गई और उनकी वह इच्छा बलवती भी हो गई. फिर उन्होंने जनसत्ता के प्रधान संपादक होने के अपने दायित्वों की तरफ से भी एक हद तक ध्यान हटा लिया और राज्यसभा में अपनी सीट जुगाड़ने के काम में भिड़ गए. रोज तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के आगे चंवर डुलाने का काम शुरू कर दिया. उस दौरान वे जनसत्ता के दफ्तर में विरले ही देखे जाते थे. वीपी सिंह की सरकार बनाने में प्रभाष जी का भी योगदान था. सरकार बनने पर जनसत्ता में उनहोंने वीपी के समर्थन में बहुत लिखा था. सो अब उस लेखन और समर्थन का प्रतिदान वे चाहते थे. पर लाख कोशिश के बाद भी वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए. वीपी सिंह और देवीलाल के दरबार में काफी समय तक झाड़ू-बुहारू करने के बाद भी वीपी और देवीलाल उन्हें गोली ही देते रहे, राज्यसभा की सांसदी नहीं दी. प्रभाष जी की सक्रियता जनसत्ता में वापस तभी शुरू हुई जब वे सांसदी की उम्मीद से निराश होकर लौट आए. एक बार मैं एक चैनल के लिए इंचरव्यू करने चौधरी देवीलाल के पास गया था. उन दिनों देवीलाल दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती थे और स्वास्थलाभ कर रहे थे. उस मुलाकात में देवीलाल ने प्रभाष जी की सांसदी की लालसा और उसके लिए उनकी तरफ से (प्रभाष जी की ओर से) की गई कोशिशों के बारे में काफी कुछ बताया था. बातचीत में देवीलील ने प्रभाष जी के लिए कई अपशब्दों और अपमानजनक पंक्तियों का भी इस्तेमाल किया था जो मुझे बहुत बुरा लगा था और मैं देवीलाल से यह जानकर बहुत दुखी और लज्जित हुआ कि जनसत्ता सरीखे एक मानक अखबार को स्तित्व में लानेवाला यह महान पत्रकार राज्यसभा की सांसदी पाने के अपने निहित स्वार्थ के लिए इन भ्रष्ट और टुच्चे राजनेताओं के आगे नतमस्तक होकर क्यों गिड़गिड़ाया. मुझे दुख इस बात के लिए भी काफी हुआ कि अपने भविष्य के इस हितलाभ को ध्यान में रखकर इस महान पत्रकार ने बरसों तक जनसत्ता के पन्नों पर वीपी सिंह और देवीलाल का अनर्गल महिमामंडन क्यों किया. इतनी कसीदाकारी के बाद भी वीपी और देवीलाल प्रभाष जी के काम नहीं आए यह और भी लज्जा का विषय है. नेता किसी का सगा नहीं होता यह तो आदरणीय प्रभाष जी नें महसूस किया ही होगा. पर प्रभाष जी ने अपने फायदे के लिए जनसत्ता के पन्नों का भरपूर इस्तेमाल किया. सांसदी तो उन्हें नहीं मिली पर हो सकता है उन्हें दूसरे तरह के लाभ मिले हों. प्रभाष जी को तो रामनाथ गोयनका (आरएनजी) की संपत्ति में भी कुछ मिलने की उम्मीद थी, पर शायद एसा नहीं हो पाया क्योंकि आरएनजी के अंतिम दिनों में एक्सप्रेस की संपत्ति का विवाद काफी विचित्र मोड़ ले चुका था और उस दौरान आरएनजी अपनी याददाश्त खो चुके थे. प्रभाष जी की बेटी तो उन दिनों कहा करती थी कि बुड्ढा आरएनजी मरने से पहले कुछ हिस्सा तो हमें (तात्पर्य प्रभाष जी और उनका परिवार) भी देकर ही जाएगा. (मैंने खुद यह सुना है उनकी बेटी के मुंह से जब आरएनजी अस्वस्थ तो थे पर सहारे से चल-फिर सकने की स्थिति में थे) पर यह उम्मीद भी धरी की धरी ही रह गई और आरएनजी की संपत्ति उनके दोनों नातियों विवेक खेतान व मनोज सोंथालिया और बहू सरोज गोयनका में बंट कर रह गई……तो भाई कुल जमा ये कि खोट हर जगह है. कोशिश यही रहे कि सारे चरित्र पर्दे के पीछे से सामने ले आए जाएं और फिर उस पर बहस हो. सही बात और काम की सराहना जरूर हो पर गलत को सही हर्

