
लुबना अहमद अल हुसैन, पत्रकार
मंगलवार को अदालत में लुबना उसी लिबास में पहुंचीं जिसमें उन्हें पिछले महीने गिरफ़्तार किया गया था और जिसे अभद्र बताया जा रहा है। लुबना का कहना है कि उन्हें ये मंजूर नहीं कि जिन कपड़ों में वो अपने खुदा की इबादत करती हैं उन्हें अभद्र ठहराया जाए। लुबना उस कानून को भी सही नहीं मानती जिसमें महिलाओं का ड्रेस कोड निर्धारित किया गया है और अमल नहीं करने पर अभद्र बर्ताव का मुकदमा चलाया जाता है।
पिछले महीने गिरफ़्तारी
लुबना समेत 13 महिलाओं को जुलाई में एक रेस्तरां से गिरफ़्तार किया गया था। इसलिए कि उन सभी ने पैंट पहन रखी थी। उनमें से दस महिलाओं ने अपनी गलती मान ली। जिसके बाद पुलिस स्टेशन में उन महिलाओं पर दस-दस कोड़े बरसाए गए और छोड़ दिया गया। लेकिन लुबना और दो अन्य महिलाओं ने गलती मानने से इनकार कर दिया और अब उन पर अदालती कार्रवाई की जा रही है। गुनाह साबित हुआ तो तीनों पर चालीस कोड़े बरसाए जा सकते हैं और 250 सूडानी पाउंड का जुर्माना लगाया जा सकता है।
सरकार और अदालत का रुख

गिरफ़्तारी के वक़्त लुबना की ड्रेस
दरअसल लुबना को जब गिरफ़्तार किया गया उस वक़्त वो संयुक्त राष्ट्र की कर्मचारी थीं। सूडान में संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों को इम्यूनिटी (कानूनी सुरक्षा) हासिल है। उन पर उस वक़्त तक कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती जब तक संयुक्त राष्ट्र इसकी इजाजत न दे दे। संयुक्त राष्ट्र लुबना के समर्थन में था। जज ने भी लुबना से कहा कि वो चाहें तो जा सकती हैं। लेकिन लुबना ने महिलाओं से पहनावे से जुड़े तानाशाही कानून को चुनौती देने के लिए संयुक्त राष्ट्र का पद छोड़ दिया। नौकरी से इस्तीफा दे दिया है।
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