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ये संपादक तो बड़ा ख़तरनाक है

जागरण में छपी तस्वीर

जागरण में छपी तस्वीर

क्या किसी पत्रकार को ये हक़ है कि वो निजी खुन्नस निकालने में अपने संस्थान का इस्तेमाल करे? इस सवाल का सीधा जवाब है – नहीं। किसी भी पत्रकार को ऐसा नहीं करना चाहिए और ना ही उसे ये हक़ दिया जाना चाहिए। इसी सिलसिले में दिल्ली के एक मीडिया संस्थान का एक वाकया ध्यान आ रहा है। वहां के एक कर्मचारी ने किसी इंस्टीट्यूट को डराने के लिए संस्थान का बेजा इस्तेमाल कर दिया था। इंस्टीट्यूट की तरफ से शिकायत मिलने पर उस कर्मचारी को नौकरी छोड़नी पड़ी। लेकिन आप हर कंपनी से ऐसी आचार संहिता की उम्मीद नहीं कर सकते। खासकर जब वो कंपनी अपने कर्मचारियों का इस्तेमाल अनैतिक तरीके से धन जुटाने में करती हो।

तीस जुलाई को पटना के दैनिक जागरण में एक तस्वीर छपी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस की। जॉर्ज राज्यसभा का पर्चा भरने के लिए पटना पहुंचे हुए थे। ये तस्वीर मोर्या होटल में खींची गई थी। जॉर्ज और नीतीश के पीछे पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश कुमार मौजूद थे। बताया जाता है कि प्रकाश कुमार और दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक शैलेंद्र दीक्षित से रिश्ते ठीक नहीं हैं। दोनों में झगड़ा है। झगड़ा की जगह खुन्नस शब्द ज़्यादा बेहतर रहेगा। दोस्ती की तरह खुन्नस भी निजी होती है। बेहद निजी। लेकिन दैनिक जागरण के संपादक ने निजी खुन्नस बेहद ओछे तरीके से सार्वजनिक कर दी। तीस जुलाई को अख़बार में नीतीश और जॉर्ज की जो तस्वीर छपी, उसमें उन दोनों के पीछे मौजूद प्रकाश कुमार का चेहरा ब्लर (पोत) कर दिया गया। ऐसे जैसे वो पत्रकार कोई अपराधी या पीड़ित हो। ये अपने आप में ऐतिहासिक घटना है। ऐसी घटना इससे पहले शायद ही कभी हुई होगी। शायद ही कभी किसी संपादक ने किसी पत्रकार से इस तरह बदला लिया हो। सवाल उठता है कि ये तरीका कहां तक सही है और इससे क्या संकेत मिलते हैं?

दूसरे अख़बार में छपी तस्वीर

दूसरे अख़बार में छपी तस्वीर

दैनिक जागरण बीते कुछ महीनों में अपने कुकर्मों के कारण कुछ ज़्यादा ही बदनाम हो चुका है। कुकर्म भी ऐसे कि पूरे मीडिया जगत पर कालिख पुत गई है। पटना में दैनिक जागरण ने जिस दिन पत्रकार की फोटो को ब्लर किया उसी दिन बिहार विधानसभा में चुनाव के दौरान मीडिया के कुकर्मों पर बहस चल रही थी। एक विधायक ने प्रभाष जोशी के लेखों का हवाला देकर सवाल उठाया कि कैसे कई अख़बारों ने पैसे लेकर ख़बरें छापीं। प्रभाष जोशी ने अपने लेख में दैनिक जागरण का नाम खुल कर लिया है। बताया है कि उस अख़बार ने किस तरह ख़बरों का सौदा किया। ईमान का सौदा किया। पत्रकारिता के धर्म और कर्म का सौदा किया। विधानसभा में बहस के दौरान राज्य सरकार ने माना कि दैनिक जागरण जैसे कुछ अख़बार इस कुकर्म में लिप्त रहे हैं। लेकिन सरकार मजबूर है। ये सबकुछ अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में किया गया है इसलिए कार्रवाई नहीं की जा सकती है। सरकार भी सीधे तौर पर किसी मीडिया संस्थान से पंगा नहीं लेना चाहती।

जाहिर है, शैलेंद्र दीक्षित पटना में दैनिक जागरण के संपादक हैं और सुभाष पांडे ब्यूरो चीफ। ऐसे में अख़बार की तरफ से हुई दलाली की ख़बर उनको भी रही होगी। आखिर ख़बरों का सौदा उनकी जानकारी के बगैर तो नहीं हुआ होगा। ऐसे में प्रश्न उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि संस्थान के लिए सारे धतकर्म करते-करते इनके हौसले इतने बुलंद हो गए हों कि संस्थान को निजी मिल्कियत समझने लगे हों और उसका इस्तेमाल निजी सेटिंग-गेटिंग में करने लगे हों? या कहीं बिहार में दैनिक जागरण में ऊंचे पदों पर तैनात ये तथाकथित पत्रकार पहले से ही ऐसे हथकंडे तो नहीं अपना रहे? हो सकता है कुछ लोगों को ये सवाल अजीब से लगे, लेकिन जो पत्रकार अपने साथी को बेइज्जत करने के लिए ऐसी हरक़त कर सकते हैं क्या गारंटी है कि वो नेताओं, कारोबारियों के साथ ऐसा नहीं करते होंगे। उन्हें डराने-धमकाने और ब्लैकमेल करने के लिए इस तरह के हथकंडे नहीं अपनाते होंगे। क्या गारंटी है कि उन्होंने अपने संस्थान को निजी स्वार्थों की पूर्ति का जरिया नहीं बनाया होगा?

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34 Responses to ये संपादक तो बड़ा ख़तरनाक है

  1. विवेक रस्तोगी Reply

    August 4, 2009 at 7:35 am

    सांख्ययोग में कहा गया है कि अगर कहीं पर धुआँ उठ रहा है तो निश्चित ही वहाँ आग जल रही होगी।

  2. aam admi Reply

    August 4, 2009 at 2:21 pm

    समरेन्द्र जी,

    एक गंभीर मसला उठाने के लिए आपको हार्दिक बधाई. इस ‘लिपाई-पुताई’ कांड की तह में जाकर आप गहराई से पड़ताल करें तो आपको यह घटना कतई अस्वाभाविक नहीं लगेगी. बाजारवाद के मर्ज़ से बुरी तरह पीड़ित और अपनी आतंरिक संरचना में सामाजिक संतुलन को भद्दे ढंग से नजरंदाज़ करते एवं सामंती मनोवृति का महीन तरीके से पोषण करने वाले पत्र-पत्रिकाओं से किसी क्रन्तिकारी अप्रोच की उम्मीद की जा सकती है क्या? जब तक हमारा मीडिया जगत इन दोनों ‘बिमारियों’ का सही इलाज नहीं करता इस तरह की ‘दुर्घटनाएं’ आगे भी होती रहेंगी.

  3. manisha parul Reply

    August 5, 2009 at 9:54 am

    मान्यवर,
    अव्वल तो आपको ये झगडे और मीडिया की आपसी डाह वाली ख़बरों पर वक़्त और दीमाग ही नहीं खपाना चाहिए था. कुछ बेहतर सोचने समझने और लिखने की कोशिश हो, जो अब टी वी में वैसे भी बहुत कम रह गया है. वैसे किसी अखबार में क्या छपे और क्या नहीं ये उसके सम्पादक का अधिकार है. ( कॉपी राईट कानून अवश्य देखें ) फिर चेहरे पर लिपा पोती से प्रकाश इतने क्यों दुखी है. आप एक बार पटना आयें ये मेरा आग्रह है. देखिये कैसी होड़ मची है मुख्या मंत्री नीतिश कुमार का सबसे करीबी दीखने की. सब ने पत्रकारिता के नाम पर यहाँ अपनी अपनी दूकान खोल रखी है. जिन दोनों पत्रकारों में झगडा हुआ कल तक चाचा भतीजा थे गलबहियां डाले घुमते थे लेकिन इसी दूकानदारी के चक्कर में भीड़ गए. प्रेस क्लब का झगडा भी इसी की एक कड़ी है. लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है आप पिछले दरवाजे से प्रकाश बाबु को चमकाने की मुहीम में जुटे हैं

    • समरेंद्र Reply

      August 6, 2009 at 3:34 pm

      मनीषा जी,
      मैंने कब कहा कि संपादक का अधिकार नहीं। यकीनन अख़बार में क्या छपे और क्या नहीं ये संपादक का ही अधिकार है। इसलिए तो जो छपा है उसके लिए संपादक की आलोचना हो रही है। संपादक की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

      रही बात प्रकाश की तो जनतंत्र पर उन्हें चमकाने का आरोप लगाने से पहले आपको इससे जुड़ा बाकी पोस्ट पढ़ने चाहिए। कहीं प्रकाश का समर्थन नहीं किया गया है। प्रकाश और कन्हैया भेलारी के बीच हुए झगड़े पर पटना के वरिष्ठ पत्रकारों की जो राय रखी गई है उसमें भी वो प्रकाश की निंदा कर रहे हैं। आप उन सभी से जाकर पूछिएगा कि क्या उनकी राय में कोई काट-छांट की गई है? फिर भी आपको ऐसा क्यों लग रहा है यह बात समझ से परे है।

      जहां तक पटना आने का सवाल है। मेरा जन्म पटना में हुआ है और बचपन के कई साल पूर्णिया में बीते हैं। बीते दो साल में छह से सात बार बिहार के कई इलाकों का चक्कर लगा चुका हूं। पटना के अलावा अररिया, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया कई इलाकों में घूम चुका हूं। वहां के ढेरों पत्रकारों को जानता हूं। टीवी और प्रिंट दोनों माध्यमों के। ये भी जानता हूं कि किस किस ने कौन-कौन सी दुकान खोल रखी है। ये भी किसकी दुकान कितनी बड़ी है। इसलिए आपसे बस एक ही गुजारिश है कि बात जिस मुद्दे पर हो रही है उसे उसी मुद्दे पर केंद्रित रखिए।

  4. रीतेश Reply

    August 5, 2009 at 9:28 pm

    जनतंत्र डेस्क,

    आपकी खबर पढ़कर अच्छा नहीं लगा. आपकी खबर पर बात करू इससे पहले यह साफ कर दूं कि मेरे लिए दीक्षित जी आदरणीय हैं और मेरा सौभाग्य रहा कि मैंने उनका सानिध्य पाया. ये भी बताना जरूरी समझता हूं कि 1999 के दौर में जब जागरण का दफ्तर खोलने दीक्षित जी उमस भरी गर्मी में एक मार्शल से बिहार-झारखंड का दौरा कर रहे थे, तभी उन्होंने मुझे नौकरी दी थी. नौकरी देने से ज्यादा आपको यह बताना महत्वपूर्ण है कि मैं ब्राह्मण नहीं था फिर भी मुझे बिना जान-पहचान के नौकरी मिली. और, इसी नौकरी का हाथ पकड़कर मैं 2005 में दिल्ली आया और आज भी दिल्ली में खम के साथ डटा हुआ हूं.

