
लुबना हुसैन, पत्रकार, सूडान
“मैं इस मामले को ऊपरी अदालत तक ले जाऊंगी। अगर जरूरत पड़ी तो संविधान पीठ तक। अगर वहां भी मुझे गुनहगार ठहराया गया तो मैं चालीस कोड़े खाने को तैयार हूं। सिर्फ चालीस क्यों, मैं चालीस हज़ार कोड़े खाने को तैयार हूं। अगर सभी महिलाएं सिर्फ पहनावे को लेकर कोड़े खाने की हक़दार हैं तो मुझ पर भी चालीस हज़ार कोड़े बरसाए जाएं।”
ये कहना है सूडान की पत्रकार लुबना अहमद अल हुसैन का। लुबना समेत तीन महिलाएं पैंट पहनने के कारण अभद्र व्यवहार की आरोपी हैं। लुबना के मुताबिक उन्हें कोड़े बर्दाश्त हैं लेकिन अपमान बर्दाश्त नहीं। वो इसे नारी जाति का अपमान मानती हैं। मानवता का अपमान मानती हैं। लुबना चाहती तो इस मुकदमे से बच सकती थीं। संयुक्त राष्ट्र की कर्मचारी होने के नाते उन्हें इम्यूनिटी हासिल थी। लेकिन उन्होंने सूडान के इस तानाशाही कानून को चुनौती देने के लिए संयुक्त राष्ट्र की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उनके मुबातिक ये कानून न केवल मानवता के बल्कि शरिया कानून के भी ख़िलाफ़ है और इसे हर हाल में बदला जाना चाहिए।
लुबना को बीते महीने एक सूडान के एक रेस्तरां से गिरफ्तार किया गया था। उस रेस्तरां में लोग मिश्र के गायक को सुन रहे थे। तभी पुलिस ने छापा मारा और 13 महिलाओं को अभद्र व्यवहार के तहत गिरफ़्तार कर लिया। लुबना के मुताबिक “हम 13 महिलाओं में एक ही बात सामान्य थी कि हमने पैंट पहन रखी थी। हम में से 10 महिलाओं ने मान लिया कि उनसे गलती हुई है। उन पर दस कोड़े बरसाए गए और 250 सूडानी पाउंड का जुर्माना लगा। एक लड़की जिसकी उम्र 13 से 14 साल के बीच थी इतना डर गई कि उसका पैंट गीला हो गया।”
लुबना आगे कहती हैं कि “ये सब बीते बीस साल से हो रहा है। आए दिन महिलाओं की गिरफ्तारी होती है और उन पर कोड़े बरसाए जाते हैं।” इसके नतीजे बहुत भयावह होते हैं। “कई बार तो अपमान से ग्रस्त लड़कियां अपने घर नहीं लौटती। कई लड़कियां पढ़ाई छोड़ चुकी हैं। कुछ लड़कियों की तो शादी तक टूट चुकी है।” ये एक ऐसी मानसिक यंत्रणा है जिसका अंत जरूरी है।
लुबना यह भी साफ करती हैं कि उनकी मंशा राजनीतिक नहीं है। उन्हें गुस्सा आता है क्योंकि “महिलाओं को पैंट पहनने से रोकना उनके धर्म इस्लाम की गलत व्याख्या है। पुलिस ने मुझे जिन कपड़ों में गिरफ़्तार किया उन्हीं कपड़ों में अपने खुदा की इबादत करती हूं।” लुबना के मुताबिक “ये धर्म का मसला नहीं बल्कि इससे जाहिर होता है कि मर्द औरतों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं।”
दुनिया भर में तारीफ़
मंगलवार यानी 4 अगस्त को जब इस मामले की सुनवाई होगी, तो पूरी दुनिया की नज़र लुबना पर टिकी होगी। इससे पहले की सुनवाई में भी अदालत में महिला हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं के प्रतिनिधिओं, पत्रकारों और राजयनयिकों की भारी भीड़ मौजूद थी। इस बार भी बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के मौजूद रहने की उम्मीद है। लुबना के समर्थन में पूरी दुनिया से आवाज़ उठ रही है। गार्डियन ने अपने संपादकीय में लुबना की जमकर तारीफ की है। उसने लिखा है कि “बाहर रह कर बदलाव की मांग करना जितना आसान है, अंदर से उस बदलाव के लिए लड़ना उतना ही मुश्किल।” गार्डियन ने कहा है कि हो सकता है कि लुबना ये मुकदमा हार जाएं लेकिन उनकी हार किसी भी जीत से बड़ी होगी। उन्होंने जो मिसाल पेश की है वो दुनिया भर की आज़ाद ख्याल महिलाओं को लड़ने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
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