    िज न करार दिया जाए. इन संद्रभों में चर्चा और बहस इसे लेकर भी होनी चाहिए कि बड़े पत्रकारों व संपादकों ने बड़े अखबारों व बैनरों का अपने फायदे के लिए कहां-कहां किस-किस प्रकार से इस्तेमाल किया. आखिर कुछेक पत्रकार चंद दिनों में ही इतने बड़े-बड़े अमीर कैसे हो गए यह भी एक बहस का मुद्दा तो बनता ही है. सवाल मैं भी पत्रकारिता की सुचिता और नैतिकता की कर रहा हूं दोस्त.

  9. समता भारती Reply

    August 5, 2009 at 12:34 am

    जनतंत्र पर एक बार फिर इस चर्चा ने इसके नाम जनतंत्र को सार्थक किया है। मैं समझ नहीं पा रही कि चैकीदार का चोर होना टिप्पणी पर 24 प्रतिक्रियाओं और इस नयी चर्चा में आठ प्रतिक्रियाओं के बावजूद प्रभाष जोशी जैसे मूर्धन्य पत्रकार इस तरह चुप क्यों हैं। मैं उनके लेखन की प्रशंसक रही हूं और चैकीदार का चोर होना टिप्पणी टिप्पणी को मैं कई बार पढ़ चुकी हूं। मैंने जयकिशन के पत्र को भी ध्यानपूर्वक पढ़ा और मैंने अपनी पिछली टिप्पणी में लिख चुकी हूं कि यह व्यक्तिगत छींटाकशी का मामला नहीं है बल्कि आदरणीय प्रभाष जोशी ने अपने लेख में जिस व्यक्ति या अखबार को आदर्श बताया है, उसके बारे में वास्तविक तथ्यों की तहकीकात का मामला है। चूंकि प्रभाष जी इसे लिख चुके हैं और जनतंत्र इसे प्रकाशित कर चुका है, साभार ही सही, तो अब यह छानबीन कोई व्यक्तिगत बात नहीं रह जाती। तारीफ आपने किसी व्यक्ति की ही की है, उसकी सच्चाई जानने की बात आयी तो इसे छींटाकशी कहकर कोई बच नहीं सकता। में समझती हूं कि इस मामले में प्रभाष जी की चुप्पी उनके व्यक्तित्व को हल्का करेगी। यह बात मेरी समझ से परे है कि आप पाठकों को जवाब देकर उलझने के बजाय सीधे प्रभाष जी से ही इसका जवाब क्यों नहीं मांग लेते। में नहीं समझती कि उनके जैसा व्यक्तित्व सच्चाइ से मुंह चुरायेगा अथवा पीछे हटेगा। एक मूर्धन्य पत्रकार होने के नाते श्री प्रभाष जोशी बखूबी समझते ही होंगे कि उनके लिखे की सच्चाई जानने का हक हर पाठक को है। इस पर सवाल करने का भी। इसे व्यक्तिगत या छींटाकशी बताकर टालने के बजाय सच सामने लाने का प्रयास होना चाहिए।
    मुुझे लगता है कि अविनाशजी भी भावुकता में बहकर प्रभाष जी और हरिवंश जी के व्यक्तित्व के आधार पर टीका-टिप्पणी कर रहे हैं। बेहतर होगा कि वह तमाड़ के चुनाव के और लोकसभा चुनाव के दौरान तथा बांका में प्रभाष जी, हरिवंश जी और अनुराग चतुर्वेदी जी की भूमिका के बारे में तथ्यों को जानने का प्रयास करें। जयकिशन ने अपने पत्र में अंडर बिलिंग वाले जिस पेंच की बात की है, वह भी समझने की चीज है। इतनी चर्चा के बाद भी अगर प्रभाष ने मुंह नहीं खोला तो वह प्रकारांतर से इन तथ्यों की ही पुष्टि करेंगे। ऐसे में अविनाश जी द्वारा एकांगी बचाव किया जाना असफल प्रयास ही होगा।