    आपकी खबर में कुल जमा दो आरोप हैं. एक तो ये कि जागरण ने प्रकाश जी की तस्वीर को ब्लर कर दिया या ठीक से ब्लर नहीं किया क्योंकि दीक्षित जी और प्रकाश जी के बीच झगड़ा या खुन्नस है. दूसरा आरोप आपने लगाया कि चुनाव के दौरान जागरण ने खबरों के लिए दलाली की और ये सब दीक्षित जी की जानकारी में हुआ.

    मैंने दीक्षित जी से बात करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो सकी. बिना उनसे बात किए भी मैं आपको दोनों आरोप का जवाब दे सकता हूं क्योंकि मैंने जागरण में अपने बचपना और जवानी के दरम्यान के छह साल बिताए हैं.

    पहले बात प्रकाश जी की तस्वीर को ब्लर करने पर. जागरण में आपने कभी काम किया होता तो आप जरूर जानते कि जागरण में खबरों के तौर पर पत्रकारों (अपने या दूसरे सभी) की तस्वीर और नाम छापने पर सख्त पाबंदी है. इस प्रतिबंध का उल्लंघन सिर्फ जागरण के समारोह के दौरान ही होता है. मैं ऐसा इसलिए बता रहा हूं कि मैं खुद इस नीति का भुक्तभोगी रहा हूं. बेगूसराय का रहने वाला हूं और वहीं कुछ जिलों के न्यूज को-ऑर्डिनेटर के तौर पर बेगूसराय दफ्तर में काम करता था. इस नौकरी के दौरान ही एक बार पुलिस की एक चौकी पर हिरासत में ले लिया गया. दो-चार घंटे हाजत में काटकर जब लौटा तो पत्रकारों ने धरना वगैरह का कार्यक्रम तय कर लिया. लेकिन जब मेरे हाजत में बंद होने की खबर पटना पहुंची तो दीक्षित जी ने फोन करके हाल-चाल पूछा और कहा कि खबर नहीं जा रही है क्योंकि हम बदमाश लोगों को ये नहीं बताना चाहते कि अपने खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को पीटा जा सकता है और ऐसी एक घटना आज हुई है. बाद में मुझे पता चला कि दीक्षित जी ने डीजीपी से बात करके उस अधिकारी के ऊपर कार्रवाई करवाई. आप इस सोच का विरोध कर सकते हैं कि पत्रकार को पीटने पर खबर क्यों न छापी जाए लेकिन ये नहीं कह सकते कि खबर नहीं छापने का मतलब संपादक डीजीपी या एसपी से मिला हुआ है.

    इसलिए प्रकाश जी की तस्वीर के ब्लर होने पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. जागरण की सोच रही है कि कोई पत्रकार नेताओं के साथ इसलिए फोटो में नहीं दिखना चाहिए क्योंकि जिन लोगों से इससे वो पत्रकार परिचित नहीं होगा, वे लोग उसे उस पार्टी का नेता मान लेंगे. एक बार इसी तरह नीतीश कुमार के कार्यक्रम की हमारी तस्वीर में हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष की तस्वीर आ जाने पर हमसे दोबारा और दूसरी तस्वीर भेजने कहा गया था क्योंकि पटना में बैठे लोग अरुण जी को पहचानते थे. कई बार अनजान पत्रकार छप जाते हैं लेकिन प्रकाश जी जाने-पहचाने चेहरे हैं. मुझे ऐसा लगता है कि स्कैनिंग डिपार्टमेंट जो फोटो बनाने का काम करता है, उसके किसी कर्मचारी की काहिली से ऐसा हुआ होगा. आम तौर पर यह विभाग एक दिन में तीन-चार सौ फोटो को छपने लायक बनाता है. हड़बड़ी में या काम के दबाव में यह हुआ होगा कि ब्लर करने में ठीक से समय देने की बजाय स्कैनिंग कर्मचारी सिर्फ चेहरा पोत कर आगे बढ़ गया होगा. इस फोटो को छापने के मोह से बचा भी जा सकता था लेकिन जिस तरह से नीतीश कुमार और देवेश चंद्र ठाकुर जॉर्ज साहब का हाथ पकड़ कर उन्हें ले जा रहे हैं, इस मोह से बचना मुश्किल रहा होगा. ऐसा शॉट दोबारा फोटोग्राफर को न मिला हो.

    आप तस्वीर ब्लर करने को दीक्षित जी और प्रकाश जी के बीच निजी खुन्नस बता रहे हैं. मुझे नहीं पता कि आपसे किसने कहा कि दीक्षित जी और प्रकाश जी के बीच खुन्नस है. लेकिन आपको बता दूं कि उन दोनों के बीच खुन्नस हो ही नहीं सकती. दोनों अलग-अलग तरह का काम करते हैं और दोनों के काम के बीच कोई सीधा या टेढ़ा टकराव दूर-दूर तक नहीं है. प्रकाश जी की खुन्नस सुभाष पांडे के साथ हो सकती है या किसी और रिपोर्टर के साथ हो सकती है क्योंकि दोनों एक मोर्चे पर काम करते रहते हैं. दीक्षित जी विधानसभा के अंदर या सड़कों पर रिपोर्टिंग नहीं करते इसलिए संवाददाताओं के साथ खुन्नस रखना उनका काम नहीं है. आपकी बात को पकड़ कर चलूं तो सुभाष पांडे और सुजीत झा के बीच की खुन्नस को सुभाष पांडे और नकवी साहब के बीच की खुन्नस नहीं कहा जा सकता. इतना ज्ञान हम सबको है कि संपादक हर चीज के लिए जवाबदेह होता है लेकिन हरेक चीज उसके सामने से नहीं गुजरती.

    आपका दूसरा आरोप है कि जागरण ने चुनावों के दौरान दलाली की और यह सब दीक्षित जी की सहमति से हुआ. आप मीडिया पर इतना कुछ लिख रहे हैं तो इतने अनजान नहीं हो सकते कि लोकसभा चुनाव के दौरान जागरण ही नहीं भास्कर, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर जैसे अखबारों ने पैसे वाले उम्मीदवारों को पैकेज ऑफर किया और उनके प्रचार को छापा. यह संपादकों का फैसला नहीं था, मालिकों का फैसला था. जागरण के अंदर यह शैलेंद्र दीक्षित का फैसला नहीं था. अखबार के इस कदम का विरोध अगर दीक्षित जी को सामने रखकर करेंगे तब तो हो गया विरोध. विरोध करना है तो संजय गुप्ता जी या सुनील गुप्ता जी का कीजिए, जिन्होंने यह तय किया कि हम इस चुनाव से कितना कमाएंगे और इस तरह से कमाएंगे. अखबार के हर विभाग को लाला की बात माननी ही पड़ती है नहीं तो लिफ्ट और गेट तो हमेशा खुला ही रहता है.

    दीक्षित जी का नाम लेकर आप चुनाव में गड़बड़ी की बात कर रहे हैं तो आपको एक और प्रसंग सुना देता हूं. 2004 के चुनाव में हमारे यहां बलिया सीट से सूरज सिंह उर्फ सूरजभान चुनाव लड़ रहे थे. सूरजभान से मेरा निजी संबंध मधुर रहा है और उस चुनाव के बहुत पहले से यह संबंध कायम था क्योंकि बतौर क्राइम रिपोर्टर हम अलग-अलग दुनिया से कई तरह के संबंध रखते हैं. लेकिन चुनाव के दौरान हमारे अखबार में सूरजभान के खिलाफ काफी कुछ लिखा गया. सूरजभान के खिलाफ खबर न लिखने और ऐसी खबरों को रोकने के लिए जागरण प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारियों का फोन आया लेकिन दीक्षित जी का फोन नहीं आया और न ही संपादकीय विभाग के किसी दूसरे का फोन आया. सूरजभान की आर्थिक ताकत को भी आप जानते होंगे, निजी रूप से लाभ उठाने के लिए दीक्षित जी के पास वो मौका भी बेकार नहीं था अगर वो ऐसा ही कर रहे होते. मोटी तनख्वाह सिर्फ दिल्ली में बैठे लोगों को ही नहीं मिल रही, पटना में बैठे लोग भी बेहतरीन पगार पा रहे हैं. आपको नहीं मालूम हो तो जान लें कि दीक्षित जी बिहार, झारखंड, बंगाल तीनों राज्यों से निकलने वाले जागरण के हरेक संस्करण के संपादक हैं. संस्करणों की संख्या एक दर्जन से ऊपर है. उनका वेतन इतना तो होगा ही कि हर महीने वेतन का 80 फीसदी सीधे बचत खाता में जमा कर दें क्योंकि उनके सामान्य खर्च भी अखबार उठाता है.

    और सबसे आखिरी बात, जिससे ये फसाद शुरू हुआ है. पटना में प्रेस क्लब ट्रस्ट के अंदर चलेगा या कमिटी के अंदर. आप तो जनतंत्र की बात कर रहे हैं, आप ट्रस्ट बनाने की मंशा रखने वालों के साथ हैं या कमिटी बनाने की जिद पर अड़े लोगों के साथ. दिल्ली में बैठकर पटना के प्रेस क्लब के झगड़े की समीक्षा करना आसान है. ये पटना के लोगों को तय करने दीजिए कि उनका क्लब ट्र्स्ट होगा या कमिटी. ट्रस्ट कुछ लोगों को मालिकाना हक जैसा अहसास देता है और कमिटी दूसरों को भी मालिक बनने का मौका देती है.

    उम्मीद है आपके जनतंत्र में मेरी आवाज को भी जगह दी जाएगी.

    • समरेंद्र Reply

      August 5, 2009 at 11:07 pm

      रीतेश जी,

      आपकी बातों से इस पूरे मसले पर एक नई रोशनी पड़ी है। हमें भी अपनी सोच का दायरा और बढ़ाने की जरूरत महसूस हो रही है। इसे महसूस कराने के लिए शुक्रिया। लेकिन सवाल अब भी अपनी जगह पर बने हुए हैं। आपके मुताबिक प्रकाश कुमार के चेहरे को भद्दे तरीके से ब्लर करने की वजह निजी खुन्नस की जगह मानवीय भूल भी हो सकती है। अगर भूल प्रेस के किसी भी शख़्स से हुई है तो उस भूल का दायित्व तो संपादक को ही लेना होगा। क्या शैलेंद्र जी ने उस भूल की नैतिक जिम्मेदारी ली है? अगर हां, तो क्या उन्होंने इसके लिए माफ़ी मांगी है? अगर माफी मांगी है, तब तो बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए। अगर नहीं, तो फिर इसका क्या अर्थ लगाया जाए? हो सके तो यह भी बताइयेगा कि अगर यही भूल जॉर्ज और नीतीश में से किसी की तस्वीर के साथ हुई होती तो भी क्या शैलेंद्र जी उस पर इसी तरह चुप रहते?

      दूसरी बात। आपने लंबे पत्र के आखिर में यह कहा है कि सारा फसाद प्रेस क्लब की वजह से शुरू हुआ। आप एक तरफ तो यह भी मानते हैं कि फसाद हुआ है लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि आपको निजी खु्न्नस की कोई वजह समझ नहीं आती। खैर इस विरोधाभास को यहीं छोड़ देते हैं। ध्यान प्रेस क्लब पर केंद्रित करते हैं। आपने एकदम सही बात कही है। फसाद की जड़ में प्रेस क्लब ही है। उस मसले में हमारा सीधा मानना है कि ट्रस्ट जिसने भी बनाया उसने ग़लत किया। ट्रस्ट एक समूह की निजी मिल्कियत होती है। और कहीं का प्रेस क्लब कुछ लोगों की मिल्कियत नहीं हो सकता। उस मामले में हम ट्रस्ट का विरोध करने वालों के साथ हैं। लेकिन आपकी यह बात जमी नहीं कि ये पटना के पत्रकारों का मसला है उन्हें ही तय करने दें। इस तरह से तो आपको बिहार के इतर भारत से जुड़े किसी भी मसले पर बोलने का हक नहीं है। और बिहार में बेगूसराय से इतर किसी भी मसले पर बोलने का हक नहीं होगा।

      आखिरी बात, पैसे और सत्ता की लालच का कोई अंत नहीं होता। अगर किसी के पास इतना ही पैसा है तो वो अपने जमीर को मार कर दूसरों के अपराध में भागीदार क्यों बन रहा है? अगर मजबूरी या इच्छा दोनों में से किसी एक वजह से कोई शख़्स दूसरों के अपराध में भागीदार बन रहा है तो उसकी तो आलोचना और निंदा होगी ही। फिर निंदा होने पर रोना क्यों?

  5. रीतेश Reply

    August 6, 2009 at 2:26 pm

    समरेंद्र जी, नमस्कार

    अपनी खबर पर मेरी प्रतिक्रिया को प्रकाशित करने के लिए शुक्रिया. इससे आपके “जनतंत्र” में मेरा भरोसा पैदा हुआ है. आपने मेरी प्रतिक्रिया पर कुछ और सवाल उठाए हैं जिन पर मुझे कुछ कहने की जरूरत महसूस हो रही है.

    मैं आज हर हाल में शाम तक दीक्षित जी से बात करने की भी कोशिश करूंगा क्योंकि आपने उनके बारे में कुछ लिखा तो आपको उनसे बात जरूर करनी चाहिए थी और उनकी बातों को जगह देनी चाहिए थी. बीती हुई बात को रहने दीजिए. मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि अगर मेरी दीक्षित जी से बात हुई तो मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वो अगर चाहें तो अपनी बात आपके पास अवश्य रखें क्योंकि आपने बहस के लिए मंच को खुला खोल रखा है.

    आपके जवाब का पहला सवाल यह है कि चेहरा ब्लर करने का सवाल अब भी अपनी जगह पर है और इस काम की जवाबदेही किसकी है. इसके लिए उन्होंने खेद प्रकट किया या नहीं. मेरा मानना है कि चेहरा ब्लर होने के लिए निश्चित रूप से दीक्षित जी जवाबदेह होंगे क्योंकि वो संपादक हैं और बिहार, बंगाल या झारखंड में जागरण के तमाम संस्करणों में छपे एक-एक शब्द और एक-एक तस्वीर के लिए जवाबदेह हैं. लेकिन संपादक के रूप में उनकी जवाबदेही ही तो वह वजह है जिसके कारण उन्हें प्रकाश जी की तस्वीर ब्लर करनी पड़ी. जागरण की नीतियां इसके लिए जवाबदेह हैं कि दीक्षित जी (या उस समय मौजूद रहे पेज इंचार्ज) को किसी पत्रकार का चेहर ब्लर करने का फैसला लेना पड़े. जागरण के किसी पाठक को यह लगे कि प्रकाश जी नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडीस की पार्टी के नेता हैं इसलिए उनके पीछे खड़े हैं, इससे तो बेहतर यही था कि उनकी तस्वीर हटा दी जाए. हटाने में काबिलियत का परिचय जिन लोगों को देना चाहिए था, उनसे कुछ चूक हो गई.

    समरेंद्र जी, अगर दीक्षित जी की जगह आप होते तो अपने अखबार की नीतियों के साथ पन्ना छोड़ने से पहले क्या करते इस तस्वीर के साथ. जवाब में इस बात का ख्याल रखिएगा कि नीतीश और देवेश चंद्र ठाकुर दोनों तरफ से जॉर्ज को पकड़े हैं, यह अकेली तस्वीर है और सिर्फ जागरण में छपी है. प्रकाश जी के साथ वाली तस्वीर जिस अखबार में छपी है, उसकी नीतियां उसके मालिकों ने बनाई होगी और वहां ऐसा करने की इजाजत होगी. लेकिन प्रकाश जी के साथ वाली तस्वीर से यह भाव बिल्कुल भी पैदा नहीं होता कि अब जॉर्ज साहब को सिर्फ सहारे की नहीं, दोनों तरफ से हाथ पकड़ कर चलाने वाले मददगारों की जरूरत है. एक मूक तस्वीर, हजार शब्दों से ज्यादा भाव पाठक तक पहुंचाती है.

    आपका एक सवाल यह भी है कि नीतीश और जॉर्ज की तस्वीर के साथ ऐसा होता तो क्या होता. मेरा मानना है कि जॉर्ज या नीतीश या किसी और नेता, अभिनेता, अधिकारी की तस्वीर ब्लर करने की जरूरत नहीं पड़ती है और कभी ऐसी नौबत नहीं आती. क्योंकि जब ब्लर किया जाता है तो तय रूप से ऐसा जानबूझ कर ही किया जाता है और कोई भी संपादक या पेज इंचार्ज किसी भी सामान्य तस्वीर या उसमें कैद नेता के चेहरे को आखिर ब्लर करने का हुक्म क्यों देगा.

    अभी लोकसभा चुनाव में जागरण ने जो कमाऊ नीतियां बनाई थीं उसमें ये भी था कि जो उम्मीदवार विज्ञापन नहीं देगा, उसकी तस्वीर नहीं छापेंगे. फोटोग्राफरों को बता दिया गया था तो बड़े नेताओं की रैली में फोटो उन एंगलों से ही लिया गया जिसमें उम्मीदवार फ्रेम से बाहर रहे. ये जागरण का मालिकाना फैसला था और आप उसको कोस सकते हैं.

    प्रकाश जी का शुभचिंतक मैं भी हूं और मुख्यमंत्री के कक्ष में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर पटना में काम कर रहे अपने कई मित्रों और शुभचिंतकों के साथ प्रकाश जी की तरफ खड़ा हूं. कक्ष में जो भी बतकही हुई, वो अनुचित थी और प्रकाश जी की जगह पर कोई भी होता, वहीं करता.

    आपने प्रेस क्लब की वजह से पैदा हुआ फसाद को फोटो के ब्लर होने से जोड़ दिया है. मेरे लिखे का यह आपका विश्लेषण हो सकता है. मेरे कहने का तो सीधा सा मतलब यह है कि प्रेस क्लब की वजह से साथ-साथ काम करने वालों में पैदा कड़वाहट मुख्यमंत्री के कक्ष में कुरुप रूप में सामने आई. प्रेस क्लब और फसाद का मेरा मतलब इससे है, न कि चेहरे को ब्लर करने से. पत्रकारों का चेहरा न छापना जागरण की नीति में है और उसका पालन दीक्षित जी को भी करना है और हर उस संपादक मंडल के सदस्य को करना है जो जागरण परिवार का हिस्सा है.