  10. amit kumar Reply

    August 5, 2009 at 10:36 pm

    श्वेत कमल जी,
    सूचनार्थ प्रेषित है कि इधर कुछ महीनों से हरिवंश जी भी राज्य सभा की जुगत में हैं. यह कुछ नयी बात नहीं है. पटना में तो इसे सब जानते हैं.
    चुनाव के दिनों में प्रभात खबर ने भी माल बटोरा है, दूसरों की तरह. लेकिन अपनी औकात भर ही न बटोरेगा वह. इसलिए उतना दिखा नहीं.
    मोतिहारी के सम्वाददाता को निकाले जाने की वजह का यहाँ ज़िक्र अविनाश ने किया है, वह उन्हें हरिवंश (या उनके लोगों) ने ही बताई होगी. बहुत अच्छा अविनाश जी, आपके मार्क्सवादी मगज में मालिक ही वैध हैं, नौकर से क्या जानना कि असली वजह क्या है. वैसे भी आपकी इस पूरी टिपण्णी में मालिकों की चापलूसी झलकती है. लिबरेशनी क्रांतिकारिता यही है क्या अविनाश जी?
    आजकल प्रभात खबर वैसे राजपूतिस्तान बना हुआ है. अविनाश जी भी शायद सर्टिफिकेट पाने की आस लगाये बैठे हैं. लगे रहिए, रामजी बेडा पर लगायेंगे.

    • खबरची Reply

      August 17, 2009 at 1:36 pm

      हमारे बिहार में एक पुरानी कहावत है- आप पियें तो शरबत, हम पियें तो ताड़ी. माननीय हरिवंश जी के पैरोकार कुछ ऐसी ही कवायद में लगे हैं. अविनाश जी जिस तरीके से हरिवंश जी के पक्ष में दलीलें दे रहे हैं उससे एक अलग किस्म की बू जरूर आ रही है. अरे भईया, क्या पूरे देश में एकमात्र समाजवादी दिग्वियज सिंह ही थे जो हरिवंश तमाम नैतकिता और मर्यादा को ताक पर रख कर उनके चुनाव प्रचार में कूद पड़े. अविनाश जी इसका रिश्ता समाजवाद से जोड़ रहे हैं. वैसे बात वाद की ही है लेकिन समाज के बदले जाति लगा दें तो हरिवंश जी का सही चेहरा सामने आयेगा. मोतिहारी का रिपोर्टर इसलिए निकाला गया क्योंकि वो एक खास जाति का नहीं था. बिहार के तमाम पत्रकार इन बातों को समझते हैं, हैरान हूं अविनाश जी क्यों नहीं समझ पा रहे हैं. वैसे हरिवंश जी का एक चेहरा और भी है. नीतीश कमार के धुर विरोधी दिग्विजय सिंह के लिए उनकी गहरी आस्था जगजाहिर हो चकी है. हिरवंश जी उनका चुनाव प्रचार कर रहे थे. ये वो चनाव प्रचार था जिसकी बुनियाद ही नीतीश कुमार का विरोध करना था. (चुनाव के समय बांका पहुंचने वाले प्रभात खबर के पन्नों को पलट कर देखिये हरिवंश जी की निष्पक्षता आंखों के सामने आ जायेगी. ) हरिवंश जी उस प्रचार के बड़े योद्धा थे. लेकिन उनका भोलापन तो देखिये दो महीने बाद ही उन्हें नीतीश सरदार पटेल के बाद सबसे सुलझे हुए राजनेता नजर आने लगते हैं. इस सादगी पर कौन न मर जाये…हरिवंश जी की नैतिकता का नंगा सच देखने के लिए जरा उस दिन का अखबार तो देख लीजिये जब पटना में सरेआम एक चुवती को निर्वस्त्र किया गया था. छोडिये पत्रकारों को, हर शरीफ बंदे की आंखें शर्म से जरूर झुक गयी होंगी. अगर हरिवंश जी इसके लिए स्वयं जिम्मेवार नहीं थे तो क्यों नहीं उन्होंने स्वयं प्रकाश(स्थानीय संपादक) या प्रमोद मुकेश (समाचार संपादक) के खिलाफ कार्रवाई की थी. माननीय हरिवंश जी ने इसके बाद नीतीश कुमार को फोन कर माफी तो मांगी लेकिन अपने स्वजातीय अधीनस्थों के खिलाफ कार्रवाई का साहस नहीं जुटा पाये. अमित जी आप सही हैं, हरिवंश जी के सहारे अविनाश जी की नैया जरूर पार लग जायेगी.

      • khderan Reply

        August 21, 2009 at 1:16 am

        bhai sab, kya such me aap bihari hain? aasman par mat thukiye. such boliye. man me kuntha nahi paliye

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