    आपको इस बात को भी पसंद करना चाहिए कि पटना के प्रेस क्लब का मामला पटना का पत्रकार मंडल ही देखे. वहां विवाद बाहर से नहीं, अंदर से है. ट्रस्ट बने या समिति, दोनों को ही पटना के पत्रकारों को चलाना है. पटना के पत्रकारों का बहुमत इतना काबिल और समझदार है कि प्रेस क्लब के लिए जो उचित होगा, वो मिलकर वहीं फैसला करेंगे. आपकी, मेरी या फिर पटना से बाहर के किसी पत्रकार की वहां क्या भूमिका हो सकती है. दिल्ली के प्रेस क्लब में पटना के पत्रकार की क्या भूमिका आप देखते हैं. दिल्ली वाले वहां जाएंगे तो मेहमान होंगे और पटना वाले यहां आते हैं तो मेहमान होते हैं. मेजबानी के अंदर का झगड़ा तो मेजबान ही निपटाएंगे. मेरे, पटना वालों पर छोड़ देने का आशय बस इतने से है कि पटना के पत्रकारों को ही तय करने दीजिए कि वो कैसा क्लब चाहते हैं, किस तरह से चलाना चाहते हैं. हमारी और आपकी उसमें कोई भूमिका बनती भी नहीं है.

    आपका सबसे आखिरी सवाल पैसे और सत्ता की लालच का है. आप कह रहे हैं, “अगर किसी के पास इतना ही पैसा है तो वो अपने जमीर को मार कर दूसरों के अपराध में भागीदार क्यों बन रहा है?”. मैं या कोई भी नौकरीशुदा पत्रकार आपकी इस राय से इत्तेफाक नहीं रखेगा. अभी इस पर तो बहुत बहस चल रही है कि अखबारों में जो छप रहा है या छापना पड़ रहा है या चैनलों पर जो दिखाना पड़ रहा है, उसे संपादक दिखाएं या नौकरी छोड़कर बाहर चले आएं.

    असल में, मीडिया घरानों की गलत नीतियों की आलोचना करते वक्त हम नकवी जी या मृणाल पांडे जी या किसी और संपादक से आगे नहीं जाते. ऐसे में तो आप ज्यादा से ज्यादा संपादक ही बदलवा पाएंगे या दूसरे शब्दों में कहें तो अपने हमसफर लोगों का ही नुकसान करेंगे क्योंकि दूसरा संपादक भी तो वही करेगा जो पुरी साहब या भरतिया जी चाहेंगी. मीडिया में अगर बुराई नीतियों के स्तर पर है तो उसके खिलाफ अपने छोटे से बड़े हमले का निशाना संपादकों या संवाददाताओं की बजाय मालिकों को बनाइए. ऐसा नहीं करेंगे तो सुधार होने से रहा. लेकिन, अगर जागरण की नीतियों के लिए आप बस दीक्षित जी की आलोचना करना चाहते हैं, उन्हें कोसना चाहते हैं और ऐसा करके खुश होना चाहते हैं तो मुझे आपत्ति है, दीक्षित जी कहें या न कहें, उन्हें भी होगी. बस, जागरण प्रबंधन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा और शायद आप भी अनचाहे-चाहे ऐसा ही चाहते हैं.

    आपका
    रीतेश

    • समरेंद्र Reply

      August 6, 2009 at 3:47 pm

      रीतेश जी,
      आप अपने शब्द हमारे मुंह में डालने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? हमने यह तो कहा नहीं कि अख़बारों की दलाली के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ संपादक जिम्मेदार है। कहीं कहा है क्या? हमने तो यह कहा है कि मालिकों के हुक्म का पालन करते-करते उनकी सोच भी मालिकों जैसी हो गई है। इसमें ग़लत क्या है? अगर अख़बारों के अच्छे कामों का श्रेय संपादकों और पत्रकारों को मिलना चाहिए तो उसकी दलाली के लिए अगर संपादकों और पत्रकारों की भी (यहां… भी… पर गौर कीजिएगा) आलोचना होती है तो आप लोग बिफर क्यों पड़ते हैं? एक प्रवक्ता की तरह उनका बचाव क्यों करने लगते हैं? इसके पीछे आपका क्या स्वार्थ जुड़ा है?

      आप मालिकों की बात बार-बार कह रहे हैं और ये भी कह रहे हैं कि मालिकों के गुनाह के लिए संपादकों को नहीं कोसना चाहिए। अरे भई, जब अनैतिक कामों से ही सही कंपनी का मुनाफा बढ़ता है तो संपादकों को इन्क्रिमेंट, प्रमोशन जैसी चीजे नहीं मिलती हैं क्या? यही तो उस मुनाफे में उनका हिस्सा होता है। आपने खुद की कहा है कि दैनिक जागरण के संपादक का सामान्य खर्च कंपनी उठाती है। क्यों? क्योंकि ये “पैकेज” का हिस्सा है। उसी “पैकेज” की शर्तों के तहत अख़बारों में संपादकों का नाम छपता है और उनकी जिम्मेदारी बनती है। हम भी बस यही कह रहे हैं कि दैनिक जागरण की उस भूल के लिए संपादक महोदय जिम्मेदार हैं। ऐसा कहने में गलत क्या है?

      आप यह भी कह रहे हैं प्रेस क्लब पत्रकारों का अंदरूनी मसला है। भाई साहब, प्रेस क्लब के लिए जमीन किसी पत्रकार ने नहीं खरीदी है। न ही किसी मीडिया संस्थान ने। ये जमीन राज्य की है। जनता की है। नीतीश सरकार ने पत्रकारों की दबंग बिरादरी को खुश रखने के लिए जनता की जमीन उनके नाम कर दी है। फिर उस दबंग बिरादरी में उस सामूहिक संपत्ति के लिए मारपीट हो जाती है… तो क्या सवाल नहीं उठाया जाए?

      • रीतेश Reply

        August 6, 2009 at 4:19 pm

        समरेंद्र जी,

        मैं आपके ऊपर के दोनों पाराग्राफ से सहमत हूं. अगर आप अखबार की नीतियों के लिए अखबार के संपादक की ही आलोचना करना चाहते हैं तो यह स्वीकार्य है लेकिन इससे कोई हल नहीं निकलेगा. बतौर संपादक दीक्षित जी उस आलोचना के हकदार हैं जिस पर अमल करना संपादक होने के नाते उनका कर्तव्य है और लाजिमी भी. आपकी पूर्व की आलोचना उस मंशा और उन शब्दों में नहीं की गई थी.

        मुझे दीक्षित जी का प्रवक्ता बनने का सौभाग्य नहीं मिला है, लेकिन उनका जोरदार प्रशंसक हूं. उनको बहुत अच्छी से जानता हूं, जागरण के प्रबंधन को समझता हूं. कई हिन्दी साइटों को पढ़ता हूं और आपकी साइट पर लिखी गई खबर की भाषा और उसके इशारे से तकलीफ हुई तो आपको अपनी प्रतिक्रिया भेज दी. अपने अभिभावक के ऊपर लगे आरोप का जवाब देने के लिए प्रवक्ता होना कतई जरूरी नहीं है. आपके भी किसी आदरणीय संपादक या पत्रकार मित्र पर कोई बेजा आरोप लगाएगा और आप जानते होंगे कि ऐसा नहीं है जैसा कहा जा रहा है तो आप भी बिना प्रवक्ता पद पर नियुक्त हुए या संबंधित व्यक्ति से सलाह-अनुमोदन के वहीं करेंगे, जो मैंने किया है. आप ऐसा नहीं करते हैं तो यह आपके-उनके संबंध की गहराई को ही सामने लाएगा.

        मैं अब भी डटा हुआ हूं कि पटना का प्रेस क्लब तो पटना के ही पत्रकारों का मामला है. जमीन सरकार दे रही है लेकिन दे रही है पटना के पत्रकारों को. वहां कुष्ठ रोगियों का कोई अस्पताल नहीं खुलने वाला है या कोई अनाथालय नहीं शुरू होने वाला है. हर शाम कुछ मजमा लगेगा, कुछ खाने का इंतजाम होगा, कुछ पीने का और कुछ बहकने का. दिल्ली के प्रेस क्लब को देखकर इतना तो समझा ही जा सकता है.

        पटना में भी प्रेस क्लब बने, ये किनकी मांग थी और कौन इसे बनाना चाहते हैं, मुझे पता नहीं है. लेकिन दैनिक जागरण ने प्रेस क्लब बनाने की मांग नहीं की होगी, इतना तो पक्का पता है क्योंकि जागरण या हिन्दुस्तान प्रबंधन अपने पत्रकारों को एकजुट होने या किसी भी संगठन के बैनर तले जुटने का मौका नहीं देगा. ये यूनियन के दौर की तरफ ले जाता है.

        लेकिन जिस किसी की भी मांग या दबाव पर नीतीश कुमार की दरियादिल सरकार जमीन देने के लिए तैयार हुई है, पटना के पत्रकारों के लिए ही हुई है. आप वहां अपनी भूमिका देखते हैं तो जरूर हस्तक्षेप कीजिए. मुझे नहीं लगता कि वहां के फसाद को सलटाने में मेरी या दिल्ली के किसी और पत्रकार की वहां कोई भूमिका है. पटना में सुरेंद्र किशोर, अविनाश चंद्र मिश्रा, अरुष अशेष, अरुण कुमार, श्रीकांत प्रत्यूष, सुजीत झा और इनके जैसे कई पत्रकार हैं जो क्लब के भविष्य की रूपरेखा तय कर सकते हैं. यह पटना के पत्रकारों का विशेषाधिकार है और उसके हनन का मेरा तो कोई इरादा नहीं है.

  6. Pravin Reply

    August 6, 2009 at 6:27 pm

    जनतंत्र डेस्क,

    मै रितेश जी के तमाम ज्ञान से सहमत नही हूं.. लेकिन एक बात सच है जिसे आप स्वीकार करने से क्यूं बच रहे हैं अगर किसी संपादक पर आरोप लगाते हैं तो उसका आधार होना चाहिए … ये फिल्म टीम की रिपोर्टिंग है कि जो मन मे आया लिख दिया … आरोप लगाना आसान है लेकिन उससे किसी को भी दुख हो सकता है… आप को पढ़कर ऐसा लग रहा है कि आप शैलेंद्र दीक्षित से आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं …..

  7. अनिकेत Reply

    August 6, 2009 at 7:54 pm

    बहुत बढ़िया बहस हो रही है। इसे पर्सनल न बनाएं, ये सभी से गुज़ारिश है। ग़लत कोई भी हो सकता है, आपका अभिभावक भी, आपका दोस्त भी और आपका गुरु भी। सवाल ये नहीं है कि जो ग़लत है, वो किसका क्या लगता है। सवाल ये है कि क्या अखबार और न्यूज़ चैनल (इनमें मालिक, संपादक, संवाददाता सभी शामिल हैं) अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं? क्या वो अपने प्रस्तुतिकरण में निष्पक्ष हैं, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है? अगर नहीं, तो उसकी निशानदेही करना, उसे ग़लत ठहराना ज़रूरी है।

  8. mukesh parashar Reply

    August 6, 2009 at 8:38 pm

    सचमुच व्यक्तिगत हो गया है मामला लेकिन “ये संपादक तो बड़ा खतरनाक है” हेडर के साथ जो लिखा गया था वो क्या वयक्तिगत हमला नही था ? संस्था जिम्मेदार होती है व्यक्ति नही। जहां तक मैने समरेंद्र के बारे मे सुना और पढ़ा है उनकी कलम मुखर रही है लेकिन इस मामले मे कलम थोड़ी चूक गई है।

    • समरेंद्र Reply

      August 6, 2009 at 11:00 pm

      कुछ पद ऐसे होते हैं जिन पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति होने के बाद वो महज़ एक व्यक्ति नहीं रह जाता। वो संस्था का प्रतीक बन जाता है। या यूं कहा जाए कि उसे संस्था का दर्जा हासिल हो जाता है। राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, राज्यपाल और मुख्यमंत्री जैसे पद उसी श्रेणी में आते हैं। अगर मीडिया में बात करें तो इस श्रेणी में सिर्फ़ एक ही पद आता है और वो पद है संपादक का। किसी भी अख़बार और न्यूज़ चैनल का संपादक अपने आप में एक संस्था होता है। यही वजह है कि किसी अख़बार और न्यूज़ चैनल में गड़बड़ी होने पर, उसका संपादक सबसे पहले निशाने पर आता है। सबसे अधिक आलोचना उसी की होती है। इसलिए कि वह सिर्फ़ एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था भी है। कंपनी का मालिक यह कह कर बच सकता है कि जिम्मेदारी उसकी नहीं संपादक की है। लेकिन संपादक यह कह कर बच नहीं सकता कि जिम्मेदारी किसी ब्यूरो चीफ़ या न्यूज़ एडिटर की है।

      अब आप सोच रहे होंगे कि यह सब कहने का क्या मकसद है। दरअसल हाल के दिनों में यह एक फैशन बन गया है कि व्यवस्था के नाम पर संपादक अपने गुनाहों पर पर्दा डाल लें। इसी को दूसरे शब्दों में कहें तो कंपनी के सभी कुकर्मों में शामिल होने के बाद भी खुद को पाक-साफ़ बताए। पवित्र बताए। नैतिक बताए। अख़बारों की दलाली का मुद्दा उठाइए तो वो यह कह देते हैं कि बाज़ार की मांग है। बिना पैसे के कंपनी तो चल नहीं सकती। ख़बरों की गुणवत्ता का सवाल उठाइए तो जवाब आता है कि जनता ख़बर देखना ही नहीं चाहती। सरोकारों की बात कीजिए तो कहते हैं कि सरोकार का मतलब क्या है? कुल मिला कर संपादकों ने अपने बचाव की बड़ी तगड़ी व्यूह रचना की है। उनके इस व्यूह में सेंध लगाना बहुत मुश्किल है। आप एक सवाल उठा कर देखिए… सबसे पहले उनके “चाहनेवाले” आपकी नीयत पर ही सवालिया निशान लगा देंगे।

      रीतेश जी, प्रवीण जी और मुकेश जी – हो सके तो एक बार ठंडे दिमाग से सोचिएगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि आप सब एक सही मुद्दे को निजी रंग देकर वही भूमिका निभा रहे हैं? यह भी सोचिएगा कि मजबूरियां तो हर किसी की होती हैं। बहुत से लोग ऐसे मिलेंगे जो मजबूरी में चोरी-डकैती करते हैं। कुछ मजबूरी में क़त्ल भी कर देते हैं। क्या मजबूरियों को ढाल बना कर अपने गुनाहों पर पर्दा डाला जा सकता है? एक अख़बार चलाने पर इतनी मजबूरियां हैं कि सारे तरह के धतकर्म करने पड़ रहे हैं और उन्हें जायज भी ठहराना पड़ रहा है तो फिर राज्य और देश चलाने में कितनी मजबूरियां होती होंगी। फिर आपको और हमको भ्रष्टाचार और अपराध से जुड़े मामलों में अपने हुक्मरानों को कठघरे में खड़ा करने क्या हक़ रह जाएगा? आखिर में इस भी गौर कीजिएगा कि इसी तरह हर कोई अपने गुनाह कबूल करके प्रायश्चित करने की जगह उन गुनाहों को सही ठहराने का तार्किक आधार खोज ले तो फिर सुधार की गुंजाइश कहां बचेगी? इससे आगे मैं कुछ और नहीं कहना चाहता। आप चाहें तो इसे जितना भी निजी रंग दे दें।

      • mukesh parashar Reply

        August 6, 2009 at 11:13 pm

        आप ने तो मुझे रितेश जी और प्रवीण जी के साथ खड़ा कर दिया इसलिए ये साफ करना जरूरी है कि मेरा पटना जागरण से कोई सबंध नही है ना मै सपादक महोदय को जानता हूं। पिछले कई दिनो से जनतंत्र को पढ़ रहा हूं और उन पर हो रही टीप्पणी को भी देखता हूं। इसलिए मैरा नाम लिख कर आप मे मुझे निष्पक्ष रहने की मेरी इमानदार कोशिश को बेकार कर दिया। मुझे लगा कि आप ठंडे दिमाग से मेरे लिखे पर इमानदार कोशिश करेगे लेकिन शायद आपके मंच पर आप अहम ज्यादा बड़ा निकला

        • समरेंद्र Reply

          August 6, 2009 at 11:22 pm

          मुकेश जी, लगता है आपको मेरी बात चुभ गई। मेरा ऐसा इरादा कतई नहीं था। हो सके तो इसके लिए माफ़ कीजिएगा। आपकी तरह मैं भी दैनिक जागरण के संपादक महोदय को नहीं जानता। न कभी उनसे मिला हूं। न ही कभी उनसे बात हुई है और न ही कभी उनका लिखा कुछ पढ़ा है। तो फिर निजी टकराव और हमले की बात कहां से उठी?

      • रीतेश Reply

        August 6, 2009 at 11:41 pm

        समरेंद्र जी,

        मेरी दीक्षित जी से आज बात हुई. वो उचित समझेंगे तो समुचित माध्यम से आपसे संपर्क करेंगे क्योंकि यह उनके लिए अपमानजनक है कि आप पत्रकारों का फोटो नहीं छापने की जागरण की नीति को उनके चरित्र हनन के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करें और उनका नाम लेकर इस तरह से हमला करें जैसे यह उनका निजी फैसला है.

        आपने लिखा है कि संपादक एक संस्था होता है, इस बात पर किसी को शक नहीं है. लेकिन यह संस्था एक तरफ जनता और दूसरी तरफ मालिक के प्रति जवाबदेह होती है. आप अपनी वेबसाइट के मालिक हैं, आपकी जवाबदेही अपने और अपने पाठकों तक सीमित है. आप इस पर वह सब करने के लिए आजाद हैं जो आपको भाए. आपकी पसंद ही जनतंत्र की नीति हो सकती है. दीक्षित जी की पसंद, जागरण की नीति नहीं हो सकती.

        आप संपादक को एक वेतनभोगी होने के नाते मीडिया हाउस के तमाम काम के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. इसमें कुछ भी गलत नहीं है. लेकिन कुकर्म शब्द का चयन गलत है. कोई भी मीडिया हाउस कुकर्म नहीं कर रहा, इंडिया टीवी भी नहीं जिसे आप और हम पानी पी-पी कर कोसते हैं. अखबारों की दलाली से आपका क्या आशय है और दलाली का बाजार की मांग से क्या रिश्ता है, ये आप ही बेहतर समझते होंगे. मुझे तो संस्थागत स्तर पर दलाली की कोई शिकायत आज तक किसी ने नहीं की. पंजाब केसरी की भी नहीं और आज अखबार की भी नहीं. जागरण तो बड़ा खिलाड़ी है.

        आप ये भी कह रहे हैं कि अखबारों में खबरें नहीं दिखतीं, खबरें अखबारों में ही दिखती हैं और बड़ी-छोटी ही नहीं गली-नुक्कड़ की भी दिखती है क्योंकि हर जिले के लिए अब एक संस्करण निकलता है. आपकी नीयत पर सवाल नहीं उठा रहा, आपकी भाषा और आपके विश्लेषण पर सवाल उठा रहा हूं. आपने फोटो को ब्लर करने के प्रकरण में साफ नीयत का परिचय नहीं दिया. आपको यह जानकारी रखनी चाहिए कि आम तौर पर बड़े अखबारों के संपादक प्रकाशन के बाद के ही संपादक होते हैं. शाम में संपादकों के साथ बैठक करके अगले दिन ही पन्ने की समीक्षा करते हैं. जो छप गया, उनके सिर लेकिन उनके आंख के सामने से गुजरने की गारंटी नहीं होती.

        आप ये क्यों नहीं कहते कि जागरण ने प्रकाश जी की तस्वीर को ब्लर करके अच्छा नहीं किया ताकि जागरण अपनी नीति बदले और उसके फोटोग्राफर के फ्रेम में फिर कभी कोई प्रकाश जी जैसे पत्रकार आ जाएं तो उनका चेहरा ब्लर न करना पड़े. इसके लिए आप एक आदमी विशेष को क्यों निशाना बना रहे हैं जब जागरण ने ऐसा करने की इजाजत नहीं दी है. एक समय बवाल का कारण रहे पोटा का लोगों ने बहुत विरोध किया था. लेकिन अगर आप पोटा को हटाना चाहते तो पोटा के तहत गिरफ्तारी करने गए एसपी की मुखालफत करते या पोटा लागू करने वाली सरकार का. फिर गेंद आपके ही पाले में है.

        शुभ रात्रि. अगर आपका कोई जवाब आया तो अगले दिन दोपहर में ही कुछ कह पाउंगा, अगर उसकी कोई जरूरत बनती हो.

  9. विद्रोही Reply

    August 7, 2009 at 10:37 am

    भाइयों मुझे लगता है, दोनों पक्षों की बात अपनी-अपनी जगह ठीक है। ये भी ठीक है कि अखबार की ग़लती के लिए संपादक ज़िम्मेदार है और ये भी सही है कि संपादक अखबार में छपे हर हर्फ को निजी तौर पर देख नहीं सकता। पूरी टीम ज़िम्मेदारी के साथ काम करती है, तब कहीं अख़बार निकलता है। एक भी कड़ी कमज़ोर हो, तो अंतिम प्रोडक्ट पर असर पड़ता है। लेकिन ग़लती होने पर अख़बार भूल सुधार भी छापते हैं। यहां दिक्कत ये है कि अख़बार की तरफ़ से कोई भूल सुधार की कोशिश नहीं दिख रही। और बचाव करने वाले कह रहे हैं कि ग़लती तो हुई है, लेकिन संपादक की ज़िम्मेदारी नहीं बनती। ये तो अख़बार की पॉलिसी का सवाल है। हो सकता है अखबार के मालिकों ने किसी रिपोर्टर की फोटो नहीं छापने का फैसला किया हो, लेकिन ये तो नहीं कहा होगा कि किसी रिपोर्टर का चेहरा भद्दे ढंग से ब्लर कर दो और फिर ग़लती मानने की जगह नीतियों का रोना रोते रहो। अरे भई, आप लोग संपादक की तरफ से सफाई देना छोड़िए, उन्हें खुद आगे आने दीजिए। कम से कम इतना तो कह ही सकते हैं कि नीति के पालन में चूक हुई है और उसके लिए उन्हें खेद है। आगे से ऐसा नहीं होगा। वैसे आपको बता दूं कि दैनिक जागरण में मालिक और प्रधान संपादक स्वर्गीय नरेंद्र मोहन की तस्वीरें खूब छपती थीं। नरेंद्र मोहन जब वाजपेयी से नाराज़ हो गए थे (राम प्रकाश गुप्ता को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने से) तो नाराज़गी दूर करने के लिए वाजपेयी ने बुलाया और तस्वीर खिंचवाई गई। उसी तस्वीर के साथ जागरण के पहले पन्ने से बीजेपी का ब्लैकआउट खत्म हुआ था। मैंने जागरण में काम किया है और जानता हूं कि वहां संपादक की क्या हैसियत होती है। मालिक ही नहीं, जनरल मैनेजर भी संपादक से ऊपर होते हैं। जागरण में संपादकीय नीतियां मालिक तय करते हैं, ये मैं अच्छी तरह जानता हूं, लेकिन नीतियों पर भद्दे ढंग से अमल करना तो संपादक की गलती है ही।

  10. michal chandan Reply

    August 7, 2009 at 12:33 pm

    “ये संपादक तो बड़ा खतरनाक है”
    इस पोर्टल पर छेड़ा गया यह मुद्दा मेरे विचार से पूर्वाग्रह से ग्रसित लगता है या तो जनतंत्र की सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का हथकंडा मात्र है।
    यहां मुद्दे कुछ और है, बहस कहीं और हो रही है, और निशाने पर कोई और है।
    जनतंत्र की टीम से हम निवेदन करते है कि बगैर किसी कुंठा के स्वस्थ्य मुद्दे उठाये ताकि उस पर बहस भी स्वस्थ्य तरीके से हो। जहां तक चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबरें बेचने का सवाल है तो इस हमाम में सभी नंगे है, किसी एक मीडिया समूह पर उंगली उठाना ठीक नहीं है। प्रभात जोशी जैसे महानतम पत्रकार ने जब इस मुद्दे को (कुछ निजी खुन्नस में, जो अब जग जाहिर हो चुका है) उठाया था तो इस पर देश भर में जोरदार बहस हुई थी, परन्तु मुझे लगता है कि यह मुद्दा भी अब दिशाविहीन हो चुका है।

  11. रीतेश Reply

    August 7, 2009 at 1:22 pm

    विद्रोही जी,

    आपने जागरण में काम किया है, यह जानकर खुशी हुई लेकिन यह पढ़कर दुख हुआ कि जागरण का अनुभव रखते हुए भी आप कह रहे हैं कि संपादक को फोटो ब्लर करने के लिए अपनी गलती माननी चाहिए.

    किस बात की गलती विद्रोही जी. जब कुछ गलत ही नहीं हुआ तो गलती क्यों मानें. पत्रकार का फोटो नहीं छापना है, नहीं छपी. इसमें कौन सी गलती है. फोटो छापना होता और नहीं छपती तब गलती होती या फोटो नहीं छापना होता और छप जाती तो गलती होती. जब गलती ही नहीं हुई तो जबर्दस्ती आप और समरेंद्र जी भूल सुधार की मांग पर अड़े हैं.

    मुझे तो लगता है कि जागरण में काम करने का आपका दावा पुख्ता नहीं है. अगर आपने वहां काम किया होता तो आपको पता होता कि किसी गलती पर खेद या भूल सुधार छापा जाता है. मैं और समरेंद्र जी तो इसी पर तो बहस कर रहे हैं कि फोटो का ब्लर होना गलत था या नहीं. समरेंद्र जी कह रहे हैं गलत था, मैं कह रहा हूं सही था क्योंकि स्थापित नीति का पालन होना है. अगर पत्रकार की तस्वीर का ब्लर होना गलत है तो उस नीति को बदलने की बात कीजिए, उसके पालक पर हमला क्यों.

    दीक्षित जी को आगे आना होगा तो हमारी-आपकी क्रिया-प्रतिक्रिया पर सिर खपाने के लिए थोड़े आएंगे. उनके पास हमसे और आपसे थोड़ा सा ज्यादा काम तो है ही. वो आएंगे तो सीधे समरेंद्र जी के पास पहुंचेंगे और मानहानि का मुकदमा करेंगे. फिर आदरणीय गंगा बाबू, नलिन जी और आप जैसे लोग समरेंद्र जी के लिए कोर्ट में साबित करेंगे कि दीक्षित जी की मानहानि कैसे नहीं हुई. मैं भी देखूंगा कि आप उस दिन कैसे कोर्ट में जाने से मुकर जाते हैं और जो लोग जाते हैं वो कोर्ट में क्या कहकर यह साबित कर पाते हैं कि इससे दीक्षित जी का चरित्र हनन नहीं हुआ.

    आपलोग समरेंद्र जी को अपने कारणों से झाड़ पर चढ़ा रहे हैं. इसलिए वो अपने लेख को अब एक अभियान के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं. जनतंत्र के इस अभियान का भी स्वागत है उनके पिछले लेख की तरह. लेकिन अभियान की नींव ही कमजोर है क्योंकि उनका तर्क और उनके विचार में दम नहीं है. अभियान की शुरुआत करते हुए गंगा बाबू और नलिन जी से समरेंद्र जी ने कुछ सवाल-जवाब छापा है लेकिन क्या कहा उन दोनों ने उसको भी तो पढ़िए. दोनों ने कहीं सीधे तौर पर नहीं कहा कि दीक्षित जी को माफी मांगनी चाहिए. कहा तो साथ में कुछ शर्त भी जोड़ रखी है. उसे भी तो पढ़िए. अपने मतलब की लाइन कोमा के पहले या बाद से मत उड़ाइए. दोनों ने जो कहा, वहीं मैं भी कह रहा हूं. शब्द अलग हो सकते हैं. ये सीधी और बेलाग बात आप या समरेंद्र जी मानने को तैयार नहीं हैं कि जागरण में पत्रकार का फोटो ब्लर होना कोई गलती नहीं है और जब गलती ही नहीं हुई तो काहे की माफी सर जी.

    समरेंद्र जी, मेरे शब्द कुछ तीखे हो सकते हैं क्योंकि दीक्षित जी मेरे लिए आदरणीय हैं. लेकिन, बगैर किसी भी दुर्भावना के आपको सलाह दे रहा हूं कि किसी और के बहकावे में अपनी साइट को अखाड़ा मत बनाइए. गंगा बाबू और नलिन जी के इंटरव्यू पर उसी लेख के कमेंट सेक्शन में बात करता हूं.

  12. विद्रोही Reply

    August 7, 2009 at 2:11 pm

    रीतेश जी,
    कितना गुस्सा करते हैं आप। मेरे लिखे को बिलकुल ग़लत ढंग से ले रहे हैं। मैं रिपोर्टर की फोटो नहीं छापने या ब्लर करने की बात नहीं कर रहा। मैं तो आपकी कही बात का ही दूसरा पहलू बता रहा था। आपने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है “हटाने में काबिलियत का परिचय जिन लोगों को देना चाहिए था, उनसे कुछ चूक हो गई।” भाई अगर ठीक से पूरा ब्लर किया होता, तो पता नहीं चलता कि किसकी तस्वीर है। भद्दे ढंग से ब्लर किया, तभी शायद प्रकाश को इतना बुरा लगा होगा। मैं इसी चूक की बात कर रहा हूं। और भूल, चाहे वो कितनी ही छोटी हो, अगर किसी को ठेस पहुंचा रही है, आपके हिसाब से बेवजह तूल पकड़ रही है, तो उसे सही परिप्रेक्ष्य में रखा जाना चाहिए। मेरा कहना ये है कि जो बात आपने कही ( कि हो सकता है ब्लर करने वाले से कुछ चूक हो गयी हो) वो अगर अखबार की ओर से साफ कर दी जाती कि भाई हम किसी खास व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं, हमारी नीति ही ऐसी है कि हम किसी रिपोर्टर का फोटो नहीं छापते। हां, ब्लर ठीक से नहीं किया, ये चूक हुई है, तो सारा मसला ही निपट जाता। एक पाठक के नाते ऐसी विनम्रता की अपेक्षा करना क्या ग़लत है?
    आपकी पिछली प्रतिक्रियाओं की परिपक्वता देखकर ही मैंने लिखा था कि दोनों पक्षों की बातों में कुछ न कुछ दम लगता है। लेकिन लगता है आप कुछ ज़्यादा ही आहत हैं। आप अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र हैं, तो दूसरों को भी ये हक़ देना चाहिए। क्या जनतंत्र में छपे इस लेख पर सिर्फ आप और समरेंद्र ही टिप्पणियां करेंगे? कोई और टिप्पणी आपको पसंद न आए, तो आप कोर्ट में देख लेने की धमकियां देंगे?
    आप इतना भड़के हुए हैं कि एक संतुलित टिप्पणी को भी पक्ष बनाकर धमकाने वाले अंदाज़ में बात कर रहे हैं। ये तो बड़ा दुखद है। आपकी टिप्पणी की भाषा और अंदाज़ हैरान करने वाले हैं।

    • रीतेश Reply

      August 7, 2009 at 2:57 pm

      विद्रोही जी,

      मैं बिल्कुल आहत नहीं हूं. दुखी हूं, इतना तो पहले पोस्ट से ही कह रहा हूं. आपके पोस्ट का जवाब भी मैंने उतनी ही गंभीरता के साथ दिया है जितनी शिद्दत से मैं इस विषय पर समरेंद्र जी से बहस कर रहा हूं. गुस्से का तो सवाल ही नहीं उठता. आप भी आमंत्रित हैं बहस में. कोई रोक किसी के लिए नहीं है. कुछ साल पहले तक गुस्सा आता था लेकिन काबू पाने के लिए घरवालों ने दाहिने हाथ की चार और बाएं हाथ की एक उंगली में अंगूठी डाल रखी है. गुस्सा अब तो बुलाए भी नहीं आता.

      आपने कोट किया, “हटाने में काबिलियत का परिचय जिन लोगों को देना चाहिए था, उनसे कुछ चूक हो गई।” ये मैंने कहा है, दीक्षित जी ने नहीं. मैं उनका प्रवक्ता नहीं हूं, फैन हूं. मेरे कहने का मतलब यह है कि स्कैनिंग वालों ने ठीक से ब्लर कर दिया होता तो ये बहस करने की नौबत नहीं आती, ये नहीं कहा कि स्कैनिंग वालों ने ऐसी गलती कर दी है जिसके लिए माफी मांगनी चाहिए. आप मेरी कल्पना को कि ऐसा होता तो बेहतर होता को आधार न बनाएं. ब्लर करने के सवाल पर तो मेरा साफ-साफ मत है कि जागरण ने कुछ गलत नहीं किया. अच्छे से कर दिया होता तो बेहतर होता. न भी किया तो माफी मांगने लायक गलती नहीं हुई है. जागरण का कोई भी संपादक कैसे उस बात के लिए गलती मान लेगा जिसे करना उसके कर्तव्य में शामिल है.

      कोर्ट में न तो मैं जा रहा हूं, न समरेंद्र जी और न आप. कोर्ट में अगर जाना होगा तो वो जाएंगे जिनकी मानहानि हुई है. वैसे मेरे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है कि पटना जागरण या दीक्षित जी ऐसा करने जा रहे हैं. अगर जाते हैं तो भी न तो मैं उस मामले में गवाह बन सकता हूं और न याचक तो फिर मैं भला आपको या किसी को क्यों और क्या धमकी दूंगा.

      आप मेरी पूरी टिप्पणी की किस लाइन या किस शब्द से आहत हुए हैं, उस लाइन और शब्द को उद्धृत करें तो बड़ी मेहरबानी होगी.

  13. अरविंद शेष Reply

    August 7, 2009 at 2:19 pm

    अभी कुछ दिन पहले मणिपुर के इंफाल में एक युवक को वहां के उग्रवादियों से जनता की रक्षा में लगे सुरक्षा बलों ने मार डाला और नाम दिया “मुठभेड़” का। “गड़बड़ी” यह हुई कि किसी ने उस पूरी घटना की स्टेप-बाई-स्टेप तस्वीर उतार ली और “तहलका” ने जैसे का तैसे छाप दिया। और सच्चाई खुली कि वहां क्या हो रहा है।

    “कायदे से” तहलका को पूरे तस्वीर क्रम में सभी पुलिस वालों का चेहरा ब्लर कर दिया जाना चाहिए था, ताकि हमारा भ्रम बना रहे कि सुरक्षा बल हमारी “सुरक्षा” में लगे हैं।

    लेकिन “तहलका” के तरुण तेजपाल को शायद इसका ध्यान ही नहीं रहा। या हो सकता है कि “मुठभेड़” में शामिल उन सैनिकों से तहलका को कोई फायदा या नुकसान नहीं होने वाला रहा हो।

    सही कहते हैं कुछ लोग किसका फोटो छापें और किसका ब्लर कर दें, यह संपादक अधिकार है। अब अगर प्रकाश इस बार निशाने पर आए तो संपादक के इस अधिकार को देखते हुए कोई उज्र नहीं होना चाहिए। भाई जब अधिकार है, तो वहां नैतिकता और जिम्मेदारी कहां से आ जाती है। अधिकार तो अधिकार होता है। अंग्रेज आए और दो सौ साल तक हमें जैसे चाहा रौंदा। यह विशेषाधिकार उन्हें उन्होंने अपनी शक्ति से अर्जित किया है।

    और समरेंद्र जी, एक पुरानी कहावत दोहरा रहा हूं- समरथ को नहीं दोष गुसाईं…

    • रीतेश Reply

      August 7, 2009 at 3:01 pm

      अरविंद शेष जी,

      आपके पोस्ट पर सिर्फ एक बात कहनी है. आप जिसे संपादक का अधिकार कह कर भयावह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, मैं उसे सिर्फ कर्तव्य कहकर मामूली बताना चाहता हूं.

  14. Vedang Reply

    August 7, 2009 at 8:15 pm

    भाई समरेंद्र जी,
    मैं तो चुप ही रहना चाहता था. पर कई दिनों से देख रहा हूं, चमचागिरी बहुत बढ़ रही है. मैं दैनिक जागरण और शैलेंद्र जी की कई नसें जानता हूं. बिना बोले रहा नहीं गया सो इस रूप में यहां आना पड़ा है. ये रीतेश जी लगातार बहुत ज्ञान दिए जा रहे हैं और अपने को शैलेंद्र जी के चेले और बड़ा धुरंधर और ज्ञानी पत्रकार साबित कर रहे हैं. उनके वकील बनकर कोर्ट में घसीटने की भी धमकी उनकी तरफ से दे रहे हैं. पर लगता है इन्हें पत्रकारिता में अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन से ज्यादा नहीं हुए. पर ये शैलेंद्र दीक्षित के खास बन रहे हैं. शायद अपना नंबर बढ़वाना चाहते होंगे. पर उन्हें जानना चाहिए कि फोटो में से किसी का चेहरा ब्लर करना पत्रकारिता के इथीक्स के खिलाफ है. नियम है कि जस की तस धर दीन्हीं चदरिया होना चाहिए. फोटो ब्लर करना जागरण की कोई नीति नहीं है. इसी तरह के मामलों में नेताओं के आगे-पीछे आ गए कई पत्रकारों के फोटो जागरण में पहले छप चुके हैं. इस ब्लर मामले में शैलेंद्र दीक्षित जी ने बड़ी दिलचस्पी ली और खड़े होकर हंस-हंस कर प्रकाश पर कमेंट कर-करके और मजे ले-लेकर उनका फोटो ब्लर करवाया. सुभाष पांडेय भी उनके साथ खड़े थे. मनीष कुमार भी थे. मनीष भी रीतेश की तरह बेगूसराय के ही है. जागरण पटना के स्कैनिंग विभाग के कई साथी तो यही कह रहे हैं…..

  15. राजेश पांडे Reply

    August 7, 2009 at 9:38 pm

    समरेंद्र,
    ये रीतेश कौन है और कहां काम करता है ये साफ़ होना चाहिए? कहीं ये कोई छद्म नाम तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि दैनिक जागरण का ही कोई शैलेंद्र भक्त अपना नाम बदल कर इस तरह से कुतर्क कर रहा है। तुम इसकी पहचान सार्वजनिक करो या फिर हम इसका भंडाफोड़ करेंगे। इसका खुद का ट्रैक रिकॉर्ड भी तो पता चलना चाहिए।
    - राजेश पांडे

    • रीतेश Reply

      August 7, 2009 at 10:12 pm

      राजेश पांडे जी,

      मैं कौन हूं, ये लिख चुका हूं. आप अंतिम पोस्ट से शुरू कर रहे हैं तो एक बार पहली पोस्ट से फिर शुरू कीजिए. बेगूसराय में आपके जानने वाले कोई पत्रकार होंगे तो आपको पता चल जाएगा कि मैं कोई छद्म नाम धारक शैलेंद्र भक्त नहीं हूं. शैलेंद्र भक्त हूं और अपने असली नाम से ही सामने हूं.

      और, आपको हमारी पहचान सार्वजनिक करने के लिए सीआईडी या सीबीआई जांच की जरूरत नहीं है. समरेंद्र जी से पूछ लीजिए, उन्हें पता है, उनके पास मेरा मेल आईडी है और उसकी सत्यता का प्रमाण भी. फिर भी न पता चले तो आप अपना मेल आईडी दीजिए, मैं सीधे आपको अपनी सीवी भेज देता हूं. पूरा ट्रैक रिकॉर्ड मिल जाएगा.

      भंडाफोड़ करने में आपको कोई दुविधा या दिक्कत न हो इसके लिए मैं बिना मांगे अपना मेल आईडी दे रहा हूं
      riteshiimc@gmail.com

      आपका स्वागत है.

  16. Vedang Reply

    August 7, 2009 at 10:03 pm

    प्रिय भाई,
    आपने तो छह इंच छोटा कर दिया. मजा नहीं आया. उनकी बाकी बातें भी सार्वजिनक हो जाने देते. और अब जब राजेश जी भी कूद ही पड़े हैं तो पर्दा हटा ही देते. मैंने तो अपनी प्रतिक्रिया की कापी रखी नहीं. आपने डिलीट न किया हो तो पूरा जाने दीजिए. मौजूदा स्थिति में अब शैलेंद्र दीक्षित का कच्चा चिट्ठा सामने आना बहुत जरूरी हो गया है. राजेश पांडे जी ठीक ही कह रहे हैं कि कोई शैलेंद्र भक्त छद्म नाम से उनका यशोगान कर रहा है. अगर एसा है तो यह खुद शैलेंद्र ही करा रहे होंगे. शैलेंद्र खुद तो लिख नहीं सकते. एडिट तक तो लिख नहीं सकते. किसी से लिखवा रहे होंगे.

    • समरेंद्र Reply

      August 7, 2009 at 10:23 pm

      वेदांग जी,
      आपने शैलेंद्र दीक्षित की निजी ज़िंदगी के बारे में ऐसी बाते लिखी थी जिन्हें छापा नहीं जा सकता था। हमारा शैलेंद्र से कोई निजी झगड़ा नहीं है। बात एक मुद्दे पर हो रही है और बहस उसी पर केंद्रित रहनी चाहिए।

  17. रीतेश Reply

    August 7, 2009 at 10:05 pm

    वेदांग जी,

    मैंने जब पहला पोस्ट लिखा था, तभी से आपके दिए विशेषण के लिए तैयार बैठा था. चमचा होने में कोई बुराई है क्या. आप नहीं हैं या किसी के चमचा नहीं रहे, ये आपका सौभाग्य है. मुझे ऐसा सौभाग्य नहीं मिला.

    यहां पत्रकारिता और ज्ञान की तो बात ही नहीं हो रही. न मैंने अभी तक दावा किया है कि मैं कोई बड़ा ज्ञानी पत्रकार हूं और दुनिया के तमाम विषयों पर मेरी समझ की कोई सानी नहीं है. आप क्यों लच्छेदार कह रहे हैं मैं ज्ञानी पत्रकार बनने की कोशिश कर रहा हूं. मैं तो टुच्चा पत्रकार हूं और जुम्मा-जुम्मा नौ साल हो गए हैं. उंगलियों पर गिनकर नौ साल. इतना समय तो काफी है बहस में शामिल होने के लिए. आप कह दें कि 15 या 25 साल की पत्रकारिता के बाद बहस में कूदना चाहिए तो अगले 10-15 साल के तौबा कर लूं.

    मुझे दीक्षित जी के यहां नंबर बनाने या बढ़ाने की जरूरत नहीं है क्योंकि मुझे जागरण में छह साल काम करने के बाद उस घर को अलविदा कहे भी चार साल हो चुके हैं. दोबारा वहां जाने की कोई सूरत अगले 20-25 साल तक तो नजर ही नहीं आती. पत्रकारों का फोटो नहीं छापना जागरण की नीति है, आप इसमें कोई शक हो तो फिर से मुझे लिख सकते हैं. मैंने लिखा है फोटो नहीं छापना और आप उसे खींचकर ले गए हैं फोटो ब्लर करने तक. जो कभी गलती से छप गए, उसमें छपे पत्रकारों को पहचानने वाला वहां कोई नहीं रहा होगा, प्रकाश जी को बिहार में सब पहचानते हैं.

    और दीक्षित जी ने हंस-हंस कर फोटो ब्लर करवाया, ये आपकी एक्सक्लूसिव जानकारी है. इसका खंडन तो मैं नहीं कर सकता लेकिन दावे के साथ कह सकता हूं कि ये दो सौ फीसदी झूठ है. फोटो कैसे ब्लर हुआ, क्यों हुआ और किसने किया, आपसे ज्यादा गहराई और सच्चाई के साथ मैं जानता हूं. दीक्षित जी से मेरी कल भी बात हुई थी. कभी आमने-सामने मिलेंगे तो आपको भी बता देंगे, लिखने की बात नहीं है. लेकिन ब्लर हुआ तो कोई गलत नहीं हुआ, ये मेरी राय अब भी कायम है. आप चमचा कहें या चमचाधिराज, इससे जागरण की नीति नहीं बदलने वाली और मेरा बयान भी.

    शुभ रात्रि.

  18. Pravin Reply

    August 7, 2009 at 10:39 pm

    अरे भाई क्या हो रहा है … मामला तो गाली गलौच तक पहुंच गया है … किसकी – किसकी पहचान सार्वजनिक करने की बात हो रही है… मानो लिखने वाला रेपिस्ट हो जो अपना किसी का बचाव कर रहा है.. राजेश पांडे जी ने तो यूं लिखा है मानो समाज का बड़ा भार मैं तो यूं कहूंगा कि समरेंद्र जी खुद साफ करें कि कहानी के पीछे एक किरदार है जिसके समरेंद्र जी का क्या सबंध है?

  19. विद्रोही Reply

    August 7, 2009 at 11:07 pm

    आप लोग रीतेश जी के पीछे क्यों पड़े हैं? उन्होंने तो ये भी मान लिया है कि वो चमचे भी हैं और भक्त भी। अब और बहस करने का क्या मतलब है? जाने भी दो यारों….

  20. रीतेश Reply

    August 7, 2009 at 11:18 pm

    विद्रोही जी,

    आपने तो अभी तक बहस ही नहीं किया और मुझे जाने दे रहे हैं. मैं जाने के मूड में बिल्कुल नहीं हूं. आप बहस में बने रहिए. मैं भी बना हुआ हूं. बीच में मैं छोड़कर नहीं जा रहा और आपसे भी बहस को बीच में न छोड़ जाने का अनुरोध है.

    मैंने आपसे पिछले पोस्ट में पूछा था कि आप मेरे किस शब्द और पंक्ति से आहत हुए हैं, आपने उसका जवाब नहीं दिया. यूं लिखकर गायब मत हो जाइए. लिखिए तो फिर अपने लिखे पर आए जवाब का जवाब भी दीजिए.

    • विद्रोही Reply

      August 7, 2009 at 11:49 pm

      भाई मैं पिछले कुछ समय से जनतंत्र देख रहा हूं, सिर्फ इसलिए कि इस पर सही मुद्दे, सार्थक बहसें होती रही हैं। पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े बेहतरीन मसले उठाए जाते रहे हैं। ये बहस भी कुछ ऐसी ही लगी, इसलिए टिप्पणी कर दी। लेकिन फिर समझ आया कि यहां तो अच्छी-खासी अखाड़ेबाज़ी चल रही है। दंगल हो रहा है। पहली टिप्पणी का मकसद भी यही था कि इस मसले पर कोई सहमति जैसी बात बने और आगे बढ़ा जाए। लेकिन अब ऐसा होने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं लग रही। लिहाजा मेरी दिलचस्पी घट गई है। शायद इसलिए भी कि न तो मैं किसी शैलेंद्र दीक्षित को जानता हूं, न प्रकाश कुमार को और न ही पटना के और तमाम मूर्धन्य पत्रकारों को।
      …रही बात आपके पिछले सवाल का जवाब देने की, तो वो मैंने पहली टिप्पणी में ही लिख दिया था। आप मेरी टिप्पणी फिर से पढ़िए और फिर अपना दिया जवाब। शायद आपको खुद ही समझ आ जाए। आपने अपनी हर दलील में समरेंद्र जी के साथ ही मुझे भी लपेट दिया और कोर्ट-कचहरी में देख लेने की बातें करने लगे। मैं जागरण में रहा हूं या नहीं, इस पर बिना वजह शको-शुबहा भी जता दिया। यही मुझे अजीब लगा। तटस्थ टिप्पणी का जवाब कुछ retaliatory अंदाज़ में दिया गया। भाई मेरे, हर कोई आपकी या समरेंद्र जी की तरह अखाड़ेबाज़ ब्लॉगर नहीं होता। मैं भी नहीं हूं, सो पीछे हटने में ही भलाई है। उम्र के इतने वसंत पार कर चुका हूं कि अब ऊर्जा की कमी भी होने लगी है। आप जैसे नौजवान लोगों की बातें पढ़कर थोड़ा जोश आ जाता है, लेकिन ज़्यादा देर टिकता नहीं। अगर कोई बात बुरी लगी हो, तो कहा-सुना माफ कीजिएगा।

  21. रीतेश Reply

    August 8, 2009 at 12:17 am

    विद्रोही जी,

    आप उम्रदराज हैं यह मुझे नहीं पता था. नेट पर नाम से उम्र या बाकी चीजें पता नहीं चलती. अगर मेरे किसी भी शब्द या वाक्य से आपके सम्मान को ठेस पहुंचा है तो उस के लिए माफी मांग रहा हूं. मैंने तो 30 भी पार नहीं किया है.

    पूरे सम्मान के साथ आपसे आग्रह है कि आप बहस में बने रहिए. बहस को छोड़ जाएंगे तो कुछ गाली-गलौच करने वाले जगह हथिया लेंगे. मैं तो वैसे उनसे भी बहस करने की हिम्मत जुटाए बैठा हूं. अगर अपने पहले संपादक के सम्मान में एक पोस्ट डाल दिया है तो अंतिम पोस्ट तक डटा रहूंगा.

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